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भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने भारत की स्वतंत्रता की घोषणा 31 दिसम्बर 1929 में, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का वार्षिक अधिवेशन तत्कालीन पंजाब प्रांत की राजधानी लाहौर में हुआ। इस ऐतिहासिक अधिवेशन में कांग्रेस के ‘पूर्ण स्वराज्य’ का घोषणा-पत्र तैयार किया तथा इसे कांग्रेस का मुख्य लक्ष्य घोषित किया। जवाहरलाल नेहरू, जिन्होंने पूर्ण स्वराज्य के विचार को लोकप्रिय बनाने में सर्वाधिक योगदान दिया था, इस अधिवेशन के अध्यक्ष चुने गये। जवाहरलाल नेहरू को अध्यक्ष बनाने में गांधी जी ने निर्णायक भूमिका निभाई। यद्यपि अठारह प्रांतीय कांग्रेस समितियों में से सिर्फ तीन का समर्थन ही नेहरू को प्राप्त था किंतु बहिष्कार की लहर में युवाओं के सराहनीय प्रयास को देखते हुये महात्मा गांधी ने इन चुनौतीपूर्ण क्षणों में कांग्रेस का सभापतित्व जवाहरलाल नेहरू को सौंपा।

जवाहरलाल नेहरू के अध्यक्ष चुने जाने के दो महत्वपूर्ण कारण थे-

1. उनके पूर्ण स्वराज्य के प्रस्ताव को कांग्रेस ने अपना मुख्य लक्ष्य बनाने का निश्चय कर लिया था।

2. गांधी जी का उन्हें पूर्ण समर्थन प्राप्त था।

अधिवेशन में जवाहरलाल नेहरू ने अपने प्रेरक अध्यक्षीय भाषण में कहा “विदेशी शासन से अपने देश को मुक्त कराने के लिये अब हमें खुला विद्रोह करना है, और कामरेड आप लोग और राष्ट्र के सभी नागरिक इसमें हाथ बताने के लिए सादर आमंत्रित है”। नेहरू ने यह बात भी स्पष्ट कर दी कि मुक्ति का तात्पर्य सिर्फ विदेशी शासन को उखाड़ फेंकना भर नहीं है। उन्होंने कहा “मुझे स्पष्ट स्वीकार कर लेना चाहिए कि मैं एक समाजवादी और रिपब्लिकन हूं। मेरा राजाओं और महाराजाओं में विश्वास नहीं है, न ही मैं उस उद्योग में विश्वास रखता हूं जो राजे-महाराजे पैदा करते हैं, और जो पुराने राजों-महाराजों से अधिक जनता की जिन्दगी और भाग्य को नियंत्रित करते हैं और जो पुराने राजों-महाराजों और सामंतों के लूटपाट और शोषण का तरीका अख्तियार करते हैं”।

लाहौर अधिवेशन में पास किये गये प्रस्ताव की प्रमुख मांगें इस प्रकार थीं-

  • गोलमेज सम्मेलन का बहिष्कार किया जायेगा।
  • पूर्ण स्वराज्य को कांग्रेस ने अपना मुख्य लक्ष्य घोषित किया।
  • कांग्रेस कार्यसमिति को सविनय अवज्ञा आंदोलन प्रारंभ करने का पूर्ण उत्तरदायित्व सौंपा गया, जिनमे करों का भुगतान नहीं करने जैसे कार्यक्रम सम्मिलित थे।
  • सभी कांग्रेस सदस्यों को भविष्य में कौंसिल के चुनावों में भाग न लेने तथा कौंसिल के मौजूदा सदस्यों को अपने पदों से त्यागपत्र देने का आदेश दिया गया।
  • 26 जनवरी 1930 का दिन पूरे राष्ट्र में प्रथम स्वतंत्रता दिवस के रूप में मनाने का निश्चय किया गया।

31 दिसम्बर 1929 की अर्द्धरात्रि को इंकलाब जिंदाबाद के नारों के बीच रावी नदी के तट पर भारतीय स्वतंत्रता का प्रतीक तिरंगा झंडा फहराया गया।26 जनवरी 1930 को पूरे राष्ट्र में जगह-जगह सभाओं का आयोजन किया गया, जिनमें सभी लोगों ने सामूहिक रूप से स्वतंत्रता प्राप्त करने की शपथ ली। इस कार्यक्रम को अभूतपूर्व सफलता मिली। गांवों तथा कस्बों में सभायें आयोजित की गयीं, जहां स्वतंत्रता की शपथ को स्थानीय भाषा में पढ़ा गया तथा तिरंगा झंडा फहराया गया।

हालांकि इस  अधिवेशन 26 जनवरी को स्वाधीनता दिवस हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है इसी हर्षोउल्लास के माध्यम से गांधी जी के द्वारा 11 सूत्री मांग ( 1 लगान में कमी करना 2सैन्य खर्चो के 50 प्रतिशत काम करना3 नमक कर की समाप्ति करना 4विदेशी कपड़ो के आयात में कमी करना 5नशीली वस्तुओ को बंद करना 6राजनीतिक कैदियों को छोड़ना 7रुपये की विनिमय दर घटाना 8 तटीय यातायात के लिये रक्षा विधेयक पारित करना 9डाक सरक्षण विधेयक पारित हो  10जाँच एजेंसियों पर सार्वजनिक नियंत्रण हो 11आत्म रक्षा के लिए हथियार रखने की अनुमति दी जाय )रखी जाती है ये मांग गांधी जी के द्वारा यंग इंडिया के माध्यम से तत्कालीन वायसराय इरविन रखी जाती है गांधी जी की मांगे न मानने कारण गांधी जी के द्वारा सविनय अवज्ञा आंदोलन की घोषणा की जाती हैं इसके कुछ समय पश्चात सविनय अवज्ञा आंदोलन की शुरुआत होती है दांडी यात्रा से इस आंदोलन की शरुआत होती है इसके साथ ही अन्य जगह आंदोलन होते हैं वही दूसरी ओर गांधी जी को कैद कर लिया जाता है  जिसके कारण1930 का कांग्रेश समेलन नही होता है