गुंडा (१९९८ चलचित्र)

हिन्दी भाषा में प्रदर्शित चलवित्र

गुंडा १९९८ में बनी हिन्दी भाषा निर्देशक कांती शाह की अपराध-ड्रामा आधारित फिल्म हैं, फिल्म की मुख्य भुमिकाओं में मिथुन चक्रवर्ती, मुकेश ऋषि और शक्ति कपूर एवं कई सह-अभिनेता सम्मिलित हैं। फिल्म निर्माता में अनिल सिंह, पटकथा-लेखन में बशीर बब्बर एवं संगीत निर्देशक हैं आनंद राज आनंद।

गुंडा
चित्र:गुंडॉ॰jpg
गुंडा का पोस्टर
निर्देशक कांती शाह
लेखक बशीर बाबर
अभिनेता इशरत अली,
मिथुन चक्रवर्ती,
मोहन जोशी,
शक्ति कपूर,
हरीश पटेल,
रमी रेड्डी,
मुकेश ऋषि,
दीपक शिर्के
संगीतकार आनंद राज आनंद
प्रदर्शन तिथि
१९९८
देश भारत
भाषा हिन्दी

'गुण्डा' एक ईमानदार आदमी और कई गैंग-सरगनाओं के हिंसक मुठभेड़ और उसके आपसी टकराव पर आधारित कहानी हैं, जो वह आगे चलकर इनसे हिंसात्मक प्रतिशोध लेता है जब युवावस्था में उसके पिता, बहन और प्रेयसी की हत्या हो जाती हैं।

फिल्म की शुरुआत भ्रष्ट राजनेता कफनचोर और लम्बु आटा की उस सौदे से होती है, जहां लम्बु को बुल्ला (मुकेश ऋषि) को मारने का काम मिलता है। लम्बु इस जंग की ऐलान बुल्ला के आदमी को मारकर आगाज़ करता है, तो वहीं बुल्ला उसी के भाई कुंदन की हत्या करता है। लम्बु आवेश में अपने भाई का बदला बुल्ला की बहन का बलात्कार कर उसकी भी हत्या करता है। बुल्ला आखिरकार जंग को विराम लगाने के लिए लम्बु आटा को खत्म करता है और अंडरवर्ल्ड का अविजित सरगना होने का ऐलान करता है। भ्रष्ट राजनेता बच्चूभाई भिगोना की शरण में आकर बुल्ला को वह कफनचोर-नेता को मारने का जिम्मा सौंपता है, जिसे वह अंजाम देने के लिए अपने दाहिने हाथ काला शेट्टी (रमी रेड्डी) को कहता है। शेट्टी तब कफनचोर-नेता को पुलिस बल के सामने ही मार देता है पर पुलिस कोई प्रतिक्रिया नहीं करती। तब शंकर (मिथुन चक्रवर्ती) नाम का युवक उसके राह का रोड़ा बनता है और उसे पुलिस के हाथों गिरफ्तार कराता है। शंकर अपना जीवनयापन बंदरगाह और कभी-कभार हवाईअड्डे में कुली मजदूरी कर कमाता है जहां वह अपनी साधारण सी जिंदगी अपने पुलिसकर्मी पिता, बहन गीता और एक पालतू बंदर टिंचू के साथ व्यतीत करता है। शंकर की गंगा नाम की प्रेयसी रहती जो उसके साथ किसी भी तरह विवाह को आतुर रहती है लेकिन अपनी जिम्मेदारी को निभाने के संकल्प में शंकर उससे ब्याह को इंकार करता है।

वहीं शिपयार्ड पर बुल्ला द्वारा संचालित एक कुश्ती प्रतियोगिता का आयोजन होता है जहां बुल्ला अपने पहलवान को हराने बतौर ईनाम रखता है। शंकर को किसी पुरस्कार या रुतबा हासिल करने की लालसा नहीं रहती लेकिन अपने कुली साथियों के जोर देने और बहन की शादी का आश्वासन मिलने पर मुकाबले को राजी हो जाता है और पहलवान को हराकर ही पुरस्कार की राशि जीतता है। लेकिन बुल्ला की दुश्मनी उसकी तब चिंगारी पकड़ती है जब शंकर के पिता बुल्ला के भेजे गुण्डे दुकानदारों से जबरन हफ्ता वसूली करने के विरोध करने पर उनके हाथों पिटाई खाते है। शंकर वहां पहुँच उन गुण्डो को मार भगाता है।

अपने आदमियों की पिटाई से बौखलाया बुल्ला तब शंकर की बहन गीता को शिकार बनाने अपने वफादार नाटे को भेजता है, और नाटा उससे छेड़छाड़ करता है जिसके विरोध में गुलशन उसकी पिटाई करता है। गीता उसकी दिलेरी से प्रभावित हो प्रेम कर बैठती है और दोनों शादी कर लेते हैं। लेकिन उसे पता नहीं होता कि गुलशन बुल्ला की ही षड्यंत्र का ही हिस्सा है, जहां वो गीता को चुटिया (शक्ति कपूर) के हाथों उसकी यौनापुर्ति के लिए छोड़ जाता है। बुल्ला उसे विटामिन-सेक्स (वियाग्रा की गोली जो विशेष उसने लंदन से खरीदी थी) की गोली खिलाता है जिसके उत्तेजित होकर चुटिया गीता का बलात्कार कर बाद में मार डालता है और शव को जंगल में दफना देता है। शंकर का पालतू बंदर, टिंचू यह देख लेता है और शंकर को बुलाकर बुल्ला के बंगले तक पहुंचाता है। बहन की वीभत्स हत्या उजागर होने पर शंकर चुटिया का पीछा कर बुल्ला की दहलीज तक पहुंचता है। और वहीं मौजुद बुल्ला, पोते, ईबु हटेला (हरीश पटेल) और इंस्पेक्टर काले का सामना होने पर उनकी मौत की चेतावनी देकर अपने रास्ते लौट जाता है।

शंकर के पिता अपने बेटी गीता की मौत के दुख से पागल हो जाते है और अपने अफसर इंस्पेक्टर काले को गैंगस्टर बुल्ला की तरफदारी को लेकर अपनी बर्बादी के लिए धमकाते हैं। काले से गुत्थमगुथ्ती की असफल कोशिश में बुढ़ा पिता उसके हाथों गला घोंटकर मारा जाता है। वहीं शंकर तब बुल्ला और उसके तरफदारों को अगले दस दिन बाद एक-एक को मारने की कसम लेता है। रास्ते में शंकर एक अंजान लावारिस बच्ची को पाकर उसे अपनी गोद लेता है।

शंकर गुस्से की झोंक में बुल्ला के आदमियों को मारने निकल पड़ता हैं, जिसकी शुरुआत वह गुलशन की हत्या से करता है। फिर बुल्ला के चमचे ईबु हटेला को एक लड़की की बलात्कार के प्रयास में उसका सर काट डालता है। फिर अपने अगले मकसद भ्रष्टनेता बच्चूभाई को मारने की असफल कोशिश में उसके स्नाईपर द्वारा शंकर पकड़ा दिया जाता है और हत्या के आरोप में उसे उम्रकैद की सजा दी जाती है पर उसी रात शंकर जेल से फरार हो जाता है और काले के घर आ धमकता है। शंकर के राह में प्रशिक्षित कुंगफु हत्यारे व्याध्यान डालते है जो कई चाकू, स्वचलित हथियारों और हथगोलों से लैस हैं। पर शंकर उनको भी धत्ता बतलाते हुए काले को मार डालता है।

शंकर अब बुल्ला के आदमी चिकना को मारने जाता है जो उसके लिए गांव की लड़कियों को अगवा कर वेश्यावृति के लिए शहर ले जाता हैं। पर चिकना की हत्या से पूर्व शंकर को यह मालूम हो जाता है कि रास्ते में मिली वो लावारिस नवजात भी बुल्ला की अवैध संतान है। शंकर का अगला निशाना पोते, चुटिया और बुल्ला को बने ही थी वो पहले ही शंकर की प्रेयसी गंगा का अपहरण कर मार डालते हैं। पोते गुस्साये शंकर के हाथों मारा जाता है फिर वह चुटिया का पीछा कर उसे धर-दबोचता है, मौत के भय से चुटिया बताता है कि वह तो नपूंसक है और सारी मुसीबत बुल्ला की दी हुई उस विटामिन-सेक्स (वियाग्रा) की गोली का असर था जिसके उग्र उन्माद में उसने गीता का बेरहमी से बलात्कार कर दिया। चुटिया के इतना कहते ही शंकर उसका गुप्तांग-भंग कर कहता है कि वह इसी सजा के लायक है।

अंतिम चरम के दृश्य में शंकर और बुल्ला का आमना-सामना उसी शिपयार्ड-हवाईअड्डे वाले काॅम्पलेक्स में होता है। पर बुल्ला अपने दर्जन भर हत्यारे रिक्शा चालकों की भीड़ में घेर उसे मारने की कोशिश करता है, लेकिन शंकर तब अपनी कार की डिक्की से राॅकेट ग्रेणेड लांचर निकाल उन सभी हत्यारे रिक्शाचालकों का उड़ा डालता है। लेकिन स्थिति तब पलटती है जब बुल्ला शंकर की गोद ली हुई बच्ची को उसकी बेटी समझ अपनी ढाल बनाता है, लेकिन वो ये सुनकर हैरान हो जाता है वो बच्ची उसके ही कुकर्मों का नतीजा है। इससे पहले बुल्ला उसकी जान लेता शंकर का पालतू टिंचू बंदर उसे बचा लेता है। वहीं हवाईअड्डे में मौजुद काला शेट्टी हेलिकॉप्टर के जरिए बुल्ला को बचाने पहुँचता है, शंकर उनको खदेड़ते हुए नीचे गिराकर काला शेट्टी और बुल्ला की पिटाई कर मार डालता है।

मुख्य कलाकार

संपादित करें

फ़िल्म का संगीत निर्देशन आनंद राज आनंद ने कंपोज किया है।

1."तुम बिन जीना रास ना आए" - साधना सरगम, उदित नारायण

2."नशा नशा करता है" - आनंद राज आनंद, पूनम भाटिया

3."आज पराई होकर बहन जाए" - शब्बीर कुमार

4. "खोली मेरे दिल की खाली है तु" - पूनम भाटिया, अभिजीत

5. "तेरी आंखों का चल गया जादू" - कविता कृष्णामूर्ति, कुमार शानु

रोचक तथ्य

संपादित करें

फ़िल्म में बोले द्विअर्थी संवाद और महिलाओं पर अपमान व हिंसक कृत्य जैसे दृश्यों पर कई महिला संस्थाओं ने जमकर फ़िल्म की कड़ी आलोचना की।

बौक्स ऑफिस

संपादित करें

समीक्षाएँ

संपादित करें

नामांकन और पुरस्कार

संपादित करें

बाहरी कड़ियाँ

संपादित करें