लोमराज सिंह (१८३२ - १९२८) चंपारण सत्याग्रह के पुरोधा तथा किसान नेता थे। उनके कारण पीपरा व तुरकौलिया की नीलही कोठियों के हजारों किसान अत्याचार, अनाचार और शोषण के विरुद्ध आंदोलन पर उतरे। लोमराज सिंह जगीरहां कोठी के जमादार थे। नीलहों द्वारा किसानों व मजदूरों के साथ अत्याचार होता देख लोमराज सिंह ने नीलहों की नौकरी छोड़ी।

जीवनसंपादित करें

बाबू लोमराज सिंह चम्पारण सत्याग्रह के महत्वपूर्ण पुरोधा थे। माना जाता है कि इनके कारण ही चम्पारण सत्याग्रह का केन्द्र बिन्दु बना। इनका गाँव जसौली जो आज जसौली पट्टी के नाम से जाना जाता है। ये किसान नेता थे जिनकी अगुआइ में पीपरा एवं तुरकौलिया नीलही कोठियों से सम्बद्ध हजारों किसान नीलहे साहबों के अत्याचार, अनाचार और षोषण के विरुद्ध निर्णायक आन्दोलन पर उतर गये थे।[1] उपरोक्त किसानों के आन्दोलन को ही निर्णायक मोड़ तक पहुँचाने के लिए 1917 में कांग्रेस नेता मोहनदास करमचंद गाँधी चंपारण आये थे, जो यहाँ ‘ बाबा ’ कहलाये और महात्मा गाँधी बन कर लौटे।[1] गाँधी जी ने 15 अप्रैल 1917 को चंपारण आगमन के बाद अपना कार्य प्रारंभ करने के लिए बाबू साहेब को ही चूना था।

वे 16 अप्रैल की सुबह जसौली के लिए चल पडे़। कहा जाता है कि वहां किसान आंदोलन को कुचलने के लिए इनके साथ दमनात्मक कारवाई की गई थी। गाँधी जी के लिए उस समय चंपारण में जसौली से अधिक उपयुक्त धरती नहीं थी जहाँ वे सत्याग्रह की शुरुआत कर सकें। गाँधी जी की जसौली यात्रा से नीलीहों के साथ साथ जिला प्रशासन तथा तत्कालीन ब्रिटीश सरकार के कान खड़े हो गए तथा उनके भ्रमण पर प्रतिबन्ध लगाते हुए तत्कालीन कलक्टर मि0 हेकौक ने उन्हें जिला छोड़ने का आदेश दिया। गाँधी जी तथा बाबू लोमराज सिंह अपने इरादे पर अडिग रहे। गाँधी जी रास्ते में चंद्रहिया के पास से स्वयं सरकार से निबटने के लिए जिला मुख्यालय मोतिहारी लौट गए लेकिन उन्होंने अपने सहयोगी रामनवमी प्रसाद, धरनीधर प्रसाद दोनों वकील तथा अन्य को चंपारण सत्याग्रह का सूत्रपात करने के लिए जसौली भेजा। बाबू साहेब ने उन्हें लेकर जसौली आए।

जहाँ उनलोगों ने बाबू साहेब के विरुद्ध की गइ दमनात्मक कारवाइयों को देखा तथा चंपारण सत्याग्रह का सूत्रपात करते हुए उन्हीं के दरवाजे पर किसानो का पहला बयान दर्ज कर एक पोथी बनाइ जो आगे चलकर महीने भर में चंपारण सत्याग्रह का पोथा हो गयी। जिसमें किसानों पर अत्याचार कि कथा दर्ज थी।

स्वतंत्रता संग्रामसंपादित करें

बाबू लोमराज सिंह ने 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम ”सिपाही विद्रोह“ को उभरते तथा विफल होते देखा था। बेतिया राज को पराभूत होते तथा उससे पट्टे पर जमीन लेकर नीलहें साहबों को उभरते, निरीह किसानो को उनकी दमन चक्की में पिसते तथा इस अन्याय के साथ सरकार की शक्ति को सहयोग करते देखा था और उनकी आत्मा चित्कार कर उठी थी।

इस बीच अंग्रजों से संघर्ष करने के लिए वर्तमान पश्चिमी चम्पारण के किसान शेख गुलाब और शीतल राय, पीरमोहम्मद मुनिश आदि उठे लेकिन उन्हें दबा दिया गया। उस समय चंपारण में शिक्षा की बेहद कमी थी तथा उनके अभाव में संघर्ष सफल नहीं हो रहा था। कोइ पढ़ा-लिखा व्यक्ति अंग्रेजों के खिलाफ आगे नहीं आ रहा था।

इसी बीच अंग्रेज साहब मि0 एमन के दमन के शिकार पं0 राजकुमार शुक्ला हुए। पं0 शुक्ला ने जब विरोध का झंडा उठाया तो उन्हें बाबू लोमराज सिंह की शक्ति मिल गयी। बाबू साहेब तो लम्बे समय से अंग्रेजों से कानूनी लड़ाई लड़ रहे थे लेकिन इन्हें समुचित सफलता नहीं मिल रही थी।

मुकदमें में धन का अपव्यय भी सीमा छू रही थी जिसमें बाबू साहेब को अपने मोतिहारी के वकील टोली का शहरी आवास वकील साहेब की फीस में ही गंवाना पड़ा था। लेकिन इस बीच वे तुरकौलीया तथा पीपरा कोठी क्षेत्र के किसानों को एक जुट कर कोटवा गाँव के मिठुआ वर के पास एक बड़ी सभा करने में सफल रहे थे। कहा जाता है कि उन्होंने तिरहुत कमिश्नर को सात सौ किसानों के हस्ताक्षर के युक्त बढ़े हुए लगान (सहरबेसी) का मन बना लिया लेकिन उसने आन्दोलन का रूप तब लिया जब उसमें पं0 राज कुमार शुक्ला शामिल हो गये तथा बाबू साहेब के वकील बाबू गोरख प्रसाद की बुद्धि उसमें मिल गयी।

चम्पारण सत्याग्रहसंपादित करें

गोरख बाबू ने ही इन लोगों को गाँधी द्वारा द0 अफ्रिका में किये गये कार्यों की जानकारी तथा सुझाव दिया कि अगर वे चम्पारण की स्थिति आकर देख लें तो यहाँ का भी उद्धार हो जाये। इसके लिए पं0 शुक्ला के नेतृत्व में किसानों का एक जत्था चम्पारण से लखनऊ कांग्रेस में भाग लेने गया जिसमें बाबू लोमराज सिंह ने सहयोग किया।

गाँधी जी चम्पारण कैसे आये यह तो सर्वविदित है लेकिन यह कम ही लोग जानते हैं कि पटने की तकलीफ के बाद जब गाँधी जी मगन लाल को पत्र लिख कर अपना कार्यक्रम बदल कर लौटने की तैयारी कर रहे थे तो बाबू लोमराज सिंह ही ऐसे आदमी थे जिन्होंने गाँधी जी से कहा था कि उन्होंने अपना सब कुछ गंवाया है गाँधी की आशा और विश्वास पर अगर गाँधी चंपारण नहीं गए तो वे गंगा नदी में कूद कर आत्महत्या कर लेंगे परन्तु लोक विश्वास गंवाने चंपारण नहीं जायेंगे और गाँधी जी को अपना मन बदल कर चम्पारण आना पड़ा था फिर जो हुआ यह चम्पारण सत्याग्रह के इतिहास से भी सभी जानते हैं। चंपारण एग्रेरीयन एक्ट गाँधी के चंपारण सत्याग्रह के साथ बाबू लोमराज सिंह के किसान आन्दोलन की सफलता थी।

बाबू लोमराज सिंह के बड़े मददगार उनके चचेरे भाई भिखु सिंह थे जो अंग्रेजों की जमादारी छोड़कर किसान आन्दोलन में शामिल हुए थे। अंग्रेज साहबों के पत्र तथा सरकारी प्रतिवेदनों से ज्ञात होता है कि पीपरा और तुरकौलीया कोठी के साहबों पर इन दोनो भाईयों का भय था। अपनी जनता में ये इतना लोकप्रिय थे कि लोमराज सिंह को लोग सोराज (स्वराज) सिंह पुकारने लगे थे। पीपरा के साहेब मि0 नॉरमेन ने कलेक्टर मि0 हेकौक को बताया था कि सोराज (लोमराज) के विरुद्ध कोई गवाह मिलना मुश्किल है और कलक्टर लोमराज सिंह की इतनी लोकप्रियता की जानकारी अपने पत्र द्वारा अधिकारियों को दी थी तथा चम्पारण में किसान आन्दोलन भड़कने की स्थिति को रेखांकित किया था। बाबू साहेब का मनोबल तब उच्च हो गया जब पं0 राजकुमार शुक्ला समय से कलकते गाँधी जी को लाने प्रस्थान कर गये। इसी समय जगिरहाँ कोठी का साहब मि0 कौम्प भी इनका मनोबल तोड़ने इनके सामने आ गया। तब अपनी बंसवारी से अंग्रेजों के आदमियों को बाँस काटने कि सूचना मिलते ही बाबू साहेब उन्हें रोकने के लिए निहत्थे चल दिये और इनके पीछे पड़ा जन सैलाब।

जिसपर मि0 कैम्प घोड़े दौड़ा-दौड़ा कोड़े बरसाने लगा। बाबू साहेब ने ललकारा तो लोगों ने उसे घोड़े पर से गिरा कर उसकी भोजपुरीया पिटाइ कर दी, उसके शरीर में लाठी धांस दी। इसमें अंग्रेजों ने अपने अस्तित्व के विरोद्ध चुनौती मानी तथा जसौली में पलटन भेज कर तबाही मचायी, मुकदमें किये। मुकदमें में बाबू साहेब तो रिहा हुए लेकिन उस मुकदमें में मखन सिंह, विसुन सिंह, त्रिवेणी सिंह, राजाधरी राय, रामफल राय, महींगन कुंंवर सहित अनेक लोग बक्सर जेल से सजा काट कर आये। बाबू साहेब के अच्छे सहयोगी बारा (चकिया) का देव परिवार था। बाबू साहेब तथा उनके भाई भिखु सिंह स्वयं ही अंग्रजों से नहीं लड़ते अन्य लड़ाकू किसानों की आर्थिक मदद करने का प्रणाम मिला है। बाबू लोमराज सिंह ने पटने में गाँधी जी को किया गया वादा 18 अप्रैल 1917 को मोतिहारी के कचहरी में मुकदमें की सुनवाई के दौरान पीपरा और तुरकौलीया क्षेत्र के 10 हजार किसानों को समर्थन में जमा कर निभाया। बाबू साहेब की यहीं साख थी कि महात्मा गाँधी 1934 में भूकंप की बर्बादी देखने आये तो उन्होंने उनकी तथा पं0 शुक्ला की खोज की लेकिन तब तक वे लोग दिवेगत हो गये थे।

मृत्युसंपादित करें

बाबू साहेब ने स्वतंत्रता नहीं देखी। लेकिन कहा जाता है कि उनके किसान आन्दोलन का प्रभाव हुआ कि नीलहों को बेतिया राज को लीज लौटा कर जाना पड़ा।

मि0 कैम्प ने उनका घर तो तोड़वा दिया लेकिन उनकी इंर्ट से अपना घोड़सार नहीं बनवा सका पर बाबू लोमराज सिंह ने मरने के पहले उसकी कोठी तोड़वा कर उसकी ईंट से अपना शौचालय बनवा लिया। [2][3]


इन्हें भी देखेंसंपादित करें

संदर्भसंपादित करें

  1. "जसौलीपट्टी में रचा गया था भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन का ताना-बाना". web.archive.org. 2017-03-23. अभिगमन तिथि 2020-06-30.
  2. महात्मा गाँधी मोमेंट्स इन चंपारण 1917-1918
  3. चंपारण में गाँधी

बाहरी कड़ियाँसंपादित करें