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अवंतिसुंदरी कथा संस्कृत साहित्य के गद्यकाव्य के अंतर्गत एक महत्वपूर्ण कथाप्रबंध है। विद्वानों ने इसे आचार्य दण्डी की कृति माना है और इनकी तीसरी रचना के रूप में इसी प्रबंध को मान्यता दी है। दंडी के काव्यादर्श की टीका जंघाल ने इसे दंडी की रचना कहा है।[1]

दण्डी के आविर्भावकाल की संभावना विद्वानों ने ५०० ई. से ८०० ई. के बीच की है। प्राचीन ग्रंथों की खोज में अवंतिसुंदरी कथा की एक अपूर्ण प्रति उपलब्ध हुई थी।[2] एम. आर. कवि नामक एक विद्वान् ने इसका संपादन करके सन् १९२४ ई. में इसे प्रकाशित करवाया और पुष्ट प्रमाणों के आधार पर इसे दण्डी की रचना बताया। इसका कथानक कविकल्पित है; जैसा कथाप्रबंध के लिए आवश्यक है। इसका कथानक दण्डी के दशकुमारचरित की भांति ही है। राजकुमारों और अवंतिसुंदरी नायिका की कथा के व्याज से इसमें तत्कालीन समाज का यथातथ्य चित्रण उपलब्ध होता है। गद्यशैली की दृष्टि से यह कथा प्रबंध एक महत्वपूर्ण कृति है और संस्कृत गद्यकाव्य की शैली के विकासक्रम में एक निश्चित सोपान के रूप में माना जाता है।

इन्हें भी देखेंसंपादित करें

सन्दर्भसंपादित करें

  1. A Companion to Sanskrit Literature: Spanning a Period of Over Three Thousand Years, Containing Brief Accounts of Authors, Works, Characters, Technical Terms, Geographical Names, Myths, Legends, and Several Appendices, Sures Chandra Banerji, pp. 141, Motilal Banarsidass Publishers, 1989, ISBN 978-81-208-0063-2, ... AVANTISUNDARlKATHA : A fragmentary prose work. Some scholars believe that it is the lost Purvapithika of the Dasakumaracarita of Dandin. Other scholars reject the theory ...
  2. Encyclopaedic Dictionary of Pali Literature, pp. 124, Global Vision Publishing House, 2004, ISBN 978-81-87746-67-6, ... Avantisundari Katha is written by celebrated 7th century Sanskrit writer Dandin. As now available, the work is incomplete ... The main story of Avantisundari is almost the same as that of the Daskumara Charita ... adventures of Prince Rajvahana, mixing supernatural incidents with plausible ones ...