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नाना फडनवीस कि एक पुरानि छित्र्

नाना फडनवीस (1741-1800) 'बालाजी जनार्दन भानु' उर्फ 'नाना फडनवीस' का जन्म सतारा में हुआ था। यह चतुर राजनीतिज्ञ तथा देशभक्त था और इसमें व्यावहारिक ज्ञान तथा वास्तविकता की चेतना जागृत थी। इसमें तीन गुण थे - स्वामिभक्ति, स्वाभिमान, तथा स्वदेशाभिमान। इसके जीवन की यही कसौटी है। इसके सामने तीन समस्यएँ थीं; पेशवा पद को स्थिर रखना, मराठा संघ को बनाए रखना, तथा विदेशियों से मराठा राज्य की रक्षा करना। कुशल राजनीतिज्ञ नाना फडनवीस पर मराठा-संघ की नीति के संचालन का भार 1774 से आया। मराठा संघ के घटक सिंधिया, होल्कर, गायकवाड़ तथा भोसले भी थे। इनमें परस्पर द्वेष और कटुता थी और पक्ष और उपपक्ष थे जिनकी प्रेरणा से अनेक षड्यंत्र, विप्लव, विश्वासघात आदि घृणित कार्य करवाए जा रहे थे। अत: नाना फडनवीस को बड़ी दूरदर्शिता एवं कूटनीतिज्ञता से संघ का कार्य चलाना पड़ा और राज्य के अंदर सुव्यवस्था लाने का भार भी उसपर आ पड़ा। सभी सरदार पेशवा को अपना नेता मानते थे। परंतु पानीपत की तीसरी लड़ाई (1761) के बाद पेशवा का नियंत्रण अत्यंत शिथिल होने लगा था। साथ ही पेशवा के उत्तराधिकार के संबंध में मतभेद और आपसी षड्यंत्र भी चल रहे थे। अत: नाना को दो समस्याओं का हल एक साथ ही करना था। अत: अपने स्वाभिमान की रक्षा करते हुए नाना ने पेशवा की, तथा मराठाराज्य की रक्षा की, तथा मराठा संघ को विछिन्न होने से बचाया। अंग्रेज अपने साम्राज्य को बढ़ाना चाहते थे परंतु नाना ने वर्षानुवर्ष युद्ध करके मराठों के शत्रु अंग्रेजों से पेशवा का साष्टी के अतिरिक्त पूराराज्य जीत लिया। इस प्रकार नाना ने अंग्रेजों की बढ़ती हुई शक्ति को रोका और संघ को विच्छिन्न होने से बचाया। परन्तु नाना की मृत्यु के बाद ही मराठा संघ का अंत हुआ। लार्ड वेलजली के नाना के संबंध के शब्द स्मरणीय हैं। नाना फडनवीस केवल एक योग्य मंत्री ही नहीं था, किंतु वह ईमानदार तथा उच्च आदर्शों से प्रेरित था। उसने अपना पूरा जीवन राज्य के कल्याण के लिए तथा अपने अधिकारियों की कल्याणकामना के लिए उत्सर्ग किया