हिरनगाँव (Hirangaon) भारत के उत्तर प्रदेश राज्य के फ़िरोज़ाबाद ज़िले में स्थित एक गाँव है।[1][2]

हिरनगाँव
Hirangaon
हिरनगाँव की उत्तर प्रदेश के मानचित्र पर अवस्थिति
हिरनगाँव
हिरनगाँव
उत्तर प्रदेश में स्थिति
निर्देशांक: 27°10′41″N 78°19′48″E / 27.178°N 78.330°E / 27.178; 78.330निर्देशांक: 27°10′41″N 78°19′48″E / 27.178°N 78.330°E / 27.178; 78.330
ज़िलाफ़िरोज़ाबाद ज़िला
राज्यउत्तर प्रदेश
देशFlag of India.svg भारत
जनसंख्या (2011)
 • कुल695
भाषाएँ
 • प्रचलितहिन्दी
समय मण्डलभारतीय मानक समय (यूटीसी+5:30)
पिनकोड283103

विवरणसंपादित करें

हिरनगाँव एक छोटा-सा गाँव है। किन्तु यह गाँव ऐतिहासिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है। यह जरौली खुर्द ग्राम पंचायत के अन्तर्गत आता है ग्राम हिरनगाँव की कुलदेवी का नाम माता बेलोन (नरोरा) है घनी वसाबट वाली वस्ती से दूर बसे होने तथा खुले एवम् शांतिपूर्ण स्वछ हरियाली युक्त वातावरण व् ट्रैफिक की समस्या से दूर होने के कारण ब्राह्मणों का गाँव कहे जाने वाले इस गाँव में पूर्व में कायस्थ भी रहा करते थे परंतु वर्तमान में कोई भी कायस्थ नहीं रहते अनेक समुदाय के लोग निवास करते है इनमे ब्राहम्ण, जाटव, नाई, कोरी, काछी, वाल्मीकि है ब्राह्म्णों में तिवारी, स्रोतीय, रावत, मुदगल, पाठक, जोशी, तेनुगुरिया, दीक्षित गौत्र के व्यक्ति है हिरनगाँव चार मौहल्लो में विभाजित है जिसमे "तिवारी मौहल्ला, स्रोतीय मौहल्ला, दीक्षित मौहल्ला, एवम जाटव मोहल्ला "सभी समुदाय के व्यक्ति मिलजुल कर घनिस्ट प्रेमता के साथ रहते है। फ़िरोज़ाबाद जिला मुख्यालय से लगभग 16 किलोमीटर पूर्वी दिशा में स्थित है। यहाँ पर अधिकांश व्यक्ति सरकारी सेवा में कार्यरत थे परंतु वर्तमान में अधिकांश व्यक्ति कारख़ानों/फैक्ट्रीयो पर निर्भर है। वर्तमान में जो व्यक्ति सरकारी सेवा में कार्यरत है वो गाँव से बाहर शहर में निवास कर रहे हैं। हिरनगाँव का पिन कोड 283103 है यहाँ पत्रो के आने जाने हेतु भारत सरकार द्वारा स्थापित हिरनगाँव डाकखाना भी है एवम् प्रधान डाकखाना फ़िरोज़ाबाद में स्थित है। जो कि लगभग 8 किलो मीटर दूरी पर है।

आगरा गजेटियर सन 1905 के अनुसार- फिरोजाबाद मैं दो दिन बाजार लगता था रविवार एवं बृहस्पतिवार को जिन जिन ग्राम वासियों को कोई भी शहर से सामान खरीदना होता था तब वह इन निर्धारित दिनों में ग्राम के कई लोग मिलजुल कर पैदल अपने ग्राम से शहर जाते थे और अपने लिए आवश्यकता के सामान खरीद कर लेकर आते थे हिरनगाँव ग्राम के ग्रामवासी मेला देखने के लिए अपने निकटतम, ग्राम अलीनगर केंजरा, उलाऊ, जरौली कलां में मेला देखने जाते थे उस समय ग्राम उलाऊ के मेले में लगभग 250 व्यक्तियों की भीड़ आती थी व ग्राम अलीनगर केंजरा में लगभग 300 व्यक्तियों की मेले में भीड़ लगती थी एवं जरौली कलां ग्राम के मेले में लगभग 400 व्यक्तियों की भीड़ लगती थी।

हिरनगाँव के चारों तरफ देवी देवताओं के मंदिर बने हुए हैं जो कि इस गांव की विपत्तियों से रक्षा करते हैं इस गांव में यदि किसी व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है तो उस व्यक्ति कादा संस्कार उसको बैठा कर किया जाता है योग क्रिया की तरह जबकि अन्य गांव में इस तरह की प्रथा नहीं है अन्य गांव में किसी भी मृत व्यक्ति का दाह संस्कार लिटाकर किया जाता है इस प्रथा को इस गांव हिरनगाँव के व्यक्ति पूर्वज ऋषि मुनि की योगसाधना से जोड़ते हैं क्योंकि प्राचीन काल में ऋषि मुनि अपनी योग साधना ऋषि मुद्रा में लीन होकर करते थे हिरनगांव ग्राम वासियों के कुल के पंडा पंडित राजेश कुमार सम्राट पुत्र स्व0 गिरिराज धरण सम्राट निवासी मोहल्ला अंदर दहलान सोरों जिला कासगंज उत्तर प्रदेश है।

हिरनगाँव के उत्तर मे नारखी तहसील, दक्षिण में फ़तेहाबाद, पश्चिम में टूण्डला तहसील और पूर्व में शिकोहाबाद तहसील है। हिरनगाँव के पूर्व में ग्राम जरौलीखुर्द पश्चिम में ग्राम अकबरपुर उत्तर में ग्राम अलीनगर केंजरा दक्षिण में ग्राम है आगरा मंडल 42 किलो मीटर दूरी पर है जिसमे कई मुगलकालीन ऐतहासिक इमारते सुशोभित है।

इतिहाससंपादित करें

हिरनगाँव का इतिहास प्राचीन बताया जाता है। यह प्राचीन समय में हिरनगौ के नाम से जाना जाता था क्योंकि इस गाँव में अधिकांश संख्या में हिरण और गऊ रहा करती थी। वर्तमान में हिरन तो नहीं रहे लेकिन गाय कुछ संख्या में देखी जा सकती है। प्राचीन समय में गाय का बहुत महत्व था कहा जाता है कि हमारी पृथ्वी गाय के सींग पर टिकी हुई है। हिरनगौ (हिरनगाँव) से 12 किलोमीटर दूरी पर फ्रेंच, आर्मी चीफ डी. वायन ने सन नवंबर 1794 में फिरोजाबाद में आयुध फैक्ट्री की स्थापना की। श्री थॉमस ट्रविंग ने भी अपनी पुस्तक 'ट्रैवेल्ज़ इन इंडिया' में इस आयुध फैक्ट्री का उल्लेख किया है। 30 सितंबर 1803 को फिरोजाबाद नगर अंग्रेजों के अधीन हो गया और अंग्रेजी सरकार की हुकूमत फिरोजाबाद नगर पर चलने लगी। लेखक क्षेमचंद सुमन द्वारा अपनी हस्त्तलिखित पुस्तक "दिवंगत हिंदी सेवी भाग 2" में सन 1822 में ग्राम हिरनगौ मैं एक अन्य परिवार के बसने का उल्लेख किया है। इससे प्रतीत होता है कि यह ग्राम ततसमय अस्तित्व में था। 1800 सदी में जन्मे इस गाँव के निवासी क्रांतिकारी पंडित तेजसिंह तिवारी जिन्होंने सन 1857 की क्रांति की जंग में भाग लिया था। इनके पुत्र पंडित खुशालीराम तिवारी, जिनकी ख्याति बहुत दूर दूर तक फैली हुई थी, उन्होंने हिरनगाँव प्राथमिक विद्ययालय की ज़मीन दान में दे दी। सन् 1876 में इस गाँव में तोताराम सनाढ्य का जन्म हुआ था जिनके अथक प्रयासों से गिरमिटिया/बंधुआ मजदूरी प्रथा को समाप्त किया जा सका एवम् उनके द्वारा फिजी देश में मेरे 21 वर्ष पुस्तक इसी प्रयोजन से लिखी गई थी। इस पुस्तक को भारती भवन द्वारा प्रकाशित कराकर भवन की ख्याति को बढ़ाया। इस पुस्तक का अंग्रेजी अनुवाद कराकर दीनबंधु एंड्रूज फिजी लेते गए एवम् तोताराम सनाढय की मेहनत और त्याग के फलस्वरूप फिजी द्वीप प्रशांत महासागर स्वर्ग के नाम से प्रशिद्ध है।

तोताराम सनाढय की मृत्यु पर महात्मा गांधी ने लिखा " वयोवृद्ध तोताराम जी किसी से भी सेवा लिए वगैर ही गये वे सावरमति आश्रम के भूसण थे विद्वlन तो नहीं पर ज्ञानी थे भजनों के भण्डार थे फिर भी गायनाचार्य थे अपने एक तारे और भजनों से आश्रमवासियो को मुग्ध कर देते थे "परोपकाराय सत्ता विभूतय "तोताराम जी में ये अक्षरश सत्य रहा"।

दर्शनीय स्थलसंपादित करें

  • बाबा नीम करोरी महाराज - हिरनगाँव से 500 मीटर दुरी पर बाबा नीम करोरी महाराकी भी जन्म स्थली है जिनके धार्मिक मंदिर देश में ही नहीं अपितु विदेशो में भी बने हुए है। यहाँ प्रतिवर्ष भंडारा होता है एव श्रदालु हजारो की संख्या में बाबा का प्रसाद ग्रहण करते है और उनका आशिर्वाद भी प्राप्त करते है।
  • वैष्णो देवी मंदिर- हिरनगाँव से लगभग 4 किलो मीटर दूर पर मंदिर बना हुआ है यहाँ कोई भी सच्चे मन से मांगी गई मन्नत पूरी होती है यहाँ प्रतिवर्ष नवदुर्गो में मेला लगता है और हजारो की संख्या में बड़ी दूर दूर से श्रदालु माता के दर्शन के लिए आते है और अपनी मन्नते पूर्ण करने के लिए मांगते है एव लेजा भी काफी संख्या में यहाँ चढ़ाये जाते है।
  • महावीर दिगम्बर जैन मंदिर- हिरनगाओं से लगभग 8 किलो मीटर दूर जैन मंदिर की स्थापना स्वर्गीय सेठ छि दामी लाल जैन द्वारा की गई थी मंदिर के हॉल में भगवान महावीर जी की सुन्दर मूर्ति पदमासन की मुद्रा में स्थापित है , इस सुन्दर व् विशाल मंदिर में 2 मई 1976 में 45 फीट लंबी और 12 फीट चोडी भगवान वाहुवलि स्वामी की मूर्ति स्थापित की गई है मूर्ति का वजन कुल 130 तन है यह उत्तरी भारत की पहली तथा देश की पाँचवी बड़ी प्रतिमा है एवम् चंद्रप्रभु की सुन्दर प्रतिमा भी स्थापित है सम्पूर्ण भारतवर्ष से जैन मतावलंबी महावीर दिगंबर जैन मंदिर के दर्शनार्थ हजारो की संख्या में प्रति माह आते रहते है।
  • चंदवार गेट - हिरनगाँव से लगभग 13 किलो मीटर दूर यमुना तट पर चंदवार वसा हुआ है चंद्रवार का किला (फिरोजाबाद) यहाँ पर मोहम्मद ग़ोरी एवम् जयचंद का युद्ध हुआ था। जैन विद्वानों की यह मान्यता थी कि ये कृष्न भगवान कृष्न के पिता वासुदेव द्वारा शसित रहा है कहा जाता है कि चंदवार नगर की स्थापना चंद्रसेन ने की थी। यमुना नदी ग्राम से होकर बहती है जहां चंद्रसेन के वंशज चंद्रपाल द्वारा बनवाए किले के अवशेष खंडहर इनकी विशालता एवं वैभव की कहानी कहते हैं पुरातात्विक दृष्टिकोण से चंद बार एक महत्वपूर्ण स्थान है सूफी साहब की दरगाह से लगभग 1 किलोमीटर दूर दक्षिण की ओर यमुना नदी के किनारे राजा चंद्रसेन के किले का टीला स्थित है इस टीले पर एक छोटी इमारत खड़ी है जिसके नीचे के भाग की ईट निकल रही है ऊपर आने के लिए एक जीना है जिसकी सीढ़ियां टूट गई है पानी से टीला कहीं-कहीं कट गया है ऐसी किवदंती है कि टीले पर दूब घास नहीं उगती जबकि खाई के बाहरी और यह खास उगती हैं
  • राजा का ताल - हिरनगाँव से लगभग 2 किलोमीटर दूरी पर राजा का ताल बसा हुआ है फिरोजाबाद गजेटियर द्वारा राजा के ताल का निर्माण सम्राट अकबर के नवरत्नों में से एक मंत्री राजा टोडरमल ( राजस्व मंत्री)द्वारा कराया गया था आगरा मार्ग के किनारे लाल पत्थर से बना बड़ा राजा का ताल राजा टोडरमल का स्मरण कराता है इस ताल के विषय में एक रुचिकर तथ्य है कि यहां ताल के मध्य में पत्थर का बना एक मंदिर है जहां एक बांध पुल द्वारा पहुंचा जा सकता है परंतु वर्तमान में अब यह ताल नाम मात्र का रह गया है और यहां पर ज्यादातर मकान बन चुके हैं परंतु कहीं कहीं पर लाल ककरी की दीवार नाममात्र के रूप में नजर आती है
  • फिरोजशाह का मकवरा - हिरनगाँव से लगभग 9 किलो मीटर दूर नगर निगम फ़िरोज़ाबाद के सामने फिरोज शाह का मकवरा 16वी सताब्दी का निर्मित बताया जाता है। इस मकबरे में ख़वाजा मुग़ल सेनापति फ़िरोज़शाह की कब्र है उ0प्र0 वफ बोर्ड द्वारा मकवरे की देखवाल की जा रही है।
  • नूरजहाँ - हिरनगाँव से लगभग 18 किलो मीटर दूर नूरजहाँ का मकवरा आगरा मै स्थित है।
  • महा वृक्ष अजान - हिरनगाँव से लगभग 16 किलो मीटर दूरी पर कोटला रोड पर बड़ा गाँव तथा जाटउ मार्ग पर एक बृक्ष जिसकी गोलाई 9.80 मीटर तथा ऊँचाई 19.3 मीटर है महा बृक्ष अजान के नाम से जाना जाता है इस बृक्ष पर जुलाई माह में सफ़ेद रंग के फूल आते है।
  • सूफी शाह - हिरनगाँव से लगभग 15 किलो मीटर दूर दक्षण में यमुना के किनारे सूफी शा ह का मकवरा है जहाँ प्रतिवर्ष मेला लगता है तथा उर्श भी होता है उक्त स्थल पर सूफी शाह की मजार पर नगर के मुस्लिम व् हिन्दू श्रद्धा से मेले में सरीक होते है।
  • सांती - हिरनगाँव से लगभग 13 किलो मीटर दूर उत्तर दिशा में सांती ग्राम स्थित है यहाँ पर लगभग 100 बीघा में स्थित एक प्राचीन खेरा तथा शिवजी का मंदिर है कहा जाता है कि प्राचीन समय में राजा शान्तनु का यहाँ किला था फाल्गुन माह के कृष्न पक्ष की त्रयोदसी के दिन यहाँ प्रत्येक वर्ष हजारो की संख्या में भक्तजन गंगा से जल लाकर कावर चढ़ाते है एवम् उसी दिन मेला भी लगता है यह मेला लगभग 200 वर्ष पुराना वताया गया है।
  • शाही मस्जिद - हिरनगाँव से लगभग 9 किलो मीटर दूर आगरा गजेटियर के अनुसार नगर की सबसे प्राचीन शाही मस्जिद जोकि वर्तमान में कटरा पठानान में है का निर्माण शेरशाह सूरी ने कराया था।
  • गोपाल आश्रम - हिरनगाँव से लगभग 9 किलो मीटर दूर सेठ रामगोपाल मित्तल द्वारा बाई पास रोड स्थित आश्रम का निर्माण 1953 में कराया आश्रम में 57 फीट ऊँची हनुमान की प्रतिमा स्तापित है इस आश्रम में एक विशाल सत्संग भवन है यहाँ पर प्रतिदिन सत्संग होता है।
  • श्री हनुमान मंदिर - हिरनगांव से लगभग 9 किलोमीटर दूरी पर मराठा शासन काल में श्री वाजीराव पेशवा द्वतीय द्वारा इस मंदिर की स्थापना एक मठिया के रूप में की गई। यहाँ 19वी शताब्दी के ख्याति प्राप्त तपस्वी चमत्कारिक महात्मा वावा प्रयागदास की चरण पादुकाएं भी स्थित है।
  • पाढ़म - एका शिकोहावाद मार्ग पर स्थित परीक्षित नगरी पाढ़म के खण्डर एक विशाल खेड़े के रूप में अपने प्राचीन वैभव के ज्वलंत प्रमाण है यह खेड़ा एक किलो मीटर की वृत्ताकार परधि में स्थित है मान्यता है कि अर्जुन के पोत्र तथा अभिमन्यु के पुत्र महाराजा परीक्षित की नागदंश् के फलस्वरूप मृतु के उपरांत उनके पुत्र जनमेजय ने पृथ्वी के समस्त नागो को नस्ट करने के लिए इशी स्थान पर नाग यज्ञ किया था। ग्राम के नाम का संबंध राजा परीक्षित से जोड़ा जाता है होने के पहले ऐसे स्थान का नाम वरदान था कालांतर में ग्राम ने अपना वर्तमान नाम प्राप्त किया खुदाई में परीक्षित कुंड नाम के यज्ञ कुंड के अंदर प्राप्त यज्ञ सामग्री व हानि रहित सरपंच से यह एक सामान्य धारणा है कि सर्पदंश से पिता की मृत्यु के पश्चात परीक्षित के पुत्र जनमेजय द्वारा यहां एक बड़ा यज्ञ किया गया था पांडव खेड़े की उचाई 200 फुट है इस खेड़े की खुदाई में 3.5 गज की मोटी दीवारे निकली है खुदाई से प्राप्त ईटे विभिन्न आकार में एक फुट से लेकर 1.5 फुट तक लम्बी है खेड़े पर एक प्राचीन कुआँ है जिसे परीक्षित कूप कहा जाता है यहाँ दो प्राचीन जैन मंदिर भी है जनमेजय का नाग यज्ञ कुण्ड भी खेड़े के समीप ही है। किस स्थल की खुदाई में कुछ पक्की सीढ़ियां तथा कुछ खंडित मूर्तियां मिली खुदाई में प्राप्त कुछ मूर्तियां दक्षिणी कोने पर स्थित मंदिर में दर्शनार्थ रखी है वर्ष में दो बार चेत्र एवं आश्विन की पूर्णमासी पर पालम के काली मंदिर में मेला लगता है स्थानीय निवासियों का कहना है कि सब जग समाप्त होने के समय से ही यह मेला लगना शुरु हो गया था यह मेला कुंड का मेला के नाम से जाना जाता है वर्तमान में कुंड का अस्तित्व समाप्त प्राय हो गया है केवल पश्चिमी किनारे पर कुंड के कुछ विशेष हैं यह स्थल यद्दपि समतल है परंतु खुदाई के फलस्वरूप यह चौकोर प्रतीत होता है ग्राम के उत्तर में पत्थर से बना प्राचीन हुआ है जिसके संबंध में किवदंती है कि इसे राजा परीक्षित ने निर्मित कराया था इसीलिए इसे परीक्षित को कहते हैं स्थानीय मान्यता है कि कुए के पानी के प्रयोग से चर्म रोग से मुक्ति मिल जाती थी किंतु अब ऐसा नहीं होता है ये के पास ही दक्षिण दिशा में एक छोटी धर्मशाला है इस कस्बे के दक्षिण पश्चिम उत्तर पश्चिम उत्तर दक्षिण पूर्व में एक विशाल खेड़ा जिला है जो महाभारत कालीन किले का अवसेश माना जाता है कहा जाता है कि यदाकदा खेड़े पर खुदाई में सिक्के की प्राप्ति हुई होती है इस स्थान की प्राचीनता इस तथ्य से प्रमाणित होती है कि इनके खंडहरों अवशेषों में अनेक सिक्के प्राप्त होते हैं जो कुछ युद्ध कालीन तथा इंडोर ससा नियम काल के हैं मोहम्मद बिन सामी से अकबर के शासन काल के सिक्के मिलना सामान्य है विभिन्न सिक्कों को अटूट श्रंखला यह दर्शाती है कि यह स्थान अति प्राचीन काल से विभिन्न राजाओं अथवा बादशाहों की सत्ता का केंद्र रहा होगा मलबे के टीले के नीचे दबे सिक्कों के अलावा अब कुछ भी मनुष्य निर्माण शेष नहीं रह गया है परीक्षित कूप के पूर्व में लगभग 30 से 40 मीटर की दूरी पर मोहम्मद साहब की दरगाह है यहां चैत्र के महीने में 2 दिन का उर्स लगता है
  • कोटला का किला - हिरनगांव से लगभग 12 किलोमीटर दूरी पर 1884 के गजेटियर के अनुसार कोटला का किला जिसकी खाई 20 फ़ीट चोडी, 14 फुट गहरी, 40 फुट ऊँची दर्शाई गई है भूमि की परधि 284 फ़ीट उत्तर 220 फ़ीट दक्षिण तथा 320 फ़ीट पूर्व तथा 480 फ़ीट पछिम में थी वर्तमान में ये किला नस्ट हो गया है किन्तु अब भी उसके अभिषेश देखने को मिलते है।
  • रपडी "' - शिकोहाबाद से दक्षिण किनारे यमुना नदी के निकट रपडी जागीर के अवशेष आज भी विधमान है कहा जाता है कि राव जोरावर सिंह ने रपडी को वसाय था उनके वंशजों को मोहम्मद गौरी से 1194 में युद्ध करना पड़ा जागीर के अवशेष आज भी यमुना नदी किनारे समान है आओ जरा वर्शन के राज्य का विस्तार यमुना के कारण और प्रभाव आग मुस्तफाबाद घिरोर और बरनाहल के परगने तक था राजा जयचंद को पराजित करने के पश्चात मुस्लिम सेना चंद बाहर से सन 1194 में दक्षिण की ओर चली तब उसने रबड़ी के राजा पर आक्रमण किया तथा करता में पराजित किया राजा रतन सेन के पराभव के उपरांत रबड़ी मुसलमान शासन की जागीर के रूप में रहे परंतु मुस्लिम शासकों के पराभव तथा मराठा शासकों के अभ्युदय के साथ रबड़ी का भी पराभव प्रारंभ हो गया विभिन्न मस्जिदें कब्रे कुएं बावली रबड़ी के प्राचीन वैभव के मुंह प्रमाण है अनेक खंडहरों के अवशेषों से प्राप्त शिलालेखों ने स्थानीय इतिहास पर पर्याप्त प्रकाश डाला है इनमें से सबसे महत्वपूर्ण शिलालेख अलाउद्दीन खिलजी के शासनकाल का है यहां शेरशाह सूरी एवं सलीम शाह के शासन काल में अनेक भवन निर्मित हुए शाही भवनों में से एक के द्वार के चिन्ह अब भी विद्वान है जो यह संकेत देते हैं कि रपड़ी बहुत बड़ा एवं संपन्न कस्बा था एक सुविख्यात संत किट्टू शाह की दरगाह पर वार्षिक उर्स लगता है जहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु एकत्र होते हैंे यह संत एक ईश्वर के उपासक थे वह अपनी शक्ति से अनेक चमत्कार दिखाते थे यमुना को पार करने के लिए यह अत्यंत महत्वपूर्ण स्थल रहा है यह नावों का एक अस्थाई पुल है जो आगरा जिले के बटेश्वर में महान पशु मेला जाने के लिए मुख्य मार्गों में से एक है मोहम्मद खा नामक व्यक्ति द्वारा मोहम्मदाबाद जो बाद में शिकोहाबाद जाना गया की स्थापना के कारण रबड़ी महत्व होता गया के लिए के समस्त चिन्ह समाप्त हो गए और वह मत देखती रह गया है रबड़ी के लिए के खंडहर पर यमुना के किनारे एक कच्छ में दो कपड़े बनी है यह टीला शिकोहाबाद बटेश्वर मार्ग के दक्षिण की ओर है इस शताब्दी के आठवें दशक के मस्त मध्य जब सड़क पक्की हो गई थी तब इसे चौड़ा किया गया इस निर्माण की प्रक्रिया में किले का द्वार गिर गया इसी खुदाई के समय सोने की ईट प्राप्त हुई थी वहां एक ईदगाह है , यहाँ वुजुर्ग फरीदउद्दीन चिस्ती की दरगाह भी है चैत्र की फसल कटने क बाद यहाँ उर्ष का मेला लगता है दरगाह के पीछे एक ईदगाह भी है जिसकी दीवारो पर अरवी में कुरान की आयते भी लिखी हुई है पुराने समय में एक किलो मीटर के दायरे में विशाल किला बना होगा जिसके टूटे हुए पत्थर व् ईटे आज भी भिखरी हुई है एक मस्जिद तथा एक पक्का कुआ के अवशेष आज भी मौजूद है।

हवाईअड्डासंपादित करें

  • आगरा- हिरनगाँव से आगरा हवाईअड्डा लगभग 47 किलो मीटर दूरी पर है।
  • दिल्ली- हिरनगाँव से दिल्ली हवाईअड्डा लगभग 250 किलो मीटर है।
  • लख़नऊ- हिरनगाँव से लखनऊ हवाई अड्डा लगभग 330 किलो मीटर है।
  • वाराणसी- हिरनगाँव से वाराणसी हवाई अड्डा लगभग 570 किलो मीटर है।

यातायातसंपादित करें

हिरनगाँव के नजदीक ही हिरनगाँव रेलवे स्टेशन लगभग 1.5 किलो मीटर की दूरी पर है एवम् 42 किलोमीटर दूर आगरा रेलवे कैंट और आगरा किला सबसे प्रमुख रेलवे स्टेशन है।[3] यहाँ आने जाने हेतु टैक्सी एवम् टैम्पू की समुचित व्यवस्ता है। 8 किलो मीटर दूरी पर फ़िरोज़ाबाद रोडवेज बस स्टैण्ड है दिल्ली से यहाँ आने के लिए बस एवम् रेल द्वारा पंहुचा जा सकता है रेल द्वारा पहुचने के लिए नजदीक स्टेशन टूण्डला,फीरोजाबाद,एवम् आगरा है। सन 1862 में 1 अप्रैल को टूण्डला से शिकोहाबाद के लिए पहली रेलगाड़ी चालू हुई एव इसके अगले वर्ष से मार्च 1863 से टूण्डला से अलीगढ तक रेल चलने लगी।

उद्योगसंपादित करें

उत्तर प्रदेश में सर्वप्रथम काँच का कारखाना हिरनगाँव रेलवे स्टेशन पर स्थापित है। जो की वर्तमान में बंद है। हिरन गाँव के निकट 2 किलो मीटर पर काँच के अनेको कारखाने/ फैक्ट्रीया लगी हुई है जिसमे काँच के अनेको प्रकार के आइटम तैयार किये जाते है। जैशे- चूड़िया, झूमर, ग्लास, आदि। यहाँ पर मकान बनाने वाले कुशल कारीगर राजमिस्त्री,एवम् वेलदार अनुसूचित जाति में काफी संख्या में है जो कि भव्य एवम् सुन्दर इमारतों को बनाने में सक्षम है

शिक्षासंपादित करें

हिरनगाँव में प्राथमिक पाठशाला एवम् महाविद्यालय भी है।प्राथमिक पाठशाला का निर्माण सन् 1889 में हुआ था आगरा गजेटियर सन 1912 के अनुसार- हिरनगाँव प्राथमिक विद्यालय मैं पढ़ने वाले विद्यार्थियों की उपस्थिति लगभग 72 की संख्या में थी जो कि वर्तमान में मॉडर्न स्कूल बनाया जा रहा है। हिरन गाँव प्राथमिक पाठशाला बनवाने के लिए खुशालीराम तिवारी पुत्र तेजसिंह तिवारी द्वारा जमीन दान में दी गई जिसमे आज पाठशाला सुशोभित है बर्तमान में गाँव के अधिकांश विद्यार्थी यहाँ शिक्षा प्राप्त करते है।

स्वास्थ्यसंपादित करें

उप सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र हिरनगाँव की स्थापना लगभग 2009 में गाँव की जनता के स्वास्थ्य की देख रेख करने हेतु सरकार द्वारा की गई , स्वास्थ्य केंद्र की स्थापना के निम्नलिखित उद्देश्य थे।

  • जनमानस के स्वास्थ्य की देखरेख करना एव उन्हें स्वास्थ्य सम्बंधित सुविधाएं प्रदान करना।
  • सरकार की छवि को बनाये रखना।
  • ग्रामीण छेत्र को स्मार्ट बनाना।

इन्हें भी देखेंसंपादित करें

बाहरी जोड़संपादित करें

सन्दर्भसंपादित करें

  1. "Uttar Pradesh in Statistics," Kripa Shankar, APH Publishing, 1987, ISBN 9788170240716
  2. "Political Process in Uttar Pradesh: Identity, Economic Reforms, and Governance Archived 23 अप्रैल 2017 at the वेबैक मशीन.," Sudha Pai (editor), Centre for Political Studies, Jawaharlal Nehru University, Pearson Education India, 2007, ISBN 9788131707975
  3. "संग्रहीत प्रति". मूल से 5 फ़रवरी 2016 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 28 जनवरी 2016.