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मुकुंदराव आनंदराव जयकर

मुकुंदराव आनंदराव जयकर ( 13 नवम्बर 1873 - 10 मार्च 1959, मुम्बई) ) प्रख्यात विधि विशारद्, संविधानशास्त्रज्ञ, न्यायाधीश, प्रसिद्ध वक्ता, शिक्षाशास्त्री एवं समाजसेवक थे। 1917 के बाद हिंदुस्तान का ऐसा कोई भी आंदोलन नहीं जिससे आपका संबंध न रहा हो। 1948 से पूना के कुलपति के रूप में रहे। आपका व्यक्तित्व अत्यंत व्यापक रहा है। आपके सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक तथा शिक्षा संबंधी कार्यों का मूल्यांकन किए बिना भारत का आधुनिक इतिहास अधूरा रहेगा। इस दृष्टि से आपके भाषणों, पत्रों तथा लेखों का अध्ययन आवश्यक है।

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मुकुंदराव आनंदराव जयकर का जन्म नासिक में हुआ था। आपकी शिक्षा बंबई के एलफिंस्टन हाई स्कूल और कालेज तथा सरकारी लॉ स्कूल में हुई थी। 1905 में आपने हाईकोर्ट में वकालत शुरु की। 1937 में फेडरल कोर्ट ऑव इंडिया में न्यायाधीश के रूप में आपकी नियुक्ति हुई। प्रीवी काउन्सिल की ज्युडीशियल कमिटी के भी आप सदस्य थे पर 1942 में आपने इस पद से त्यागपत्र दे दिया। कॉन्सिटट्युएंट एसेंबली के लिए सदस्य के रूप में आपका निर्वाचन हुआ था पर 1947 में इस पद से भी अप ने त्यागपत्र दे दिया।

1907 से 1912 तक लॉ स्कूल में आप कानून के प्राध्यापक थे। आपके आत्मसम्मान की भावना का इसी समय साक्षात्कार होता है जब अपने से निम्न स्तर के यूरोपीय अध्यापक की आपसे उच्चपद पर नियुक्ति पर आपने त्यागपत्र दे दिया। फर्ग्युसन कॉलेज में "प्लेज ऑव इंग्लिश लिटरेचर" पर आपका भाषण शिक्षा संबंधी आपके गंभीर अध्ययन क परिचायक है। मुंबई विश्वविद्यालय की रिफॉर्म कमेटी के आप 1924-25 में सदस्य थे। शिक्षा सुधार की योजना आपने इसी समय प्रस्तुत की थी। सरकार की डेक्कन कॉलेज को बंद करने की नीति के विरुद्ध आपने संघर्ष किया जो बंबई विश्वविद्यालय के इतिहास में चिरस्मरणीय है। 1941 में महाराष्ट्र यूनिवर्सिटी के संबंध में आपकी अध्यक्षता में एक कमिटी कायम हुई थी। शिक्षा और साहित्य के साथ संगीत और कला में भी आपकी रुचि थी। इनके उत्थान के लिए भी आप चिंतित थे।

शिक्षाशास्त्री के रूप में आप सर्वत्र विख्यात थे। नागपुर, लखनऊ, पटना, आदि अनेक विश्वविद्यालयों में हुए आपके दीक्षांत भाषण अमर हैं। 1917, 1918, 1920 तथा 1925 के कांग्रेस के अधिवेशनों में "स्वराज्य" तथा दूसरे राजनीतिक विषयों पर आपके भाषण और प्रस्ताव बहुत ही महत्वपूर्ण रहे हैं। बंबई की स्वराज पार्टी लेजिस्लेटिव काउंसिल में आप विरोध पक्ष के नेता रहे। 1926 में इंडियन लेजिस्लेटिव एसेंबली के लिए सदस्य के रूप में आप निर्वाचित किए गए। यहाँ पर आप नेशनलिस्ट पार्टी के उपनेता के रूप में कार्य करते रहे। गोल मेज सम्मेलन में प्रतिनिधि के रूप में आप उपस्थित थे। फेडरल सट्रक्चर कमिटी के भी आप सदस्य रहे। गांधी इर्विन समझौता के लिए सर सप्रू के साथ शांतिदूत के रूप में आपने कार्य किया। पूना पैक्ट के लिए भी आप प्रयत्नशील रहे।

आप पर सभी का समान रूप से विश्वास होने के कारण मध्यस्थ के रूप में आपकी योग्यता महनीय थी। सरकार ने आपको के. सी. एस. आई. बनाना चाहा पर आप मिस्टर जयकर ही बने रहे। 1919 में जलियांवाला हत्याकांड से संबंधित आपकी रिपोर्ट इतिहास में अमर है। 1940 में ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय ने डी. सी. एल. पदवी से आपको विभूषित किया।