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जो दूसरों के [[बाल]] काटता एवं सवांरता है उसे '''नाई''' (barber) कहते हैं। [[भारत]] में यह एक [[जाति]] भी है जिसके सदस्य मुख्यत: बाल काटने एवं [[संस्कार|हिन्दू संस्कारों]] में मुख्य सहायक का काम करते आये हैं।
 
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{{clear}}'''नाई- उत्पत्ति, इतिहास एव वर्तमान'''
 
यह लेख विभिन्न एतिहासिक और वेब स्रोतो और कुछ आप मित्रो से प्राप्त जानकारी के आधार पर है . कमेट हमेशा स्वागत योग्य है। पूरे भारत मे न्यायी/नाई जाति के बारे मे कई व्यावहारिक विभिन्न्ताए है। इनमे एकरूपता लाने एव एक व्यापक एव सटीक द्रष्टि बनाने के लिये यह लेख लिखा जा रहा है
 
१- ब्राह्मण या पंडित जाति दक्षिण भारत में ३ प्रोफेशन मे बटी है
 
१ - आयुर्वेद डोक्टर
 
२ - मंदिर सगीतज्ञ
 
३ - न्यायी / नाई ( बाल काटने वाले )
 
इस वर्गीकरण के ही आधार पर ब्राह्मण - न्यायी / नाई समुदाय उपजा . ब्राह्मण - न्यायी / नाई समुदाय का कुलगुरु धनवन्तरि को माना जाता है .
 
२- क्षत्रिय या यदुवंशी लोग उत्तर भारत मे क्षत्रिय -न्यायी/नाई के रूप मे उभरे जिसका नेतत्व भारत के प्रथम चक्रवर्ती सम्राट महापदम नन्द द्वारा हुआ माना जाता है, इस प्रकार , संपूर्ण भारत मे हिन्दू न्यायी जाति के इतिहास की जाच - पडताल करने पर पाया गया कि इसकी उपस्थिति ४ ( ब्राह्मण , क्षत्रिय , वैश्य , शूद्र ) मे से २ ( ब्राह्मण व क्षत्रिय ) वर्गों मे है
 
१ - ब्राह्मण न्यायी
 
२ - क्षत्रिय न्यायी
 
 
 
उत्तर भारतीय न्यायी " क्षत्रिय- न्यायी " है जबकि दक्षिण भारतीय न्यायी , " ब्राह्मण -न्यायी ” है .
 
'''स्रोत''' -------
 
1 - मुद्रा राक्षस
 
2 - वेद , पुराण
 
3 - इन्टरनेट ( विभिन्न द्रश्य व श्रव्य सामग्री सहित )
 
4 - उत्तर व दक्षिण भारतीय मित्र
 
5 - भारतीय प्राचीन इतिहास एव इसकी विभिन्न पाठ्य पुस्तके
 
'''१--दक्षिण भारतीय न्याय''' - "ब्राह्मण- न्याय" दरअसल, प्राचीन काल मे लोग बाल कटवाने का नहीं बल्कि उन्हें लंबे समय तक बडा करके रखने का शौक रखते थे। ऐसे मे बाल काटने वालो की यदा-कदा केवल जरूरत पडती होगी या फिर यू कहे कि उस समय नाई जाति का ही अस्तित्व नहीं था लेकिन कुछ लोग थे जो अपने पास कैंची आदि रखते हुए लोगो के घायलावस्था मे उनके बालो की सफाई करके मरहम - पट्टी का कार्य किया करते थे। ये लोग राजा के महल में ज्यादातर अपनी सेवा देते थे और इन्हे आयुर्वेदिक या सिद्धा डॉक्टर कहा जाता था। उनके परम गुरु धनवन्तरि और चरक ही थे। ब्रिटिश काल मे, एलोपैथी चिकित्सा आने, शिक्षा को बढावा मिलने और बालो को कटवाने का फैशन बन जाने के कारण ये डोक्टरो का विभाजन २ भागों मे हो गए हैं - शिक्षित सेक्टर एवं अशिक्षित डॉक्टर - समय बीतने के साथ रये अशिक्षित डॉक्टर "नाई" कहलाए जा रहे हैं।
 
'''२-उत्तर भारतीय न्यायी-'''"क्षत्रिय - न्यायी" महापदम नन्द - नाई (न्यायी) और उनकी यादव - पत्नी की सताने "नन्द" वही महापद्म नन्द - नाई (न्यायी) और उनकी मुरा - पत्नी सतान "मौर्य 'के रूप में जाने जाने लगे। उत्तर - मध्य भारत में निवास करने वाला अलाई (न्यायी) समुदाय की उत्पत्ति "युगपुरुष" चक्रवर्ती सम्राट 'एकक्षत्र' महाराज श्री महापदम नन्द जी से हुई है। इसीलिए दक्षिण भारत को छोड़कर भारत वर्ष के अन्य भागों में रहने वाला यह समुदाय मूल क्षत्रिय पृष्ठभूमि का चन्द्रवंशीय क्षत्रिय (नन्द क्षत्रिय) है"
 
'''नाई " या " न्यायी " --''' ' नाई " शब्द की उत्पत्ति संस्कृत भाषा के ' नाय ' से मानी गयी है , जिसका हिन्दी अर्थ है- नेतृत्व करने वाला अर्थात् वह जो समाज का नेतृत्व करे या न्यायी - न्याय करे । " नाई " जाति क्षत्रिय वर्ण की चन्द्रवंश शाखा के अन्तर्गत वर्गीकृत है और वैदिक क्षत्रिय है , जो वैदिक कालीन शासक जाति है । इस जाति के अनेक महान सम्राट , राजा , मंत्री , योद्धा , वीर रक्षक , अंगरक्षक , प्रसिद्ध वैध्य , पंडित ( विद्वान ) , ऋषि , सन्त , योगी , आचार्य आदि श्रेष्ठ व्यक्तित्व रहे हैं । आज हमारा शिक्षित व्यक्ति अशिक्षित एव असभ्य ( barber ) शब्द " नाई " को प्रयोग हेतु बाध्य है।
 
'''वर्ण और जाति--''' वर्ण का अर्थ रंग है और इसी रंग के आधार पर हिन्दू समाज प्रारंभ में बंटा था जैसे गोरा रंग - पंडित रंग - क्षत्रिय रंग - वैश्य काला रंग - शूद्र जब गोरे के परिवार में काले और काले के परिवार मे गोरे पैदा हुए तो नई समस्या पैदा हुई। वह यह कि पंडित अपने काले बच्चे को समय बीतने के साथ रंग के आधार पर यह विभाजन काम न आया तो जातियो की आवश्यकता महसूस हुई जो बिना कोई शिकायत किये जन्म - जन्मान्तर तक कार्य कर सके। इसीलिये जातियो की स्थिति म्रत्युपर्यंत नही बदलती।
 
'''गोत्र (टाइटल) --''' निष्कर्षतः हम पूरे भारत मे ब्राह्मण प्रथम है और क्षत्रिय बाद मे क्योकि पूरे भारत मे पूजा - पाठ करने वाले ब्राह्मणो का मुख्य सहयोगी , नाई ही रहा है जबकि . शिक्षा के आधार पर केवल हम नाई नही हो सकते है और कर्म एव रग के आधार पर शूद्र नही हो सकते क्योकि शिक्षा आज लगभग हर नाई परिवार ले रहा है वही कर्म एव रग के आधार पर शूद्र माना जाना कही से भी तार्किक नही है। पूजा - पाठ कराना सेवा क्षेत्र का विषय है जो शूद्र की ओर इशारा करता है जिसे पडित स्वय को कभी स्वीकार नही कर सकता है तो हम किस आधार पर इसे स्वीकार करे , यही बात रग पर लागू होती डॉक्टर वर्ग या अग्रेजी शासन हमे एक नई नाई जाति नही दे सकता क्योकि आज इस देश मे अग्रेजी शासन रहा नही और डॉक्टर वर्ग ने जाति की जगह पेशे का रूप धारण किया है। देश तो आजाद हो गया परन्तु नाई जाति शिक्षा के अभाव आज तक आजादी नही पा सकी .जो जाति हिन्दू धर्म के निर्माण के समय बनी ही नही , उसको क्यो स्वीकारा जायेे।
 
१- दुबे , द्विवेदी , त्रिवेदी , त्रिपाठी , पाठक , चौबे , चतुर्वेदी , शर्मा , पडित , ब्राह्मण , राय , दीक्षित
 
२- श्रीवास्तव, श्रीवास , सविता , नाई , नाऊ , नउआ , सेन , नन्द , नन्दा , ठाकुर , राजौरिया , नीबोरिया , मथुरिया , वर्मा , शर्मा , प्रधान ,
 
३ - तेली , गान्धी , राठोर , मोदी आदि
 
==सन्दर्भ==
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