आल्हा मध्यभारत में स्थित ऐतिहासिक बुंदेलखण्ड के सेनापति थे और अपनी वीरता के लिए विख्यात थे। आल्हा के छोटे भाई का नाम ऊदल था और वह वीरता में अपने भाई से बढ़कर ही थें। जगनेर के राजा जगनिक ने आल्ह-खण्ड नामक एक काव्य रचा था उसमें इन दोनों वीरों की 52 लड़ाइयों की गाथा वर्णित है।[1]

वीर चन्द्रवंशी आल्हा

ऊदल ने अपनी मातृभूमि की रक्षा हेतु पृथ्वीराज चौहान से युद्ध करते हुए ऊदल वीरगति प्राप्त हुए । आल्हा अपने छोटे भाई की वीरगति की खबर सुनकर अपना आपा खो बैठे और पृथ्वीराज चौहान की सेना पर मौत बनकर टूट पड़े आल्हा के सामने जो आया मारा गया । लगभग एक घंटे के घनघोर युद्ध की के बाद पृथ्वीराज चौहान और आल्हा आमने-सामने थे, दोनों में भीषण युद्ध हुआ, पृथ्वीराज चौहान बुरी तरह घायल हुए आल्हा के गुरु गोरखनाथ के कहने पर आल्हा ने पृथ्वीराज चौहान को जीवनदान दिया और बुंदेलखंड के महा-योद्धा आल्हा ने नाथ पंथ स्वीकार कर लिया ।

आल्हा चंदेल राजा परमर्दिदेव (परमल के रूप में भी जाने-जाते हैं) के एक महान सेनापति थे, जिन्होंने 1182 ई० में पृथ्वीराज चौहान से लड़ाई लड़ी, जो आल्हा-खांडबॉल में अमर हो गए।

उत्पत्ति

आल्हा और ऊदल, चंदेल राजा परमल के सेनापति दसराज के पुत्र थे। वे बनाफर वंश के थे, जो कि चंद्रवंशी क्षत्रिय समुदाय है। मध्य-काल में आल्हा-ऊदल की गाथा राजपूत शौर्य का प्रतीक दर्शाती है। [2]

आल्हा-उदल के माता-पिता को लेकर गाथा में कोई विकल्प नहीं मिलता। दोनों दसराज (जसराज) और दिवला (देवल दे) के पुत्र हैं। कन्नौजी पाठ के अनुसार आल्हा का जन्म दशपुरवा (दशहर पुर, महोबा की सीमा पर एक छोटा-सा गाँव) में हुआ था। आल्हा की जन्म तिथि जेठी दशहरा बताई जाती है। आल्हा से ऊदल लगभग बारह वर्ष छोटा था। पिता की हत्या के बाद उसका जन्म हुआ था। [3] ग्रियर्सन के अनुसार बनाफरो की पत्नियाँ मूलतः अच्छे परिवारों की थीं। बाद में उन्हें अहीर कहा गया। कदाचित् माहिल ने बैर भाव से यह अफवाह फैला दी हो। महोबा में, विवाह-संबंधों के संदर्भ में बनाफर "ओछी जात के राजपूत" कहे गए हैं।।[4]

पं० ललिता प्रसाद मिश्र ने अपने ग्रन्थ आल्हखण्ड की भूमिका में आल्हा को युधिष्ठिर और ऊदल को भीम का साक्षात अवतार बताते हुए लिखा है - "यह दोनों वीर अवतारी होने के कारण अतुल पराक्रमी थे। ये प्राय: १२वीं विक्रमीय शताब्दी में पैदा हुए और १३वीं शताब्दी के पुर्वार्द्ध तक अमानुषी पराक्रम दिखाते हुए वीरगति को प्राप्त हो गये। ऐसा प्रचलित है की ऊदल की पृथ्वीराज चौहान द्वारा हत्या के पश्चात आल्हा ने संन्यास ले लिया और जो आज तक अमर है और गुरु गोरखनाथ के आदेश से आल्हा ने पृथ्वीराज को जीवनदान दे दिया था, पृथ्वीराज चौहान के परम मित्र संजम भी महोबा की इसी लड़ाई में आल्हा उदल के सेनापति बलभद्र तिवारी जो कान्यकुब्ज और कश्यप गोत्र के थे उनके द्वारा मारा गया था । वह शताब्दी वीरों की सदी कही जा सकती है और उस समय की अलौकिक वीरगाथाओं को तब से गाते हम लोग चले आते हैं। आज भी कायर तक उन्हें (आल्हा) सुनकर जोश में भर अनेकों साहस के काम कर डालते हैं। यूरोपीय महायुद्ध में सैनिकों को रणमत्त करने के लिये ब्रिटिश गवर्नमेण्ट को भी इस (आल्हखण्ड) का सहारा लेना पड़ा था।"[5]

सन्दर्भ

  1. मिश्र, पं० ललिता प्रसाद (2007). आल्हखण्ड (15 संस्करण). पोस्ट बॉक्स 85 लखनऊ 226001: तेजकुमार बुक डिपो (प्रा०) लि०. पृ॰ 1-11 ( महोबे का इतिहास). पाठ "आल्हा ने 52 लड़ाईयां लड़ीं और जीती कभी कोई आल्हा को नहीं हरा सक " की उपेक्षा की गयी (मदद); |page= में 7 स्थान पर line feed character (मदद)सीएस1 रखरखाव: स्थान (link)
  2. Hiltebeitel, Alf (2009). Rethinking India's Oral and Classical Epics: Draupadi among Rajputs, Muslims, and Dalits. University of Chicago Press. पपृ॰ 160–163. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 0-226-34050-3.
  3. Patang, Acharya Mayaram (2018). Alha Udal ki Veergatha. Prabhat Prakashan. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 9789387980006.
  4. Talbot, Cynthia (2016). The Last Hindu Emperor: Prithviraj Cauhan and the Indian Past, 1200–2000 (अंग्रेज़ी में). Cambridge University Press. पृ॰ 203. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 9781107118560. मूल से 29 दिसंबर 2019 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 5 जून 2020.
  5. मिश्र, पं० ललिता प्रसाद (2007). आल्हखण्ड (15 संस्करण). पोस्ट बॉक्स 85 लखनऊ 226001: तेजकुमार बुक डिपो (प्रा०) लि०. पृ॰ 1 (भूमिका). |year= में तिथि प्राचल का मान जाँचें (मदद)सीएस1 रखरखाव: स्थान (link)

बाहरी कड़ियाँ