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"गाण्डीव" महाभारत काल में सर्वाधिक प्रसिद्ध धनुष था। एक समय, घोर वन के अन्दर, कण्व मुनि कठोर तपस्या कर रहे थे। तपस्या करते-करते, समाधिस्थ होने के कारण उन्हें भान ही नहीं रहा कि सारा शरीर दीमक के द्वारा बाँबी बना दिया गया । उस मिट्टी के ढेर पर ही एक सुन्दर बाँस उग आया। तपस्या जब पूर्ण हुई तब ब्रह्मा जी प्रकट हुए । उन्होंने अपने अमोघ जल के द्वारा कण्व की काया को कुन्दन बना दिया । उन्हें अनेक वरदान दिये और जब जाने लगे तो ध्यान आया कि कण्व की मूर्धा पर उगी हुई बाँस कोई सामान्य नहीं हो सकती । इसका सदुपयोग करना चाहिए । उसे काट कर ब्रह्मा जी ने विश्वकर्मा को दे दिया और विश्वकर्मा ने उससे तीन धनुष बनाए–पिनाक, शारंग और गाण्डीव । इन तीनों धनुषों को ब्रह्मा जी ने भगवान शंकर को समर्पित कर दिया। इसे भगवान शंकर ने इन्द्र को दिया और फिर बाद वरुण देव से यह अर्जुन के पास पहुँचा, अर्जुन ने इस धनुष के साथ असंख्य युद्ध जीते, यह धनुष अत्याधिक शक्तिशाली और सुदृढ़ था।

इन्हें भी देखेंसंपादित करें

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