भद्रबाहु सुप्रसिद्ध जैन आचार्य थे जो दिगंबर और श्वेतांबर दोनों संप्रदायों द्वारा अंतिम श्रुतकेवली माने जाते हैं। भद्रबाहु चंद्रगुप्त मौर्य के गुरु थे। भगवान महावीर के निर्वाण के लगभग १५० वर्ष पश्चात् (ईसवी सन् के पूर्व लगभग ३६७) उनका जन्म हुआ था। इस युग में ५ श्रुतकेवली हुए, जिनके नाम है: गोवर्धन महामुनि, विष्णु, नंदिमित्र, अपराजित, भद्रबाहु। [1]

भद्रबाहु
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जन्म पुण्ड्रवर्धन
निधन श्रवणबेलगोला

परिचयसंपादित करें

 
श्रुत परम्परा

उस समय जब मगध में भयंकर दुष्काल पड़ा तो अनेक जैन भिक्षु भद्रबाहु के नेतृत्व में समुद्रतट की ओर प्रस्थान कर गए, शेष स्थूलभद्र के नेतृत्व में मगध में ही रहे। (दिगंबर मान्यता के अनुसार चंद्रगुप्त जब उज्जैनी में राज्य करते थे तो भद्रबाहु ने द्वादशवर्षीय अकाल पड़ने की भविष्यवाणी की इस पर भ्रदबाहु के शिष्य संघ विशाखाचार्य संघ को लेकर पुन्नार चले गए, जबकि रामिल्ल, स्थूलभद्र और भद्राचार्य ने सिंधुदेश के लिए प्रस्थान किया)। दुष्काल समाप्त हो जाने पर जैन आगमों को व्यवस्थित करने के लिए जैन श्रमणों का एक सम्मेलन पाटलिपुत्र में बुलाया गया। जैन आगमों के ११ अंगों का तो संकलन कर लिया गया लेकिन १२वाँ अंग दृष्टवाद चौदह पूर्वो के ज्ञाता भद्रबाहु के सिवाय और किसी को स्मरण नहीं था। लेकिन भद्रबाहु उस समय नेपाल में थे। ऐसी परिस्थित में पूर्वो का ज्ञान संपादन करने के लिए जैन संघ की ओर से स्थूलभद्र आदि साधुओं को नेपाल भेजा गया और भद्रबाहु ने स्थूलभद्र को पूर्वो की शिक्षा दी।

 
श्रवणबेलगोला शिलालेख

महानतासंपादित करें

भद्रबाहु अविभाजित जैन संघ के अंतिम आचार्य थे। उनके बाद, संघ भिक्षुओं के दो अलग-अलग शिक्षक-छात्र वंश में विभाजित हो गया। दिगंबर भिक्षु आचार्य विशाखा के वंश के हैं और श्वेतांबर भिक्षु आचार्य स्थूलभद्र की परंपरा का पालन करते हैं।

भद्रबाहु और चंद्रगुप्त मौर्य के संबंध का वर्णन करने वाले शिलालेखों के बारे में राधा कुमुद मुखर्जी लिखते हैं,

लगभग 600 ईस्वी का सबसे पुराना शिलालेख "जोड़ी (युगमा), भद्रबाहु के साथ चंद्रगुप्त मुनि से जुड़ा है।" सेरिंगपट्टम के पास कावेरी पर लगभग 900 ईस्वी के दो शिलालेखों में चंद्रगिरि नामक एक पहाड़ी के शिखर का वर्णन किया गया है, जो भद्रबाहु और चंद्रगुप्त मुनिपति के पैरों के निशान द्वारा चिह्नित है। 1129 के एक श्रवणबेलगोला शिलालेख में भद्रबाहु "श्रुतकवली" और चंद्रगुप्त का उल्लेख है, जिन्होंने ऐसी योग्यता हासिल की कि उनकी वन देवताओं द्वारा पूजा की जाती थी। 1163 इसी प्रकार के एक अन्य अभिलेख में जोड़े और उनका वर्णन करते हैं। वर्ष 1432 के तीसरे शिलालेख में यतींद्र भद्रबाहु और उनके शिष्य चंद्रगुप्त के बारे में बताया गया है, जिनकी तपस्या की प्रसिद्धि दूसरे शब्दों में फैल गई।

-राधा कुमुद मुखर्जी

भद्रबाहु-चरित्र लगभग 1450 ईस्वी के रत्नानन्दी द्वारा लिखा गया था।.[2]

सन्दर्भसंपादित करें

  1. Rice १८८९, पृ॰ 3.
  2. Mookerji 1988, पृ॰ 40.

सन्दर्भ सूचीसंपादित करें

  • जगदीशचंद्र जैन : प्राकृत साहित्य का इतिहास।

बाहरी कड़ियाँसंपादित करें

यह चंद्रगुप्त ने अपने अंतिम समय में जैन बिच्छू भद्रबाहु से दीक्षा लेकर श्रवणबेलगोला में गायक लेस द्वारा प्राण त्याग दिया।