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'''ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस''' ('''ओयूपी''') दुनिया की सबसे बड़ी विश्वविद्यालय प्रेस है।<ref>{{cite news|url=http://www.nytimes.com/1994/02/16/news/16iht-presseduc.html|title=400 Years Later, Oxford Press Thrives|last=Balter|first=Michael |date= फ़रवरी 16, 1994|publisher=The New York Times|accessdate=2009-10-21}} {{Dead link|date=Octoberअक्टूबर 2010|bot=H3llBot}}</ref> यह [[ऑक्सफ़र्ड विश्वविद्यालय|ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय]] का एक विभाग है और इसका संचालन उपकुलपति द्वारा नियुक्त 15 शिक्षाविदों के एक समूह द्वारा किया जाता है जिन्हें प्रेस प्रतिनिधि के नाम से जाना जाता है। उनका नेतृत्व प्रतिनिधियों के सचिव द्वारा किया जाता है जो ओयूपी के मुख्य कार्यकारी और अन्य विश्वविद्यालय निकायों के प्रमुख प्रतिनिधि की भूमिका निभाता है। ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय सत्रहवीं सदी के बाद से प्रेस की देखरेख के लिए इसी तरह की प्रणाली का इस्तेमाल करता आ रहा है।<ref>हैरी कार्टर, ''ए हिस्ट्री ऑफ दी ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस'' (ऑक्सफोर्ड, 1975) पी. 137</ref>
 
विश्वविद्यालय ने 1480 के आसपास मुद्रण व्यापार में कदम रखा और बाइबल, प्रार्थना पुस्तकों और अध्ययनशील रचनाओं का प्रमुख मुद्रक बन गया।<ref>कार्टर पास्सिम</ref> इसकी प्रेस द्वारा शुरु की गयी एक परियोजना उन्नीसवीं सदी के अंतिम दौर में ''ऑक्सफोर्ड इंग्लिश डिक्शनरी'' बन गई और बढ़ती लागतों से निपटने के लिए इसने अपना विस्तार जारी रखा। <ref>पीटर सटक्लिफ, ''दी ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस: एन इन्फोर्मल हिस्ट्री'' (ऑक्सफोर्ड 1975; 2002 के सुधार के साथ पुनःप्रकाशित) पी. 53, 96-7, 156</ref> नतीजतन अपने शैक्षणिक और धार्मिक शीर्षकों से मेल स्थापित करने के लिए ऑक्सफोर्ड ने पिछले सौ सालों में बच्चों की पुस्तकों, स्कूल की पाठ्य पुस्तकों, संगीत, पत्रिकाओं, वर्ल्ड्स क्लासिक्स सीरीज और सबसे ज्यादा बिकने वाली अंग्रेजी भाषा शिक्षण पाठ्य पुस्तकों का प्रकाशन किया है। अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कदम रखने के फलस्वरूप 1896 में [[नया यॉर्क|न्यूयॉर्क]] से शुरुआत करने वाली इस प्रेस ने [[संयुक्त राजशाही (ब्रिटेन)|यूनाइटेड किंगडम]] के बाहर भी अपना कार्यालय खोलना शुरू कर दिया। <ref>सटक्लिफ, पास्सिम</ref> कंप्यूटर प्रौद्योगिकी के आगमन और उत्तरोत्तर बढ़ती व्यापारिक दशाओं की वजह से 1989 में ऑक्सफोर्ड में स्थित प्रेस के छापेखाने को बंद कर दिया गया और वोल्वरकोट में स्थित उसकी पूर्व कागज़ की मिल को 2004 में ध्वस्त कर दिया गया। अपनी छपाई और जिल्दसाजी कार्य का ठेका देकर आधुनिक प्रेस हर साल दुनिया भर में लगभग 6000 नए शीर्षकों का प्रकाशन करता है और दुनिया भर में इसके कर्मचारियों की संख्या लगभग 4000 है। एक धर्मार्थ संगठन के हिस्से के रूप में ओयूपी अपने मूल विश्वविद्यालय को अधिक से अधिक वित्तीय सहायता प्रदान करने के लिए और इसके अलावा अपनी प्रकाशन गतिविधियों के माध्यम से छात्रवृत्ति, अनुसन्धान और शिक्षा में बेहतरीन प्रदर्शन करने में विश्वविद्यालय के लक्ष्यों को पूरा करने में उसकी सहायता करने के लिए प्रतिबद्ध है।
=== लंदन व्यवसाय ===
 
फ्राउड को कोई शक नहीं था कि लन्दन में प्रेस का व्यवसाय काफी हद तक बढ़ गया था और बिक्री के आरम्भ के साथ अनुबंध पर नियुक्त किया गया था। सात साल बाद विश्वविद्यालय के प्रकाशक के रूप में फ्राउड एक छाप के रूप में अपने खुद के नाम के साथ-साथ 'ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस' का इस्तेमाल कर रहे थे। यह शैली हाल के दिनों तक कायम थी और प्रेस के लन्दन कार्यालयों से दो प्रकार के छापों की उत्पत्ति हो रही थी। 'विश्वविद्यालय के प्रकाशक' के नाम से जाने जाने वाले अंतिम व्यक्ति जॉन गिल्बर्ट न्यूटन ब्राउन थे जो अपने सहकर्मियों के बीच 'ब्रुनो' के नाम से जाने जाते थे। छापों के द्वारा गर्भित भेद सूक्ष्म लेकिन महत्वपूर्ण थे। कमीशन (उनके लेखकों द्वारा या किसी पढ़े-लिखे व्यक्तियों के समूह द्वारा भुगतान) पर लन्दन द्वारा जारी किए जाने वाले पुस्तकों की शैली पर 'हेनरी फ्राउड' या 'हम्फ्री मिलफोर्ड' की छाप थी जिस पर ओयूपी का कोई उल्लेख नहीं था मानो प्रकाशक उन्हें अपने आप जारी कर रहे थे जबकि विश्वविद्यालय के शीर्षक के अधीन प्रकाशकों द्वारा जारी किए जाने वाले पुस्तकों पर 'ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस' की छाप थी। इन दोनों श्रेणियों को ज्यादातर लन्दन द्वारा नियंत्रित किया जाता था जबकि ऑक्सफोर्ड (व्यावहारिक दृष्टि से सचिव) क्लेयरेंडन प्रेस पुस्तकों की देखभाल करता था। कमीशन किताबों का मकसद लन्दन व्यवसाय के ऊपरी खर्चों को वित्तपोषित करने के लिए कामधेनु गाय की तरह काम करना था क्योंकि प्रेस ने इस प्रयोजन के लिए अलग से किसी संसाधन की व्यवस्था नहीं की थी। फिर भी फ्राउड विशेष रूप से इस बात पर ध्यान देते थे कि उनके द्वारा प्रकाशित सभी कमीशन पुस्तकों को प्रतिनिधियों का अनुमोदन प्राप्त हो। यह विद्वानों या पुराविदों के प्रेसों के लिए कोई असामान्य व्यवस्था नहीं थी।{{citation needed|date=Decemberदिसम्बर 2010}}
 
प्राइस ने तुरंत बाइबल के संशोधित संस्करण के कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी प्रेस के साथ संयुक्त रूप से निकटवर्ती प्रकाशन के लिए फ्राउड को प्रधानता दी जिसके इस हद तक एक 'बेस्टसेलर' होने की सम्भावना थी जिसे मांग के साथ तालमेल बनाए रखने के लिए प्रेस के सभी संसाधनों को काम में लगाने की जरूरत पड़ती. यह 1611 के प्राधिकृत संस्करण को अधिक्रमित करते हुए सबसे पुराने मूल यूनानी और हिब्रू संस्करणों से बाइबल ग्रन्थ का एक सम्पूर्ण पुनरानुवाद था। फ्राउड की एजेंसी को ठीक समय पर संशोधित संस्करण के लिए स्थापित किया गया जिसे 17 मई 1881 को प्रकाशित किया गया और प्रकाशन से पहले और तब से एक खतरनाक दर पर इसकी एक मिलियन प्रतियों की बिक्री हुई हालांकि अत्यधिक उत्पादन की वजह से अंत में लाभ में कमी आ गई।{{citation needed|date=Decemberदिसम्बर 2010}} हालांकि फ्राउड किसी भी तरह से एक ऑक्सफोर्ड व्यक्ति नहीं थे और ऐसा होने का कोई सामाजिक मिथ्याभिमान नहीं था लेकिन फिर भी वह एक अच्छे व्यवसायी थे जो सतर्कता और उद्यम के बीच के जादूई संतुलन को प्रभावित करने में सक्षम थे। उनके मन में बहुत पहले से ही प्रेस के विदेशी व्यापार को सबसे पहले यूरोप में और उसके बाद लगातार अमेरिका, कनाडा, भारत और अफ्रीका में उन्नत बनाने का विचार हिलोर मार रहा था। अमेरिकी शाखा के साथ-साथ [[एडिनबरा|एडिनबर्ग]], [[टोरंटो]] और [[मेलबॉर्न|मेलबोर्न]] में डिपो स्थापित करने का एकमात्र श्रेय काफी हद तक उन्हीं पर था। फ्राउड ने लेखकों से निपटने, जिल्दसाजी, वितरण और विज्ञापन सहित ओयूपी की छाप वाली किताबों के लिए अधिकांश प्रचालन तंत्रों को नियंत्रित किया और केवल संपादकीय कार्य और छपाई की देखरेख का काम ऑक्सफोर्ड द्वारा किया गया।{{citation needed|date=Decemberदिसम्बर 2010}}
 
फ्राउड ऑक्सफोर्ड को नियमित रूप से पैसे भेजते थे लेकिन उन्होंने निजी तौर पर महसूस किया कि इस व्यवसाय की पूंजी काफी कम थी और अगर इसे एक वाणिज्यिक आधार नहीं मिला तो यह बहुत जल्द विश्वविद्यालय के संशाधनों को खाली कर देगा। उन्हें खुद एक निर्धारित सीमा तक व्यवसाय में पैसों का निवेश करने की अधिकार था लेकिन पारिवारिक परेशानियों की वजह से वे ऐसा नहीं कर पा रहे थे। इसलिए विदेशी बिक्री में उनकी रुचि जगी क्योंकि 1880 और 1890 के दशकों तक भारत में पैसा बनाने का अवसर था जबकि यूरपीय पुस्तक बाजार मंदी की मार झेल रहा था। लेकिन प्रेस के फैसले से फ्राउड की दूरी का मतलब था कि जब तक कोई प्रतिनिधि उनकी तरफदारी नहीं करता तब तक वे इस नीति को प्रभावित करने में असमर्थ थे। फ्राउड ने अपना ज्यादातर समय प्रतिनिधियों द्वारा दिए गए जनादेश के तहत काम करने में बिताया. 1905 में पेंशन के लिए आवेदन करते समय उन्होंने तत्कालीन वाइस चांसलर जे. आर. मैग्राथ को लिखा कि बाइबल वेयरहाउस के प्रबंधक के रूप में उनके सात साल के कार्यकाल में लन्दन व्यवसाय की बिक्री का औसत लगभग 20000 पाउंड और लाभ का परिमाण 1887 पाउंड प्रति वर्ष था। 1905 तक प्रकाशक के रूप में उनके प्रबंधन के तहत बिक्री का परिमाण 200000 पाउंड प्रति वर्ष पहुँच गया था और उनके 29 साल के कार्यकाल में लाभ के परिमाण का औसत 8242 प्रति वर्ष पहुँच गया था।
इस क्षेत्र के साथ ओयूपी की पारस्परिक क्रिया भारत में अपने मिशन का हिस्सा थी क्योंकि उनके कई यात्रियों ने भारत जाने या वहां से आने के रास्ते पूर्व और दक्षिण पूर्व एशिया में प्रवेश किया था। 1907 में अपनी पहली यात्रा में ग्रेडन ने 'स्ट्रेट्स सेटलमेंट्स' (काफी हद तक फेडरेटेड मलय राज्य और सिंगापुर), चीन और जापान की यात्रा की थी लेकिन बहुत ज्यादा यात्रा करने में समर्थ नहीं थे। 1909 में ए. एच. कोब ने शंघाई में शिक्षाओं और पुस्तक विक्रेताओं से भेंट की और देखा कि वहां अक्सर सीधी-सादी छपाई वाली ब्रिटिश पुस्तकों के साथ खास तौर पर अमेरिका से आने वाली सस्ती पुस्तकों से प्रतिस्पर्धा चल रही थी।<ref>देखें रिमी बी. चटर्जी, 'पायरेट्स एंड फिलैन्थ्रपिस्ट: ब्रिटिश पब्लिशर्स और कॉपीराइट इन इंडिया, 1880-1935 स्वप्न कुमार चक्रवर्ती और अभिजीत गुप्ता द्वारा संपादित ''प्रिंट एरियाज़ 2: बुक हिस्ट्री इन इंडिया'' में, (न्यू डेल्ही: परमानेंट ब्लैक, आगामी 2007 में)</ref> 1891 के चेस अधिनियम के बाद उस समय की कॉपीराइट परिस्थिति ऐसी थी कि अमेरिकी प्रकाशक दंड मुक्त होने के लिए ऐसी किताबों को प्रकाशित कर सकते थे हालांकि उन्हें सभी ब्रिटिश प्रदेशों में वर्जित माना जाता था। दोनों प्रदेशों में कॉपीराइट को सुरक्षित करने के लिए प्रकाशकों को एक साथ प्रकाशन करने का इंतजाम करना पड़ा जो इस युग के वाष्प चालित जलयानों के लिए एक अंतहीन प्रचालन सिरदर्द था। किसी भी एक प्रदेश में पूर्व प्रकाशन के लिए दूसरे प्रदेश में कॉपीराइट संरक्षण के लिए कीमत चुकानी पड़ती थी।<ref>देखें साइमन नोवेल स्मिथ, ''इंटरनेशनल कॉपीराइट लॉ एंड दी पब्लिशर इन दी रीजन ऑफ क्वीन विक्टोरिया: दी ल्येल लेक्चर्स, यूनिवर्सिटी ऑफ ऑक्सफोर्ड, 1965-66'', (ऑक्सफोर्ड: क्लेयरेंडन प्रेस, 1968).</ref>
 
कोब ने शंघाई के हेन्जेल एण्ड कंपनी (जिसका संचालन संभवतः किसी प्रोफ़ेसर द्वारा किया जाता था) को उस शहर में ओयूपी का प्रतिनिधित्व करने का काम सौंपा.{{citation needed|date=Decemberदिसम्बर 2010}} प्रेस को हेन्जेल से तकलीफ थी जो अनियमित रूप से पत्राचार करते थे। वे एडवर्ड इवांस के साथ भी व्यापार करते थे जो एक अन्य शंघाई पुस्तक विक्रेता था। मिलफोर्ड ने कहा कि 'हमलोग चीन में अब तक जो कुछ कर रहे हैं हमें उससे अधिक करना चाहिए' और 1910 में उन्होंने कोब को शैक्षिक प्राधिकारियों के प्रतिनिधि के रूप में हेन्जेल की जगह किसी और रखने के लिए सुयोग्य प्रतिनिधि की तलाश करने का अधिकार प्रदान किया।{{citation needed|date=Decemberदिसम्बर 2010}} उनकी जगह मिस एम. वेर्ने मैक्नीली नामक एक दुर्जेय महिला को रखा गया जो ईसाई ज्ञान प्रचार सोसाइटी की एक सदस्या थीं और एक किताब की दुकान भी चलाती थीं। उन्होंने काफी कुशलतापूर्वक प्रेस के मामलों पर ध्यान दिया और कभी-कभी वह मिलफोर्ड को सम्मानार्थ भेंट स्वरुप सिगारों से भरे डिब्बे भी भेजती थीं। ओयूपी के साथ उनका सहयोग लगभग 1910 से शुरू हुआ था हालांकि उनके पास ओयूपी पुस्तकों के लिए कोई विशेष एजेंसी नहीं थी। सस्ते अमेरिकी किताबों की तुलना में ऑक्सफोर्ड द्वारा आराम से उत्पन्न और महंगे बाइबिल संस्करणों के बहुत ज्यादा प्रतिस्पर्धी न होने के बावजूद चीन में व्यापार की प्रमुख वस्तु बाइबल की किताबें थीं जबकि भारत में शैक्षिक किताबों को सबसे ऊंचा स्थान प्राप्त था।
 
1920 के दशक में, भारतीय शाखा की स्थापना की स्थापना हो गई थी और वह चालू हो गई थी तब कर्मचारी सदस्यों के लिए पूर्व और दक्षिण पूर्व एशिया की यात्रा करने के लिए यहां आना-जाना एक रिवाज बन गया। 1928 में मिलफोर्ड का भतीजा आर. क्रिस्टोफर ब्रैडबी वहां गए। वह ठीक उसी समय 18 अक्टूबर 1931 को ब्रिटेन लौट आए जब जापानियों ने मंचुरिया पर हमला कर दिया। मिस एम. वेर्ने मैक्नीली ने राष्ट्र लीग को एक विरोध पत्र लिखा और मिलफोर्ड को एक निराशा पत्र लिखा जिन्होंने उन्हें शांत करने की कोशिश की। {{citation needed|date=Decemberदिसम्बर 2010}} जापान ओयूपी के लिए बहुत कम मशहूर बाजार था और जो कुछ थोड़ा बहुत व्यापार होता था वह भी काफी हद तक बिचौलियों के माध्यम से ही होता था। मारुजेन कंपनी अब तक सबसे बड़ी ग्राहक थी और उसके पास मामलों से संबंधित एक विशेष व्यवस्था थी। अन्य व्यवसाय कोबे के सन्नोमिया में आधारित एच. एल. ग्रिफिथ्स नामक एक पेशेवर प्रकाशक प्रतिनिधि के माध्यम से होता था। ग्रिफिथ्स ने प्रेस की तरफ से प्रमुख जापानी स्कूलों और किताबों की दुकानों की यात्रा की और 10 प्रतिशत कमीशन हासिल किया। एडमंड ब्लंडेन कुछ समय तक टोकियो विश्वविद्यालय में रहे थे और विश्वविद्यालय पुस्तक विक्रेता फुकुमोटो स्ट्रोइन के साथ प्रेस का संपर्क स्थापित किया। हालांकि जापान से प्राप्त होने वाला एक महत्वपूर्ण अधिग्रहण ए. एस. हॉर्नबीस एडवांस्ड लर्नर्स डिक्शनरी था। यह हांगकांग में प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा पाठ्यक्रम के लिए पाठ्य पुस्तकों का भी प्रकाशन करता है। चीनी भाषी शिक्षण शीर्षकों को ब्रांड कीज प्रेस (啟思出版社) के साथ प्रकाशित किया जाता है।
 
==== उत्तरी अमेरिका ====
दिसंबर 1909 में कोब लौट आए और उन्होंने उस वर्ष अपनी एशियाई यात्रा का विवरण प्रस्तुत किया। उसके बाद कोब ने मिलफोर्ड के सामने प्रस्ताव रखा कि दक्षिण अमेरिका के आसपास के वाणिज्यिक यात्रियों को भेजने के लिए प्रेस को कंपनियों के समूह में शामिल किया जाना चाहिए जिस पर मिलफोर्ड सैद्धांतिक रूप से सहमत हो गए। कोब ने स्टीयर (प्रथम नाम अज्ञात) नामक एक व्यक्ति को अर्जेंटीना, ब्राजील, उरुग्वे, चिली और संभवतः अन्य देशों की यात्रा करने का काम सौंपा जिसकी जिम्मेदारी कोब पर थी। होडर एण्ड स्टफटन इस उद्यम से बाहर निकल गया लेकिन ओयूपी ने आगे बढ़कर इसमें अपना योगदान दिया।
 
स्टीयर की यात्रा एक मुसीबत थी और मिलफोर्ड ने उदासी भरे लफ्जों में कहा कि सभी यात्रियों की यात्राओं की तुलना में यह यात्रा 'काफी महंगी और बहुत कम फलदायक साबित हुई'. अपने यात्रा कार्यक्रम के आधे से अधिक हिस्से को पूरा करने से पहले ही स्टीयर लौट आए और वापस लौटते समय वे अपने ग्राहकों के भुगतान को वापस करने में विफल रहे जिसके परिणामस्वरूप प्रेस को 210 पाउंड की एक मोटी रकम से हाथ धोना पड़ा. प्रेस को 'आकास्मिक व्यय' के रूप में अपने पुस्तकों के मूल्य का 80 प्रतिशत चुकाने के लिए मजबूर होना पड़ा इसलिए पर्याप्त ऑर्डर मिलने के बावजूद उन्हें नुकसान उठाना पड़ा. वास्तव में कुछ ऑर्डर यात्रा से ही प्राप्त हुए थे और जब स्टीयर के नामूनोने का बॉक्स को वापस किया गया तब लन्दन कार्यालय को पता चला कि उन्हें दूसरी परत से नीचे की तरफ नहीं खोला गया था।{{citation needed|date=Decemberदिसम्बर 2010}}
 
==== अफ्रीका ====
* ''जर्मनी एंड सेकेंड वर्ल्ड वार''
* विलियम डॉयल द्वारा ''ऑक्सफोर्ड हिस्ट्री ऑफ दी फ्रेंच रिवॉल्यूशन''
{{Expand section|date=Mayमई 2008}}
 
=== अंग्रेजी भाषा शिक्षण ===
 
== क्लेयरेंडन छात्रवृत्तियां ==
2001 से ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस ने वित्तीय रूप से क्लेयरेंडन बर्सरी को अपना सहयोग दिया है जो [[ऑक्सफ़र्ड विश्वविद्यालय|ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय]] की एक स्नातक छात्रवृत्ति योजना है।{{citation needed|date=Decemberदिसम्बर 2010}}
 
== इन्हें भी देखें ==
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