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जयसिंह तृतीय, सोमेश्वर द्वितीय और विक्रमादित्य षष्ठ का अनुज था।

अपने पिता (सोमेश्वर प्रथम) के समय में वह तर्दवाडि का प्रांतपाल था। १०६१ ई. में वह कूडल् के युद्ध में वीर राजेंद्र के विरुद्ध लड़ा था किंतु चालुक्य पक्ष की गहरी हार हुई थी। सोमेश्वर द्वितीय ने सिंहासन पर बैठने पर जयसिंह को भी प्रांतों का शासन दिया। १०६८ ई. में वह कोगलि, कदंबलिगे और बल्लकुंदे पर राज्य कर रहा था। बाद में वह नोलंबवाडि और सिंदवाडि का प्रांतपाल नियुक्त हुआ जिस पद पर वह १०७३ ई. तक बना रहा। बीच-बीच में उसे अन्य प्रांतों का भी अधिकार मिल जाता था। विरुद सहित उसका पूरा नाम "त्रैलोक्यमल्लनोलंम-पल्लव पेर्माडि जयसिंहदेव" था। विक्रमादित्य षष्ठ और सोमेश्वर द्वितीय के संघर्ष में दोनों बार उसने विक्रमादित्य का पक्ष लिया। १०७६ ई. में वह भी विक्रमादित्य के साथ कुलोत्तुंग प्रथम के हाथों पराजित हुआ था, जिसने सोमेश्वर का पक्ष लिया था। किंतु उसकी सहायता से विक्रमादित्य ने चोल नरेश को पराजित करके सिंहासन प्राप्त किया। विक्रमादित्य ने जयसिंह की सहायता का उचित महत्व स्वीकार किया और उसे बेल्वोल और पुलिगेरे का प्रांत दिया जो प्राय: युवराज को दिया जाता था। बाद में बनवासि और संतलिगे भी उसके अधिकार में कर दिए गए।

१०८३ ई. तक जससिंह ने विक्रमादित्य की अधीनता में शासन किया। फिर उसने प्रजा को अनेक प्रकार से उत्पीड़ित करके धन एकत्र किया जिससे उसने एक विशाल सेना बनाई, चोल नरेश से भी मित्रता की, वन-जातियों से संधि की, विक्रमादित्य की सेना में फूल डालने का प्रयत्न किया और सिंहासन पर अपना अधिकार करने के लिये कृष्णा के तट पर आया जहाँ अनेक सामंत उससे मिल गए। पहले तो विक्रमादित्य ने शांतिपूर्ण उपायें से काम लेना चाहा किन्तु अंत में विवश होकर उसे युद्ध करना पड़ा। जयसिंह को प्रारंभ में विजय मिलती हुई सी लगी, किंतु अंत में विक्रमादित्य की वीरता के कारण वह पराजित होकर बंदी बना। बिल्हण के अनुसार विक्रमादित्य ने उसे क्षमा कर दिया। वास्तविकता कदाचित् उससे कुछ भिन्न थी; इसके बाद इतिहास में जयसिंह का कोई चिह्न नहीं मिलता।

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इन्हें भी देखेंसंपादित करें