चिल्ला (फारसी: چله‎, अरबी: أربعين‎, दोनों का अर्थ 'चालीस' है।) एक सूफी आध्यात्मिक क्रिया है जिसमें चालीस दिन तक एकान्त में रहकर तपस्या की जाती है। यह मुख्यतः भारतीय और फारसी परम्परा में देखने को मिलती है। चिल्ला करने वाला तपस्वी एक वृत्त के अन्दर बैठे रहता है और बिना भोजन के ४० दिन तक ध्यान लगाता है जिसे अरबइन भी कहते हैं। [1][2] चिल्ला एकान्त स्थान पर किया जाता है जिसे 'चिल्ला-खाना' कहते हैं। चिल्ला किसी विशिष्ट अवसर पर या किसी विशेष उद्देश्य की सिद्धि के लिए किया जाता है जिसमें बहुत सी बातों का बचाव और बहुत–से नियमों का पालन करना पड़ता है।

चिल्ला करते हुए एक सूफी मौलवी (शिक्षक)

चिल्ला करने वाले प्रमुख लोग

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14वीं शताब्दी के प्रसिद्ध ईरानी सूफ़ी कवि हाफ़िज़ शिराज़ी. [3][4][5]

यह भी देखें

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  1. Landolt & Lawson 2005, पृ॰ 203.
  2. Dehlvi 2012, पृ॰ 109.
  3. "Teachings of Hafiz: Translated by Gertrude Lowthian Bell". मूल से 20 अक्तूबर 2019 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 29 अप्रैल 2020.
  4. "Hafiz حافظ Biography". मूल से 27 अक्तूबर 2019 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 29 अप्रैल 2020.
  5. "Iran Chamber Society". मूल से 26 अप्रैल 2006 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 29 अप्रैल 2020.