सोला स्क्रिप्तूरा (Sola Scriptura) ईसाई पंथ के कुछ पंथों की यह मान्यता है कि पंथ में केवल वही मान्य होना चाहिये जो ईसाई र्ग्रथ बाइबिल में लिखा गया है और इस से अलग किसी मानव या पुस्तक द्वारा जो भी कहा गया है वह अधिकारिक नहीं माना जा सकता।[1][2] ईसाई पंथ के विकास में समय के साथ-साथ कई परम्पराएँ जुड़ गई थी, जैसे कि कैथोलिक पंथ में प्रत्येक पोप ने कई नियम बानाए व घोषणाएँ की जिनका पालन करा जाता था। जब प्रोटेस्टैंट पंथ उभरा तो उसकी कई शाखाओं ने सोला स्क्रिप्तूरा के सिद्धांत को बढ़ावा दिया जिसमें पोप द्वारा कही बातो को अमान्य ठहराया गया और केवल बाइबिल को ही माना गया। इस बात को लेकर वर्तमान तक कैथोलिक और प्रोटेस्टैंट अनुयायी आपस में गहरा मतभेद रखते हैं।[3][4]

मार्टिन लूथर (१४८३ - १५४६) एक प्रोटेस्टैंट पादरी थे जो कैथोलिक पंथ की निन्दा करते थे और सोला स्क्रिप्तूरा पर विश्वास करते थे

इन्हें भी देखेंसंपादित करें

सन्दर्भसंपादित करें

  1. Humphrey, Edith M. (2013). Scripture and Tradition: What the Bible Really Says. Grand Rapids, Michigan: Baker Academic. ISBN 978-1-4412-4048-4.
  2. Johnson, Alan F.; Webber, Robert E. (1993) [1989]. What Christians Believe: An Overview of Theology and Its Biblical and Historical Development. Grand Rapids, Michigan: Zondervan. ISBN 978-0-310-36721-5.
  3. Armstrong, Dave (2004). The Catholic Verses: 95 Bible Passages That Confound Protestants. Manchester, New Hampshire: Sophia Institute Press. ISBN 978-1-928832-73-7.
  4. Mathison, Keith A. (2001). The Shape of Sola Scriptura "संग्रहीत प्रति". मूल से पुरालेखित 20 नवंबर 2017. अभिगमन तिथि 19 फ़रवरी 2019.सीएस1 रखरखाव: BOT: original-url status unknown (link). Moscow, Idaho: Canon Press. ISBN 978-1-885767-74-5.