चंद्रयान-२

चंद्रयान मिशन
(चंद्रयान-2 से अनुप्रेषित)

चंद्रयान-२ या चंद्रयान द्वितीय, चंद्रयान-1 के बाद चन्द्रमा पर खोजबीन करने वाला दूसरा अभियान है,[7][8][9] जिसे इसरो ने विकसित किया है।[10][11] अभियान को जीएसएलवी मार्क 3 प्रक्षेपण यान द्वारा प्रक्षेपित (लॉन्च) किया गया।[12][5] इस अभियान में भारत में निर्मित एक चंद्र ऑरबिटर, एक रोवर एवं एक लैंडर शामिल हैं। इन सब का विकास इसरो द्वारा किया गया है।[13] भारत ने चंद्रयान-2 को 22 जुलाई 2019 को श्रीहरिकोटा रेंज से भारतीय समयानुसार दोपहर 02:43 बजे सफलता पूर्वक प्रक्षेपित किया।[14]

चंद्रयान-2
चन्द्रयान-द्वितीय (लैण्डर एवं ऑर्बिटर का सम्मिलित रूप)
चन्द्रयान-द्वितीय (लैण्डर एवं ऑर्बिटर का सम्मिलित रूप)
मिशन प्रकार चन्द्र ऑर्बिटर , लैंडर तथा रोवर
संचालक (ऑपरेटर) भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन(इसरो)
वेबसाइट www.isro.gov.in/chandrayaan2-home
मिशन अवधि ऑर्बिटर: 1 वर्ष
विक्रम लैंडर: <15 दिन[1]
प्रज्ञान रोवर: <15 दिन[1]
अंतरिक्ष यान के गुण
निर्माता भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन(इसरो)
लॉन्च वजन कुल योग: 3,877 कि॰ग्राम (8,547 पौंड)[2][3]
पेलोड वजन ऑरबिटर: 2,379 कि॰ग्राम (5,245 पौंड)[2][3]
विक्रम लैंडर:1,471 कि॰ग्राम (3,243 पौंड)[2][3]
प्रज्ञान रोवर : 27 कि॰ग्राम (60 पौंड)[2][3]
ऊर्जा

ऑरबिटर: 1 किलोवाट[4]विक्रम लैंडर: 650 वाट

प्रज्ञान रोवर: 50 वाट
मिशन का आरंभ
प्रक्षेपण तिथि 15 जुलाई 2019, 21:21 यु.टी.सी (योजना) थी, जो तकनीकी गड़बड़ी के चलते 22 जुलाई 2019 को 02:41 अपराह्न की गई थी।
रॉकेट भूस्थिर उपग्रह प्रक्षेपण यान संस्करण 3[5]
प्रक्षेपण स्थल सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र
ठेकेदार भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन
चन्द्रमा ऑर्बिटर
कक्षीय निवेशनसितंबर 6, 2019 (योजना)
कक्षा मापदंड
निकट दूरी बिंदु100 कि॰मी॰ (62 मील)[6]
दूर दूरी बिंदु100 कि॰मी॰ (62 मील)[6]
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भारतीय चन्द्रयान अभियान(इसरो)
← चंद्रयान-1 चंद्रयान-3

चंद्रयान-2 लैंडर और रोवर को चंद्रमा पर लगभग 70° दक्षिण के अक्षांश पर स्थित दो क्रेटरों मज़िनस सी और सिमपेलियस एन के बीच एक उच्च मैदान पर उतरने का प्रयास करना था। पहियेदार रोवर चंद्र सतह पर चलने और जगह का रासायनिक विश्लेषण करने के लिए बनाया गया था। रोवर द्वारा एकत्र किए गए आंकड़ों को चंद्रयान-2 कक्षयान के माध्यम से पृथ्वी पर भेजने की योजना थी।[15][16]

चंद्रयान-1 ऑर्बिटर का मून इम्पैक्ट प्रोब (MIP) 14 नवंबर 2008 को चंद्र सतह पर उतरा, जिससे भारत चंद्रमा पर अपना झंडा लगाने वाला चौथा देश बन गया था।[17] यूएसएसआर, यूएसए और चीन की अंतरिक्ष एजेंसियों के बाद, चंद्रयान-2 लैंडर की सॉफ्ट लैंडिंग हो जाने पर भारत ऐसा करने वाला चौथा देश होता। सफल होने पर, चंद्रयान-2 सबसे दक्षिणी चंद्र लैंडिंग होता, जिसका लक्ष्य 67°-70° दक्षिण अक्षांश पर उतरना था।[18]

हालाँकि, भारतीय समय अनुसार लगभग 1:52 बजे, लैंडर लैंडिंग से लगभग 2.1 किमी की दूरी पर अपने इच्छित पथ से भटक गया[19] और अंतरिक्ष यान के साथ ग्राउन्ड कंट्रोल ने संचार खो दिया।[20]

8 सितंबर 2019 को इसरो द्वारा सूचना दी गई कि ऑर्बिटर द्वारा लिए गए ऊष्माचित्र से विक्रम लैंडर का पता चल गया है। परंतु अभी चंद्रयान-2 से संपर्क नहीं हो पाया है।[21]

इतिहास संपादित करें

12 नवंबर 2007 को इसरो और रूसी अंतरिक्ष एजेंसी (रोसकॉस्मोस) के प्रतिनिधियों ने चंद्रयान-2 परियोजना पर साथ काम करने के एक समझौते पर हस्ताक्षर किए। [22] यह तय हुआ था कि ऑर्बिटर तथा रोवर की मुख्य जिम्मेदारी इसरो की होगी तथा रोसकोसमोस लैंडर के लिए जिम्मेदार होगा।

भारत सरकार ने 18 सितंबर 2008 को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की अध्यक्षता में आयोजित केन्द्रीय मंत्रिमंडल की बैठक में इस अभियान को स्वीकृति दी थी।[23] अंतरिक्ष यान के डिजाइन को अगस्त 2009 में पूर्ण कर लिया गया जिसमें दोनों देशों के वैज्ञानिकों ने अपना संयुक्त योगदान दिया।[24][25]

हालांकि इसरो ने चंद्रयान -2 कार्यक्रम के अनुसार पेलोड को अंतिम रूप दे दिया[26] परंतु रूस द्वारा लैंडर को समय पर विकसित करने में असफल होने के कारण अभियान को जनवरी 2013 में स्थगित कर दिया गया[27] तथा अभियान को 2016 के लिये पुनर्निर्धारित कर दिया गया। [28][29] रोसकॉस्मोस को बाद में मंगल ग्रह के लिए भेजे फोबोस-ग्रन्ट अभियान मे मिली विफलता के कारण चंद्रयान -2 कार्यक्रम से अलग कर दिया गया[28] तथा भारत ने चंद्र मिशन को स्वतंत्र रूप से विकसित करने का फैसला किया।[27]

उद्देश्य संपादित करें

चंद्रयान-2 लैंडर का प्राथमिक उद्देश्य चंद्रमा की सतह पर सॉफ्ट-लैंडिंग और रोबोटिक रोवर संचालित करने की क्षमता प्रदर्शित करना था।

ऑर्बिटर के वैज्ञानिक लक्ष्य हैं:

  • चंद्र स्थलाकृति (टोपोग्राफी) , खनिज विज्ञान, तात्विक प्रचुरता, चंद्र बहिर्मंडल (एक्सॉस्फीयर), और हाइड्रॉक्सिल और जल से बनी बर्फ के निशानों का अध्ययन करना। [30] [31]
  • दक्षिणी ध्रुवीय क्षेत्र में जल से बनी बर्फ और सतह पर चंद्र रेगोलिथ की मोटाई का अध्ययन करना। [32]
  • चंद्रमा की सतह का मानचित्रण करना और उसके 3डी मानचित्र तैयार करने में मदद करना।

बनावट संपादित करें

ऑर्बिटर संपादित करें

ऑर्बिटर 100 किलोमीटर की ऊंचाई पर चन्द्रमा की परिक्रमा कर रहा है।[33] इस अभियान में ऑर्बिटर में पांच पेलोड लगे हुए हैं। तीन पेलोड नए हैं, जबकि दो अन्य चंद्रयान-1 ऑर्बिटर पर भेजे जाने वाले पेलोड के उन्नत संस्करण हैं। उड़ान के समय इसका वजन लगभग 2379 किलो था। ऑर्बिटर में हाई रिज़ॉल्यूशन कैमरा लगा है जिसका काम लैंडर के ऑर्बिटर से अलग होने पूर्व लैंडिंग साइट की तस्वीर देना था।[1][33][34]लॉन्च के समय, चंद्रयान 2 ke ऑर्बिटर बयालू, कर्नाटक स्थित भारतीय डीप स्पेस नेटवर्क (आईडीएसएन) के द्वारा ट्रैक किया गया। ऑर्बिटर का मिशन जीवन एक वर्ष है और इसे 100X100 किमी लंबी चंद्र ध्रुवीय कक्षा में रखा गया है।

लैंडर संपादित करें

चंद्रयान 2 के लैंडर का नाम भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम के जनक विक्रम साराभाई के नाम पर रखा गया है। यह एक चंद्र दिन के लिए कार्य करने के लिए डिज़ाइन किया गया है, जो लगभग 14 पृथ्वी दिनों के बराबर होता है। लैंडर को चांद की सतह पर सॉफ्ट लैंडिंग करने के लिए डिज़ाइन किया गया है। चन्द्रमा की सतह से टकराने वाले चंद्रयान-1 के मून इम्पैक्ट प्रोब के विपरीत, लैंडर धीरे-धीरे नीचे उतरेगा। [35] लैंडर तथा रोवर का वजन लगभग 1471 किलो था। प्रारंभ में, लैंडर रूस द्वारा भारत के साथ सहयोग से विकसित किए जाने की उम्मीद थी। जब रूस ने 2015 से पहले लैंडर के विकास में अपनी असमर्थता जताई। तो भारतीय अधिकारियों ने स्वतंत्र रूप से लैंडर को विकसित करने का निर्णय लिया। रूस द्वारा लैंडर को रद्द करने के कारण मिशन प्रोफ़ाइल को बदलना पड़ा जिसके तहत स्वदेशी लैंडर की प्रारंभिक कॉन्फ़िगरेशन का अध्ययन 2013 में अंतरिक्ष अनुप्रयोग केंद्र (SAC), अहमदाबाद द्वारा पूरा किया गया। [27]

चंद्रमा की सतह पर लैंडिंग के लिए अनुसंधान दल ने लैंडिंग विधि की पहचान की और इससे जुड़े प्रौद्योगिकियों का अध्ययन किया। इन प्रौद्योगिकियों में हाई रेसोल्यूशन कैमरा, नेविगेशन कैमरा, खतरे से बचने के लिए कैमरा, एक मुख्य तरल इंजन (800 न्यूटन) और अल्टीमीटर, एक्सीलेरोमीटर और इन घटकों को चलाने के लिए सॉफ्टवेयर आदि शामिल थे।[1][33] लैंडर के मुख्य इंजन को सफलतापूर्वक 513 सेकंड की अवधि के लिए परीक्षण किया गया था। उसके बाद सेंसर और सॉफ्टवेयर के क्लोज़ लूप वेरीफिकेशन परीक्षण किए गए।[34] लैंडर के इंजीनियरिंग मॉडल को कर्नाटक के चित्रदुर्ग जिले के चुनलेरे में अक्टूबर 2016 के अंत में जमीनी और हवाई परीक्षणों के दौर से गुजारा गया। इसी परीक्षण के अंतर्गत इसरो ने लैंडिंग साइट का चयन करने के लिए और लैंडर के सेंसर की क्षमता का आकलन करने में सहायता के लिए चुनलेरे में करीब 10 क्रेटर बनाए थे।

रोवर को चांद की सतह पर उतारने के लिए विक्रम लैंडर ऑर्बिटर से अलग हुआ और अपने 800 N के मुख्य तरल इंजन का उपयोग करके 30 किमी × 100 किमी (19 मील × 62 मील) की निचली चंद्र कक्षा में उतर गया। अपने सभी ऑन-बोर्ड सिस्टम की जांच करने के बाद इसने एक नरम लैंडिंग का प्रयास किया, जिससे रोवर को तैनात किया जाता इस दौरान इसने लगभग 14 पृथ्वी दिनों तक वैज्ञानिक गतिविधियां कीं। इस प्रयास के दौरान ही विक्रम दुर्घटनाग्रस्त हो गया।[36][37]

रोवर संपादित करें

चंद्रयान-2 का 'प्रज्ञान' नामक रोवर एक 6 पहियों वाला रोबोट वाहन था। प्रज्ञान एक संस्कृत शब्द है जिसका अर्थ 'बुद्धिमत्ता' या 'ज्ञान' होता है। रोवर का वजन 27 किग्रा था और यह सौर ऊर्जा के माध्यम से 50 W इलेक्ट्रिक पावर जनरेशन की क्षमता रखता था। यह चांद की सतह पर 500 मीटर तक यात्रा करने के लिए बनाया गया था। यह केवल लैंडर के साथ संवाद कर सकता था। इस रोवर को चन्द्रमा की सतह पर पहियों के सहारे चलने, मिट्टी और चट्टानों के नमूने एकत्र करने व रासायनिक विश्लेषण करने के लिए डिजाइन किया गया था। इस डाटा को लेंडर के माध्यम से ऊपर ऑर्बिटर से होते हुए पृथ्वी के स्टेशन पर भेजने की योजना थी।[26][35]

आईआईटी कानपुर ने गतिशीलता प्रदान करने के लिए रोवर के तीन उप प्रणालियों विकसित की[38]:

  1. स्टीरियोस्कोपिक कैमरा आधारित 3डी दृष्टि - जमीन टीम को रोवर नियंत्रित के लिए रोवर के आसपास के इलाके की एक 3डी दृश्य को प्रदान करने के लिए।
  2. काइनेटिक ट्रैक्शन (कर्षण) कंट्रोल - रोवर को चन्द्रमा की सतह पर चलने और अपने छह पहियों पर स्वतंत्र रूप से काम करने की क्षमता प्रदान करने के लिए।
  3. नियंत्रण और मोटर गतिशीलता - छह पहियों से युक्त इस रोवर के प्रत्येक पहिये को स्वतंत्र बिजली की मोटर द्वारा संचालित करने के लिए।

प्रज्ञान रोवर का अपेक्षित परिचालन (ऑपरेटिंग) समय एक चंद्र दिवस या ~14 पृथ्वी दिन था, क्योंकि इसके इलेक्ट्रॉनिक्स को ठंडी चंद्र रात को सहन करने के लिए डिज़ाइन नहीं किया गया था। हालाँकि, इसकी विद्युत प्रणाली में सौर ऊर्जा से संचालित सोने/जागने का चक्र लागू किया गया है, जिसके परिणामस्वरूप योजना से अधिक सेवा समय मिल सकता था।[39][40] रोवर के दो पिछले पहियों पर चंद्रमा की सतह पर पैटर्न वाले ट्रैक छोड़ने के लिए इसरो का लोगो और भारत का राजकीय प्रतीक उभरा हुआ था।[41][42]

पेलोड संपादित करें

सबसिस्टम मात्रा (सं.) वजन(किलोग्राम) पावर(वाट)
जड़त्वीय नेविगेशन प्रणाली[43] 1 20 100
स्टार ट्राकर[43] 2 6 15
अल्टीमीटर[43] 2 1.5 8
वेलोसिटी मीटर[43] 2 1.5 8
इमेजिंग सेंसर[43] 2 2 5

इसरो ने घोषणा की है कि एक विशेषज्ञ समिति के निर्णय के अनुसार ऑर्बिटर पर पांच तथा रोवर पर दो पेलोड भेजे जायेंगे.[44] हालांकि शुरुआत में बताया गया था कि नासा तथा ईएसए भी इस अभियान में भाग लेंगे और ऑर्बिटर के लिए कुछ वैज्ञानिक उपकरणों को प्रदान करेंगे,[45] इसरो ने बाद में स्पष्ट किया कि वजन सीमाओं के चलते वह इस अभियान पर किसी भी गैर-भारतीय पेलोड को साथ नहीं ले जायेगी.

ऑर्बिटर पेलोड
  • चन्द्र सतह पर मौजूद प्रमुख तत्वों की मैपिंग (मानचित्रण) के लिए इसरो उपग्रह केन्द्र (ISAC), बंगलौर से लार्ज एरिया सॉफ्ट एक्स-रे स्पेक्ट्रोमीटर (क्लास) और फिजिकल रिसर्च लेबोरेटरी (PRL), अहमदाबाद से सोलर एक्स-रे मॉनिटर (XSM).[26]
  • स्पेस एप्लीकेशन सेंटर (SAC), अहमदाबाद से एल और एस बैंड सिंथेटिक एपर्चर रडार (एसएआर); चन्द्र सतह पर वॉटर आइस (बर्फीले पानी) सहित अन्य तत्वों की खोज के लिए. एसएआर से चन्द्रमा के छायादार क्षेत्रों के नीचे वॉटर आइस की उपस्थिति की पुष्टि करने वाले और अधिक साक्ष्य प्रदान किये जाने की उम्मीद है।
  • स्पेस एप्लीकेशन सेंटर (SAC), अहमदाबाद से इमेजिंग आईआर स्पेक्ट्रोमीटर (IIRS); खनिज, पानी, तथा हाइड्रॉक्सिल की मौजूदगी संबंधी अध्ययन हेतु चन्द्रमा की सतह के काफी विस्तृत हिस्से का मानचित्रण करने के लिए.
  • अंतरिक्ष भौतिकी प्रयोगशाला (SPL), तिरुअनंतपुरम से न्यूट्रल मास स्पेक्ट्रोमीटर (ChACE2); चन्द्रमा के बहिर्मंडल के विस्तृत अध्ययन के लिए.
  • स्पेस एप्लीकेशन सेंटर (SAC), अहमदाबाद से टेरेन मैपिंग कैमरा-2 (टीएमसी-2); चन्द्रमा के खनिज-विज्ञान तथा भूविज्ञान के अध्ययन के लिए आवश्यक त्रिआयामी मानचित्र को तैयार करने के लिए.
लैंडर पेलोड
  • सेइसमोमीटर - लैंडिंग साइट के पास भूकंप के अध्ययन के लिए [6]
  • थर्मल प्रोब - चंद्रमा की सतह के तापीय गुणों का आकलन करने के लिए[6]
  • लॉंगमोर प्रोब - घनत्व और चंद्रमा की सतह प्लाज्मा मापने के लिए[6]
  • रेडियो प्रच्छादन प्रयोग - कुल इलेक्ट्रॉन सामग्री को मापने के लिए[6]
रोवर पेलोड

इन्हें भी देखें संपादित करें

सन्दर्भ संपादित करें

  1. Nair, Avinash (31 May 2015). "ISRO to deliver "eyes and ears" of Chandrayaan-2 by 2015-end". The Indian Express. मूल से 15 फ़रवरी 2018 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 7 August 2016.
  2. "Chandrayaan-2 to Be Launched in January 2019, Says ISRO Chief". Gadgets360. एनडीटीवी इंडिया. Press Trust of India. 29 August 2018. मूल से 29 अगस्त 2018 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 29 August 2018.
  3. "ISRO to send first Indian into Space by 2022 as announced by PM, says Dr Jitendra Singh". Indian Department of Space. 28 August 2018. मूल से 28 अगस्त 2018 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 29 August 2018.
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  5. Shenoy, Jaideep (28 February 2016). "ISRO chief signals India's readiness for Chandrayaan II mission". The Times of India. Times News Network. मूल से 20 जुलाई 2019 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 7 August 2016.
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  7. "चंद्रयान 1 और 2 में क्या फर्क, कैसे करेगा काम? आपके हर सवाल का जवाब यहां है..." मूल से 10 सितंबर 2019 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 7 सितंबर 2019.
  8. "चंद्रयान-2: कहीं इंजन में ख़राबी के चलते तो नहीं टूटा विक्रम से संपर्क".
  9. "Chandrayaan-2 landing: 40% lunar missions in last 60 years failed, finds Nasa report". मूल से 8 सितंबर 2019 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 7 सितंबर 2019.
  10. "Chandrayaan-2 launch put off: India, Israel in lunar race for 4th position". मूल से 19 अगस्त 2018 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 5 अगस्त 2018.
  11. "Apollo-11 took 4 days to reach Moon, Chandrayaan-2 taking 48 days. Explained". मूल से 9 अगस्त 2019 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 9 अगस्त 2019.
  12. "GSLV-Mk III, India's 'Baahubali' rocket for Gaganyaan, Chandrayaan II". मूल से 6 जून 2019 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 12 जून 2019.
  13. "India Slips In Lunar Race With Israel As Ambitious Mission Hits Delays". मूल से 24 जून 2019 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 5 अगस्त 2018.
  14. Prasad, S. (23 January 2016). "Chandrayaan-2 launch likely by 2018". द हिन्दू. अभिगमन तिथि 29 January 2016.
  15. Subramanian, T. S. (4 January 2007). "ISRO plans Moon rover". The Hindu. अभिगमन तिथि 22 October 2008.
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  17. "Tricolour's 4th national flag on Moon". The Economic Times. 15 November 2008. मूल से 12 January 2009 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 18 November 2008.
  18. "World eyeing Chandrayaan-2 data as we'll explore the unexplored: Isro chief". मूल से 23 अगस्त 2019 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 22 अगस्त 2019.
  19. "Extra brake thrust may have sent Vikram out of control in home stretch". मूल से 8 सितंबर 2019 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 8 सितंबर 2019.
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  35. सन्दर्भ त्रुटि: <ref> का गलत प्रयोग; Economic नाम के संदर्भ में जानकारी नहीं है।
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बाहरी कड़ियाँ संपादित करें