भाषापरिच्छेद, विश्वनाथ न्यायपञ्चानन कृत (1634 ई) एक दार्शनिक ग्रंथ है जिसे 'कारिकावली' या 'न्यायकारिकावली' भी कहते हैं। यह न्याय-वैशेषिक दर्शन का ग्रन्थ है। इस पर उन्होने स्वयं 'न्यायसिद्धान्तमुक्तावली' नाम से स्वयं भाष्य लिखा है।

न्याय दर्शन और वैशेषिक दर्शन दोनों प्रमाणप्रधान दर्शन हैं। इस दृष्टि से दोनों दर्शनों में समानता है। दोनों दर्शन ईश्वर को सृष्टि का निमित्त कारण मानते हैं। वैशेषिक दर्शन में सम्पूर्ण सत्ता को सात पदार्थों में विभाजित किया गया है - द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, विशेष, समवाय और अभाव। न्याय के 16 पदार्थों की अपेक्षा अधिक संगत होने के कारण यही विभाजन आगे चलकर अधिक मान्य हुआ तथा न्याय-वैशेषिक-दर्शन की उस संयुक्त परंपरा का आधार बना, जिसका प्रतिनिधित्व "न्यायमुक्तावली" आदि अर्वाचीन ग्रंथ करते हैं।

बाहरी कड़ियाँसंपादित करें