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सतगुरु रविदास जी भारत के उन विशेष महापुरुषों में से एक हैं जिन्होंने अपने आध्यात्मिक वचनों से सारे संसार को एकता, भाईचारा पर जोर दिया। रविदास जी की अनूप महिमा को देख कई राजा और रानियाँ इनकी शरण में आकर भक्ति मार्ग से जुड़े। जीवन भर समाज में फैली कुरीति जैसे जात-पात के अंत (अन्त) के लिए काम किया।
 
रविदास जी के सेवक इनको " '''सतगुरु'''", "'''जगतगुरु'''" आदि नामों से सत्कार करते हैं। रविदास जी की दया दृष्टि से करोड़ों लोगों का उद्धार किया जैसे: [[मीरा बाई]] , जीजाबाई आदि। उनकी पत्नी लोना एक विदुशी महिला थीं। वो एक वैद्य भी थी।आदि
 
== जीवन ==
गुरू रविदास (रैदास) का जन्म [[काशी]] में माघ पूर्णिमा दिन रविवार को संवत 1433 को हुआ था। उनके जन्म के बारे में एक दोहा प्रचलित है। चौदह से तैंतीस कि माघ सुदी पन्दरास। दुखियों के कल्याण हित प्रगटे श्री रविदास।
उनके पिता रग्घु तथा माता का नाम घुरविनिया था। उनकी पत्नी का नाम लोना बताया जाता है।<ref>{{Cite web|url=https://navbharattimes.indiatimes.com/astro/others/today-guru-ravidass-jayanti-is-the-birthday-of-celebrated-on-magh-purnima-73748/|title=Ravidas Jayanti 2020: राम नाम जपने का यह लाभ बताया है संत रविदास ने|last=टाइम्स|first=नवभारत|date=2020-02-09|website=नवभारत टाइम्स|language=hi-IN|access-date=2021-01-15}}</ref> रैदास ने साधु-सन्तों की संगति से पर्याप्त व्यावहारिक ज्ञान प्राप्त किया था। वे जूते बनाने का काम किया करते थे औऱ ये उनका व्यवसाय था और अपना काम पूरी लगन तथा परिश्रम से करते थे और समय से काम को पूरा करने पर बहुत ध्यान देते थे। <ref name=":0">{{Cite web|url=https://news.jagatgururampalji.org/guru-ravidas-jayanti-2020-hindi/|title=Guru Ravidas Jayanti 2020 [Hindi]: जीवनी, कौन थे संत रविदास जी के गुरु?|date=2020-02-07|website=S A NEWS|language=en-US|access-date=2021-02-03}}</ref>संत रामानन्द के शिष्य बनकर उन्होंने आध्यात्मिक ज्ञान अर्जित किया। संत रविदास जी ने स्वामी रामानंद जी को कबीर साहेब जी के कहने पर गुरु बनाया था, जबकि उनके वास्तविक आध्यात्मिक गुरु कबीर साहेब जी ही थे।<ref name=":0" /> उनकी समयानुपालन की प्रवृति तथा मधुर व्यवहार के कारण उनके सम्पर्क में आने वाले लोग भी बहुत प्रसन्न रहते थे। प्रारम्भ से ही रविदास जी बहुत परोपकारी तथा दयालु थे और दूसरों की सहायता करना उनका स्वभाव बन गया था। साधु-सन्तों की सहायता करने में उनको विशेष आनन्द मिलता था। वे उन्हें प्राय: मूल्य लिये बिना जूते भेंट कर दिया करते थे। उनके स्वभाव के कारण उनके माता-पिता उनसे अप्रसन्न रहते थे। कुछ समय बाद उन्होंने रविदास तथा उनकी पत्नी को अपने घर से भगा दिया। रविदास पड़ोस में ही अपने लिए एक अलग इमारत बनाकर तत्परता से अपने व्यवसाय का काम करते थे और शेष समय ईश्वर-भजन तथा साधु-सन्तों के सत्संग में व्यतीत करते थे।
 
== स्वभाव ==
*मन ही पूजा मन ही धूप ,मन ही सेऊँ सहज सरूप
*'''<nowiki/>'ऐसा चाहूं राज मैं''', जहां '''मिले''' सबन को '''अन्न''', छोट-बड़ो सब सम बसे, रविदास रहे प्रसन्न'
*'''<nowiki/>'''रविदासबाभन मत पूजिए जो हो गुन हीन, ूजिए प
*'''<nowiki/>''' चरण चांडाल को जो ह-ुए गुण - प्रवीण।प्रवीण
 
== संदर्भ ==
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