राजा मान सिंह

राजा मानसिंह ( भारत के सम्राट )
(मान सिंह प्रथम से अनुप्रेषित)


मानसिंह कच्छवाहा राजपूत राजा थे। उन्हें 'मान सिंह प्रथम' के नाम से भी जाना जाता है। राजा भगवन्त दास इनके पिता थे।

राजा मान सिंह
आमेर के राजा
राजा मान सिंह प्रथम
आमेर के राजा मान सिंह प्रथम
जन्म21 दिसंबर 1550
आमेर, राजस्थान, मुगल साम्राज्य
निधन6 जुलाई 1614(1614-07-06) (उम्र 63)
अचलपुर, मुगल साम्राज्य
जीवनसंगी
  • सुशीलावती बाई (1566–1662)
  • मुनवारी बाई (1556–1640)
  • बीबी मुबारक (1564–1638)
संतान
  • राजा भाऊ सिंह (1580-1621)
  • कुंवर जगत सिंह (1586-1620)
  • कुंवर दुर्जन सिंह (1575-1597)
  • कुंवर हिम्मत सिंह (1590-1597)
  • भोगदा सिंह (1596-1610)
  • राज कुवरी मैना बाईसा (1591-1682)
  • मनोरमा बाई (1614-1689)
पिताभगवानदास
मातारानी भगवती बाई
धर्महिंदू

राजा मानसिंह भारतवर्ष के अघोषित राजा थे, जो राजनीतिक विवशता के कारण अकबर के राजनीतिक मित्र भी थे ।

मानसिंह जी का कद अपने समकालीन राजाओ में सबसे बड़ा था । मानसिंह ने अकबर की रक्षा बहुत बार की, जिस कारण अकबर राजपाठ से निश्चिन्त हो गया ।। उस समय पठान भी भारत पर अधिकार चाहते थे, दोनो पक्षो से मानसिंह जी एक साथ लड़ना नही चाहते थे , अतः उन्होंने विदेशी शक्तियों का दो फाड़ करते हुए, मुगलो का साथ लिया, ओर मुगल सेना की मदद से पठानों को कुचल डाला । गौरी से लेकर गजनवी ओर इब्राहिम लोदी तक के अत्याचारों का सारा बदला मानसिंहजी ने ले लिया ।

मानसिंह जी के कारण ही आज जगन्नाथ पुरी का मंदिर मस्जिद नही बना । उड़ीसा के पठान सुल्तान ने जगन्नाथ पुरी के मंदिर को ध्वस्त करके मस्जिद बनाने का प्रयास किया था, जब इसकी सूचना राजा मानसिंहजी को मिली, तब उन्होंने अपने स्पेशल कमांडो उड़ीसा भेजे, लेकिन विशाल सेना के कारण सभी वीरगति को प्राप्त हुए । उसके बाद राजा मानसिंह खुद उड़ीसा गए, ओर पठानों ओर उनके सहयोगी हिन्दू राजाओ को कुचलकर रख दिया ।। उसके बाद पठान वर्तमान बंगाल की ओर भाग गए । जगन्नाथ मंदिर की रक्षा हिन्दू इतिहास का सबसे स्वर्णिम इतिहास है । यह हिंदुओ के सबसे प्रमुख मंदिरों में से एक है ।। राजा मानसिंह जी महान कृष्ण भक्त थे, उन्होंने वृंदावन में सात मंजिला कृष्णजी ( गोविन्ददेव जी ) का मंदिर बनाया ।। बनारस के घाट, पटना के घाट, ओर हरिद्वार के घाटों का निर्माण आमेर नरेश मानसिंहजी ने ही करवाया था । जितने मंदिर मध्यकाल से पूर्व धर्मान्ध मुसलमानो ने तोड़े थे, वह सारे मंदिर मानसिंहजी ने बना दिये थे, लेकिन औरंगजेब के समय मुगलो का अत्याचार बढ़ गया था , ओर हिन्दू मंदिरों का भारी नुकसान हो गया ।[कृपया उद्धरण जोड़ें]


माई एडो पूत जण, जेडो मान मर्द

समंदर खांडो पखारियो, काबुल पाड़ी हद ।।

अर्थात :- कच्छवाहो ने समंदर पहली बार देखा था, ओर वहीं अपनी रक्त से भीगी तलवारे धोयीं । माता आपको धन्य है, जिन्होंने मानसिंहजी जैसा पुत्र पैदा किया ।। राजा मानसिंहजी की माता का नाम रानी भगवती बाई थी, ओर पिता का नाम श्रीभगवानदास जी था ।।

अफगानिस्तान के बच्चे मानसिंहजी के नाम से डर के सो जाते है, ओर हमारे यहां कवियों ने दोहे बना दिये :-

मात सुलावे बालकां , ख़ौफ़नाक रणगाथ

काबुल भूली नह अजे, यो खांडो ये हाथ


राजा मानसिंहजी केवल महान योद्धा ही नही थे, वरन् वह एक महान कवि भी थे।


दानवीर मानसिंह---

आपने नरसी मेहता की एक कथा सुनी होगी, वह महान कृष्ण भक्त थे, उनके पास जब भी धार्मिक कार्य के लिए धन की कमी होती, वह भगवान श्रीकृष्ण को याद करते, ओर श्रीकृष्ण को भी उनकी मदद करने आना ही पड़ता था --

खैर यह तो भगवान ओर भक्त के बीच की बात थी , लेकिन भारत के इतिहास में मानसिंह जैसे वीर योद्धा भी हुए है, जो स्वयं भी महान कृष्ण भक्त थे -- उन्होंने एक कवि का सम्मान किस तरह किया

जयपुर आमेर का घराना, महान कृष्ण भक्त है । वृंदावन से लेकर जयपुर तक उन्होंने अद्वितीय कृष्णमंदिरो का निर्माण करवाया है ---

सिद्धि श्री मानसिंहजी की कीर्ति विरुद्ध

मई तो लो लाज रहो जो लो भूमि चिर बेनी है ।।

राबरी कुशल हम सिसुन है, समेत चाहे धरी धरी

पलपल युहाउ सुचेनि है,

हुंडी एक तुमपे कही है, हजार को सो कविन

को राखो मानसिंहः जोग देनी है ।

पोहिए प्रमाण मानवंश में सपूत मान

रोक दीनी देन जसा लेते लिख लेनी है --

दानवीर आश्रयदाता श्रीमानसिंह जी , आपने संसार की सारी ख्याति प्राप्त की है, संसार मे ऐसा कोई नही, जो आपको ना जानता हो,  संसार के अंत तक आपकी ख्याति बनी रहेगी ।।  मैं आपके हर कार्य  के साथ-साथ आपके ओर आपके पुत्रो के भी कल्याण की कामना करता हूं।  यहाँ भी सब कुछ कुशल मंगल है ।   मैं आपको 1000 रुपये की हुंडी लिख रहा हूँ   कृपया कवि की गरिमा को बनाए रखें, जो आपके महान  राजवंश के योग्य है।

May the shreeman sinh , who the endowed with the fame and celebrity endure till the end of the world . I wish your well being as well as the well being your children every movement . Here too there is well being all the time . I send the cheque of rupee's one thousand into you . Do please preserve the dignity of the poet , which action is worthy scion of your dynasty . One need only write to you ,you bestow, countless fortunes of people peremptorily and earn great celebrity there by .

इसपर मानसिंहजी ने कवि बनकर  जवाब दिया --

इतमे हम महाराज है, उत्ते आप कविराज

हुंडी लिखत हजार की, लिखत ना आई लाज ??

की जैसे हम महाराज है, हमारे आप कवियों के राजा है । हम दोनों ही अपने अपने राजा है, फिर एक राजा दूसरे राजा से मात्र 1000 रुपये मांगता है , इतनी छोटी राशि मांगते हुए कविराज को लज्जा नही आई ?

इतना कहकर मानसिंहजी ने एक करोड़ रुपया कवियों को दिया ।। तब कविओ के झुंड ने मानसिंहजी के लिए कहा -

रक्त की नदियां बहाने वाला, जो हमेशा युद्धरत रहता है, वह इतना दानी भी है , संसार मे आपका इतिहास स्वर्ण अक्षरों में लिखा जाएगा महाराज । आप स्वयं साधारण मनुष्य नही, गौरी की गोद मे बैठे, साक्षात गणेश ही है ।।

मानसिंह एक प्रतापी राजा ही नही, महान दानी राजा थे, जैसे कोई चतुर्भुज अवतार हो, दो हाथों से युद्ध करना, ओर शेष दो हाथों से दान करना, यह कला जयपुर नरेश मानसिंहजी कच्छवाहा में थी । महाराज मानसिंहः जी आमेर महाधर्नुधर दिग्विजयी राजा थे । उनके स्मृतिचिन्ह इस संसार मे चिरकाल तक बने रहेंगे । दान, दासा, नरु, किशना, हरपाल, ईश्वरदास जैसे कवियों को उन्होंने एक एक करोड़ रुपया उस समय दान दिया था ।। उनके काल मे छापा चारण जैसे उनके दास 100-100 हाथियों के स्वामी हो गए थे । मान के गौदान की सम्पूर्ण संख्या 1 लाख थी ।।

।।आमेर रियासत ओर अकबर के बीच संधि के कारण।।

कच्छवाहो की राजनीति भारत की सभी रियासतों से हटकर राजनीति थी, जहां से ओर अन्य रियासतों के लिए मुगल परेशानी का सबब बने हुए थे, तो वहीं दूसरी ओर कच्छवाह पठानों को हिन्दुत्व के लिए सबसे बड़ा खतरा मानते थे, ओर यह कहीं ना कहीं सही भी था । कासिम के बाद जितने आक्रमण हुए, चाहे वह मूहम्मद गजनवी का करोड़ो हिंदुओ की हत्या कर 17 बार सोमनाथ समेत भारत को लूटना हो, या गजनवी के पिता सुबुक्तगीन द्वारा राजा जयपाल से अफगानिस्तान हड़पना हो । इन्ही पठानों के कारण भाटी जैसे वीर राजपूतो को अफगानिस्तान छोड़कर जैसलमेर आना पड़ा था । उसके बाद चाहे सालार मसूद गजनी हो, जिसके बारे में कहा जाता है की वह जहां से गुजरता था, हवाएं भी इस्लाम कबूल कर लेती थी, इसका अर्थ उसकी क्रुरता से लगाना उचित होगा, क्यो की वह जहां से भी गुजरता था, अपने क्रूरतम तरीके से वहां की पूरी आबादी को तलवार की नोक पर इस्लाम की दीक्षा देता हुआ चलता था। इसी सालार गजनी का वध बहराइच के राजा सुहेलदेव बैंस जी ने किया था । उसके बाद हम नजर डालें तो मूहम्मद गौरी भी एक पठान ही था , जिसके बाद गुलामवंश चला, कुतबुद्दीन ऐबक से लेकर नालंदा को जलाने वाला बख्तियार खिलजी पठान ही था, राणा रत्नंसिंह के समय चितोड़ का विध्वंस करने वाला अलाउद्दीन खिलजी भी पठान ही था, इस नरपिशाच के काल मे महारानी पद्मावती समेत 20,000 राजपूत स्त्रियो का जौहर हुआ था। मुगलो के आने से पहले पठानों ने भारत को पूरी तरह जकड़ लिया था । बिहार के सुल्तान, मालवा के सुल्तान , नागौर के सुल्तान यहां तक कि चित्तौड़ तक एक समय पठानों का कब्जा हो चुका था । यह पठान केवल हिंदुओ के शत्रु नही थे, दिल्ली की तख्त पर बैठा गैरपठान राजा भी इनका उतना ही बड़ा शत्रु था, आप इतिहास में देख सकते है, मुगल हिमायूँ से लड़ने वाला शेरशाह सूरी पठान ही था, ओर उसने अफगानिस्तान के पठानों से मदद लेने के लिए ही पेशावर से लकेर बिहार तक कि सड़क के मरम्मत का कार्य करवाया था । बाबर मुगल ने जिस मुस्लिम बादशाह का सिर धड़ से अलग कर भारत मे प्रवेश किया था, वह इब्राहिम लोदी भी पठान था। अतः इतिहास के पाठकों को यह समझना चाहिए की केवल हिंदुओ ओर मुसलमानो का नही, मुसलमानो का भी भारत की सत्ता के लिए आपसी अंतरयुद्ध चला है , मुगलो ओर पठानों का आपसी बैर इसका उदाहरण है ।। यह बात 1543 ईस्वी की है, जब शेरशाह सूरी मारवाड़ के राजा मालदेव को परास्त करने पूरी शक्ति से मारवाड़ की ओर बढ़ रहा था। मालदेव को बुरी तरह रौंदने शेरशाह सूरी विशाल टिड्डी दल के साथ मारवाड़ की ओर बढ़ रहा था। आमेर के सामने एक चिंता और भी थी, की अगर कहीं शेरशाह की सेना बीकानेर की तरफ बढ़ गयी, तो उस पूरे क्षेत्र का इस्लामीकरण होने से फिर कोई नही रोक सकता, क्यो की बीकानेर उस समय इतनी आबादी वाला क्षेत्र नही था, ओर युद्ध के पूरे संसाधन भी वहां नही थे, वहां नजर आजादी के समय बाद महाराजा गंगासिंहः जी अब लेकर आए है, वहां पानी की कितनी बड़ी समश्या उस समय थी । आमेर के गोपाल जी शेरशाह सूरी को रोकने के लिए चाटसू की ओर आगे बढ़े, आमेर के कच्छवाह योद्धाओं की संख्या शेरशाह के सैनिकों की तुलना में काफी ज्यादा कम थी, लेकिन कच्छवाहो ने शेरशाह की सेना का चारो तरफ से घेरकर उसका बड़ी बुरी तरह संघार किया । कच्छवाहो ने बिहारी मुसलमानो से सुसज्जित 4 -4 फुट के मुसलमानो की सेना को गाजर मूली की तरह इस तरह बधारा की शेरशाह मैदान छोड़कर भाग गया । आमेर के ऊपर से संकट टला सो टला, शेरशाह के इस नुकसान के बाद मालदेव ओर हिमायूँ भी बच गए। लगभग इसी चाटसु के युद्ध के बाद तय हो चुका था, की अगर मुसलमानो के आतंक से भारत को बचाना है, तो किसी ऐसे मुसलमान को भारत की सत्ता सौंपनी होगी, जो गैर पठान हो। इसके लिए हिमायूँ से बेहतर विकल्प ओर क्या हो सकता था ? हिमायूँ एक थर्ड क्लास आदमी, ओर एक नम्बर का बेवड़ा था । इसके अलावा वह व्यभिचारी भी था, ओर बड़ी बात यह थी, की वह समलैंगिक भी था । ऐसे चरित्रहीन ओर विलासी राजा के सत्ता के केंद्र में रहने से कच्छवाहो का काम इतना आसान हो जाता कि वह पर्दे के पीछे खुद शासन कर सकते थे । गोपाल जी के समय हिमायूँ और कच्छवाहो के बीच मित्रता की चर्चा शुरू हुई थी, कच्छवाहो के पास अपना अभिमान यह था कि उसने हिमायु के सबसे बड़े शत्रु शेरशाह को परास्त किया था, तो यहां पर बराबरी वाली मित्रता की बात थी, ना कि एक दूसरे की कोई अधीनता थी। आमेर नरेश पूरनमल जी के समय ही मुगल ओर आमेर रियासत के बीच मैत्री संधि हो गयी थी।


आमेर ओर मुगलो के बीच संधि अकबर से भी पूर्व अकबर के पिता हिमायु के समय ही हो चुकी थी, जिसकी शुरुआत गोपाल जी के समय मे हुई, ओर पूरणमल जी कच्छवाह के समय दोनो पक्षो की ओर से आधिकारिक संधि की घोषणा भी हो गयी ।


मेवाड़ पर विजयसंपादित करें

मानसिंहजी को भारत की व्यापार क्षमता बढ़ाने के लिए गुजरात जाने के लिए मेवाड़ से मार्ग चाहिए था । लेकिन महाराणा प्रताप ने उन्हें रास्ता नही दिया, क्यो की मानसिंहजी अकबर के मित्र थे। अगर गुजरात जाने का मार्ग बंद रहता, तो भारत की आर्थिक उन्नति पर भी प्रभाव पड़ता, ओर गुजरात मे पठान लगातार प्रबल होते जाते । पठानों को दबाए रखने के लिए, ओर भारत के व्यापार को बढ़ाने के लिए, भारत की आर्थिक उन्नति के लिए मानसिंहजी को मेवाड़ से मार्ग चाहिए था । लेकिन जब बात नही बनी, तो हल्दीघाटी का युद्ध हुआ।  जिसमे मानसिंहजी की विजय हुई ।

मानसिंह और रक्तरंजित हल्दीघाटीसंपादित करें

21 जून 1576 के बीच हल्दीघाटी का युद्ध लड़ा गया । इससे पहले चित्तौड़ ओर अकबर के बीच युद्ध 1567 ईस्वी में लड़ा गया । जिसमें अकबर ने बड़ा भारी विध्वंस चित्तौड़ में मचाया था । इस युद्ध के नुकसान को लेकर तमाम इतिहासकारो में तरह तरह की बातें है । इस युद्ध मे मेवाड़ के कम से कम 2 लाख मारे गए थे, 2 सेर जनेऊ अकबर ने वहां तोल दी थी, इससे कोई भी अनुमान लगा सकता है, की 1567 का युद्ध चित्तौड़ के लिए कितना विध्वंसकारी युद्ध था ।  1567ईस्वी के युद्ध मे 27 वर्षीय महाराणा प्रताप अपने 9 साल के पुत्र अमरसिंह के साथ अपने पिता के आदेशानुसार सुरक्षित स्थान पर चले गए ।।

चित्तौड़ के किले की जिम्मेदारी जयमल मेड़तिया ओर उनके 49,000 सैनिकों को सौंप दी गयी । उन सैनिकों में मात्र 1000 सैनिक ही जीवित बचे ।। प्रजा का भी भारी विध्वंस हुआ ।। हजारो स्त्रियो को जौहर हुए, हजारो की संख्या में स्त्रियो का अपहरण हुआ ।।

इसी कारण मानसिंहजी को महाराणा प्रताप के पास आना पड़ा, जिस समय हल्दीघाटी का युद्ध हुआ, उस समय मेवाड़ की गद्दी पर महाराणा प्रताप ही थे । मानसिंह दुबारा 1567 जैसा विनाश मेवाड़ में नही चाहते थे, क्यो की इससे हिन्दू सत्ता और नागरिकों को भारी हानि पहुंचती ।

मानसिंहजी ने महाराणा प्रताप को समझाया की " युद्ध केवल तलवारों से नही होता, बहुत बार श्रीकृष्ण की तरह रणछोड़ भी बनना पड़ता है । आपके आगे मुगल है, ओर पीछे पठान । ऐसी स्थिति में हम शत्रुओ को एक साथ नही निपट सकते । आपको मुगलो से संधि कर अपने नागरिकों ओर सेनिको की रक्षा करनी चाहिए । क्यो की अकबर के पास विशाल सेना है, अतः उससे लड़ना आपकी एक राजनीतिक ओर कूटनीतिक भूल ही होगी । क्यो की इससे 9 वर्ष पूर्व जब आप वर्तमान समय से ज़्यादा शक्तिशाली थे, तभी चित्तौड़ को नही बचा पाए थे, तो इस समय अकबर के सामने विजय की कोई संभावना नही है । आप प्रजा के भले के लिए संधि करें, ओर  उचित समय की प्रतीक्षा करें।। इससे पहले भी अति स्वाभिमान ओर वीरता के कारण राजपूत बहुत नुकसान उठा चुके है, यह समय युद्ध का नही, कूटनीति का है ।

लेकिन महाराणा प्रताप के मंत्रियों को लगा की मानसिंहजी अपना स्वार्थ साध रहे है। मंत्रियों से परामर्श के बाद महाराणा प्रताप ने संधि प्रस्ताव को ठुकरा दिया, ओर मानसिंहजी को सम्मानजनक तरीके से विदा किया ।। हालांकि कर्नल टॉड जैसे इतिहासकार लिखते है की राणा प्रताप ने मानसिंहजी का अपमान किया, लेकिन इन बातों में कोई सत्यता नही है , क्यो की कर्नल टॉड ने क्या वह युद्ध देखा था ? बिना किसी आधार के कर्नल टॉड ने यह बात लिख दी ।। कर्नल टॉड से पूर्व के किसी समकालीन इतिहासकार चाहे वह फारसी हो, या अरबी या अकबरनामा, या मुहणोत नेन्सी किसी मे महाराणा प्रताप द्वारा मानसिंहजी के अपमान की घटना का जिक्र नही है ।।

मानसिंहजी महाराणा प्रताप के यहां से चले गए, लेकिन उनके मन मे मेवाड़ के नागरिकों की चिंता ही थी । वह नही चाहते थे कि इन राजनीतिक युद्धो में जनता पिसी जाएं।  मानसिंहजी को दूसरी चिंता यह थी, की कहीं कोई मुगल सेनापति के नेतृत्व में हल्दीघाटी का युद्ध लड़ा गया, तो मेवाड़ का पूर्ण विनाश निश्चित होगा । नागरिकों की हत्या होगी ।

अतः मानसिंहजी अपने छोटे भाई माधोसिंहजी के साथ स्वयं युद्ध के मैदान में उतरे ।

इस युद्ध मे माधोसिंहजी ने बड़ा जोरदार पराक्रम दिखाया।। इस युद्ध मे माधोसिंहजी के हाथों महाराणा प्रताप बुरी तरह घायल हो गए, झाला मानसिंह नाम के एक नामी मेवाड़ी सरदार ने महाराणा प्रताप को युद्ध से बाहर निकाला । महाराणा प्रताप के मैदान छोड़ते ही मेवाड़ी सेना के हौसले टूट गए, ओर मानसिंहजी इस युद्ध मे विजयी हुए ।

माधोसिंहजी ओर मानसिंहजी दोनो ने महाराणा प्रताप को मैदान छोड़कर जाते देख लिया, लेकिन किसी ने उनका पीछा नही किया ।। मानसिंहजी में मुगल सैनिकों को मेवाड़ नही लूटने दिया ।। यह पहली बार हुआ, की मेवाड़ एक भीषण युद्ध के बाद भी बहुत ज़्यादा नुकसान नही उठाना पड़ा ।। हल्दीघाटी के युद्ध के बाद मानसिंहजी ने साबित कर दिया, की युद्धनीति ओर युद्ध के बाद महानता  में उनका कोई तोड़ नही है । मानसिंहजी एक दिव्य पुरूष की भांति मेवाड़ के लिए वरदान साबित हुए ।

विश्व विजेता मानसिंहसंपादित करें

मानसिंहजी रावलपिंडी थे, जो पूरी तरह इस्लामिक बन चुका था ।। मानसिंहजी के पास सेना थी मात्र 3500 । कश्मीर से लेकर अफगानिस्तान, कज्जकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान , तुर्कीस्तान, उज्बेकिस्तान, ईरान के शाशक एक हो गए, ओर इनका इरादा था, भारत मे भयंकर लूटमार मचाना ।।

इतनी बड़ी संख्या, ओर मानसिंहः जी के पास सैनिक केवल 3500 , बाद में कुछ सहायता अकबर की तरफ से गयी, क्यो की वह भी अफगानों से हारकर अपना राजपाठ गंवाना नही चाहता था, अय्याशी किस विदेशी आक्रांता को प्यारी नही है । यह घटना हल्दीघाटी युद्ध के मात्र 4 साल बाद कि घटना है ।।

इस पूरे हमले को अकेले मानसिंहजी ने रौका था, एक भी अन्य राजपूत का सहयोग मानसिंहजी ने नही लिया । मानसिंहजी ने कश्मीर से लेकर , कैस्पियन सागर तक ( जिसमे ईरान, कज्जकिस्तान, अफगानिस्तान, कश्मीर, तुर्की, उज्बेकिस्तान , बलूचिस्तान ,आदि सभी क्षेत्र आ जाते है, जहां से कासिम से लेकर अल्लाउदीन खिलजी सब आये थे ) के प्रदेशो को कुचलकर रख दिया । उस समय यह सारा प्रदेश मात्र 5 रियासतों में बंटा था । इन्ही पांच रियासतों के झंडे उतारकर , मानसिंहजी ने भारत के गौरव की शान में इन पांच रियासतों के झंडे को मिलाकर जयपुर का " पंचरंगा ध्वज बनाया । इतना बड़ा काम करने वाला यह महापुरुष उस समय मात्र 30 साल का था ।।

अगर मानसिंहजी ने इस हमले को असफल ना किया होता, तो भारत मे एक भी हिन्दू का बचे रहना मुश्किल था ।

मानसिंह काल में आमेर की उन्नतिसंपादित करें

राजा भगवानदास की मृत्यु हो जाने पर (उनका दत्तक पुत्र) राजा मानसिंह जयपुर के सिंहासन पर बैठा. कर्नल जेम्स टॉड ने लिखा है- "मानसिंह के शासनकाल में आमेर राज्य ने बड़ी उन्नति की। मुग़ल दरबार में सम्मानित हो कर मानसिंह ने अपने राज्य का विस्तार किया उसने अनेक राज्यों पर आक्रमण कर के जो अपरिमित संपत्ति लूटी थी, उसके द्वारा आमेर राज्य को शक्तिशाली बना दिया। धौलाराय के बाद आमेर, जो एक मामूली राज्य समझा जाता था, मानसिंह के समय वही एक शक्तिशाली और विस्तृत राज्य हो गया था।भारत के इतिहास में कछवाहो का महत्वपूर्ण स्थान आता है मानसिंह के समय कछवाहो ने खुतन से समुद्र तक अपने बल, पराक्रम और वैभव की प्रतिष्ठा की थी। मानसिंह यों अकबर की अधीनता में ज़रूर था, पर उसके साथ काम करने वाली राजपूत सेना, बादशाह की सेना से कहीं अधिक शक्तिशाली समझी जाती ,हिन्दू धर्म के सच्चे संरक्षक के रूप में कछवाहों ने कार्य किया और कट्टर इस्लामीकरण से भारत और उसकी जनता को बचाए रखा ,कट्टर औरंगज़ेब के समय कछवाहो और मुगलों के सम्बन्ध खराब हो गए थे और औरगज़ेब के आखिरी समय मै कछवाहो ने मुगलों से दूरी बना ली थी [1]

कर्नल जेम्स टॉड की इस बात से दूसरे कुछ इतिहासकार सहमत नहीं. उनका कथन है मानसिंह भगवान दास का गोद लिया पुत्र नहीं था, बल्कि वह तो भगवंत दास का लड़का था। भगवानदास और भगवंत दास दोनों भाई थे।[2] मुग़ल-इतिहास की किताबों से ज़ाहिर होता है कि अकबर के आदेश पर उसके अनुभवी अधिकारी महाराजा मानसिंह, स्थानीय सूबेदार कुतुबुद्दीन खान और आमेर के राजा भगवंत दास ने गोगून्दा और मेवाड़ के जंगलों में महाराणा प्रताप को पकड़ने के लिए बहुत खोजबीन की पर अंततः वे असफल रहे तो अकबर बड़ा क्रुद्ध हुआ- यहाँ तक सन १५७७ में तो उन दोनों (कुतुबुद्दीन खान और राजा भगवंत दास) की 'ड्योढी तक बंद' कर दी गयी!"[3]

निधनसंपादित करें

मुस्लिम इतिहासकारों ने लिखा है "हिजरी १०२४ सन १६१५ ईस्वी में मानसिंह की बंगाल में मृत्यु हुई", परन्तु दूसरे इतिहासकारों के विवरण से पता चलता है कि मानसिंह उत्तर की तरफ खिलजी बादशाह से युद्ध करने गया था जहाँ वह सन १६१७ ईस्वी में मारा गया। मानसिंह के देहांत के बाद उसका बेटा भावसिंह गद्दी पर बैठा।"[4]

सन्दर्भसंपादित करें

  1. 5.राजस्थान का इतिहास : कर्नल जेम्स टॉड, साहित्यागार प्रकाशन, जयपुर
  2. 6.राजस्थान का इतिहास : कर्नल जेम्स टॉड, साहित्यागार प्रकाशन, जयपुर
  3. 7.राजस्थान का इतिहास : कर्नल जेम्स टॉड, साहित्यागार प्रकाशन, जयपुर
  4. 8.राजस्थान का इतिहास : कर्नल जेम्स टॉड, साहित्यागार प्रकाशन, जयपुर