गंगालहरी दो अलग-अलग रचनाओं का नाम है।

  • (१) पंडित जगन्नाथ तर्कपंचानन द्वारा संस्कृत में रचित गंगास्तव। इसमें केवल 52 श्लोक हैं जिसमें उन्होंने गंगा के विविध गुणों का वर्णन करते हुए अपने उद्धार के लिए अनुनय किया है।

इसके संबंध में एक कथा प्रसिद्ध है। पंडित जगन्नाथ ने लबंगी नामक एक मुसलमान स्त्री से विवाह कर लिया था। जब तक दिल्ली दरबार में रहे, उसके साथ सुखभोग करते रहे। जब वार्धक्य को प्राप्त हुए तो वे काशी आए। पर काशी के पंडितों ने मुसलमान स्त्री रखने के कारण उनको बहिष्कृत कर दिया। यह अपमान उनसे सहन न हुआ। वे सपत्नीक गंगा तट पर जा बैठे और अपनी गंगालहरी का स्तवन करने लगे। गंगा प्रसन्न होकर प्रत्येक श्लोक पाठ के साथ एक एक पग बढ़ने लगीं और 52 श्लोक पढ़ते पढ़ते वह 52 पग बढ़ कर उनके निकट पहुँच गई और पति-पत्नि दोनों को आत्मसात् कर लिया। अब गंगालहरी की इतनी महत्ता है कि कितने ही लोग उसका नित्य पाठ करते हैं। ज्येष्ठ के दशहरे के दस दिनों तक तो देवालयों और गंगातट पर इसका पाठ लोग अवश्य करते हैं।


  • (२) हिंदी के प्रख्यात कवि पद्माकर की अंतिम रचना। अंतिम समय निकट जानकर पद्माकर गंगातट पर निवास करने की दृष्टि से सात वर्ष कानपुर रहे। इन्हीं दिनों उन्होंने इसकी रचना की। इसमें उनकी विरक्ति तथा भक्ति भावना अभिव्यक्त हुई है।

बाहरी कड़ियाँ

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