चन्दौली जिला

उत्तर प्रदेश का जिला
(चन्दौली ज़िला से अनुप्रेषित)
चन्दौली ज़िला
Chandauli district
मानचित्र जिसमें चन्दौली ज़िला Chandauli district हाइलाइटेड है
सूचना
राजधानी : चन्दौली
क्षेत्रफल : 2,484.70 किमी²
जनसंख्या(2011):
 • घनत्व :
19,52,713
 790/किमी²
उपविभागों के नाम: तहसील
उपविभागों की संख्या: ?
मुख्य भाषा(एँ): हिन्दी भोजपुरी


चन्दौली ज़िला भारत के उत्तर प्रदेश राज्य का एक ज़िला है। ज़िले का मुख्यालय चन्दौली है।[1][2]

प्रशासनिकसंपादित करें

यह वाराणसी मण्डल का भाग है और उत्तर प्रदेश के पूर्वी भाग में बिहार की सीमा से लगा हुआ है। इस जिले में कुल 4 विधानसभा सैयदराजा, चकिया ,सकलडीहा, पं दीनदयाल उपाध्याय नगर (मुगलसराय) तथा एक लोकसभा संसदीय क्षेत्र चंदौली है।

इतिहाससंपादित करें

प्रशासनिक उद्देश्य से चन्दौली जनपद का निर्माण वाराणसी जनपद से अलग करके वर्ष 1997 में हुआ। यह जनपद पवित्र गंगा नदी के पूर्वी और दक्षिणी दिशा की ओर स्थित है। इस ज़िले नाम अपने तहसील मुख्यालय के नाम पर रखा गया है। यह पूरा जिला प्राचीन काशी राज्य के अधिकार में था। इस जिले से सम्बन्धित अनेकों कथाओं के अतिरिक्त यहाँ प्राचीन काल की मूल्यवान धरोहरों के प्रमाण भी पाये गए हैं और ईंट आदि के अवशेष भी जहाँ तहाँ पूरे ज़िले में बिखरे पड़े हैं। इस जिले के बहुत से भागों का इतिहास अभी अज्ञात है। जिले की तहसीलों में कुछ उजाड़खंड स्थान हैं, तालाब और कुण्ड हैं और उनके बारे में कई लोक-कथाएँ हैं। एक बहुत ही प्राचीन क्षेत्र बलुआ है जो सकलडीहा तहसील से 22 कि०मी० दक्षिण गंगा नदी के तट पर स्थित है। गंगा यहाँ पूरब से पश्चिम दिशा की ओर बहती हैं। हिन्दुओं का एक धार्मिक मेला हर वर्ष माघ महीने में मौनी अमावस्या के दिन लगता है। यह ’पश्चिम वाहिनी मेला’ के रूप में जाना जाता है। ऐसा कहा जाता है कि गंगा पूरे देश में केवल दो ही जगह पूर्व से पश्चिम की ओर बहती हैं- एक प्रयागराज (इलाहाबाद) में और दूसरा बलुआ में।

सकलडीहा तहसील का रामगढ़ गाँव एक महान अघोरेश्वर संत बाबा कीनाराम की जन्मभूमि है। यह चहनियाँ से मात्र 06 कि०मी० की दूरी पर स्थित है। संत कीनाराम वैष्णव धर्म के महान अनुयायी थे। इनका शिव और शक्ति में गहरा विश्वास था और दैवीय शक्ति में भी दृढ़ विश्वास था। अपना पूरा जीवन इन्होंने मानव जाति की सेवा में लगा दिया। यह स्थान हिन्दुत्व का एक पवित्र स्थल बन गया है।

जिले का एक प्राचीन स्थान है हेतमपुर गाँव। यहाँ एक किला है जिसे ’हेतमपुर किला’ कहा जाता है। जिला मुख्यालय से 22 कि०मी० उत्तर पूर्व में यह स्थित है। इस किले के अवशेष 22 बीघे के क्षेत्र तक फैले हुए हैं। कहा जाता है, 14वीं से 15वीं शताब्दी के बीच टोडरमल खत्री के द्वारा इसको आकार दिया गया था जो शेरशाह सूरी के राज्य में निर्माण पर्यवेक्षक थे। मुगल काल के बाद तालुकेदार तथा जागीरदार हेतम खाँ ने इसपर कब्जा कर लिया। यहाँ पाँच मुख्य ध्वस्त वीरान कोट हैं जिन्हें भुलैनी कोट, भितरी कोट, बिचली कोट, उत्तरी कोट और दक्षिणी कोट कहा जाता है। यह यात्रियों को बहुत आकर्षित करती हैं। कुछ लोग कहते हैं कि यह हेतम खाँ के द्वारा स्वयं बनवायी गयी थीं।

काशी राज्य का हिस्सा होने के कारण चन्दौली का भी इतिहास वही है जो वाराणसी जिले का और काशी राज्य का है। भगवान बुद्ध के जन्म के पहले ईसा पूर्व छठीं शताब्दी में भारतवर्ष 16 महाजनपदों में विभाजित था। इनमें काशी एक था जिसकी राजधानी वाराणसी थी। वर्तमान का बनारस अपने चारों ओर के क्षेत्रों के साथ काशी महाजनपद कहा जाता था। वाराणसी नगर भारत के प्राचीनतम नगरों में से एक है। प्राचीन काल से ही यह विद्या का केन्द्र है। पुराणों में, महाभारत में और रामायण में इसका नाम आया है। यह हिन्दुओं का, साथ ही साथ बौद्धों और जैनों का भी पवित्र स्थान है। यह नाम राजा काशी के नाम पर पड़ा है जो इस वंश परम्परा का सातवाँ राजा था। सातवीं पीढ़ी के बाद एक विख्यात राजा धनवंतरी ने यहाँ शासन किया जिनका नाम आयुर्वेद के संस्थापक मुख्य चिकित्सक के रूप में स्मरण किया जाता है।

काशी राज्य पर महाभारत के पूर्व की शताब्दी में मगध वंश परम्परा के शासक ब्रह्मदत्त का प्रभुत्व था। किन्तु ब्रह्मदत्त की वंशावली का उत्थान महाभारत युद्ध के बाद देखा गया। इस वंश परम्परा के करीब सैकड़ों राजाओं ने इस राज्य पर अपना शासन किया। इसके कुछ शासक तो चक्रवर्ती सम्राट हुआ करते थे। काशी के राजा मनोज ने कोशल, अंग और मगध की राजधानियों को जीत कर अपने राज्य में मिला लिया। जैन धर्मग्रंथों के अनुसार अश्वसेवा नाम के काशी के राजा थे जो 23 वें तीर्थंकर पार्श्वनाथ के पिता थे।

सन् 1775 में काशी राज्य ब्रिटिश शासकों के अधिकार में आ गया। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद बनारस स्टेट का भारत में विलय हो जाने पर इस पीढ़ी के सबसे अंतिम राजा महाराज विभूति नारायण सिंह थे जिन्होंने करीब आठ साल तक शासन किया।

भूगोलसंपादित करें

जनपद चन्दौली वाराणसी से ३० कि०मी० दूरी पर पूर्व-दक्षिण-पूर्व में अक्षांश २४° ५६' से २५° ३५' उत्तर एवं ८१° १४' से ८४° २४' पूर्व में स्थित है। भौगोलिक संरचना की दृष्टि से जिले की औसत ऊंचाई ७० मीटर (२२९ फीट) तथा क्षेत्रफल २४८४.७० किमी है।[3] चन्दौली पूर्व दिशा में बिहार राज्य, उत्तर-उत्तर-पूर्व में गाजीपुर जनपद, दक्षिण में सोनभद्र जनपद, दक्षिण-पूर्व में बिहार राज्य एवं दक्षिण-पश्चिम में मिर्ज़ापुर जनपद की सीमाओं से घिरा है। कर्मनाशा नदी इस जनपद और बिहार राज्य के मध्य की विभाजन रेखा है। गंगा, कर्मनाशा और चन्द्रप्रभा नदियाँ इस जनपद की भौगोलिक और आर्थिक परिस्थितियों पर महत्वपूर्ण प्रभाव रखती हैं। चंदौली को चावल का कटोरा के रूप में भी जाना जाता है।

जनांकिकसंपादित करें

2001 के रूप में भारत चंदौली 20,071 की आबादी थी। पुरुषों आबादी और 45% महिलाओं की 55% का गठन. 74% की पुरुष साक्षरता और 55% की महिला साक्षरता के साथ, चंदौली 66% की एक औसत साक्षरता दर 59.5% के राष्ट्रीय औसत से अधिक है। जनसंख्या का 16% उम्र के 6 वर्ष से कम है।

जिले के प्रमुख व्यक्तित्व.संपादित करें

  • संत रमैया
  • संत कीनाराम
  • शिवप्रसाद सिंह
  • सिद्धेश्वरी देवी
  • विद्याधरी देवी
  • वागेश्वरी देवी
  • नामवर सिंह
  • जनकवि रामकेर
  • गिरिजा देवी
  • कमलापति त्रिपाठी
  • स्वामी भगवतानन्द
  • अखण्डानन्द सरस्वती
  • जगदीश सिंह एडवोकेट
  • लालबहादुर शास्त्री
  • राजनाथ सिंह
  • चन्द्रिका कवि
  • डॉ. दशरथ ओझा
  • डॉ.सूर्यनारायण द्विवेदी
  • पं. निरंकार नाथ द्विवेदी
  • पं. मनोज कुमार द्विवेदी
  • डॉ.काशीनाथ सिंह
  • डॉ.महेन्द्र प्रताप वर्मा
  • डॉ.उमेश प्रसाद सिंह
  • डॉ.कृष्ण मोहन
  • रामजियावन दास बावला
  • आचार्य पारसनाथ शर्मा
  • रामदेव सिंह
  • बाबू सागर सिंह
  • नील कमल
  • एम.एन. सिन्हा मुकुल
  • प्रहसन सम्राट कपिलदेव सिंह
  • डॉ.कमलाकांत त्रिपाठी
  • लक्ष्मीकांत सरस
  • इं.सुरेश सिंह कलाशून्य
  • प्रो. रामचन्द्र उपाध्याय
  • शिवप्रसाद द्विवेदी शिव
  • अभिनेत्री लीला मिश्रा
  • अभिनेता सुजीत कुमार
  • फिल्मकार अनुराग कश्यप
  • फिल्मकार अभिनव कश्यप
  • फिल्मकार नेहा सिंह
  • अवधेश नारायण सिंह आईपीएस
  • पं.रामसूरत मिश्र
  • कामता प्रसाद विद्यार्थी
  • शहीद हीरा सिंह
  • शहीद रघुनाथ सिंह
  • शहीद मँहगू सिंह
  • शहीद कैप्टन विजयप्रताप सिंह
  • जगतनारायण दूबे
  • गंजी प्रसाद
  • (ईश्वर शरण सिंह ( भाई जी)

जितना मैं जानता हूँ नेगुरा ग्राम में बहुत पहले कोर्ट लगा करता था आज नेगुर को सब नाम मात्र ही जानते हैं नेगुरा ग्राम में बहुत पहले इस ग्राम के ईश्वर शरण सिंह ( भाई जी) ये कोंग्रेस के पंडित कमलापति त्रिपाठी के साथ बहुत बड़े पद पर रहे हैं जो कि नेगुरा ग्राम के बहुत ही मसहूर व्यक्ति हैं इनका इतिहास चन्दौली जिले के नाम यानी राजा चंदेल के नाम पर बना है उनके उल्लेख में मिलता है और इनके परिवार के लोग अभी भी वह इतिहास बात सकते हैं उनके भाई युगल किशोर सिंह( प्रदुमन जी) , कुवँर वीरेंद्र नारायण राकेश( चुनमुन जी)अभी आज भी जिंदा हैं



बाबु प्रसिद्ध नारायण सिंह चंदौली (वाराणसी) जनपद के प्रथम स्नातक के साथ-साथ जनपद के प्रथम जन प्रतिनिधि थे। श्री सिंह बनारस डिस्ट्रिक्ट बोर्ड के प्रथम चेयरमैन थे। बाबु प्रसिद्ध नारायण सिंह चंदौली जनपद के कादिराबाद गावँ के मूल निवासी थे। राजा बनारस द्वारा नौगढ़ में श्री सिंह को जमीन दान स्वरूप दिया गया था जहाँ पर श्री सिंह ने शमशेरपुर नामक गावँ स्थापित किया और आदिवासी समाज के उत्थान में काफी सहयोग किया।

  • एल. उमाशंकर सिंह*

एल. उमाशंकर सिंह एक साधक किस्म के अध्येता, विचारक, कलाकार, पत्रकार व सम्पादक हैं। लगभग तीस वर्षों से चित्रकला, साहित्य व पत्रकारिता की सेवा कर रहे हैं और स्वयं को सिर्फ सामान्य विद्यार्थी व जिज्ञासु ही मानते हैं। सम्मान व धनार्जन की लिप्सा से परे सिर्फ कर्म और देयवृत्ति में विश्वास रखते हैं। विचारों से प्रगतिशील हैं लेकिन विज्ञान को अपना धर्म मानने में कोताही नहीं बरतते। बड़े प्रकृति-प्रेमी हैं। अक्सर यायावर की तरह देश-विदेश की यात्राओं में मशगूल रहते हैं, क्योंकि इनकी दृष्टि में असली दर्शन यही है।

  • पत्रकारिता*

एल. उमाशंकर ने पत्रकारिता की शुरुआत छात्र-जीवन से ही कर दी। पाँच वर्षों तक अपने विद्यालय की पत्रिका 'प्रतिभा' में छात्र-सम्पादक रहे। तत्कालीन सबसे बड़े समाचार-पत्र 'आज' में अनेक वर्षों तक संवाददाता, फीचर-लेखक व चित्रकार के रूप में कार्य किया। बड़े प्रसार संख्या वाली राष्ट्रीय पाक्षिक पत्रिका 'पुनर्जागरण' के मुख्य कार्यकारी सम्पादक रहे। मासिक साहित्यिक पत्रिका 'भारतीय वाड़्गमय' के कार्यकारी सम्पादक भी रहे। कुछ महीनों तक लखनऊ से प्रसारित टीवी-शो 'आई टीवी' में कार्यक्रम निदेशक का पद सम्हाला। 'दैनिक जागरण' जैसे बड़े समाचार-पत्र के लखनऊ यूनिट में वरिष्ठ उपसम्पादक भी रहे। इसके अतिरिक्त 'नवभारत टाइम्स' मुम्बई, 'संमार्ग' कोलकाता, 'आवाज' धनबाद, 'गांडीव' वाराणसी, 'नेशनल रिव्यू' आजमगढ़, 'राष्ट्रचिन्ह' गोरखपुर, 'सन्मार्ग' वाराणसी व 'गाँव-गिराँव' वाराणसी सहित अनेक समाचार-पत्रों के लिए विभिन्न भूमिकाओं में कार्य किया। पचास से अधिक स्मृतिग्रंथों व स्मारिकाओं का सम्पादन और आवरण-संयोजन भी कर चुके हैं। दर्जनों स्मृतिग्रंथों में सलाहकार रह चुके हैं और वर्तमान में लगभग बीस पत्रिकाओं में सलाहकार-सम्पादक व मुख्य विजुअलाइजर की भूमिका का निर्वहन कर रहे हैं। अभी तक विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में लगभग चार सौ फीचर-लेख प्रकाशित हो चुके हैं।

  • साहित्य-सेवा*

प्राथमिक कक्षाओं के गुरु आचार्य पारसनाथ शर्मा से प्रभावित होकर एल. उमाशंकर के भीतर साहित्यिक अभिरुचि पैदा हुई और अपने ही कुल के ख्यातिलब्ध समालोचक डॉक्टर नामवर सिंह के सान्निध्य ने उस अभिरुचि को पंख दिया। कक्षा सात की पढ़ाई के दौरान ही कविताओं-कहानियों की रचना का प्रयास शुरू हो गया था। प्रत्येक रचनाओं के प्रथम पाठक या श्रोता भी डॉ. नामवर सिंह ही रहते थे और लगातार सुझाव और प्रोत्साहन भी देते रहते थे। एल. उमाशंकर की कुछ कहानियाँ व कविताएँ विद्यालयीय पत्रिका 'प्रतिभा' के अनेक अंकों में प्रकाशित हुईं। बाद में अनेक प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में कविताएँ छपीं। ढाई सौ से अधिक कविताएँ, लगभग तीस कहानियाँ व दो अपूर्ण उपन्यास लिख चुके एल. उमाशंकर की कविताएँ तो कुछ साझा-संकलनों में पुस्तकाकार प्रकाशित हुईं, लेकिन अन्य अभी भी प्रकाशन की बाट जोह रही हैं। खुद के साहित्य को प्रकाशित नहीं करा पाने का कारण शायद यही है कि ये दूसरे रचनाकारों की कृतियों के सम्पादन में अपना अधिकाधिक समय देते रहे हैं। पाँच सौ से अधिक पुस्तकों का सम्पादन मामूली बात नहीं होती है और एल. उमाशंकर ने यह अचम्भित करने वाला श्रमसाध्य कार्य किया है। सम्पादित पुस्तकें विश्वविद्यालय प्रकाशन, पुनर्जागरण प्रकाशन, पुस्तक-पथ प्रकाशन, वाराणसेय संस्कृत संस्थान, शारदा प्रकाशन, अक्षर प्रकाशन व संस्कृति प्रकाशन सहित अनेक महत्वपूर्ण प्रकाशनों से प्रकाशित हुई हैं। एल. उमाशंकर ने 'निर्गुण रचनावली' (छः खण्डों में), 'पं. कृपाशंकर शुक्ल रचनावली' (चार खण्डों में), 'मुकुल रचनावली', 'विवेकी राय कथा-समग्र' सहित अनेक बड़े संग्रहों का भी कुशल सम्पादन किया। इनके द्वारा बाबा नागार्जुन, त्रिलोचन शास्त्री, विष्णु प्रभाकर, मनोहरश्याम जोशी, डॉ. रामविलास शर्मा, डॉ. विद्यानिवास मिश्र, डॉ. विष्णुकांत शास्त्री, डॉ. नामवर सिंह, डॉ. केदारनाथ सिंह, डॉ. मैनेजर पाण्डेय, मुद्राराक्षस, डॉ. अशोक वाजपेयी व राजेंद्र यादव सहित पचास से अधिक स्वनामधन्य साहित्यकारों का साक्षात्कार लिया गया, जो विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए। सौ से अधिक पुस्तक-समीक्षाएँ भी विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं। एल. उमाशंकर द्वारा लिखित नौ नाटकों व तीन पटकथाओं का मंचन व दृश्यांकन भी हो चुका है।

  • कला-सेवा*

एल. उमाशंकर सिंह जब प्राथमिक कक्षाओं में पढ़ रहे थे तो पड़ोसी गाँव के एक बहुमुखी प्रतिभासम्पन्न व्यक्ति श्री पारसनाथ शर्मा उनके अध्यापक के रूप में मिले। शर्मा जी साहित्य, संगीत, चित्रकला, मूर्तिकला व तकनीकी में तो माहिर थे ही, अध्यापन-कला में भी बेजोड़ थे। आचार्य शर्मा की चित्रकारी से प्रभावित होकर एल. उमाशंकर चित्रांकन में मनोयोग से लगे। कला के प्रति गहरे लगाव ने ही इनको अपने नाम (उमाशंकर) के पहले दुनिया के महानतम चित्रकार लियोनार्दो द विंची का नाम जोड़ने हेतु प्रेरित किया। इनके नाम एल. उमाशंकर का प्रथमाक्षर 'एल' लियोनार्दो है। प्राथमिक कक्षाओं में ही एल. उमाशंकर लगन व रियाज से विद्यालय में सबसे अच्छे कलाकार-छात्र बन गए। कुशल चित्रांकन ने इनको इण्टरमीडिएट तक आसपास के जनपदों में भी चर्चित कर दिया। मण्डलीय कला प्रतियोगिताओं में प्रत्येक वर्ष इनको प्रथम स्थान प्राप्त होता रहा। आगे फाइन आर्ट्स में एडमिशन लेकर इन्होंने बड़े शहरों में चित्र-प्रदर्शनियाँ आयोजित करनी शुरू की। देश के अनेक शहरों की महत्वपूर्ण कला-दीर्घाओं सहित विदेशों में भी इनके चित्रों की कुल ग्यारह एकल व कुल एकतीस संयुक्त चित्र-प्रदर्शनियाँ आयोजित हो चुकी हैं। दर्जनों समकालीन बड़े चित्रकारों के कला-कर्म पर इन्होंने समीक्षात्मक लेख भी लिखे, जो विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए। एल. उमाशंकर सिंह की रुचि भारतीय संगीत में भी गहरी है। शास्त्रीय, उपशास्त्रीय, लोकसंगीत व अनुरंजक संगीत पर इन्होंने खूब लिखा है। सैकड़ों संगीतज्ञों व उनके सांगीतिक अवदान पर लिखित एल. उमाशंकर के लेख विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। कुछ सांगीतिक ग्रंथों की भूमिका भी इन्होंने लिखी है।

  • सामाजिक जीवन*

अध्ययन, चिंतन, लेखन व देशाटन में लगातार सक्रिय रहने के बावजूद एल. उमाशंकर सिंह बेहद मिलनसार व सहयोगी स्वभाव के इनसान हैं। अक्सर सामाजिक आयोजनों में भाग भी लेते रहते हैं। बिना लाग-लपेट के अपना प्रगतिशील वक्तव्य भी रखते हैं। नये रचनाकारों को खोज-खोजकर प्रोत्साहित करते हैं। व्यवहारकुशल होने के कारण सामाजिक दायरा भी काफी बड़ा है। विभिन्न क्षेत्र की बड़ी विभूतियों से सहज सम्बन्ध हैं इनके। वाम-व्यवहारी हैं, इसलिए सभी से एक भाव में मिलते हैं। किसी का भी सहयोग करके स्वयं को उपकृत महसूस करते हैं। बड़े-बड़े आयोजनों या प्रकरणों को बेहद सहज व आसान भाव से सम्पन्न करने में सक्षम दिखते हैं। सब मिलाकर कहें तो एल. उमाशंकर सिंह में अनेक व्यक्तित्वों का समावेश है, ठीक वैसे ही जैसे महान इटालियन चित्रकार लियोनार्दो दा विंची में था। (प्रस्तुति डॉ. अजय प्रताप) ********************==डा.जयप्रकाश मौर्या,ग्राम -इटवां पोस्ट-अमिलाई

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सीबी सिंह चंदौली जिले के वरिष्ठ और जाने-माने पत्रकार हैं। लंबे समय तक दैनिक जागरण से जुड़े हुए हैं। विजय विनीत भी चंदौली के निवासी हैं, जो फिलहाल जनसंदेश टाइम्‍स वाराणसी के संपादकीय प्रभारी हैं। विजय विनीत किसी पहचान के मोहताज नहीं हैं। देश के कई इलाकों में अमर उजाला, हिंदुस्‍तान जैसे अखबारों में अपनी सेवाएं दी हैं। चंदौली जिले के निवासी अनिल सिंह जाने माने पत्रकार हैं, जो फिलहाल लखनऊ में रहकर पत्रकारिता कर रहे हैं।अनिल लंबे समय तक दिल्‍ली में भी कई चैनलों एवं वेबमीडिया से जुड़े रहे हैं। दैनिक जागरण समेत कई अखबारों को अपनी सेवाएं दे चुके हैं। मिथिलेश दुबे एवं पवन तिवारी भी चंदौली जनपद के निवासी हैं, जो वाराणसी में अमर उजाला को लंबे समय से अपनी सेवाएं दे रहे हैं। पवन तिवारी अपनी एक अलग पहचान रखते हैं। चंदौली निवासी सुनील सिंह यूएनआई से जुड़े हुए हैं। सुनील कराटे के अंतर्राष्‍ट्रीय खिलाड़ी एवं कोच भी हैं। बिड़ला शंकर सिंह बिल्‍लू भी दैनिक जागरण से जुड़े हुए हैं। कुमार अरविंद चंदौली जिले के वरिष्ठ पत्रकार हैं, जो दिल्ली में रहकर कलम चला रहे हैं। सकलडीहा के बरठी गांव के रहने वाले हरबंश पटेल एक वरिष्ठ पत्रकार व समाजसेवी हैं, जो पृथक पूर्वांचल राज्य बनाने के लिए पूर्वांचल राज्य जनमोर्चा गठित कर जन आंदोलन चला रहे हैं।जिले के एक वरिष्ठ विजय कुमार तिवारी हैं, जो फिलहाल हैदराबाद में रहकर एक बड़े मीडिया घराने के साथ काम कर रहे हैं। इसके पहले वह ईटीवी संवाददाता के रुप चंदौली जिले में काम कर चुके हैं। एल उमाशंकर सिंह चंदौली जिले के पत्रकार हैं। चंदौली जिले का पहला ऑनलाइन पोर्टल भी है.. chandaulisamachar.com के नाम से जिले भर की हर बड़ी खबरों को देश-दुनिया तक पहुंचाने की कोशिश कर रहा है,जिसके संचालक रोहित कुमार उपाध्याय है।गाँव गिराँव चन्दौली जिले का प्रथम समाचार पत्र है जो वर्ष 2003 मे साप्ताहिक के रूप मे प्रकाशित हुआ वर्ष 2007 से सह प्रकाशन हिन्दी दैनिक के रूप मे प्रकाशित हो रहा है साथ ही सोनभद्र और भदोही से दैनिक व वाराणसी से मासिक पत्रिका का भी प्रकाशन हो रहा है। श्रीधर द्विवेदी इसके प्रकाशक व ग्रुप सम्पादक है। वेव साइट www.gaongiraw.com&www.gaongiraw.page पर इसे दुनिया भर मे देखा जा सकता है।

इन्हें भी देखेंसंपादित करें

बाहरी कड़ियाँसंपादित करें

सन्दर्भसंपादित करें

  1. "Uttar Pradesh in Statistics," Kripa Shankar, APH Publishing, 1987, ISBN 9788170240716
  2. "Political Process in Uttar Pradesh: Identity, Economic Reforms, and Governance," Sudha Pai (editor), Centre for Political Studies, Jawaharlal Nehru University, Pearson Education India, 2007, ISBN 9788131707975
  3. Falling Rain Genomics, Inc - Chandauli