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भीलवाड़ा सिटी, राजस्थान के मेवाड़ का एक नगर है। राजस्थान के मेवाड़ क्षेत्र में स्थित भीलवाड़ा राज्य के सबसे बड़े जिलों में से एक है और ऐतिहासिक महत्व के कारण पर्यटकों के बीच बहुत लोकप्रिय है। हालांकि, कई धार्मिक स्थलों की उपस्थिति के कारण यहां हिंदू धर्म के अनके श्रद्धालु भी आते हैं। भीलवाड़ा का इतिहास 11वीं शताब्दी से संबंधित है और उस समय यह क्षेत्र मेवाड़ राजाओं के अधीन था। हालांकि, इस जगह की स्‍थापना की असल तारीख और समय का अब तक पता नहीं चल पाया है।किवदंती है कि इस शहर का नाम यहां की स्‍थानीय जनजातिभील के नाम पर पड़ता है जिन्‍होंने 16वीं शताब्‍दी में मुगल बादशाह अकबर के खिलाफ मेवाड़ के राजा महाराणा प्रताप की मदद की थी। तभी से इस जगह का नाम भीलवाड़ा पड़ गया।1948 में राजस्थान का भाग बनने से पूर्व भीलवाड़ा भूतपूर्व उदयपुर रियासत का हिस्सा था साहस और बलिदान की भूमि भीलवाड़ा वीर योद्धा महाराणा प्रताप की एक अद्भुत पहचान है।

भीलवाड़ा सिटी
भीलवाड़ा सिटी महानगरपालिका
महानगर
उपनाम: राजस्थान का वस्त्र नगर
देशFlag of India.svg भारत
राज्यराजस्थान
ज़िलाभीलवाड़ा जिला
ऊँचाई421 मी (1,381 फीट)
जनसंख्या (2011)
 • कुल370
भाषाएँ
 • आधिकारिकहिन्दी, मेवाड़ी
समय मण्डलIST (यूटीसी+5:30)
पिन311001
आई॰एस॰ओ॰ ३१६६ कोडRJ-IN
वाहन पंजीकरणRJ 06
लिंगानुपात1000/915[1] /
वेबसाइटwww.bhilwara.rajasthan.gov.in

अनुक्रम

पर्यटनसंपादित करें

दरगाह हजरत गुल अली बाबासंपादित करें

शहर के सांगानेरी गेट पर स्थित यह दरगाह आस्ताना हज़रत गुल अली बाबा रहमतुल्लाह अलेही के नाम से मशहूर है यहाँ सभी धर्मो के लोग आस्था रखते है दरगाह पर प्रति वर्ष 1 से 3 नवम्बर तक उर्स का आयोजन होता है जो बड़ी धूमधाम से मनाया जा[माहे तैबा 1] ता हैl दरगाह के पास ही एक विशाल मस्जिद भी स्थित है जो रज़ा मस्जिद के नाम से जानी जाती है इस मस्जिद में पांच हजार लोग एकसाथ नमाज अदा कर सकते है दरगाह के सामने ही सुव्यवस्थित ढंग से एक नगरी बसी हुई है जिसे गुल अली नगरी के नाम से जाना जाता है इस नगरी में कुल-दे-सेक- यानी वो गली जो आगे जाकर बंद हो जाति हे यहाँ की खास पहचान है आस्ताना गुल अली में ही एक दारुल उलूम भी संचालित है जिसका नाम सुल्तानुल हिन्द ओ रज़ा दारुल उलूम है इस दारुल उलूम में देश के कई राज्यों से आये बच्चे इल्म हासिल करते है

गाँधी सागर तालाबसंपादित करें

यह तालाब शहर के दक्षिण पूर्वी भाग में स्थित है किसी ज़माने में यह लोगो के लिए प्रमुख पेयजल स्रोत हुआ करता था इस तालाब के मध्य में एक विशाल टापू स्थित है यह तालाब लोगो के लिए महत्वपूर्ण पर्यटन स्थल है इसके उत्तरी छोर पर हजरत मंसूर अली रहमतुल्लाह अलेह व हजरत जलाल शाह रहमतुल्लाह अलेह की दरगाह स्थित हे इन दरगाहो के एक तरफ तेजाजी का मंदिर और दूसरी तरफ बालाजी का मंदिर स्थित हे इस पर्यटन स्थल को विकसित करने के लिए इसके दक्षिणी किनारे पर एक मनोरम पार्क का निर्माण कराया गया है जिसका नाम वीर तेजा जी पार्क रखा गया है बरसात के मोसम में इस तालाब से गिरते पानी का मनोरम दृश्य देखते ही बनता है [2]

हरणी महोदवसंपादित करें

भीलवाड़ा से 6 किलोमीटर दूर मंगरोप रोड़ पर शिवालय है। जो कि हरणी महोदव के नाम से प्रसिद्ध है। जहां पर प्रत्‍येक शिवरात्रि पर 3 दिवसीय भव्‍य मेले का आयोजन होता है। मेले का आयोजना जिला प्रशासन द्वारा नगर परिषद के सहयोग से किया जाता है। जिसमें 3 दिन तक प्रत्‍येक रात्रि में अलग-अलग कार्यक्रम यथा धार्मिक भजन संध्‍या (रात्रि जागरण), कवि सम्‍मेलन व सांस्‍क़तिक संध्‍या का आयोजन किया जाता है। यह मन्दिर पहाड़ी की तलहटी पर स्थित है। प्राचीन समय में यहां घना आरण्‍य होने से आरण्‍य वन कहा जाता था, जिसका अपभ्रंश हो कर हरणी नाम से प्रचलित हो गया।

बदनोरसंपादित करें

भीलवाडा शहर से 72 किलोमीटर दूर स्थित इस कस्बे का इतिहास में एक अलग ही महत्व हे जब मेड़ता के राजा जयमल ने राणा उदेसिंह से सहायता के लिए कहा तो राणा ने जयमल को बदनोर जागीर के रूप में दिया बदनोर में कई देखने योग्य स्थल हे उनमे से निम्न हे - छाचल देव। अक्षय सागर। जयमल सागर। बैराट मंदिर। धम धम शाह बाबा की दरगाह। आंजन धाम। केशर बाग़। जल महल। आदि

कोटडीसंपादित करें

भीलवाडा शहर से 23 किलोमीटर दूर स्थित इस कस्बे का नाम आते ही सबसे पहले विख्यात श्री चारभुजा जी का मंदिर स्मृति में आता है। भीलवाडा-जहाजपुर रोड पर स्थित यह नगर भगवान के मंदिर के कारण काफी प्रसिद्ध है। सगतपुरा का देवनारायण मंदिर, पारोली में चंवलेश्वर मंदिर, मीराबाई का आश्रम व ढोला का सगस जी(भूत), कोठाज का श्री चारभुजा जी का मंदिर देखने योग्य हैं। आसोप के चारभुजा नाथ का मंदिर भी दर्शनीय है।

बनेड़ासंपादित करें

यह भीलवाडा जिले का सबसे पुराना शहर हे बनेड़ा में दुर्ग हे, जो महाराजा सरदार सिंह ने बनवाया था। ये ऐक तहसील व् उपखंड कार्यालय है यह ऐक ऐतिहासिक सत्र हे सबसे पुराना जेन मंदिर हे व् बहुत बड़ा दुर्ग के परकोटा बना हुआ है।

मेनालसंपादित करें

माण्डलगढ से 20 किलोमीटर दूर चितौडगढ की सीमा पर स्थित पुरातात्विक एवं प्राकृतिक सौन्दर्य स्थल मेनाल में 12 वीं शताब्दी के चौहानकला के लाल पत्थरों से निर्मित महानालेश्वर मंदिर, रूठी रानी का महल, हजारेश्वर मंदिर देखने योग्य हैं। सैकडों फीट ऊंचाई से गिरता मेनाली नदी का जल प्रपात भी पर्यटकों के लिए आकर्षण का प्रमुख केन्द्र हैं।

जहाजपुरसंपादित करें

भीलवाडा का प्रसिद्ध ऐतिहासिक स्थल, जिसका इतिहास बड़ा रंगबिरंगा रहा हैं। कर्नल जेम्स टॉड 1820 में उदयपुर जाते समय यहाँ आये थे। यहाँ का बड़ा देवरा (पुराने मंदिरों का समूह), पुराना किला और गैबीपीर के नाम से प्रसिद्ध मस्जिद दर्शनीय हैं।

बिजोलियासंपादित करें

माण्डलगढ से लगभग 35 किलोमीटर दूर स्थित बिजौलिया में प्रसिद्ध मंदाकिनी मंदिर एवं बावडियाँ स्थित हैं। ये मंदिर 12 वीं शताब्दी के बने हुए हैं। लाल पत्थरों से बने ये मंदिर पुरातात्विक व ऐतिहासिक महत्व के स्थल इतिहास प्रसिद्ध किसान आन्दोलन के लिए भी बिजौलियाँ प्रसिद्ध रहा हैं। यहाँ पर बना भूमिज शैली का विष्णु भगवान का मंदीर 1000 वर्ष सै भी पुराना है , जो भीलवाडा का एक मात्र मंदिर है। यहा बिजोलिया अभिलेख हैं जिससे चौहानो की जानकारी मिलती हैं व इसमे चौहनो को ब्राह्मण बताया गया हैं

शाहपुरासंपादित करें

भीलवाडा तहसील मुख्यालय से 50 किलोमीटर पूर्व में शाहपुरा राज्य की राजधानी था। यहाँ रेल्वे स्टेशन नहीं ह परन्तु यह सडक मार्ग द्वारा जिला मुख्यालय से जुडा हुआ हैं। यह स्थान रामस्नेही सम्प्रदाय के श्रद्धालुओं का प्रमुख तीर्थ स्थल हैं। मुख्य मंदिर रामद्वारा के नाम से जाना जाता हैं। यहाँ पूरे भारत से और बर्मा तक तक से तीर्थ यात्री आते हैं। यहाँ लोक देवताओं की फड पेंटिंग्स भी बनाई जाती हैं। यहाँ प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी केसरसिंह बारहठ की हवेली एक स्मारक के रूप में विद्यमान हैं। यहाँ होली के दूसरे दिन प्रसिद्ध फूलडोल मेला लगता हैं, जो लोगों के आकर्षण का मुख्य केन्द्र होता हैं। यहाँ शाहपुरा से 30 किलो मीटर दूर धनोप माता का मंदिर भी हे और खारी नदी के तट पर शिव मंदिर छतरी भी लोगों पसंद हे

माण्डलसंपादित करें

भीलवाडा से 14 किलोमीटर दूर स्थित माण्डल कस्बे में प्राचीन स्तम्भ मिंदारा पर्यटन की दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं। यहाँ से कुछ ही दूर मेजा मार्ग पर स्थित प्रसिद्ध जगन्नाथ कछवाह की बतीस खम्भों की विशाल छतरी ऐतिहासिक एवं पुरातात्विक महत्व का स्थल हैं। छह मिलोकमीटर दूर भीलवाडा का प्रसिद्ध पर्यटन स्थल मेजा बांध हैं। होली के तेरह दिन पश्चात रंग तेरस पर आयोजित नाहर नृत्य लोगों के आकर्षण का प्रमुख केन्द्र होता हैं। कहते हैं कि शाहजहाँ के शासनकाल से ही यहाँ यह नृत्य होता चला आ रहा हैं। यहां के तालाब के पाल पर प्राचीन शिव मंदिर स्थित है। जिसे भूतेश्‍वर महादेव के नाम से जाना जाता है।

माण्डलगढसंपादित करें

भीलवाडा से 51 किलोमीटर दूर माण्डलगढ नामक अति प्राचीन विशाल दुर्ग ह। त्रिभुजाकार पठार पर स्थित यह दुर्ग राजस्थान के प्राचीनतम दुर्गों में से एक हैं। यह दुर्ग बारी-बारी से मुगलों व राजपूतों के आधिपत्य में रहा हैं।

अन्य स्थलसंपादित करें

भीलवाडा-उदयपुर मार्ग पर 45 मिलोमीटर दूर गगापुर में गंगाबाई की प्रसिद्ध छतरी पुरातात्विक एवं ऐतिहासिक दष्टि से महत्वपूर्ण हैं। इस छतरी का निर्माण सिंधिया महारानी गंगाबाई की याद में महादजी सिंधिया ने करवाया था।

भीलवाड से 55 किलोमीटर दूर खारी नदी के बायें किनारे पर स्थित भीलवाडा का एक प्रसिद्ध धार्मिक स्थल। राजस्थान के लोक देवता देवनारायण जी का यह तीर्थ स्थल ह और इनका यहाँ एक भव्य मंदिर स्थित हैं। इसे इसके निर्माता भोजराव के नाम पर सवाईभोज कहते हैं।

सन्दर्भसंपादित करें

  1. Bhilwara city population Census, 2011
  2. शाह, अरुण कुमार (2017). "अद्भुत छटा बिखेरता गाँधी सागर" [अद्भुत छटा बिखेरता गाँधी सागर] (पत्रिका). भीलवाडा: rp pvt.ltd. पत्रिका. |access-date= दिए जाने पर |url= भी दिया होना चाहिए (मदद)


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