दोस्ती (1964 फ़िल्म)

1964 की सत्येन बोस की फ़िल्म

दोस्ती १९६४ में बनी हिन्दी भाषा की फिल्म है जिसके निर्देशक सत्येन बोस और निर्माता अपने राजश्री प्रोडक्शन्स के तले ताराचंद बड़जात्या हैं। जैसा फ़िल्म का नाम है, यह फ़िल्म एक अपाहिज लड़के और एक अन्धे लड़के के बीच दोस्ती को दर्शाती है। इस फ़िल्म को १९६४ के फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कारों में छ: पुरस्कारों से नवाज़ा गया जिसमें फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म पुरस्कार भी शामिल है। यह फ़िल्म उस वर्ष की १० सबसे ज़्यादा चलने वाली फ़िल्मों में एक थी और बॉक्स ऑफ़िस में "सुपर हिट" मानी गयी। * यह फ़िल्म संजय ख़ान की पहली फ़िल्म है।

दोस

दोस्ती का पोस्टर
निर्देशक सत्येन बोस
लेखक बाण भट्ट (कहानी)
गोविन्द मूनिस (पटकथा एवं संवाद)
निर्माता ताराचंद बड़जात्या
अभिनेता संजय ख़ान,
लीला मिश्रा,
नाना पालसिकर,
लीला चिटनिस,
अभि भट्टाचार्य,
मूलचन्द
छायाकार मार्शल ब्रगेन्ज़ा
संपादक जी.जी. मयेकर
संगीतकार लक्ष्मीकांत प्यारेलाल (संगीतकार)
मजरुह सुल्तानपुरी (गीतकार)
वितरक राजश्री पिक्चर्स
प्रदर्शन तिथि
1964
लम्बाई
१६३ मिनट
देश भारत
भाषा हिन्दी

रामनाथ गुप्ता उर्फ़ रामू (सुशील कुमार) के पिता एक फ़ैक्टरी हादसे में चल बसते हैं। जब फ़ैक्टरी उनकी मौत का हर्ज़ाना देने से इन्कार कर देती है तो उसकी माँ (लीला चिटनिस) यह सदमा बर्दाश्त नहीं कर पाती है और वह भी दम तोड़ देती है। सड़क दुर्घटना में रामू अपनी एक टांग गंवा बैठता है। बेघर, बिन पैसे के और अपाहिज रामू जब मुंबई की सड़कों की ख़ाक छान रहा होता है तो उसकी मुलाकात मोहन (सुधीर कुमार) नाम के एक अन्धे लड़के से होती है जिसकी कहानी भी रामू के जैसी ही है। मोहन गांव का रहने वाला है और बचपन में ही अपनी आँखें खो बैठा है। मोहन की बहन मीना गांव से शहर नर्स बनने के लिए आई थी ताकि मोहन की आँखों का इलाज करा सके। अब मोहन अपनी बहन को ढूंढता हुआ शहर आया है। रामू और मोहन गलियों में गाकर अपना पेट भरने लगते हैं और सड़क के किनारे ही सो जाते हैं। एक दिन उनकी मुलाकात मंजुला उर्फ़ मंजु नामक एक छोटी लड़की से होती है जो एक अमीर परिवार की होती है और जो बहुत बीमार है। वह रामू और मोहन को पैसे देना चाहती है लेकिन दोनों यह कह कर मना कर देते हैं कि छोटी बहन से पैसे नहीं लिए जाते हैं। मंजु की देखभाल के लिए नर्स की ज़रूरत होती है और डॉक्टर मीना को उसके घर ले आते हैं। रामू को आगे पढ़ाई करने की चाह होती है लेकिन स्कूल में दाख़िले के लिए साठ रुपयों की ज़रुरत होती है। दोनों यह पैसा मंजुला से मांगने जाते हैं लेकिन मंजुला का भाई अशोक (संजय ख़ान) उन्हें पांच रुपये देकर कहता है कि आइंदा वहाँ न आयें। अपना इस तरह अपमान होना मोहन को गंवारा नहीं होता है और वह गाकर बाकी की रक़म जमा कर लेता है।
अब वे सड़क के किनारे न सोकर एक झोपड़पट्टी में खोली ले लेते हैं जहाँ उनकी पड़ोसन मौसी (लीला मिश्रा) उन्हें अपने बच्चों जैसा ही प्यार देती है। रामू जब स्कूल में दाख़िले के लिए जाता है तो स्कूल के हेडमास्टर (अभि भट्टाचार्य) उससे कहते हैं कि उसका कोई तो होना चाहिए जो उसकी ज़िम्मेदारी ले सके वर्ना स्कूल के क़ानून के मुताबिक उसका दाख़िला नहीं हो सकता है। तभी स्कूल के एक शिक्षक शर्मा जी (नाना पालसिकर) आगे आते हैं और रामू को अपनी छत्रछाया में ले लेते हैं। वह रामू से कहते हैं कि रामू झोपड़पट्टी को छोड़ उन्हीं के घर आकर रहे और पढ़ाई करे। लेकिन रामू अपने दोस्त मोहन को छोड़ने के लिए राज़ी नहीं होता है।
एक दिन मोहन सुनता है कि कोई (अशोक) मीना को पुकार रहा है तो वह उत्सुक्तता से अपनी बहन से मिलने आगे बढ़ता है लेकिन उसके भिखारी होने की वजह से मीना उसको पहचानने से इन्कार कर देती है। बाद में मीना अशोक को सब सच बता देती है। इस बीच मंजु का भी देहान्त हो जाता है। एक दिन गली की लड़ाई में पुलिस रामू को हिरासत में ले लेती है। शर्मा जी उसकी ज़मानत देते हैं और कहते हैं कि अब वह उसे झोपड़पट्टी में नहीं रहने देंगे। रामू मान जाता है और उनके साथ रहने चला जाता है। मोहन का दिल टूट जाता है। तभी शर्मा जी का देहान्त हो जाता है और रामू के पास इम्तिहान की फ़ीस भरने के पैसे नहीं होते हैं। मोहन को जब यह बात पता चलती है तो बीमारी में भी वह गाकर पैसे जुटा लेता है और चुपके से रामू के स्कूल में जमा कर देता है। मोहन इतना बीमार पड़ जाता है कि उसे अस्पताल दाख़िल कराना पड़ता है जहाँ मीना बिना बताए उसकी देखभाल करने लगती है। रामू इम्तिहान में अव्वल आता है और जब उसे सच्चाई का पता चलता है तो वह अपने दोस्त से मिलने अस्पताल जाता है। मोहन मीना और रामू को माफ़ कर देता है और फिर तीनों गले मिलते हैं।

मुख्य कलाकार

संपादित करें

सभी गीत मजरुह सुल्तानपुरी द्वारा लिखित; सारा संगीत लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल द्वारा रचित।

क्र॰शीर्षकगायकअवधि
1."मेरा तो जो भी कदम है"मोहम्मद रफ़ी3:47
2."चाहूँगा मैं तुझे साँझ सवेरे"मोहम्मद रफ़ी4:54
3."कोईजजबराहनपाय जब राह न पाये"मोहम्मद रफ़ी4:19
4."गुड़िया कब तक ना हँसोगी"लता मंगेशकर3:29
5."जानेवालों ज़रा मुड़ के"मोहम्मद रफ़ी5:16
6."राही मनवा दु:ख की चिन्ता"मोहम्मद रफ़ी4:05

नामांकन और पुरस्कार

संपादित करें

जीते

नामांकित

बाहरी कड़ियाँ

संपादित करें