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महिलाओं को समानता के अधिकार के लिए जहां पूरे देश भर में मुहिम है वहीं कहीं कहीं महिलाओं का शोषण भी होता है इस बार महिला दिवस पर उत्तराखंड में महिलाओं की स्थिति पर विचार
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(महिलाओं को समानता के अधिकार के लिए जहां पूरे देश भर में मुहिम है वहीं कहीं कहीं महिलाओं का शोषण भी होता है इस बार महिला दिवस पर उत्तराखंड में महिलाओं की स्थिति पर विचार)
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उत्तराखंड में महिलाओं की स्थिति
 
(गुलामी से पहले या आजादी के बाद का समय)
समस्त देश दुनियां और उत्तराखंड की माताओं बहनों को महिला दिवस की हर्दिक शुभकामनाएं महिला दिवस पर एक टिप्पणी कि उत्तराखंड में महिलाओं की स्थिति कैसी थी और अब कैसी है
अगर हम उत्तराखंड में महिलाओं की स्थिति को लेके बात करते है तो पौराणिक काल से ही उत्तराखंड में महिलाओं को देवी का रूप माना जाता था और समय के साथ साथ उनकी स्थिति में परिवर्तन भी आया है
अगर हम इतिहास को पड़ते है तो हम पाते है कि पौराणिक समय में महिलाओं की स्थिति बहुत अच्छी थी महिलाओं को देवी का रूप माना जाता था और उनका बहुत सम्मान होता था
परन्तु अगर हम देश के गुलामी या राजशाही के समय की बात करे तो उस समय से महिलाओं की स्थिति में कुछ बदलाव आया है राजशाही गुलामी और आजादी के समय में महिलाओं को वो अधिकार नहीं थे जो पौराणिक काल में रहे होंगे इस समय में महिलाओं को पुरुषों का एकाधिकार समझा जाता था जो पुरुष कहीगे महिलाओं को वो मान्य होता था
उस समय उत्तराखंड में महिलाओं को उचित शिक्षा और स्वास्थ जैसे अधिकार से वंचित रखा जाता था उन पर बहुत प्रतिबंध लगे होते थे उनको समाज के बीच में खुल के बोलने या अपनी बात रखने का अधिकार नहीं होता था वैसे महिलाएं अगर कहीं पर समाज या पुरुषों के बीच बोल भी दें तो पुरुषों द्वारा उनकी ओर देखने मात्र से ही वो चुप हो जाती थी उस समय में महिलाओं की शादी भी बहुत कम उम्र में हो जाती थी जिसके कारण शादी के बाद ससुराल में
सम्पूर्ण परिवार कि जिम्मेदारी महिलाओं को ही उठानी होती थी चाहे वो घर के काम काज हो या बाहर खेती-बाड़ी का काम हो महिलाओं को सुबह जल्दी उठ के पूरे परिवार को चाय नाश्ता कराना होता था जैसे ही घर की महिलाएं इस काम से निपटती फिर गाय भैंस के लिए चारा और घास पानी पिलाना फिर बच्चो को खाना खिला के स्कूल भेजना उसके बाद दिन में खेतों में काम करने जाना खेतों से घर आके फिर दिन के खाने की तैयारी करना जैसे ही दिन में सभी का खाना हो जाए तो फिर जंगलों से घस लकड़ी पत्थर इत्यादि लाना फिर घर आ के शाम के खाने की तैयारी करना इतनी व्यस्थता के कारण पहाड़ों में महिलाओं ने कभी भी खुद समय पर भोजन नहीं किया होगा उनको खुद कभी ये पता भी नहीं लगता होगा कि उन्होंने सुबह का भोजन किया कि नहीं क्योंकि उनको सुबह से साम तक अपने लिए सोचने का समय ही नहीं मिलता था मैंने तो ये खुद ही महसूस किया है की जब भी हमारी माताएं बहनें घर के काम काज में लगी रहती थी और उनका स्वास्थ ठीक नहीं होता था तो वो सर पर कपड़ा बांध के अपने काम पर लगी रहती थी वो कभी भी सामने वाले को ये तक महसूस नहीं होने देती थी कि वो अस्वस्थ हैं ! अस्वस्थ होने के बाबजूद भी पूरे परिवार के लिए महिलाएं सभी कार्य करने की जिम्मेदारी लेती थी या ये कहें कि उन वर्षों में महिलाओं को ही परिवार के लिए एक मात्र जिम्मेदार माना जाता था महिलाओं को हर क्षेत्र में पुरुषों के मुकाबले निम्न स्थान दिया जाता था घर में कोई भी महत्वपूर्ण बात पर निर्णय लेना हो तो पुरुष आपस में ही बात कर के उस बात को निपटा लेते थे परन्तु महिलाओं को पुरुषों के बीच में बोलने का अधिकार नहीं था जो पुरुषों द्वारा निर्णय लिया जाता महिलाओं को वो मान्य होता था
बाल विवाह ,महिलाओं की अनुमति बिना उनकी शादी किसी भी लड़के और किसी भी उम्र के व्यक्ति से कर देना ,पुरुषों के अनेक विवाह होना,दहेज की प्रथा, पैसे ले के लड़कियों कि शादी करना
 
 
बाल विवाह - आजादी से पूर्व या बाद में भी लगभग सत्तर के दशक से पहले पहाड़ों में बाल विवाह भी हो जाता था उस समय लड़कियों कि शादी तकरीबन नौ दस वर्ष में या ग्यारह बारह वर्ष की आयु हो जाती थी कहीं कहीं तो बाल विवाह में दुल्हा दुल्हन की उम्र में बीस पच्चीस साल का अंतर भी होता था और कहीं कही दोनों विवाहित जोड़े इतने छोटे होते कि उनको खुद पता नहीं होता कि उनकी शादी हो है उनको अपनी शादी की खबर वयस्क होने पर या परिवार वालों के बार बार बोलने पर होती थी बाल विवाह के कारण तो बहुत होते था परन्तु उस समय इसका एक मुख्य कारण ये भी था कि गावों में पुरुष अपने दोस्तो या दूसरे गावों में रहने वाले अपने परिजनों को उनके सांथ मधुर संबंध होने के कारण लोग अपने बच्चो के होने से पहले ही आपस में ये निर्णय ले लेते थे कि अगर एक परिवार में बेटा बेटी या दूसरे परिवार में बेटा बेटी होगी तो उनकी शादी दोनों परिवार वाले आपस में करवा दंगे जिससे उनके मधुर संबंध बने रहे
यह प्रथा भारत में शुरू से नहीं थी। ये दिल्ली सल्तनत के समय में अस्तित्व में आया जब राजशाही प्रथा प्रचलन में थी। भारतीय बाल विवाह को लड़कियों को विदेशी शासकों से बलात्कार और अपहरण से बचाने के लिये एक हथियार के रूप में प्रयोग किया जाता था। बाल विवाह को शुरु करने का एक और कारण था कि बड़े बुजुर्गों को अपने पौतो को देखने की चाह अधिक होती थी इसलिये वो कम आयु में ही बच्चों की शादी कर देते थे जिससे कि मरने से पहले वो अपने पौत्रों के साथ कुछ समय बिता सकें।
 
बालविवाह के दुस्परिणाम?
बालविवाह के केवल दुस्परिणाम ही होते हैं जीनमें सबसे घातक शिशु व माता की मृत्यु दर में वृद्धि | शारीरिक और मानसिक विकास पूर्ण नहीं हो पता हैं
और वे अपनी जिम्मेदारियों का पूर्ण निर्वेहन नहीं कर पाते हैं और इनसे एच.आई.वि.  जेसे यौन संक्रमित रोग होने का खतरा हमेशा बना रहता हैं।
 
उत्तराखंड में बालविवाह होने के कई कारण हैं जैसे-
 
1.    लड़की की शादी को माता-पिता द्वारा अपने ऊपर एक बोझ समझना |
2.  शिक्षा का अभाव |
3.  रूढ़िवादिता का होना |
4.  अन्धविश्वास |
5.  निम्न आर्थिक स्थिति |
क्या बालविवाह को रोकने के लिए कुछ नहीं किया गया?
 
बालविवाह को रोकने के लिए इतिहास में कई लोग आगे आये जिनमें सबसे प्रमुख राजाराम मोहन राय,  केशबचन्द्र सेन जिन्होंने ब्रिटिश सरकार द्वारा एक बिल पास करवाया जिसे Special Marriage Act कहा जाता हैं इसके अंतर्गत शादी के लिए लडको की उम्र 18 वर्ष एवं लडकियों की उम्र 14 वर्ष निर्धारित की गयी एवं इसे प्रतिबंधित कर दिया गया। फिर भी सुधार न आने पर बाद में  Child Marriage Restraint  नामक बिल पास किया गया इसमें लडको की उम्र बढ़ाकर 21 वर्ष और लडकियों की उम्र बढ़ाकर 18 वर्ष  कर दी गयी। स्वतंत्र भारत में भी सरकार द्वारा भी इसे रोकने के कही प्रयत्न किये गए और कही क़ानून बनाये गए जिस से कुछ हद तक इनमे सुधार आया परन्तु ये पूर्ण रूप से समाप्त नहीं हुआ। सरकार द्वारा कुछ क़ानून बनाये गए हैं जैसे बाल-विवाह निषेध अधिनियम2006 जो अस्तित्व में हैं। ये अधिनियम बाल विवाह को आंशिक रूप से सीमित करने के स्थान पर इसे सख्ती से प्रतिबंधित करता है। इस कानून के अन्तर्गत, बच्चे अपनी इच्छा से वयस्क होने के दो साल के अन्दर अपने बाल विवाह को अवैध घोषित कर सकते है। किन्तु ये कानून मुस्लिमों पर लागू नहीं होता जो इस कानून का सबसे बड़ी कमी है।  
 
बाल विवाह को रोकने हेतु उपाय?
1.    समाज में जागरूकता फैलाना |
2.   मीडिया इसे रोकने में प्रमुख भागीदारी निभा सकती हैं।
3.    शिक्षा का प्रसार |
4.    ग़रीबी का उन्मूलन |
5.    जहाँ मीडिया का प्रसार ना हो सके वह नुक्कड़ नाटको का आयोजन करना चाहिए।
पैसे ले के लड़कियों कि शादी करवाना
जिस परिवार में ज्यादा खेती और पशुधन होते थे उस घर में एक ओर लड़की के घरवाले अपनी लड़की को वहां देने के लिए डरते थे कि उनकी बेटी उस घर में जा के वहां के काम काज पर बहुत थक जाएगी और कमजोर हो जाएगी तो वहीं दूसरी ओर ये भी सोचते थे कि अगर ऐसे घर में उनकी लड़की जाएगी तो उसके लिए कभी भी अन्न धन की कमी नहीं होगी
और ऐसे घर में देने के लिए लोग पहले जमाने में पैसे लिया करते थे क्योंकि उस समय जिनकी खेती और पशुधन ज्यादा होता था उस घर में लोग अपनी लड़की देने के लिए पैसे लिया करते थे क्योंकि खेती और पशुधन का सारा काम महिलाओं को ही करना होता था लड़कियों को ससुराल आ के बहुत काम करना पड़ता था
कुछ लोग पैसे मांगने की प्रक्रिया को ये भी बताते है कि लड़के पराए घर की होती है और उसका लालन पालन करने में को उसके माता पिता का खर्च आया होता है वो ससुराल वालों द्वारा चुकाया जाता है पर ये अलग अलग कहावत और मान्यता है
 
पुरुषों को शादी के लिए स्वतंत्रता
पहाड़ों में ज्यादा खेती और दूर दूर तक खेती होने के कारण उस समय के पुरुषों को एक से ज्यादा शादी करने कि स्वतंत्रता थी उस समय में पुरुष अनेक शादियां करते थे जिससे महिलाओं को उचित सम्मान नहीं मिल पाता था महिलाओं से थोड़ी बहुत गलती होने पर उनको पुरुषों द्वारा घर से निकाल दिया जाता था और किसी भी महिला को कहीं से भी उठा के ले आते थे जो महिलाओं की मर्जी के बिना भी होता था जिसमे महिलाओं का अपमान होता था महिलाओं को दूसरे घर से आई हुई या रखेल या भज्योड( दूसरे घर से भाग के आई हुई महिला) कहां जाता था
 
(प्रथक राज्य बनने से पहले या बाद का समय)
1(परिवार के लिए महिलाओं की जिम्मेदारी)
उत्तराखंड राज्य बने भले ही उन्नसी साल से भी अधिक का समय होने लगा है. मगर पहाड में ग्रामीण महिलाओं की स्थिति आज भी पहाड जैसी है. या यूं कहा जाएं, यहां महिलाएं सुबह जल्द आने की उम्मीद में जंगलों को निकलती तो हैं, मगर चारा-पत्ती व लकडी के आभाव में देर रात तक घर लौट पाती हैं. उनकी सारी दिनचर्या ही घर की जिम्मेदारी उठाने में ही निकल जाती है.
आधुनिक भारत में उत्तराखंड राज्य के ग्रामीण परिवेश की स्थित आज भी जस की तस है. जिनकी सुरक्षा व विकास को लेकर कहीं मंचों से नारे लगाये जाते हैं तो कहीं महिलाओं की स्थिति को सुधारने के लिये सेमिनारो का आयोजन होता रहता है. इसके बावजूद पहाड के ग्रामीण इलाकों में महिलाओं की स्थिति आज भी जस की तस बनी हुई है. पहाडों में कृषि व सामाजिक आर्थिकी का प्रतिबिम्ब कहीं जाने वाली ग्रामीण महिलाओं की स्थिति बताने के लिये ये दृश्य ही काफी है, जहां हाड़तोड मेहनत कर वे घर परिवार की जिम्मेदारी निभाने की कोशिश करती हैं.
 
2(जंगलों में महिलाओं को खतरा)
उत्तराखंड की महिलाओं को अपने प्रारम्भिक कार्यों जैसे घास लकड़ी पथर मिट्टी पानी इत्यादि के लिए जंगली में या जंगल से हो के जाना पड़ता है जिससे उनको जंगली जानवरो का खतरा अधिक होता है और जंगली रास्तों पर घास या पत्थर ले के जाने में गिरने पर दुर्घटना होने की संभावना अधिक होती है
कई बार तो ये भी स्थिति आई है कि बच्चों से जल्दी आने की बात कह मां जगंल तो गई मगर फिर किसी दुर्घटना का शिकार होकर रह गई. बात चमोली जिले की ही करें तो यहां पिछले एक साल के अंतराल में पांच महिलाओं की जंगल में घास काटने के दौरान मौत हो चुकी है.
 
3(अधिकारियों की लापरवाही या मनमानी)
ग्रामीण महिलाएं कम शिक्षित होने के कारण उनको कोई भी सरकारी काम काज में किसी अन्य से सहायता लेनी पड़ती है जिसके लिए उनको हर किसी व्यक्ति या अधिकारी द्वारा ठगा जाता है उदाहरण के लिए जैसे कोई गरीब परिवार की महिला अपने घर बनवाने के लिए सरकार द्वारा दिए जाने वाला इंद्रा आवाश योजना के तहत पैसे लेती है तो वो पैसे जब ब्लाक से होते हुए उसके पास पहुंचता है तो उसमें से लगभग 30%से40%तक अधिकारियों द्वारा काट लिया जाता है जो एक अनेतिक है ग्रामीण महिलाएं जब मनरेगा के तहत कार्य करने जाति थी तो उनको अशिक्षित होने के कारण काम मजदूरी दी जाति थी या उनकी मजदूरी काट दी जाती थी ग्रामीण क्षेत्रो में महिलाओं का शोषण साहूकार सरकारी अधिकारी करते थे
ग्रामीण महिलाओं की स्थिति को सुधारने के लिये विभिन्न कल्याणकारी योजनायें चलाई जा रही हैं, मगर अधिकारियों की लापरवाही व प्रचार-प्रसार के आभाव में वे इन तक नहीं पहुंच रही है. अगर ऐसा नहीं होता तो शायद इन महिलाओं को सुबह इस तरह से जंगल नहीं जाना पड़ता.
वहीं इस मामले में प्रशासन का कहना है कि महिलाओं की स्थिति को सुधारने के लिये सरकार द्वारा विभिन्न कल्याणकारी योजनायें चलाई जा रही हैं. जिसमें महिलाओं को पुरुषों के बराबर का सम्मान देने के लिए आज सरकार द्वारा महिलाओं के लिए चुनावों में आरक्षित सीट दी जाती है सरकारी नौकरियों में महिलाओं को आरक्षण दिया जाता है जिससे उनको प्रोत्साहन मिले उनके लिए शिक्षा व्यवस्था को बढ़ाने के लिए सरकार द्वारा बहुत से बालिका विद्यालय बनाए है परन्तु फिर भी पहाड़ में अभी महिलाओं को और शसक्त बनने की जरूरत है
 
ग्रामीण समाज में महिलाओं की स्थिति में बदलाव
 
ग्रामीण समाज एक ऐसी पितृ सत्तात्मक सामाजिक व्यवस्था वाली मनोवृत्ति पर विद्यमान है जो मानकर चलती है कि महिलाएँ दोयम दर्जे की नागरिक है तथा उन्हें संपत्ति, स्वास्थ्य, शिक्षा यहीं तक कि स्वयं के शरीर पर प्राकृतिक अधिकार से वंचित कर दिया जाता है ।
 
ग्रामीण समाज की महिलाओं की समस्याएँ कुछ अलग प्रकृति की हैं । ग्रामीण समाज में 90 प्रतिशत महिलाएं खेती पर निर्भर है तथा असंगठित क्षेत्रा में 98 प्रतिशत महिलाएँ है । ग्रामीण महिलाओं को लगातार 16-18 घण्टे कार्य करना पड़ता है ।
 
सुबह आटा पीसने से लेकर रात में बचा हुआ खाने का निवाला खाने तक उन्हें हाड़तोड़ मेहनत करनी पड़ती है । महिलाओं को दिनभर खेत में खपना पड़ता है, पानी लेने के लिए 4-4 मील पैदल जाना पड़ता है, घास काटनी पड़ती है और फिर घर का सारा काम खाना बनाना, बच्चों को पालना उनकी प्रमुख भूमिकाओं में से है फिर भी उनके श्रम को पितृसता महत्वपूर्ण नहीं मानती तथा यह कहते सुना जाता है कि तुम तो घर में पड़ी रहती हो यही मानसिकता महिलाओं को आज तक गरिमा पूर्ण जीवन नहीं दे पाया है ।
आंदोलनों से महिलाओं की भूमिका-
शहरी महिलाएं -
ग्रामीण महिलाएं -
शहरी महिलाओं को आंदोलन से एक सफलता मिली उनको हर जगह अपनी आवाज खोलने और बोलने का अधिकार मिला
महिला आंदोलनों ने महिलाओं की सत्ता में भागीदारी के लिए अपनी आवाज को बुलंद किया जिसके फलस्वरूप 73वां संविधान संशोधन लागू हुआ और पंचायती राज व्यवस्था में एक तिहाई, अब 50 प्रतिशत: महिला आरक्षण का प्रावधन लागू किया गया ।
 
जिसके फलस्वरूप वर्तमान में लगभग 14 लाख महिला जन प्रतिनिधि है । परंतु वास्तविकता में पुरूषों ने यह मौका उनसे छीन लिया तथा पंचायतों में चुनकर आयी महिला जनप्रतिनिधि के अधिकारों का उपयोग उसके पति, पिता अथवा भाइयों द्वारा किया जा रहा है और ग्रामीण महिला आज भी घर की चारदीवारी में अपने पारंपरिक घरेलू कार्य निपटा रही ३ ।
 
ग्रामीण महिलाएं
आज भी ग्रामीण महिलाओं को पुरुषों के समाज में खुल के बोलने का अधिकार नहीं होता है या ये कहें कि अपने आधिकारी के लिए खुल के बोलने नहीं दिया जाता है!आज भी पहाड़ों के कई पिछड़े जगहों पर अभी भी रूढ़िवादी और अंधविश्वास के कारण महिलाओं का शोषण आज भी होता रहता है जबकि आज सम्पूर्ण भारत में महिलाओं के विकास को लेके (बेट बेटी एक समान), (बेटी पढ़ाओ बेटी बचाओ) जैसे नारे लगाए जाते हैं फिर भी पहाड़ कि महिलाएं आज भी पुरुषों के सामने बोलना गलत समझती है उनको लगता है कि जो पुरुषों ने कहा या पुरुषों द्वारा निर्णय लिया गया वह सही है उसमें हस्तक्षेप करना गलत है भालेही पुरुषों द्वारा लिया गया निर्णय गलत ही हो माना जैसे कोई महिला अपनी लड़की की शादी उस घर में नहीं करना चाहती जहां उसके पति द्वारा लड़की कि शादी की का रही है पर वो महिला अपने पति से उस रिश्ते का बहिष्कार नहीं करती है वो चुपचाप सहा लेती है या ये कहें कि वो लड़की जो अपने प्रेम प्रसंग में होने के कारण या किसी और कारण उस परिवार में नहीं जाना चाहिए जहां उसके पिता द्वारा उसका रिश्ता किया होता है पर मजबूरन उसको यह शादी करनी ही पड़ती है जबकि कुछ समय से ये कम देखने को मिल रहा है कि अब लड़की के मर्जी के बिना शादी हो पर कहीं कहीं आज भी ये होता है कि लड़की को अपनी शादी के लिया खुद निर्णय लेने का अधिकार नहीं है महिलाओं के सम्मान के लिए महिलाओं ने कई आंदोलन किया परन्तु महिला आंदोलनों में ग्रामीण महिला की आवाज दबकर रह गयी है । आज जो कुछ भी अधिकार मिल रहे है वे सिर्फ शहरी मध्यम वर्ग की महिलाएं प्राप्त कर रही है तथा संगठित श्रम बाजार में ग्रामीण महिलाएं अनुपस्थित है जिससे वे अपने शोषण व अभय अत्याचार के खिलाफ भी खड़ी नहीं हो पा रही है ।
 
ग्रामीण महिलाओं के स्वास्थ्य. शिक्षा की स्थिति तो सोचनीय है भारत सरकार के मानव संसाधन मंत्रालय की माने तो ग्रामीण क्षेत्रों में लड़कियों की ड्रॉप आउट रेट दर 2007-08 में कक्षा 5 में 24.4 प्रतिशत, कक्षा 8 में 41.3 प्रतिशत तथा कक्षा 10वीं में 57.3 प्रतिशत थी ।
 
ग्रामीण क्षेत्रों में 53 प्रतिशत लड़कियों की शादी 18 साल से पहले हो जाती है । महिलाओं को शिक्षा के पात्र नहीं समझा जाता तथा लड़कियों को स्कूल न भेजने के पीछे सोच यह रहती है कि लड़कियों पढ़कर करेगी क्या उन्हें आखिर में चूल्हा ही तो संभालना है ।
 
अगर स्वास्थ्य की बात करें तो लड़कियों में आज ग्रामीण क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर एनीमिया, कुपोषण अस्वच्छता, खुले में शांच जैसी समस्याएं व्याप्त है । समाज में यह सोच है कि लड़कियाँ कठजीवी होती है वे बीमार होने पर अपने आप ठीक हो जाएगी अतः उनका इलाज नहीं करवाया जाता । जिसका परिणाम यह है कि आज मातृत्व मृत्युदर 212 प्रतिलाख पहुंच चुकी है ।
 
ग्रामीण क्षेत्रों में कई स्थानों पर लड़कियों से देह व्यापार करवाया जाता है । जैसे राजस्थान, म.प्र. में काल-बेडियाँ व साँसी जनजातियों में वैश्यावृत्ति बड़े पैमाने पर प्रचलित है इसके अतिरिक्त संगठित गिरोह द्वारा लड़कियों का अपहरण करके अथवा नौकरी के बहाने बहला-फुसलाकर शहरों में वैश्यावृत्ति में धकेल दिया जाता है ।
 
गृह मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार 2004-05 से 2009 तक 5 हजार लड़कियाँ गायब हुई । पितृ सत्तात्मक सोच भारतीय ग्रामीण समाज में अपने प्रभावी रूप में विद्यमान है । यहां नारी को अपना झूठा सम्मान व इज्जत से जोड़कर देखा जाता है । अतः उसे किसी भी प्रकार की स्वतंत्रता नहीं प्रेम विवाह करने वाली लड़कियों को ‘ऑनर किलिंग’, यानी सम्मान के नाम पर मौत के घाट उतार दिया जाता है ।
 
यहां महिलाओं को अगर कोख से जिंदगी मिल गयी तो जीवन के किसी भी पड़ाव पर उसकी सीसे छीन ली जाती है जिसे हम भ्रूण हत्या, ऑनर किलिंग या दहेज हत्या के रूप में देख सकते है । अन्त में यही कहा जा सकता है कि ग्रामीण महिलाओं की समस्याओं को संवेदन शीलता के साथ समझने की जरूरत है तथा घरेलू हिंसा अधिनियम, संपत्ति के अधिकार के कानूनों से ग्रामीण महिलाओं को जागरूक करने की आवश्यकता है ताकि सदियों से पितृसत्ता की जकड़न से घुट रही ‘स्त्री शक्ति’ को इस सबसे बड़े लोकतंत्र का भाग्य तय करने में अपने अधिकार मिलें । क्योंकि देश की आधी आबादी को सशक्त किए बिना ना तो हम विकास को समावेशी बना सकते और ना ही भारत को महाशक्ति के रूप में देख सकते है, क्योंकि देश की महाशक्ति का रास्ता नारी शक्ति के द्वारा ही तय कर सकते है ।
 
 
 
(महिलाओं की स्थिति में सुधार)
 
महिलाओं के लिए उत्तराखंड राज्य सुरक्षित है। ऐसा हाल ही में महिला एवं बल विकास मंत्रालय की जारी रिपोर्ट के अनुसार बताया गया है।
 
महिला एवं बल विकास मंत्रालय ने प्लान इंडिया की रिपोर्ट सार्वजनिक की, जो उन्होंने महिलाओं की सुरक्षा पर सर्वे के आधार पर बनाई गई है।
महिला एवं बाल विकास की हालिया रिपोर्ट के अनुसार केंद्र शासित दिल्ली और 29 राज्यों में से उत्तराखंड 13वें स्थान पर है।
 
रिपोर्ट के अनुसार महिला स्वास्थ्य और शिक्षा में भी उत्तराखंड ने अच्छा प्रदर्शन किया और इसमें 10वां स्थान प्राप्त किया है। इस सूची में गोवा अव्वल रहा, जबकि दिल्ली और बिहार की स्थित सबसे बदतर है।
 
महिला एवं बल विकास मंत्रालय ने चार कैटेगरी के आधार पर ये रिपोर्ट तैयार की है। महिला सुरक्षा, शिक्षा, स्वास्थ्य और गरीबी। महिला एवं बल विकास मंत्रालय ने रिपोर्ट में इस बात का खुलासा किया है कि महिलाओं की सुरक्षा के लिहाज से उत्तराखंड दिल्ली सहित 30 राज्यों में 13वें स्थान पर है।
 
इस बात का पता लगानों के लिए जेंडर वल्नरेबिलिटी इंडेक्स यानी जीवीआई का इस्तेमाल किया गया है। राज्यों को 0 से 1 के बीच में नंबर दिए गए हैं, यानी जो राज्य 1 नंबर के करीब है, वह सबसे सुरक्षित है और जो शून्य है वह सबसे असुरक्षित की श्रेणी में है।
 
इस रिपोर्ट में उत्तराखंड का जीवीआई 0.576 है। वहीं लोगों के सुरक्षा के मामले में भी उत्तराखंड का जीवीआई पंजाब, केरल, कर्नाटक, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश से कई ज्यादा रहा है।
 
महिलाओं के शिक्षा, स्वास्थ्य एवं जीविका कमाने के मामले में उत्तराखंड ने 10वां स्थान प्राप्त किया है। गरीबी के मामले में उत्तराखंड 14वें नंबर पर रहा। महिलाओं कि सुरक्षा और शिक्षा में कई बडे़ राज्यों से उत्तराखंड रहा है। जिसमें राज्य ने 13वां स्थान प्राप्त कि या है।  
 
महिलाओं की सुरक्षा के लिहाज से गोवा देश में अव्वल है। गोवा का जीवीआई 0.656 है। जो देश के औसत जीवीआई 0.5314 से ज्यादा है। लोगों की सुरक्षा के मामले में भी गोवा देश का नंबर एक राज्य है। सुरक्षा के अलावा गोवा शिक्षा के मामले में पांचवें, स्वास्थ्य में छठे, जीविका कमाने में छठे और गरीबी के मामले में पांचवें नंबर पर है।
 
दिल्ली और बिहार महिलाओं के लिए असुरक्षित
देश की राजधानी दिल्ली और बिहार महिलाओं के लिए बेहद असुरक्षित आंके गए हैं। 30 राज्यों की इस रिपोर्ट में दिल्ली 28वें और बिहार 30वें नंबर पर है। दिल्ली का जीवीआई स्कोर 0.436, जबकि बिहार का 0.410 रहा है।
 
न्याय प्रणाली के अन्तर्गत आजकल बहुत से केश ऐसे है जो बहुत लंबे समय से चलते आ रहे है जैसे महिलाओं के साथ हुए रेप या दहेज ना मिलने पर उनके साथ मार पीट या उनकी हत्या जबरन शादी धोखाधड़ी जैसे जिसके लिए महिलाओं अपने इंसाफ के लिए दर दर भटकती रहती है ऐसा ही एक केश निर्भया है जो लगभग आठ नौ साल से चल रहा है जिसके दोषियों को फासी की सजा है पर वो सजा अभी तक तीन बार टल चुकी है
 
अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं
 
सोनू रावत उत्तराखंडी
ग्राम कुन्हील हीत
जिला अल्मोड़ा
 
== देखिये ==
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