अंगिका भाषा

भारत और नेपाल की एक भाषा

अंगिका एक भाषा है जो बिहार के पूर्वी, उत्तरी व दक्षिणी भागों, झारखण्ड के उत्तर पूर्वी भागों और पं. बंगाल के पश्छिम भागों में बोली जाती है जिसमें गोड्डा, साहिबगंज, पाकुड़, दुमका, देवघर, कोडरमा, गिरिडीह जैसे जिले सम्मिलित हैं। यह भाषा बिहार के भी पूर्वी भाग में बोली जाती है जिसमें भागलपुर, मुंगेर, खगड़िया, बेगूसराय, पूर्णिया, कटिहार, अररिया आदि सम्मिलित हैं। यह नेपाल के तराई भाग में भी बोली जाती है। अंगिका भारतीय आर्य भाषा है।[कृपया उद्धरण जोड़ें]

अंगिका भाषा
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बोली जाती है भारत, नेपाल
क्षेत्र बिहार, झारखण्ड, पश्चिम बंगाल
कुल बोलने वाले 743,600 [1]
भाषा परिवार हिन्द-यूरोपीय
भाषा कूट
ISO 639-1 bh (बिहारी)
ISO 639-2 anp
ISO 639-3 anp
Indic script
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भाषा परिवारसंपादित करें

अंगिका हिन्द-यूरोपीय भाषा-परिवार परिवार के अन्दर आती है। ये हिन्द आर्य उपशाखा के अन्तर्गत वर्गीकृत है। हिन्द-आर्य भाषाएँ वो भाषाएँ हैं जो संस्कृत से उत्पन्न हुई हैं। उर्दू, कश्मीरी, बंगाली, उड़िया, पंजाबी, रोमानी, मराठी, मैथिली, नेपाली जैसी भाषाएँ भी हिन्द-आर्य भाषाएँ हैं।

'अंगिका' शब्द की व्युत्पत्तिसंपादित करें

अंगिका शब्द अंग से बना है। अंगप्रदेश (वर्तमान में भागलपुर के आस पास का क्षेत्र) में बोली जाने वाली भाषा को अंगिका नाम दिया गया। अंगिका को लोग छेछा के नाम से भी जानते हैं।[कृपया उद्धरण जोड़ें]

अंगिका सिनेमासंपादित करें

अंगिका भाषा में निर्मित पहली फ़िल्म खगड़िया वाली भौजी (फ़िल्म) 2007 को बिहार में प्रदर्शित किया गया। सुनील छैला बिहारी ने नई अंगिका फ़िल्म बनाने के बारे में सोच रहें हैं। वो जब बांका आये थे तो उन्होंने इस विषय पर दैनिक जागरण से बातचीत की थी। उन्हों ने कहा था की लोगो के समक्ष अंगिका के अश्लील चलचित्र और संगीत परोसा जा रहा है जिससे अंगिका की छवि ख़राब हो रही है। उन्होंने अश्लील संगीत बनाने वालों पर निशाना साधा था। एक नई फ़िल्म अंग पुत्र अप्रैल 2010 को प्रदर्शित हुई थी, जसमे अंगिका के लोक गीत में माहिर सुनील छैला बिहारी जी ने मुख्य भूमिका निभाया था।

स्रोतसंपादित करें

  1. "संग्रहीत प्रति". मूल से 21 मार्च 2018 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 8 जुलाई 2018.

इन्हें भी देखेंसंपादित करें

  • अंग लिपि अंगिका प्राचीन अंग महाजनपद अर्थात् भारत के उत्तर-पूर्वी एवं दक्षिण बिहार, झारखंड, बंगाल, असम, उड़ीसा और नेपाल के तराई के इलाक़ों में मुख्य रूप से बोली जाने वाली भाषा है। लगभग चार से पाँच करोड़ लोग अंगिका भाषा को मातृभाषा के रूप में प्रयोग करते हैं। यह प्राचीन भाषा कम्बोडिया, वियतनाम, मलेशिया आदि देशों में भी प्राचीन समय से बोली जाती रही है। प्राचीन समय में अंगिका भाषा की अपनी एक अलग 'अंग लिपि' भी थी।
  • नामकरण प्राचीन अंग प्रदेश की भाषा को 'अंगिका' कहा जाता है। अंगिका भाषी भारत में लगभग सात लाख लोग हैं। इस भाषा का नाम 'भागलपुरी' इसकी स्थानीय राजधानी के कारण पड़ा। इसके अलावा अंगिका को 'अंगी', 'अंगीकार', 'चिक्का चिकि' और 'अपभ्रन्षा' भी कहा जाता है। अंगिका की उपभाषाएं हैं- 'देशी', 'दखनाहा', 'मुंगेरिया', 'देवघरिया', 'गिध्होरिया', 'धरमपुरिया'। अक्सर भाषा का नामकरण उसके बोले जाने के स्थान से होता है, यही हम यहाँ भी देखते हैं। बोलने वालों की संख्या अंगिका 'आर्य-भाषा परिवार' की सदस्य है और भाषाई तौर पर बांग्ला, असमिया, उड़िया और नेपाली, ख्मेर भाषा से इसका काफ़ी निकट संबंध है। प्राचीन अंगिका के विकास के शुरुआती दौर को 'प्राकृत' और 'अपभ्रंश' के विकास से जोड़ा जाता है। लगभग 4 से 5 करोड़ लोग अंगिका को मातृ-भाषा के रूप में प्रयोग करते हैं और इसके प्रयोगकर्ता भारत के विभिन्न हिस्सों सहित विश्व के कई देशों मे फैले हुए हैं। साहित्यिक भाषा भारत की अंगिका को साहित्यिक भाषा का दर्जा हासिल है। अंगिका साहित्य का अपना समृद्ध इतिहास रहा है और आठवीं शताब्दी के कवि 'सरह' या 'सरहपा' को अंगिका साहित्य में सबसे ऊँचा दर्जा प्राप्त है। सरहपा को हिन्दी एवं अंगिका का आदि कवि माना जाता है। 'भारत सरकार' द्वारा अंगिका को जल्द ही भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में भी शामिल किया जाएगा। संकटग्रस्त भाषा आज विश्व में बहुतेरी भाषाएँ मरने के कगार पर हैं। 96 प्रतिशत भाषाएँ मात्र चार प्रतिशत आबादी द्वारा बोली जाती हैं। 500 भाषाओं को बोलने वालों की संख्या 100 ही है; 1500 भाषाओं को 1000 से कम लोग बोलते हैं और 5000 भाषाओं को 100,000 से कम बोलने वाले ही हैं। धीरे-धीरे एक के बाद एक मरते जा रहे हैं। न केवल भाषाएँ मरती हैं; एक भाषा के साथ सामुदायिक इतिहास, बौद्धिक और सांस्कृतिक विविधता, सांस्कृतिक पहचान भी मर जाती है। यह क्षति सबकी क्षति है; एक तरह से स्थायी क्षति। क़रीब 3000 भाषाएँ अगले 100 साल में मर जाएँगी। हर दो सप्ताह में एक भाषा मर रही है। जितनी अधिक विविधता है, उतना ही अधिक खतरा है। और इसलिए भारतीय भाषाएँ भी उसकी जद में है। 197 भाषाएँ भारत में मरने के कगार पर हैं और उनमें से एक है 'अंगिका'। हालाँकि अंगिका मुश्किल में दिखती है, लेकिन स्थिति विकट नहीं है। बहुतेरे क्षेत्र में काम हो रहे हैं। अंगिका में साहित्य उपलब्ध है। लोग लिख रहे हैं। कुछेक फ़िल्में भी बनी हैं। शब्दकोश आदि भी तैयार किए गए हैं। लेकिन इस बदलते परिवेश में सबसे ज़रूरी है, अंगिका को सूचना-प्रौद्योगिकी के पटल पर लाना, जिससे डिजिटल युग में हम अंगिका की मौजूदगी को रेखांकित कर सकें।

बाहरी कड़ियाँसंपादित करें

अंग महाजनपदसंपादित करें

अंग एक बहुविकल्पी शब्द है अन्य अर्थों के लिए देखें:- अंग (बहुविकल्पी)

अंग महाजनपद अंग देश या 'अंग महाजनपद' प्राचीन जनपद था, जो बिहार राज्य के वर्तमान भागलपुर और मुंगेर ज़िलों का समवर्ती था। अंग की राजधानी चंपा थी। आज भी भागलपुर के एक मुहल्ले का नाम चंपानगर है। महाभारत की परंपरा के अनुसार अंग के वृहद्रथ और अन्य राजाओं ने मगध को जीता था, पीछे बिंबिसार और मगध की बढ़ती हुई साम्राज्य लिप्सा का वह स्वयं शिकार हुआ। राजा दशरथ के मित्र लोमपाद और महाभारत के अंगराज कर्ण ने वहाँ राज किया था। बौद्ध ग्रंथ 'अंगुत्तरनिकाय' में भारत के बुद्ध पूर्व सोलह जनपदों में अंग की गणना हुई है।

विषय सूचीसंपादित करें

  • 1 इतिहास
    • 1.1 वैदिक काल में
    • 1.2 मौर्य काल में
    • 1.3 पौराणिक वर्णन
  • 2 टीका टिप्पणी और संदर्भ
  • 3 संबंधित लेख

इतिहाससंपादित करें

अंग देश का सर्वप्रथम नामोल्लेख अथर्ववेद 5,22,14 में है-

'गंधारिभ्यं मूजवद्भयोङ्गेभ्यो मगधेभ्य: प्रैष्यन् जनमिव शेवधिं तवमानं परिदद्मसि।'

इस अप्रशंसात्मक कथन से सूचित होता है कि अथर्ववेद के रचनाकाल (अथवा उत्तर वैदिक काल) तक अंग, मगध की भांति ही, आर्य-सभ्यता के प्रसार के बाहर था, जिसकी सीमा तब तक पंजाब से लेकर उत्तर प्रदेश तक ही थी। महाभारतकाल में अंग और मगध एक ही राज्य के दो भाग थे। शांति पर्व 29,35 (अंगं बृहद्रथं चैव मृतं सृंजय शुश्रुम') में मगधराज जरासंध के पिता बृहद्रथ को ही अंग का शासक बताया गया है। शांति पर्व 5,6-7 ('प्रीत्या ददौ स कर्णाय मालिनीं नगरमथ, अंगेषु नरशार्दूल स राजासीत् सपत्नजित्। पालयामास चंपां च कर्ण: परबलार्दन:, दुर्योधनस्यानुमते तवापि विदितं तथा') से स्पष्ट है कि जरासंध ने कर्ण को अंगस्थित मालिनी या चंपापुरी देकर वहां का राजा मान लिया था। तत्पश्चात् दुर्योधन ने कर्ण को अंगराज घोषित कर दिया था।

वैदिक काल मेंसंपादित करें

वैदिक काल की स्थिति के प्रतिकूल, महाभारत के समय, अंग आर्य-सभ्यता के प्रभाव में पूर्णरूप से आ गया था और पंजाब का ही एक भाग- मद्र- इस समय आर्यसंस्कृति से बहिष्कृत समझा जाता था। महाभारत के अनुसार अंगदेश की नींव राजा अंग ने डाली थी। संभवत: ऐतरेय ब्राह्मण 8,22 में उल्लिखित अंग-वैरोचन ही अंगराज्य का संस्थापक था। जातक-कथाओं तथा बौद्धसाहित्य के अन्य ग्रन्थों से ज्ञात होता है कि गौतमबुद्ध से पूर्व, अंग की गणना उत्तरभारत के षोडश जनपदों में थी। इस काल में अंग की राजधानी चंपानगरी थी। अंगनगर या चंपा का उल्लेख बुद्धचरित 27, 11 में भी है। पूर्वबुद्धकाल में अंग तथा मगध में राज्यसत्ता के लिए सदा शत्रुता रही। जैनसूत्र- उपासकदशा में अंग तथा उसके पड़ोसी देशों की मगध के साथ होने वाली शत्रुता का आभास मिलता है। प्रज्ञापणा-सूत्र में अन्य जनपदों के साथ अंग का भी उल्लेख है तथा अंग और बंग को आर्यजनों का महत्त्वपूर्ण स्थान बताया गया है। अपने ऐश्वर्यकाल में अंग के राजाओं का मगध पर भी अधिकार था जैसा कि विधुरपंडितजातक (काँवेल 6, 133) के उस उल्लेख से प्रकट होता है जिसमें मगध की राजधानी राजगृह को अंगदेश का ही एक नगर बताया गया है। किंतु इस स्थिति का विपर्यय होने में अधिक समय न लगा और मगध के राजकुमार बिंबिसार ने अंगराज ब्रह्मदत्त को मारकर उसका राज्य मगध में मिला लिया। बिंबिसार अपने पिता की मृत्यु तक अंग का शासक भी रहा था।

मौर्य काल मेंसंपादित करें

जैन-ग्रंथों में बिंबिसार के पुत्र कुणिक अजातशत्रु को अंग और चंपा का राजा बताया गया है। मौर्यकाल में अंग अवश्य ही मगध के महान् साम्राज्य के अंतर्गत था। कालिदास ने रघु. 6,27 में अंगराज का उल्लेख इंदुमती-स्वयंवर के प्रसंग में मगध-नरेश के ठीक पश्चात् किया है जिससे प्रतीत होता है कि अंग की प्रतिष्ठा पूर्वगुप्तकाल में मगध से कुछ ही कम रही होगी। रघु. 6, 27 में ही अंगराज्य के प्रशिक्षित हाथियों का मनोहर वर्णन है- 'जगाद चैनामयमंगनाथ: सुरांगनाप्रार्थित यौवनश्री: विनीतनाग: किलसूत्रकारैरेन्द्रं पदं भूमिगतोऽपि भुंक्ते'। विष्णु पुराण अंश 4, अध्याय 18 में अंगवंशीय राजाओं का उल्लेख है। कथासरित्सागर 44, 9 से सूचित होता है कि ग्यारहवीं शती ई. में अंगदेश का विस्तार समुद्रतट (बंगाल की खाड़ी) तक था क्योंकि अंग का एक नगर विटंकपुर समुद्र के किनारे ही बसा था।

पौराणिक वर्णनसंपादित करें

महाभारत ग्रन्थ में प्रसंग है कि हस्तिनापुर में कौरव राजकुमारों के युद्ध कौशल के प्रदर्शन हेतु आचार्य द्रोण ने एक प्रतियोगिता का आयोजन किया। अर्जुन इस प्रतियोगिता में सर्वोच्च प्रतिभाशाली धनुर्धर के रूप में उभरा। कर्ण ने इस प्रतियोगिता में अर्जुन को द्वन्द युद्घ के लिए चुनौती दी। किन्तु कृपाचार्य ने यह कहकर ठुकरा दिया कि कर्ण कोई राजकुमार नहीं है। इसलिए इस प्रतियोगिता में भाग नहीं ले सकता। तब दुर्योधन ने कर्ण को अंग देश का राजा घोषित कर दिया था।