डायोफैंटीय समीकरण

डायोफैंटस नामक यूनानी गणितज्ञ ने, जो संभवतः ईसा के पश्चात् तीसरी शताब्दी में रहा, बहुत से बहुपदीय अनिर्धार्य समीकरणों (Undetermined Equations) का अध्ययन किया तथा पूर्णांकों में उनके हलों को ज्ञात किया। किन्तु आधुनिक तथ्यों के प्रकाश में अब इसमें कोई सन्देश नहीं रह गया है कि डायोफैण्टस से बहुत पहले ही भारतीय गणितज्ञों ने इस क्षेत्र में अत्यन्त महत्वपूर्ण कार्य कर लिया था। (कुट्टक देखिये)

पूर्णांक भुजाओं वाले सभी समकोण त्रिभुज प्राप्त करना एक प्रकार से डायोफैंटीय समीकरण के हल करने के तुल्य ही है।

डायोफैंटीय समस्याओं में समीकरणों की संख्या चरों की संख्या से कम होती है (अर्थात समीकरण अनिर्धारित होते हैं)। इन समीकरणों में चरों के गुणांक पूर्णांक होते हैं और चरों का ऐसा पूर्णांक मान प्राप्त करना होता है जो इन समीकरणों को संतुष्ट करें। इसलिए उन सभी समीकरणों का नाम डायोफैंटीय समीकरण (Diophantine Equations) पड़ गया जिनमें चरों के गुणांक पूर्णांक होते हैं।

डायोफैंटीय समीकरण का एक सरल उदाहरण है: . इसके वास्तविक हल अनन्त होंगें। किन्तु इसके धन पूर्णांक हल केवल ४ हैं। : .

डायोफैंटीय समस्याओं के गणितीय अध्ययन को आजकल डायोफैंटीय विश्लेषण (Diophantine analysis) कहते हैं। इतिहास में हरेक डायोफैंटीय समीकरण एक बुझौवल (puzzle) की तरह प्रयोग की जाती रही हैं किन्तु डायोफैंटीय समीकरणों का सामान्य सिद्धान्त (जो द्विघात रूपों के परे भी जांय) बीसवीं शती की एक बड़ी गणितीय उपलब्धि मानी जाती है।

डायोफैंटीय समीकरण के उदाहरणसंपादित करें

नीचे दिये गये डायोफैंटीय समीकरणों में x, y, तथा z अज्ञात राशियाँ हैं; अन्य अक्षर नियत पूर्णांक हैं।

  यह एक रैखिक डायोफैंटीय समीकरण है।
  n = 2 के लिये (x,y,z) के अनन्त हल सम्भव हैं जो पाइथागोरीय त्रिक (Pythagorean triple) होंगे। n के 3 से बड़े मानों के लिये, फर्मा के अन्तिम प्रमेय (Fermat's Last Theorem) के अनुसार (x, y, z) का कोई भी धनात्मक पूर्णांक हल सम्भव नहीं है।
  यहाँ n पूर्ण वर्ग नहीं है। यह पेल्ल का समीकरण है जो अंग्रेज गणितज्ञ जॉन पेल्ल (John Pell) के नाम पर पड़ा है। सबसे पहले इसे ब्रह्मगुप्त ने ७वीं शताब्दी में इसका अध्ययन किया था। फर्मा (Fermat) ने सत्रहवीं शती में इसका अध्ययन किया। भारतीय गणित में इसे 'वर्ग प्रकृति' या 'कृति-प्रकृति' कहा गया है।[1] ११वीं शताब्दी में भास्कर द्वितीय ने इसके हल के लिये चक्रवाल विधि प्रस्तुत की थी।
  यह इर्डॉस-स्ट्रॉस कान्जेक्चर (Erdős–Straus conjecture) कहलाता है। इसके अनुसार, 2 से बड़ी धन पूर्णांकों के लिये (n ≥ 2), एक हल सम्भव है जिसमें x, y, तथा z सभी धन पूर्णांक होंगे। यद्यपि इस समीकरण को बहुपद के रूप में नहीं व्यक्त किया जाता, किन्तु यह उदाहरण बहुपद समीकरण 4xyz = yzn + xzn + xyn = n(yz + xz + xy) के तुल्य ही है।

डायोफैंटीय विश्लेषणसंपादित करें

डायोफैंटीय विश्लेषण में प्राय: निम्नलिखित प्रश्नों पर विचार किया जाता है-

  • क्या कोई हल सम्भव है?
  • किसी दी हुई संख्या (जिसके लिये आसानी से देखकर ही पता चल जाता है कि यह डायोफैंटीय समीकरण का हल है) के परे कोई हल सम्भव हैं?
  • हलों की संख्या सीमित है या अनन्त ?
  • क्या सैद्धान्तिक रूप से सभी हल प्राप्त करना सम्भव है?
  • क्या कोई व्यक्ति सभी हलों की गणना कर सकता है? क्या यह व्यावहारिक है?

भारत के प्राचीन गणितज्ञों द्वारा कृत डायोफैंटीय विश्लेषणसंपादित करें

 
ब्रह्मगुप्त

८०० ईसापूर्व से ५०० ईसापूर्व रचित शुल्बसूत्रों में डायोफैंटीय समीकरणों का पूर्णांक हल मिलता है। लगभग ८०० ईसापूर्व में बौधायन ने युगपत (simultaneous) डायोफैंटीय समीकरणों का हल दो धनात्मक पूर्णाकों का सेट के रूप में प्राप्त किया था। उन्होने चार अज्ञात राशियों से युक्त युगपत डायोफैंटीय समीकरणों का हल निकालने की भी कोशिश की थी। ६०० ईसापूर्व में आपस्तम्ब ने ५ अज्ञात राशियों वाले डायोफैंटीय समीकरणों का हल करने की कोशिश की थी।[2]

कुट्टकसंपादित करें

अति प्राचीन काल से ही भारतीय गणितज्ञ   प्रकार के समीकरणों का पूर्णांक हल खोजने की दिशा में कार्यरत रहे हैं। यद्यपि आजकल इन्हें 'डायोफैण्टीय समीकरण' कहा जाता है किन्तु डायोफैण्टस से बहुत पहले शुल्बसूत्रों में ऐसी गणितीय समस्याओं की विशद चर्चा है। शुल्बसूत्रों का काल ८०० ईसापूर्व या उससे भी पहले है।

आर्यभट ने इस प्रकार की समस्याओं के हल को 'कुट्टक' नाम दिया है। भास्कर ने आर्यभटीय की टीका में निम्नलिखित कुट्टक दिया है-

वह संख्या निकालो जिसमें ८ से भाग देने पर ५ शेष रहता है, ९ से भाग देने पर ५ शेष रहता है तथा ७ से भाग देने पर १ शेष रहता है।

अर्थात् पूर्णांक   निकालो जहाँ  । इसे हल करने पर   का मान   आता है।

'कुट्टक' का शाब्दिक अर्थ 'कूटने वाला' (पल्वराइजर) है। कुट्टक विधि वास्तव में एक पुनरावर्ती (recursive) विधि है। वर्तमान समय में भास्कर द्वारा 621 ई में व्याख्या सहित दी गयी इस विधि को 'आर्यभट की कलनविधि' (Aryabhata algorithm) कहते हैं जो प्रथम घात वाले डायोफैण्टीय समीकरणों के हल की मानक विधि बन गयी है।

इसी प्रकार, ब्रह्मगुप्त ने निम्नलिखित अनिर्धार्य समीकरण को हल किया है:

 

ब्रह्मगुप्त के 'खण्डखाद्यक' नामक ग्रन्थ में 'कुट्टकाध्याय' नामक एक पूरा अध्याय है।

१७वीं एवं १८वीं श्ताब्दीसंपादित करें

फर्मा (Pierre de Fermat) ने इस दिशा में काफी काम किया।

हिल्ल्बर्ट का १०वाँ प्रश्नसंपादित करें

आधुनिक अनुसंधानसंपादित करें

सन्दर्भसंपादित करें

  1. Indeterminate Equation
  2. "Diophantische analyse in India". मूल से 20 जुलाई 2015 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 16 जुलाई 2015.

इन्हें भी देखेंसंपादित करें

बाहरी कड़ियाँसंपादित करें