तुकोजीराव होळकर प्रथम (१७६७-१७९७) अहिल्याबाई होळकर के सेनापति थे तथा उनकी मृत्यु के पश्चात् होळकर वंश के शासक बन गये । पहले उन्होने पेशावर विजय में अपना पूर्ण योगदान दिया और अटक के किले मे ढ़ाई वर्ष ठहरकर हिंदवी स्वराज्य के अफ़गानी शत्रु अहमदशाह अब्दाली से रक्षा की । दक्षिण मे टीपू सुलतान को युद्ध मे पराजित कर मराठा साम्राज्य की पुनः एक बार नींव रखी ।

तुकोजीराव होळकर
'महाराज (इंदौर के शासक) '
Tukoji Rao Holkar.png
तुकोजीराव होळकर
शासनावधि१७९५ - १७९७
उत्तरवर्तीकाशीराव होळकर
जन्म१७२३
निधन१५ अगस्त १७९७
पितातनुजी होळकर
धर्महिन्दू

आरम्भिक समयसंपादित करें

बाजीराव प्रथम के समय से ही 'शिन्दे' तथा 'होळकर' मराठा साम्राज्य के दो प्रमुख आधार स्तंभ थे । राणोजी शिंदे एवं मल्हारराव होळकर शाहू महाराज के सर्वप्रमुख सेनानायकों में से थे, परन्तु इन दोनों परिवारों का भविष्य सामान्य स्थिति वाला नहीं रह पाया । राणोजी शिंदे के सभी उत्तराधिकारी सुयोग्य हुए परन्तु मल्हारराव होळकर की पारिवारिक स्थिति दुर्भाग्यपूर्ण हो गयी । उनके पुत्र खंडेराव के दुर्भाग्यपूर्ण निधन के पश्चात अहिल्याबाई होळकर के स्त्री तथा भक्तिभाव पूर्ण महिला होने से द्वैध शासन स्थापित हो गया । राजधानी में शासिका के रूप में अहिल्याबाई होळकर थी तथा सैनिक कार्यवाहियों के लिए उन्होंने तुकोजीराव होळकर को मुख्य कार्याधिकारी बनाया था । कोष पर अहिल्याबाई अपना कठोर नियंत्रण रखती थी तथा तुकोजीराव कार्यवाहक अधिकारी के रूप में उनकी इच्छाओं तथा आदेशों के पालन के लिए अभियानों एवं अन्य कार्यों का संचालन करते थे । अहिल्याबाई भक्ति एवं दान में अधिक व्यस्त रहती थीं तथा सामयिक आवश्यकताओं के अनुरूप महिलाओं की सेना को उन्नत बनाने पर विशेष ध्यान दे रही थी । तुकोजी होळकर अत्यधिक महत्वाकांक्षी थे । आरंभ में मराठा अभियानों में वह महादजी के साथ सहयोगी की तरह रहे । तब तक उनकी स्थिति भी अपेक्षाकृत सुदृढ़ रही । बालक पेशवा माधवराव नारायण की ओर से बड़गाँव तथा तालेगाँव के मध्य ब्रिटिश सेना की पराजय, रघुनाथराव के समर्पण तथा मराठों की विजय में महादजी के साथ तुकोजी होळकर का भी संतोषजनक योगदान था ।

अवनति के पथ परसंपादित करें

सन् १७८० में तुकोजी महादजी से अलग हो गये । उसके पश्चात् महादजी ने राजनीतिक क्षेत्र में अत्यंत उन्नति प्राप्त की परंतु तुकोजी का स्थान अत्यंत निम्न हो गया । लालसोट के संघर्ष के पश्चात् १७८७ में महादजी द्वारा सहायता भेजे जाने के अनुरोध पर नाना फडणवीस ने पुणे से अली बहादुर तथा तुकोजी होळकर को भेजा, परंतु वहां पहुँचकर महादजी और तुकोजी में विवाद हो गया । तुकोजी विजित प्रांतों में भाग चाह रहे थे और स्वभावतः महादजी का कहना था कि यदि भाग चाहिए तो पहले विजय हेतु व्यय किये गये धन को चुकाने में भी भाग देना चाहिए । परंतु महादजी ने अहिल्याबाई से लिया हुआ कर्ज चुकाया नही था इसलिए तुकोजी का कहना था कि "आप पहले मातेश्वरी (अहिल्याबाई होळकर) से लिया हुआ कर्ज चुकाईये । अहिल्याबाई तथा तुकोजी जो प्रायः समवयस्क थे, परन्तु कभी समान विचार वाले होकर नहीं रहे । तुकोजी कभी भी अहिल्याबाई के शब्दों के आगे नही गये ।

परिवारसंपादित करें

तुकोजी होल्कर के चार पुत्र थे-- काशीराव, मल्हारराव, विठोजी तथा यशवंतराव। इनमें से प्रथम दो पहली पत्नी तथा अंतिम दो दूसरी पत्नी के पुत्र थे ।

पराभव का आरम्भसंपादित करें

तुकोजी और महादजी का वैमनस्य और बढने लगा, परिणामस्वरूप महादजी ने उनका सर्वनाश करने का निश्चय किया । ८ अक्टूबर १७९२ को महादजी की ओर से गोपालराव भाऊ ने सुरावली नामक स्थान पर होलकर पर आकस्मिक आक्रमण किया । अनेक सैनिक मारे गए परंतु स्वयं तुकोजी होलकर बंदी होने से बच गए । यद्यपि बापूजी होलकर तथा पाराशर पंत के प्रयत्न से इस प्रकरण में समझौता हो गया । परंतु इंदौर में अहिल्याबाई तथा तुकोजी के पुत्र मल्हारराव द्वितीय को यह अपमानजनक लगा । उन्होंने थोड़ी सी सेना तथा धन लेकर अपने पिता के शिविर में पहुँचकर समझौते तथा बापूजी एवं पाराशर पंत के परामर्श का उल्लंघन कर महादजी के बिखरे अश्वारोहियों पर आक्रमण आरंभ कर दिया । गोपालराव द्वारा समाचार पाकर महादजी ने आक्रमण का आदेश दे दिया ।

लाखेरी के युद्ध में भीषण पराजयसंपादित करें

लाखेरी में हुए इस युद्ध के बारे में माना गया है कि इतना भीषण युद्ध उत्तर भारत में कभी नहीं हुआ था । होल्कर के अश्वारोही दल की संख्या लगभग २५,००० थी । उनके साथ लगभग २,००० की प्रशिक्षित पैदल सेना थी, जिसके पास ३८ तोपें थीं। महादजी के प्रतिनिधि गोपालराव २०,००० अश्वारोही, ६,००० प्रशिक्षित पैदल तथा फ्रेंच शैली की उन्नत ८० हल्की तोपें लेकर होल्कर के समक्ष डट गया। प्रथम सामना २७ मई १७९३ को हुआ । उसमें तुकोजी कि विजय हुई तत्पश्चात निर्णायक युद्ध १ जून १७९३ को हुआ । महादजी के अनुभवसिद्ध प्रबंधक जीवबा बख्शी तथा दि बायने की चतुर रणशैली के कारण होल्कर की समस्त सेना का लगभग सर्वनाश हो गया ।

तुकोजी होल्कर का पराभव हो गया और वह इंदौर लौट गये ।

अन्तसंपादित करें

१७९५ में निज़ाम के विरुद्ध मराठों के खरडा के युद्ध में अत्यंत वृद्धावस्था में तुकोजीराव ने भाग लिया । १७९५ ई० में अहिल्याबाई का देहान्त हो जाने पर तुकोजी ने इंदौर का राज्याधिकार ग्रहण किया । अपनी अंतिम अवस्था में तुकोजी पुणे में ही रहे । १५ अगस्त १७९७ को पुणे में ही उनका निधन हो गया ।

इन्हें भी देखेंसंपादित करें

सन्दर्भसंपादित करें