मुख्य मेनू खोलें

जयनाथ पति (1880-1939) मगही भाषा के पहले उपन्यासकार, भारतीय इतिहास व संस्कृति [1] के प्रमुख विद्वान और स्वतंत्रता सेनानी हैं। आपका जन्म जिला नवादा (बिहार) के गांव शादीपुर, पो. कादरीगंज के कायस्थ परिवार में 1880 में हुआ था।[2] अनेक भाषाओं के मर्मज्ञ जयनाथ पति ने मगही के साथ-साथ अंग्रेजी में अनेक विचारोत्तेजक लेख लिखे हैं जो 1920 से 1935 के दौरान प्रकाशित हुए।[3] पेशे से प्रथम श्रेणी के मोख्तार जयनाथ पति संस्कृत, अंग्रेजी, बंगला, लैटिन, फारसी, उर्दू, हिन्दी और मगही के प्रकांड विद्वान थे। उनकी प्रतिभा इतनी विलक्षण थी कि वह एक ही समय में अपनी दोनों हाथों से अलग-अलग भाषाओं में लिखने का काम बड़ी ही कुशलता के साथ किया करते थे। आपने फारसी लोकगीतों और ऋग्वेद का भी अनुवाद किया है। इनकी मृत्यु टायफाइड बीमारी से 21 सितंबर 1939 को पीएमसीएच, पटना के पेईंगवार्ड में हुई।[4]

बहुमुखी प्रतिभासंपादित करें

जयनाथ पति बहुमुखी प्रतिभा संपन्न विद्वान, लेखक, संपादक-प्रकाशक, वेदशास्त्र[5] और भाषा, संस्कृति एवं इतिहास के गंभीर अध्येता थे। एक साथ ही वे कई मोर्चे पर सक्रिय और सृजनरत थे। एक लेखक के नाते विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में वेद, इतिहास, भाषा-संस्कृति[6] पर लेख लिख रहे थे, मातृभाषा मगही में साहित्य रच रहे थे, स्वतंत्रता आंदोलन को स्थानीय स्तर पर नेतृत्व प्रदान कर रहे थे, तो मगही में किताबें छापने के साथ-साथ आजादी की लड़ाई के लिए हस्तलिखित अखबार निकाल रहे थे।[7] यही नहीं, मोख्तार होने के कारण ब्रिटिश हुकुमत से मोख्तारों के अधिकारों के लिए वह कानूनी लड़ाइयां भी लड़ रहे थे। मात्र 12वीं तक की पढ़ाई कर मोख्तार बने जयनाथ पति का योगदान शिक्षा के क्षेत्र में भी रहा है। इसका उदाहरण नवादा में उनके द्वारा स्थापित एंग्लो संस्कृत स्कूल है जो आज भी चल रहा है।

स्वतंत्रता आंदोलन के प्रमुख सुराजीसंपादित करें

वे एक निर्भिक राष्ट्रवादी थे। होमरूल आंदोलन के स्थानीय स्तर पर एकमात्र सदस्य थे। 1920 में गांधी जी के सत्याग्रह आंदोलन के समय नवादा कांग्रेस कमेटि के अध्यक्ष के रूप में उन्होंने सुराजियों का नेतृत्व किया था। स्वतंत्रता आंदोलन को संगठित करने के लिए उन्होंने एक हस्तलिखित अखबर भी शुरू किया जिसे वे अपने घर के तहखाने में लिखते और फिर अपनी पत्नी श्यामा देवी के साथ गांव-गांव जाकर पाठकों के बीच पहुंचा दिया करते। स्वतंत्रता संग्राम में उनकी सक्रिय भूमिका के कारण 1930 में उन्हें नौ माह केन्द्रीय कारागार हजारीबाग में गुजारना पड़ा था।

मगही के प्रथम उपन्यासकारसंपादित करें

जयनाथ पति ने 1927 के अंत में मगही भाषा के पहले उपन्यास ‘सुनीता’ की रचना की जो 1928 में प्रकाशित हुआ।[8] इस उपन्यास की समीक्षा सुप्रसिद्ध भाषाविद् सुनीति कुमार चटर्जी ने ‘द मॉडर्न रिव्यू’ के अप्रेल 1928 के अंक में की है।[9] मगही का यह पहला उपन्यास अब उपलब्ध नहीं है। लेकिन 1928 की पहली अप्रैल को प्रकाशित उनका दूसरा मगही उपन्यास ‘फूल बहादुर’ की प्रति सुरक्षित है।[10] इसके बाद उनका तीसरा उपन्यास ‘गदहनीत’ छपा। अपने इन तीनों उपन्यासों में उन्होंने सामाजिक रूढ़ियों और भ्रष्टाचार पर करारी चोट की है। इसके अतिरिक्त जयनाथ पति ने 1937 में गवर्नमेंट आफ इंडिया एक्ट 1935 का मगही अनुवाद कर ‘स्वराज’ शीर्षक से प्रकाशित किया है। आधुनिक मगही साहित्य के विकास के लिए उन्होंने एक संगठन भी बनाया था तथा कई पुस्तकें लिखीं जिनमें से अधिकांश अप्रकाशित रह गई।[11] उनके द्वारा संकलित मगही लोकसाहित्य की एक पुस्तक भी प्रकाशित है।

सन्दर्भसंपादित करें