सौर पाल (solar sail), जिसे प्रकाश पाल (light sail) या फ़ोटोन पाल (photon sail) भी कहते हैं सौर प्रकाश को बड़े दर्पणों से किसी अंतरिक्ष यान पर लगे बड़े आकार के परावर्तक पाल पर दाग़कर उस से बनने बाले विकिरण दाब द्वारा करे गये अंतरिक्ष यान प्रणोदन (गतिमान करने की क्रिया) को कहते हैं। जिस प्रकार कोई पालनौका पवन के प्रहार से चल पड़ती है, उसी प्रकार विचार है कि अंतरिक्ष यानों को प्रकाश के प्रहार से चलाया जा सकता है। वैज्ञानिकों की सोच है कि इस सिद्धांत से बनाये गये यानों पर ख़र्च कम होगा क्योंकि उन्हें अपने साथ ईन्धन ले जाने की आवश्यकता नहीं होगी। कुछ प्रस्तावों में सौर प्रकाश के स्थान पर पथ्वी या चंद्रमा पर लेज़र किरणों का स्रोत लगाकर उन्हें पाल पर चमकाने का सुझाव दिया गया है।[1]

सन् २०१० में जापान के इकारोस (IKAROS) अंतरिक्ष यान का उसके सौर पाल के साथ काल्पनिक चित्रण
एक नासा अभियांत्रिक के हाथ में कार्बन रेशे से बना सौर पाल का टुकड़ा - यह इतना पतला है कि इसके एक वर्ग मीटर का भार केवल 3.4 ग्राम है

पृथ्वी की कक्षा के पास स्थित ८०० मीटर चौड़े और ८०० मीटर लम्बे सौर पाल पर सूरज की किरणों का बल लगभग ५ न्य्यूटन के बराबर पड़ेगा। यह एक हल्का बल है। लेकिन जहाँ आज के राकेट कुछ अरसे तक चलकर ईन्धन समाप्त होने पर रुक जाते हैं वहाँ सौर पाल यान को महीनों, वर्षों, दशकों या शताब्दियों तक लगातार अधिक गतिशील कर सकता है। विकिरण दाब एक वास्तविकता है और बिना पाल वाले अंतरिक्ष यानों पर भी इसका प्रभाव स्पष्ट देखा जा सकता है।[2]

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इन्हें भी देखेंसंपादित करें

सन्दर्भसंपादित करें

  1. NanoSail-D mission: Dana Coulter, "NASA to Attempt Historic Solar Sail Deployment Archived 11 फ़रवरी 2009 at the वेबैक मशीन.", NASA, June 28, 2008
  2. G. Vulpetti, Fast Solar Sailing: Astrodynamics of Special Sailcraft Trajectories, Space Technology Library Vol. 30, Springer, August 2012, (Hardcover) [1], (Kindle-edition), ASIN: B00A9YGY4I