कृत्रिम वीर्यसेचन (English: artificial insemination) intrauterine insemination (IUI) गर्भधारण कराने के उद्देश्य से मैथुन के बजाय अन्य तरीके से मादा के गर्भाशय में नर का शुक्राणु पहुँचाना होता है। मानवों में यह कार्य मुख्यतः बाँझपन की चिकित्सा के रूप में प्रयोग किया जाता है जबकि गाय-भैस एवं अन्य पशुओं में प्रजनन के सामान्य विधि के रूप में प्रयुक्त होता है।

इंट्रा यूटेराइन इनसेमिनेशन
इंट्रा यूटेराइन इनसेमिनेशन महिलाओं मे।
इंट्रा यूटेराइन इनसेमिनेशन महिलाओं मे।

स्त्रियों में कृत्रिम वीर्यसेचन

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स्त्रियों में कृत्रिम वीर्यसेचन की कई तकनीकें हैं-

  • (१) इन्ट्रासर्विकल इन्सेमिनेशन (Intracervical insemination)
  • (२) इन्ट्रायूरेटाइन इन्सेमिनेशन (Intrauterine insemination)
  • (३) Intrauterine tuboperitoneal insemination
  • (४) इन्ट्राट्यूबल इन्सेमिनेशन (Intratubal insemination)

इंट्रा यूटेराइन इनसेमिनेशन

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इंट्रा यूटेराइन इनसेमिनेशन (आईयूआई) तकनीक सहज शब्दों में कहे तो कृत्रिम गर्भाधान प्रक्रिया के माध्यम से नि:संतान दंपति भी संतान प्राप्त कर सकते है। बांझपन की स्थिति के लिए पुरुषों की शारीरिक कमियां भी उत्तरदायी है। जैसे उनके वीर्य में शुक्राणु संख्या की कमी, शुक्राणु के बाहर निकलने में बाधा, वीर्य में संक्रमण, शुक्राणु की गति में कमी आदि। इसके विपरीत महिलाओं में गर्भाशय का अविकसित होना, अंडाशय में कमी जैसे अंडाणु का न बनना अथवा गाँठ, गर्भाशय के मुख से संबंधित रोग, योनि का छोटा होना कुछ प्रमुख कारण है।

आईयूआई तकनीक में फैलोपियन ट्यूब का सामान्य होना जरूरी है। इस विधि के तहत महिला को पहले ऐसी दवाएं दी जाती है, जिनके असर से उसमें अंडाणु ज्यादा बनने लगें। इससे गर्भ ठहरने के अवसर बढ़ जाते है। इसके बाद अल्ट्रासाउन्ड के माध्यम से इस बात का पता लगाते है कि माह के किस दिन अंडाणु निकलता है और इसे भी नियंत्रित करने के लिए एक ऐसा इंजेक्शन लगाया जाता है, जिससे ठीक ३६ घंटे बाद ही अंडाणु निकलता है। इससे यह अनुमान लगाना आसान होता है कि किस समय शुक्राणु को गर्भ में प्रवेश कराया जाए। इस अंडाणु निर्गम की जांच विधि को फॉलिक्युलर मॉनीटरिंग कहते हैं।

इस बीच पुरुष के शुक्राणु को लेकर उसे सही तरह से साफ कर लिया जाता है और विशेष तकनीक से उसे गाढ़ा किया जाता है। इससे शुक्राणु की गुणवत्ता और गतिशीलता बढ़ जाती है। अंडाणु निकलने के समय इस शुक्राणु को गर्भ में डाला जाता है। ऐसे में गर्भ ठहरने के अवसर ४० से ६० प्रतिशत तक होते है। आईयूआई तकनीक का प्रयोग उस समय भी किया जाता है, जबकि पुरुष में शुक्राणु बिल्कुल नहीं होते अथवा दवा के प्रयोग करने के बाद भी उनकी संख्या नहीं बढ़ती। ऐसे में किसी डोनर के शुक्राणु का प्रयोग किया जाता है। शुक्राणु को अंदर डालने के बाद एक निश्चित अवधि के अंतराल पर बराबर देखना पड़ता है कि शुक्राणु से अंडाणु मिला या नहीं? अगर नहीं मिलता है तो फिर दोबारा इस प्रक्रिया को करना पड़ता है। शुक्राणु का गर्भाधान कराने के पश्चात 'ल्यूटीयल सपोर्ट' के लिये दवाएं दी जाती है और महिला को आराम करने की सलाह दी जाती है। इस प्रक्रिया के १२ से १६ दिन के अंदर गर्भाधान को सुनिश्चित किया जाता है।

पशुओं में कृत्रिम वीर्यसेचन

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कृत्रिम वीर्यसेचन (Artificial Insemination), 'कृत्रिम प्रजनन' अथवा 'कृत्रिम गर्भाधान' का तात्पर्य मादा पशु को स्वाभाविक रूप से गर्भित करने के स्थान पर यंत्र या पिचकारी द्वारा गर्भित करना है। स्वच्छ और सुरक्षित रूप से एकत्र नर पशु के वीर्य को इस प्रक्रिया में जननेंद्रिय अथवा प्रजनन मार्ग में प्रवेश कराकर मादा पशु को गर्भित किया जाता है। इस प्रकार कृत्रिम गर्भाधान से जो बच्चे पैदा होते हैं वे प्राकृतिक ढंग से पैदा हुए बच्चों के ही समान बलवान्‌ और हृष्टपुष्ट होते हैं।

छह सौ वर्ष पूर्व १३२२ ई. में अरब के एक सरदार ने अपने शत्रु सरदार के घोड़े का वीर्य निकालकर अपनी एक बहुमूल्य घोड़ी को कृत्रिम रूप से गर्भित करने में सफलता प्राप्त की थी। यूरोप में प्लानिस ने १८७६ ई. में कृत्रिम रूप से एक कुतिया को गर्भित किया था। कृत्रिम वीर्य सेचन पर प्रथम वैज्ञानिक अन्वेषण १७८० ई. में इटली के शरीरक्रिया के प्रसिद्ध वैज्ञानिक ऐबट स्पलान जानी ने एक कुतिया के ऊपर किया। इसमें उन्हें पूर्ण सफलता मिली।

अश्वों का कृत्रिम प्रजनन पहले पहल १८९० ई. में आरंभ हुआ। एक फ्रांसीसी पशुचिकित्सक ने इसे पशुओं में वंध्यापन दूर करने का एक उत्तम साधन बताया। प्रोफेसर हॉफ़मैन ने कहा कि प्राकृतिक गर्भाधान के साथ ही यदि कृत्रिम वीर्यसेचन का भी प्रयोग किया जाए तो गर्भाधान प्राय: निश्चित होगा।

रूस में आइबनहाफ से १९०९ ई. में कृत्रिम प्रजनन की एक प्रयोगशाला स्थापित की और १९१२ ई. में ३९ घोड़ियों की योनि में कृत्रिम वीर्यसेचन किया। उनमें ३१ घोड़ियों गर्भित हुई। उसी समय स्वभाविक ढंग से २३ अन्य घेड़ियों को भी गर्भित किया गया, किंतु उनमें से केवल १० में ही गर्भधान हुआ। इससे कृत्रिम वीर्यसेचन की महत्ता प्रमाणित हुई और इसका प्रयोग बढ़ने लगा तथा अन्य पशुओं, यथा-भेड़, गाय और कुत्ते आदि में भी कृत्रिम वीर्यसेचन किया जाने लगा।

अमरीका में १८९६ ई. में १९ कुतियों की योनि में वीर्यसेचन किया गया, जिनमें से १५ गर्भित हुई और बच्चे दिए। इस प्रयोग के फलस्वरूप कृत्रिम वीर्यसेचन को यूरोप और अमरीका ने बड़ी शीघ्रता से अपनाया। इस रीति का उपयोग सारे संसार-इंग्लैंड, इटली, जर्मनी, स्वीडन, डेन्मार्क, आस्ट्रेलिया, कैनेडा, चीन और रूस आदि-में बड़ी तेजी से बढ़ रहा है।

भारत में कृत्रिम वीर्यसेचन १९४२ ई. में भारतीय पशु चिकित्सा अनुसंधान संस्था (आइजटनगर) में आरंभ हुआ। तत्पश्चात्‌ इसके अनेक केंद्र बंगाल, बिहार, पंजाब, मद्रास, मध्यप्रदेश, बंबई और उत्तर प्रदेश में खुले। इस समय भारत में सहस्रों कृत्रिम वीर्यसेचन केंद्र हैं और इनकी संख्या प्रति वर्ष बढ़ती जा रहीं है। इस प्रयोग से अब हर साल लाखों पशु गर्भित किए जाते हैं।

इसके लिए वीर्य कई रीति से एकत्रित किया जाता है : (१) कृत्रिम योनि, (२) यांत्रिक प्रहस्तन तथा (३) विद्युत उद्दीपन आदि द्वारा। वीर्य को एकत्र करने के उपरांत कृत्रिम गर्भाधान तुरंत कर देना सबसे अच्छा होता है। यदि तत्काल कृत्रिम वीर्यसेचन न किया जा सके तो वीर्य को स्वच्छ हतजीवाणु काचकूपी, या परखनली में सुरक्षित बंद करके, ठंडे में, १.३ से २.५ सें. पर रखा जा सकता है। इस ढंग से वीर्य तीन से लेकर पाँच दिनों तक गर्भाधान योग्य रहता है। वीर्य में अनेक प्रकार के विलयनों को मिलाकर मंदित भी किया जाता है; किंतु प्रयोग से सिद्ध हुआ है कि अमंदित वीर्य ही अधिक उपयोगी है।

वीर्य को एक विशेष ढंग से सूखी बर्फ (ऐल्कोहल-हिम-मिश्रण) द्वारा जमाकर रखा जाता है। वीर्य को उपयोग में लाने से पहले उसे पिघला लिया जाता है। वीर्य जमाने और उसके उपयोग पर संसार के विभिन्न भागों में बहुत से अनुसंधान कार्य हो रहे हैं। इस प्रयोग से विशेष युवा साँड़ों का वीर्य एक देश से दूसरे देशों में आसानी से भेजा जा सकता है। और हर समय उपयोग के लिए सरलता से मिल सकता है। इस प्रकार से जमाया हुआ वीर्य सफलतापूर्वक दो वर्षो तक उपयोग में लाया जा सकता है।

जिस समय मादा पशु गरम होती है उस समय उसकी पूँछ को उठाकर एकत्रित वीर्य को उसकी योनि में पिचकारी द्वारा डाल दिया जाता है।

गर्भाधान काल

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प्रकृति के अनुसार हर मादा पशु निश्चित समय पर गरम होती रहती है और यह समय हर पशु के लिए अलग-अलग होता है, जैसे गाय, भैंस और घोड़ी २१ वें दिन गरम होती हैं। गरम रहने का समय भी भिन्न-भिन्न पशुओं में भिन्न होता है। गाय और भैंस में यह केवल १२ से १८ घंटे तक रहता है और घोड़ी में लगभग एक सप्ताह तक। गरम अवस्था समाप्त हो जाने पर, स्वभाविक अथवा कृत्रिम रूप से वीर्य प्रवेश कराने पर गर्भ नहीं ठहरता। प्राकृतिक किसी भी ढंग से गर्भाधान किया जाए, जब पशु में गर्भ ठहर जाता है तब २१वें दिन गरम पड़ना बंद हो जाता है।

देखा यह गया है कि मादा पशुओं में ५०-६० प्रतिशत गर्भ ही एक बार में स्थित होता है।

कृत्रिम वीर्यसेचन दुग्धोत्पादन और पशुसुधार तथा पशुसंपत्ति बढ़ाने के लिए सुगम और आवश्यक है। पशु की उन्नति केवल अच्छे साँड़ पर निर्भर करती है। यदि साँड़ अच्छी जाति का है तो उसके बच्चे भी बलवान्‌ और अधिक दूध देनेवाले होंगे। देखा गया है कि चार पाँच पीढ़ियों से दुग्धोत्पादन में निरंतर सुधार हो रहा है। यदि निम्नकोटि की, दो सेर दुग्ध देनेवाली गाय ऐसे साँड़ से, जिसकी माँ १६ सेर दूध देती थी, गर्भित की जाए तो दूसरी पीढ़ी में १२ सेर, चौथी पीढ़ी में १४ सेर और पाँचवीं पीढ़ी में १६ सेर के लगभग दूध मिलने लगेगा।

अच्छे साँड़ को दूर तक भेजना कठिन होता हैं; परंतु उत्तम तथा उच्च कोटि के साँड़ का वीर्य सरलतापूर्वक देश देशांतरों से, आधुनिक वैज्ञानिक रीति के अनुसार, हर समय उपलब्ध हो सकता है।

प्राकृतिक ढंग से एक साँड़ साल में केवल १०० गौओं को गर्भित कर सकता है; कृत्रिम रीति से उसी साँड़ से १,००० को गर्भित किया जा सकता है। क्योंकि एक बार एकत्र किया हुआ वीर्य कम से कम ८-१० गायों को गर्भित कर सकता है और प्रशीतक (Refrigerator) में रखने से कम से कम तीन चार दिन तक ठीक-ठीक पूर्ण शक्तिशाली रहता है।

बहुत से साँड़ देखने में तो हट्टे कट्टे दिखाई देते हैं, किंतु वीर्य में खराबी होने के कारण उनसे गर्भ नहीं ठहरता। कृत्रिम ढंग में इस बात का भय नहीं है क्योंकि गर्भित करने के पहले और बाद वीर्य की जाँच पूर्णत: कर ली जाती है।

कृत्रिम वीर्यसेचन से गाय, भैंस-घोड़ी आदि की जननेंद्रियों में रोग नहीं होते, जो सामान्यत: रोगी साँड़ों के संसर्ग से हो जाते हैं।

छोटी गाय, भैंस आदि को उच्च कोटि के बड़े साँड़ के बड़े से बड़े साँड़ के वीर्य का उपयोग छोटी से छोटी गौओं आदि के लिए किया जा सकता है।

कृत्रिम वीर्यसेचन द्वारा लूली, लँगड़ी, चोटही और बेकार गाय, भैंस घोड़ी आदि को भी गर्भित करके बच्चे प्राप्त किए जा सकते हैं।

प्राकृतिक गर्भाधान की तुलना में कृत्रिम गर्भाधान (कृ0ग0) के अनेक लाभ हैं जिनमें प्रमुख लाभ निम्नलिखित हैं-

  • (1) कृत्रिम गर्भाधान तकनीक द्वारा श्रेष्ठ गुणों वाले साँड़ को अधिक से अधिक प्रयोग किया जा सकता है। प्राकृतिक विधि में एक साँड़ द्वारा एक वर्ष में 50-60 गाय या भैंसों को गर्भित किया जा सकता है जबकि कृ0ग0 विधि द्वारा एक साँड़ के वीर्य से एक वर्ष में हजारों की संख्या में गायों या भैंसों को गर्भित किया जा सकता है।
  • (2) इस विधि में धन एवं श्रम की बचत होती है क्योंकि पशु पालक को साँड़ पालने की आवश्यकता नहीं होती।
  • (3) कृ0ग0 में बहुत दूर यहाँ तक कि विदेशों में रखे उत्तम नस्ल व गुणों वाले साँड़ के वीर्य को भी गाय व भैंसों में प्रयोग करके लाभ उठाया जासकता है।
  • (4) अत्योत्तम साँड़ के वीर्य को उसकी मृत्यु के बाद भी प्रयोग किया जासकता है।
  • (5) इस विधि में उत्तम गुणों वाले बूढ़े या घायल साँड़ का प्रयोग भी प्रजनन के लिए किया जा सकता है।
  • (6) कृ0ग0 में साँड़ के आकार या भार का मादा के गर्भाधान के समय कोई फर्क नहीं पड़ता।
  • (7) इस विधि में विकलांग गायों/भैसों का प्रयोग भी प्रजनन के लिए किया जा सकता है।
  • (8) कृ0ग0 विधि में नर से मादा तथा मादा से नर में फैलने वाले संक्रामक रोगों से बचा जा सकता है।
  • (9) इस विधि में सफाई का विशेष ध्यान रखा जाता है जिससे मादा की प्रजनन की बीमारियों में काफी हद तक कमी आजाती है तथा गर्भ धारण करने की दर भी बढ़ जाती है।
  • (10) इस विधि में पशु का प्रजनन रिकार्ड रखने में भी आसानी होती है।

कृत्रिम गर्भाधान विधि की सीमायें

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कृत्रिम गर्भाधान के अनेक लाभ होने के बावजूद इस विधि की अपनी कुछ सीमायें हैं जो मुख्यतः निम्न प्रकार हैं।

  • (1) कृ0ग0 के लिए प्रशिक्षित व्यक्ति अथवा पशु चिकित्सक की आवश्यकता होती है तथा कृ0ग0 तक्नीशियन को मादा पशु प्रजनन अंगों की जानकारी होना आवश्यक है।
  • (2) इस विधि में विशेष यन्त्रों की आवश्यकता होती है।
  • (3) इस विधि में असावधानी वरतने तथा सफाई का विशेष ध्यान न रखने से गर्भ धारण की दर में कमी आ जाती है।
  • (4) इस विधि में यदि पूर्ण सावधानी न वरती जाये तो दूरवर्ती क्षेत्रों अथवा विदेशों से वीर्य के साथ कई संक्रामक बीमारियों के आने का भी भय रहता है।


इन्हें भी देखें

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बाहरी कड़ियाँ

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