किसी परमाणु में कई कक्षक सम्भव होते हैं। गुणात्मक रूप में इन कक्षकों में उनके आकार, आकृति और अभिविन्यास के आधार पर अन्तर किया जा सकता है। क्षुद्राकार के कक्षक का अर्थ यह है कि नाभिक के निकट इलेक्ट्रॉन के पाए जाने की प्रायिकता अधिक है। इसी प्रकार, आकृति और अभिविन्यास यह बताते हैं कि इलेक्ट्रॉन पाए जाने की प्रायिकता किसी दूसरी दिशा की अपेक्षा एक दिशा में अधिक है। प्रमात्रा संख्याओं द्वारा परमाणु कक्षकों में अन्तर किया जा सकता है। प्रत्येक कक्षक को तीन प्रमात्रा संख्याओं n, ℓ तथा m, द्वारा दर्शाया जाता है।

नाम चिह्न अर्थ
मुख्य n इलेक्ट्रॉन कोश
दिगंशीय इलेक्ट्रॉन उपकोश
चुम्बकिय m पारमाण्विक कक्षक
चक्रण ms कक्षक में इलेक्ट्रॉन के चक्रण की दिशा

मुख्य प्रमात्रा संख्या

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मुख्य प्रमात्रा संख्या   एक प्राकृतिक संख्या होती है। मुख्य प्रमात्रा संख्या से कक्षक के आकार और काफी हद तक उसकी ऊर्जा के बारे में पता चलता है। हाइड्रोजन और उस जैसे निकायों (He+, Li2+ आदि) हेतु यह अकेले ही कक्षक के आकार तथा ऊर्जा को निर्धारित करता है।

मुख्य प्रमात्रा संख्या से कोश का भी पता चलता है। n का मान बढ़ने के साथ अनुमत कक्षकों की संख्या भी बढ़ती है। इसे n² द्वारा दिया जाता है। n के निश्चित दिए गए मान के लिए सभी कक्षक परमाणु का एक कोश बनाते हैं। मुख्य प्रमात्रा संख्या भी बढ़ने के साथ कक्षक का आकार बढ़ता है। दूसरे शब्दों में, इलेक्ट्रॉन नाभिक से दूर स्थित होते हैं। चूँकि एक ऋणावेशित इलेक्ट्रॉन को धनावेशित नाभिक से दूर होने के लिए ऊर्जा की आवश्यकता होती है, अतः n के वृद्धि से कक्षक की ऊर्जा बढ़ेगी।

दिगंशीय प्रमात्रा संख्या

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दिगंशीय प्रमात्रा संख्या 'ℓ' को कक्षक प्रमात्रा संख्या, कक्षक कोणीय संवेग या भौम प्रमात्रा संख्या भी कहते हैं। यह कक्षक के त्रिविमीय आकार को परिभाषित करती है। n के दिए गए मान हेतु ℓ के 0 से (n-1) तक n मान हो सकते हैं। अर्थात् n के दिए गए मान हेतु   हो सकते हैं।

प्रत्येक कोश में एक या अधिक उपकोश या उपस्तर होते हैं। किसी मुख्य कोश में उपकोशों की संख्या n के समान होती है। उदाहरणार्थ पहले कोश (n=1) में केवल एक उपकोश होता है, जो (ℓ = 0) के संगत होता है। इसी प्रकार (n=2) कोश में दो उपकोश (ℓ=0, ), n=3 में तीन उपकोश (ℓ= 0, 1, 2) होते हैं।

चुम्बकिय प्रमात्रा संख्या

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चुम्बकीय कक्षक प्रमात्रा संख्या m समन्वय अक्ष के संगत कक्षकों के त्रिविम अभिविन्यास के बारे में ज्ञान देती है। किसी उपकोश हेतु m के (2ℓ+1) मान सम्भव है। इन मानों को इस प्रकार दिया जाता है:

 

अतः ℓ=0 हेतु m का एक ही स्वीकृत मान 0 होता है, अर्थात् 2(0) + 1 = 1, एक s कक्षक होता है। ℓ=1 हेतु m=-1,0, 1 हो सकता है अर्थात् 2(1)+1=3, तीन p कक्षक। ℓ=2 हेतु m=-2, -1, 0, 1, 2 हो सकता है अर्थात् 2(2)+1=5, पाँच d कक्षक।

चक्रण प्रमात्रा संख्या

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किसी परमाणु कक्षक के लिए चिह्नित तीनों प्रमात्रा संख्याओं को उसकी ऊर्जा, आकार और अभिविन्यास को परिभाषित करने में प्रयुक्त किया जा सकता है। किन्तु बहु इलेक्ट्रॉन परमाणुओं में देखे गए रेखा वर्णक्रमों की व्याख्या करने में ये प्रमात्रा संख्याएँ पर्याप्त नहीं है। इनमें कुछ रेखाएँ द्विक (दो निकटवर्ती रेखाएँ) तथा कुछ रेखाएँ त्रिक (तीन निकटवर्ती रेखाएँ) होती हैं। तीनों प्रमात्रा संख्याओं द्वारा अनुमानित ऊर्जा के अतिरिक्त यह कुछ और ऊर्जा स्तरों की उपस्थिति का संकेत करता है।

सन् 1925 में जॉर्ज उलेन्बेक और सैमुअल गाउट्स्मिट ने एक चतुर्थ प्रमात्रा संख्या की उपस्थिति प्रतिपादित की जो "इलेक्ट्रॉन चक्रण प्रमात्रा संख्या (ms) कहलाती है। एक इलेक्ट्रॉन अपने अक्ष पर ठीक वैसे ही चक्रण करता है, जैसे सूर्य के चतुर्दिक् चक्कर काटते समय पृथ्वी अपने अक्ष पर चक्रण करती है। दूसरे शब्दों में इलेक्ट्रॉन में आवेश और द्रव्यमान के अतिरिक्त अन्तर्निहित चक्रण कोणीय संवेग होता है। इलेक्ट्रॉन का कोणीय संवेग एक सदिश राशि है। इसके किसी चुने हुए अक्ष के सापेक्ष दो अभिविन्यास हो सकते हैं, जिन में चक्रण प्रमात्रा संख्या ms के द्वारा भेद किया जा सकता है। ms का मान +½ या -½ हो सकता हैं। इन्हें इलेक्ट्रॉन की दो चक्रणावस्थाएँ भी कहते हैं। साधारणतः वे तीरों ↑(ऊपर चक्रण) और ↓ (निम्न चक्रण) द्वारा दर्शाए जाते हैं। विभिन्न मान वाले दो इलेक्ट्रॉन (एक +½ और दूसरा -½) विपरीत चक्रण वाले कहलाते हैं। किसी कक्षक में दो से अधिक इलेक्ट्रॉन नहीं हो सकते हैं; इन दोनों इलेक्ट्रॉनों का विपरीत चक्रण होना चाहिए।