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पेशवा बाजीराव प्रथम (श्रीमंत पेशवा बाजीराव बल्लाळ भट्ट) (१७०० - १७४०) महान सेनानायक थे। वे १७२० से १७४० तक मराठा साम्राज्य के चौथे छत्रपति शाहूजी महाराज के पेशवा (प्रधानमन्त्री) रहे। इनको 'बाजीराव बल्लाळ' तथा 'थोरले बाजीराव' के नाम से भी जाना जाता है। इन्हें प्रेम से लोग अपराजित हिन्दू सेनानी सम्राट भी कहते थे। इन्होंने अपने कुशल नेतृत्व एवं रणकौशल के बल पर मराठा साम्राज्य का विस्तार (विशेषतः उत्तर भारत में) किया। इसके कारण ही उनकी मृत्यु के २० वर्ष बाद उनके पुत्र के शासनकाल में मराठा साम्राज्य अपने चरमोत्कर्ष पर पहुँच सका। बाजीराव प्रथम को सभी ९ महान पेशवाओं में सर्वश्रेष्ठ माना जाता है।

पेशवा बाजीराव प्रथम
पेशवा
Bajirao Peshwa.jpg
पुणे के शनिवार वाड़ा में बाजीराव की प्रतिमा
शासनावधिमराठा साम्राज्य
पूर्ववर्तीबाळाजी विश्वनाथ पेशवा
उत्तरवर्तीबाळाजी बाजीराव पेशवा
जन्म१८ अगस्त १७००
निधन२८ अप्रैल १७४०
रावेरखेडी, पश्चिम निमाड, मध्य प्रदेश
समाधि
नर्मदा नदी घाट, रावेरखेडी
पूरा नाम
बाजीराव बाळाजी भट (पेशवे)
पिताबाळाजी विश्वनाथ पेशवा
माताराधाबाई

इनके पिता पेेशवा बालाजी विश्वनाथ भी छत्रपति शाहूजी महाराज के पेशवा थे। बचपन से बाजीराव को घुड़सवारी करना, तीरंदाजी, तलवार भाला, बनेठी, लाठी आदि चलाने का शौक था। १३-१४ वर्ष की खेलने की आयु में बाजीराव अपने पिताजी के साथ घूमते थे।[1] उनके साथ घूमते हुए वह दरबारी चालों व रीतिरिवाजों को आत्मसात करते रहते थे।यह क्रम १९-२० वर्ष की आयु तक चलता रहा। जब बाजीराव के पिता का अचानक निधन हो गया तो मात्र बीस वर्ष की आयु के बाजीराव को शाहूजी महाराज ने पेशवा बना दिया।

जब महाराज शाहू ने १७२० में बालाजी विश्वनाथ के मृत्यूपरांत उसके १९ वर्षीय ज्येष्ठपुत्र बाजीराव को पेशवा नियुक्त किया तो पेशवा पद वंशपरंपरागत बन गया। अल्पवयस्क होते हुए भी बाजीराव ने असाधारण योग्यता प्रदर्शित की। पेशवा बनने के बाद अगले बीस वर्षों तक बाजीराव मराठा साम्राज्य को बढ़ाते रहे। उनका व्यक्तित्व अत्यंत प्रभावशाली था; तथा उनमें जन्मजात नेतृत्वशक्ति थी। अपने अद्भुत रणकौशल, अदम्य साहस और अपूर्व संलग्नता से, तथा प्रतिभासंपन्न अनुज श्रीमान चिमाजी साहिब अप्पा के सहयोग द्वारा शीघ्र ही उसने मराठा साम्राज्य को भारत में सर्वशक्तिमान् बना दिया।[2] इसके लिए उन्हें अपने दुश्मनों से लगातार लड़ाईयाँ करना पड़ी। अपनी वीरता, अपनी नेतृत्व क्षमता व युद्ध-कौशल योजना द्वारा यह महान वीर हर लड़ाई को जीतता गया। शिवाजी महाराज की तरह वह बहुत ही कुशल घुड़सवार थे। घोड़े पर बैठे-बैठे भाला चलाना, बनेठी घुमाना, बंदूक चलाना उनके बाएँ हाथ का खेल था। घोड़े पर बैठकर श्रीमंतबाजीराव के भाले की फेंक इतनी जबरदस्त होती थी कि सामने वाला घुड़सवार अपने घोड़े सहित घायल हो जाता था।

इस समय भारत की जनता मुगलों के साथ-साथ अंग्रेजों व पुर्तगालियों के अत्याचारों से त्रस्त हो चुकी थी। ये भारत के देवस्थान तोड़ते, जबरन धर्म परिवर्तन करते, महिलाओं व बच्चों को मारते व भयंकर शोषण करते थे।[1] ऐसे में श्रीमंतबाजीराव पेशवा ने उत्तर भारत से लेकर दक्षिण भारत तक ऐसी विजय पताका फहराई कि चारों ओर उनके नाम का डंका बजने लगा। लोग उन्हें शिवाजी का अवतार मानने लगे। श्रीमंतबाजीराव पेशवा में शिवाजी महाराज जैसी ही वीरता व पराक्रम था तो एक अपवाद छोड़कर लगभग वैसा ही उच्च चरित्र भी था।

शकरखेडला (Shakarkhedla) में श्रीमंत पेशवा ने मुबारिज़खाँ को परास्त किया। (१७२४)। मालवा तथा कर्नाटक पर प्रभुत्व स्थापित किया (१७२४-२६)। पालखेड़ में महाराष्ट्र के परम शत्रु निजामउलमुल्क को पराजित कर (१७२८) उससे चौथ तथा सरदेशमुखी वसूली। फिर मालवा और बुंदेलखंड पर आक्रमण कर मुगल सेनानायक गिरधरबहादुर तथा दयाबहादुर पर विजय प्राप्त की (१७२८)। तदनंतर मुहम्मद खाँ बंगश को परास्त किया (१७२९)। दभोई में त्रिंबकराव को नतमस्तक कर (१७३१) उसने आंतरिक विरोध का दमन किया। सीदी, आंग्रिया तथा पुर्तगालियों एवं अंग्रेजो को भी बुरी तरह विजित किया। दिल्ली का अभियान (१७३७) उनकी सैन्यशक्ति का चरमोत्कर्ष था। उसी वर्ष भोपाल में श्रीमंतबाजीराव पेशवा ने फिर से निजाम को पराजय दी। अंतत: १७३९ में उन्होनें नासिरजंग पर विजय प्राप्त की।बाजीराव प्रथम को एक महान घुड़सवार सेनापति के रूप में जाना जाता है और इतिहास के उन महान योद्धाओं में बाजीराव का नाम आता है जिन्होंने कभी भी अपने जीवन में युद्ध नहीं हारा और बाजीराव प्रथम ने अपने जीवन में एक भी युद्ध नहीं हारा और यह उनकी महानता को दर्शाता है अब शायद अकबर के बाद कोई ऐसा पहला सेनापति हुआ जिसने कभी युद्ध नहीं हारा तो वह बाजीराव प्रथम थे और भारत के इतिहास में पहली बार ऐसा घुड़सवार सेनापति हुआ।अमेरिकी इतिहासकार बर्नार्ड मांटोगोमेरी के अनुसार बाजीराव पेशवा भारत के इतिहास का सबसे महानतम सेनापति था और पालखेड़ युद्ध में जिस तरीके से उन्होंने निजाम की सेनाओं को पराजित किया उस वक्त सिर्फ बाजीराव प्रथम ही कर सकते थे उसके अलावा भारत या भारतीय उपमहाद्वीप में यह सब करने की क्षमता किसी और से नहीं थी।बाजीराव प्रथम और उनके भाई चिमाजी अप्पा ने बेसिन के लोगों को पुर्तगालियों के अत्याचार से भी बचाया जो जबरन धर्म परिवर्तन करवा रहे थे और यूरोपीय सभ्यता को भारत में लाने की कोशिश कर रहे थे जिसके चलते 1739 में अंतिम दिनों में अपने भाई चिमाजी अप्पा को भेजकर उन्हें पुर्तगालियों को निस्तनाभूत कर दिया और वसई की संधि करवा दी।बाजीराव प्रथम को 1720 ईसवी में छत्रपति शाहू में मराठा साम्राज्य का पेशवा नियुक्त किया जिसके बाद कई सारे बड़े मंत्री उनसे नाराज हो गए जिसके कारण उन्होंने युवा सरदारों को अपने साथ में लाना शुरू कर दिया जिनमें मल्हारराव होलकर, राणोजीराव शिंदे आज भी शामिल थे इन सब ने मिलकर संपूर्ण भारत पर अपना प्रभाव जमाने को कर दिया बाजीराव प्रथम प्रथम सबसे बड़ी जीत 1728 में पालखेड की लड़ाई में हुई जिसमें उन्होंने निजाम की सेनाओं को पूर्णतया दलदली नदी के किनारे ला खड़ा किया अब निजाम के पास आत्मसमर्पण के अलावा कुछ नहीं बचा था। और 6 मार्च 1728 को उन्होंने मुंगी सेवगाव की संधि की। जिसमे निजाम हैदराबाद के साथ जिसके तहत उन्होंने ढक्कन में सरदेशमुखी और चोथ को लेने का अधिकार दे दिया। और शाहु को मराठा साम्राज्य का वास्तविक छत्रपति घोषित कर दिया और संभाजी द्वितीय को कोल्हापुर का छत्रपति। उसके बाद बाजीराव ने कई और लड़ाई लड़ी परंतु 1737 में बाजीराव ने दिल्ली पर चढ़ाई करी और वह सआदत अली खान की सेना जो कि करीब एक लाख की सेना थी उसको लोग अपनी चाल को चलते उस को चकमा देकर दिल्ली की ओर निकल गए और उन्होंने चिमाजी अप्पा को करीब 10000 की सेना को लेकर निजाम को रोकने के लिए छोड़ दी थी अभी दिल्ली में लाल किले के सामने पहुंचे जहां मोहम्मद शाह जो कि मुगल सम्राट से उनको देखकर इतना घबरा गए कहीं जाकर छुप गए। वहां लूट कर बाजीराव वापस पुणे की ओर वापस लौटे जहां पर मोहम्मद शाह रंगीला ने साआदत अली खान और हैदराबाद के निजाम को लिखा कि आप बाजीराव को पुणे से पहले ही रोक ले जिसकी बाजीराव सामना भोपाल के निकट निजाम से हुआ जिसमें बाजीराव की सेना ने दोनों की सेनाओं को हरा कर दोराहा भोपाल की संधि की मालवा का संपूर्ण छेत्र मराठो को प्राप्त हो गया इससे मराठों का प्रभाव संपूर्ण भारत में स्थापित बाजीराव ने 1730 मे शनिवार वाड़ा पुणे में उसका निर्माण करवाया और पुणे देशों की राजधानी नियुक्ति की।बाजीराव ने हिंदुस्तान शाही का वादा किया और सभी हिंदुओं को एक कर विदेशी शक्तियों के खिलाफ लड़ने का बीड़ा उठाया उन्होंने 1739 में अपने भाई की चिमाजी की सेनाओं पुर्तगालियों को बेसिन पराजित कर वसई की संधि कर ली जिसके तहत पुर्तगालियों के अभद्र पूर्ण व्यवहार से भारतीय जनता को बाजीराव प्रथम ने बचा लिया बाजीराव प्रथम बहुत ही महान और काबिल हिंदू योद्धा थे संपूर्ण भारत में बाजीराव प्रथम का खौफ फैला हुआ था यहां तक कि जयपुर के राजा जयसिंह द्वितीय भी उनके लिए काफी तारीफ करते हैं।1731 में उन्होंने महाराजा छत्रसाल की बेटी से विवाह किया और बुंदेलखंड का एक तिहाई हिस्सा मराठा साम्राज्य में मिला लिया उन्होंने मोहम्मद खान बंग्स की सेना को पराजित कर महाराजा छत्रसाल को जय उसे बचा लिया और वापस उनका बुंदेलखंड राज्य को लौटा दिया इसे प्रसन्न होकर उन्होंने अपनी पुत्री मस्तानी का विवाह बाजीराव से कर दिया।।

अपने यशोसूर्य के मध्यकाल में ही २८ अप्रैल १७४० को अचानक रोग के कारण उनकी असामयिक मृत्यु हुई। मस्तानी नामक मुसलमान स्त्री से उनके संबंध के प्रति विरोधप्रदर्शन के कारण श्रीमंत साहेब के अंतिम दिन क्लेशमय बीते। उनके निरंतर अभियानों के परिणामस्वरूप निस्संदेह महाराष्ट्रीय शासन को अत्यधिक भार करना पड़ा। मराठा साम्राज्य सीमातीत विस्तृत होने के कारण असंगठित रह गया, मराठा संघ में व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाएँ प्रस्फुटित हुईं, तथा मराठा सेनाएँ विजित प्रदेशों में असंतुष्टिकारक प्रमाणित हुई; तथापि श्रीमंतबाजीराव पेशवा की लौह लेखनी ने निश्चय ही महाराष्ट्रीय इतिहास का गौरवपूर्ण परिच्छेद रचा।[2] इतिहास तथा राजनीति के एक विद्वान् सर रिचर्ड टेंपिल ने बाजीराव की महत्ता का यथार्थ अनुमान एक वाक्य समूह में किया है, जिससे उसका असीम उत्साह फूट-फूट कर निकल रहा है। वह लिखता है - सवार के रूप में बाजीराव को कोई भी मात नहीं दे सकता था। युद्ध में वह सदैव अग्रगामी रहता था। यदि कार्य दुस्साध्य होता तो वह सदैव अग्नि-वर्षा का सामना करने को उत्सुक रहता। वह कभी थकता न था। उसे अपने सिपाहियों के साथ दुःख-सुख उठाने में बड़ा आनंद आता था। विरोधी मुसलमानों और राजनीतिक क्षितिज पर नवोदित यूरोपीय सत्ताओं के विरुद्ध राष्ट्रीय उद्योगों में सफलता प्राप्त करने की प्रेरणा उसे हिंदुओं के विश्वास और श्रद्धा में सदैव मिलती रही। वह उस समय तक जीवित रहा जब तक अरब सागर से बंगाल की खाड़ी तक संपूर्ण भारतीय महाद्वीप पर मराठों का भय व्याप्त न हो गया। उसकी मृत्यु डेरे में हुई, जिसमें वह अपने सिपाहियों के साथ आजीवन रहा। युद्धकर्ता पेशवा के रूप में तथा हिंदू शक्ति के अवतार के रूप में मराठे उसका स्मरण करते हैं।[3] जब भी इतिहास में महान योद्धाओं की बात होगी तो निस्संदेह महान् पेशवा श्रीमंतबाजीराव के नाम से लोग ओत-प्रोत होंगे

पेशवा श्रीमंतबाजीराव का बिरला मंदिर, दिल्ली में एक स्तंभ पर शैल चित्र

इन्हें भी देखेंसंपादित करें

सन्दर्भसंपादित करें

  1. अपराजेय सेनानी बाजीराव (प्रथम) । वेबदुनिया
  2. हिन्दी विश्वकोश, भाग-7, नागरी प्रचारिणी सभा, वाराणसी, संस्करण 1966, पृष्ठ 339.
  3. ओरिएंटल एक्सपीरियंस, पृष्ठ 390; मराठों का नवीन इतिहास भाग-2, गोविंद सखाराम सरदेसाई, शिवलाल अग्रवाल एंड कंपनी, आगरा; तृतीय संशोधित संस्करण 1972, पृष्ठ-190 से उद्धृत।