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निर्देशांक: 26°42′N 77°54′E / 26.7°N 77.9°E / 26.7; 77.9 धौलपुर राजस्‍थान का एक छोटा सा शहर है। यह धौलपुर जिले में आता है। धौलपुर विशेष रूप से बलुआ पत्थर के लिए जाना जाता है। यहां बनाई जाने वाली अधिकतर इमारतों का निर्माण इन बलुआ पत्थरों से ही किया जाता है। धौलपुर में कई मंदिर, किले, झील और महल है जहां घूमा जा सकता है।

धौलपुर
—  शहर  —
समय मंडल: आईएसटी (यूटीसी+५:३०)
देश Flag of India.svg भारत
जनसंख्या 92,137 (2001 के अनुसार )
क्षेत्रफल
ऊँचाई (AMSL)

• 177 मीटर (581 फी॰)
आधिकारिक जालस्थल: dholpur.nic.in/

इतिहाससंपादित करें

धौलपुर एक पुराने ऐतिहासिक शहर के रूप में जाना जाता है। पहले इस जगह को धवलपुर के नाम से जाना जाता था। राजा धवल देव तोमर वंश के राजपूत राजा थे । इस शहर का निर्माण होने के बाद इस जगह को धौलपुर के नाम से जाना जाने लगा। 846 ईसवीं में यहां चौहान राज-वंश ने शासन किया था।

। पहले इसका नाम धवलपुर था, अपभ्रंश होकर इसका नाम धौलपुर में बदल गया। वर्तमान नगर मूल नगर के उत्तर में बसा है। चंबल नदी की बाढ़ से बचने के लिये ऐसा किया गया। पहले धौलपुर सामंती राज्य का हिस्सा था, जो 1949 में राजस्थान प्रदेश का हिस्सा बन गया। धवल देव शासन के बाद इस शहर का निर्माण किया गया। इस शहर का निर्माण होने के बाद इस जगह को धौलपुर के नाम से जाना जाने लगा। 846 ईसवीं में यहाँ चौहान वंश ने शासन किया था। धौलपुर विशेष रूप से बलुआ पत्थर के लिए जाना जाता है।

मुगल के पहले यह एक राजपूत रियासत थी । जो मुगल के बाद मे राना (जो की सामान्य राजपूत के लिए प्रयुक्त होता है) जाट वंश के अधिकार में आ गया । इसलिए अब धौलपुर भूतपूर्व जाट रियासत है। धौलपुर से निकट राजा मुचुकुंद के नाम से प्रसिद्ध गुफा है जो गंधमादन पहाड़ी के अंदर बताई जाती है। पौराणिक कथा के अनुसार मथुरा पर कालयवन के आक्रमण के समय श्रीकृष्ण मथुरा से मुचुकुंद की गुहा में चले आए थे। उनका पीछा करते हुए कालयवन भी इसी गुफा में प्रविष्ट हुआ और वहाँ सोते हुए मुचुकुंद को श्रीकृष्ण ने उत्तराखंड भेज दिया। यह कथा श्रीमद् भागवत 10,15 में वर्णित है। कथाप्रसंग में मुचुकुंद की गुहा का उल्लेख इस प्रकार है।[1] धौलपुर से 842 ई. का एक अभिलेख मिला है, जिसमें चंडस्वामिन् अथवा सूर्य के मंदिर की प्रतिष्ठापना का उल्लेख है। इस अभिलेख की विशेषता इस तथ्य में है कि इसमें हमें सर्वप्रथम विक्रमसंवत् की तिथि का उल्लेख मिलता है जो 898 है। धौलपुर में भरतपुर के जाट राज्यवंश की एक शाखा का राज्य था। भरतपुर के सर्वश्रेष्ठ शासक सूरजमल जाट की मृत्यु के समय (1764 ई.) धौलपुर भरतपुर राज्य ही में सम्मिलित था। पीछे यहां एक अलग रियासत स्थापित हो गई।S

धौलपुर के महाराजाओ की सूचीसंपादित करें

तसीमों इतिहाससंपादित करें

तसीमों गोली काण्डसंपादित करें

देश को आजाद कराने के लिये देश के कितने ही लोगों ने अपनी जान की क़ुरबानी दी। ऐसे ही अपने धौलपुर के तसीमों गांव के शहीदों का नाम आता है शहीद छत्तर सिंह परमार और शहीद पंचम सिंह कुशवाह। जिन्होंने देश के लिए अपनी जान की क़ुरबानी दी। धौलपुर के इतिहास की महत्त्वपूर्ण घटना है दिन था 11 अप्रैल 1947 जब प्रजामंडल के कार्यकर्ता तसीमों गांव में सभा स्थल पर एकत्रित हुये थे। तब झंडा फहराने पर रोक थी, लेकिन नीम के पेड़ पर तिरंगा लहर रहा था और सभा चल रही थी। उसी समय सभास्थल पर पुलिस के साथ सैंपऊ के तत्कालीन मजिस्ट्रेट शमशेर सिंह, पुलिस उपाधीक्षक गुरुदत्त सिंह तथा थानेदार अलीआजम पहुंचे और उन्होंने तिरंगे झंडे को उतारने के लिये आगे आए तो प्रजामंडल की सभा में मौजूद ठाकुर छत्तर सिंह सिपाहियों के सामने खड़े हो गए और किसी भी हालत में तिरंगा झंडा नहीं उतारने को कहा। इतने में ही पुलिस ने ठाकुर छत्तर सिंह को गोली मार दी। तब पंचम सिंह कुशवाह आगे आये तो पुलिस ने उन्हें भी गोली मार दी। दोनों शहीदों के जमीन पर गिरते ही सभा में मौजूद लोगों ने तिरंगे लगे नीम के पेड़ को चारों ओर से घेर लिया और कहा कि मारो गोली हम सब भारत माता के लिए मरने के लिए तैयार है। और भारत माता के नाम के जयकारे लगाने लगे जिससे मामला बिगड़ता देख पुलिस पीछे हट गयी। इसी कारण स्वतंत्रता सेनानियों की शहादत से तसीमों गांव राजस्थान में ही नहीं बल्कि पूरे भारत वर्ष में इतिहास के पन्नों में दर्ज़ हो गया जो कि इतिहास में 'तसीमों गोली कांड' के नाम से जाना जाता है। जिन्होंने अपनी जान की परवाह न करते हुए तिरंगे के लिए अपनी जान न्यौछावर कर दी। ऐसे थे हमारे धौलपुर के वीर सपूत शहीद छत्तर सिंह परमार और पंचम सिंह कुशवाह। घटना के साक्षी 83 वर्षीय पंडित रोशनलाल शर्मा बताते है कि राजशाही के इशारे पर पुलिस द्वारा चलाई गोलियों के निशान उनके हाथों पर आज भी धुंधले नहीं पड़े हैं वही साक्षी 86 वर्षीय जमुनादास मित्तल ने कहा कि तिरंगे की लाज के लिए उनके गांव के दो सपूतों की शहादत पर उन्हें फक्र है।

पर्यटन स्थलसंपादित करें

चौपड़ा-महादेव मन्दिरसंपादित करें

यह एक ऐतिहासिक मंदिर है। इस मंदिर में की गई वास्तुकला काफी खूबसूरत है। यह शिव मंदिर ग्वालियर-आगरा मार्ग पर बाईं ओर लगभग सौ कदम की दूरी पर स्थित है। इसे चौपड़ा-महादेव का मंदिर कहते हैं। मन्दिर में पूजन-अर्चन की क्रिया श्री गणेश आचार्य की देख-रेख में पूरे शास्त्रोक्त विधाh unन से सम्पन होती हैं। जगद गुरु शंकराचार्य श्री श्री१००८ स्वामी श्री जयेन्द्र सरस्वती भी यहां अभिषेक कर चुके हैं।

मुचुकुन्द-सरोवरसंपादित करें

अगर आप धौलपुर आएं तो मुचुकुंद सरोवर अवश्य घूमें। इस तालव का नाम राजा मुचुकुन्द के नाम पर रखा गया। यह तालाव अत्यन्त प्राचीन है। राजा मुचुकुन्द सूर्य वंशके 24वें राजाथे। पुराणों में ऐसा उल्लेख है कि राजा मुचुकुन्द यहां पर सो रहे थे, उसी समय असुर कालयवन भगवान श्रीकृष्ण का पीछा करते हुए यहां पहुंच गया और उसने कृष्ण के भ्रम में, वरदान पाकर सोए हुए राजा मुचुकुन्द को जगा दिया। राजा मुचुकुन्द की नजर पड़ते ही कालयवन वहीं भस्म हो गया। तब से यह स्थान धार्मिक स्थल के रूप में जाना जाता है। इस स्थानके आस-पास ऐसी कई जगह है जिनका निर्माण या रूप परिवर्तन मुगल सम्राट अकबर ने करवाया था। मुचुकुन्द सरोवर को सभी तीर्थों का भान्जा कहा जाता है। मुचुकुन्द-तीर्थ नामक बहुत ही सुन्दर रमणीक धार्मिक स्थल प्रकृतिकी गोद में धौलपुर के निकट ग्वालियर-आगरा मार्ग के बांई ओर लगभग दो कि०मी०की दूरी पर स्थित है। इस विशाल एवं गहरे जलाशय के चारों ओर वास्तु कला में बेजोड़ अनेक छोटे-बड़े मंदिर तथा पूजागृह पालराजाओं के काल 775 ई.से 915 ई.तक के बने हुए हैं। यहां प्रतिवर्ष भाद्रपद शुक्ल ऋषि-पंचमी और बलदेव-छट को विशाल मेला लगता है। जिसमें लाखों की संख्या में दूर-दूर से श्रद्धालु आते हैं, इस सरोवर में स्नान कर तर्पण-क्रिया करते हैं। ऐसी मान्यता भी है कि यहां लगातार सात रविवार स्नान करनेसे कान से सर का बहना बन्द हो जाता है। हर अमावस्या को हजारों तीर्थयात्री प्रातःकाल से ही मुचुकुन्द-तीर्थकी परिक्रमा लगाते हैं। इसी प्रकार हर पूर्णिमा को सायंकाल मुचुकुन्द-सरोवरकी महा-आरतीका आयोजन होताहै, जिसमें सैकडों की तादाद में भक्त सम्मिलित होते हैं।

शेरगढ़ किलासंपादित करें

यह किला धौलपुर से पांच किलोमीटर की दूरी पर चम्बल नदी के किनारे खारों के बीच स्थित है। इस किले का निर्माण धौलपुर नरेश मालदेव ने 1532 ई. के आसपास करवाया था। इसके बाद इस किले को शेरशाह सूरीके आक्रमण का सामना करना पड़ा और इस किले का नाम शेरगढ़ किला कर दिया गया।

मंदिर श्री राम-जानकी और श्री हनुमान जी, पुरानी छावनीसंपादित करें

 
विग्रह-श्री हनुमान जी, पुरानी छावनी, धौलपुर. छायाकार-गोपेश्वर वशिष्ठ

धौलपुर रेल्वे स्टेशन से ६-कि०मी०, धौलपुर-बाड़ी मार्ग से सरानी खेड़ा जाने वाले मार्ग पर स्थित है पुरानी- छावनी। मार्ग पर आँटौ-रिक्सा चलते रहते हैं। महाराज श्री कीर्तसिंह ने गोहद से आकर इस स्थान पर छावनी स्थापित की और यहां वि०सं०१६४२(sun-1699) में-मन्दिर का निर्माण करवाया। मन्दिर में चौबीस अवतार युक्त मर्यादापुरुषोत्तम श्रीरामक अष्टधातुका मनोहारी विग्रह है, जो उत्तराभिमुख है। इस दुर्लभ मूर्ति की चोरी भी हो गई थी। अन्तरराष्ट्रीय मूर्ति तस्करौं के चंगुल से निकलवाने में तत्कालीन डी०आई०जी०, केन्द्रीय पुलिस बल, श्री जगदानन्द सिंह की प्रमुख भूमिका रही। मन्दिर परिषरके सिंह द्वारके बाईं ओर, अपने आराध्य प्रभु श्री रामको निहारते हुए (दक्षिणाभिमुख) राम भक्त हनुमान की विशाल प्रतिमा है। प्रतिमा में रक्त-वाहिका (नशें) नजर आती हैं।

खानपुर महलसंपादित करें

इस किले का निर्माण मुगल शासन के दौरान शाहजहां ने करवाया था। इस महल की खूबसूरत बनावट पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करती है।

"वन विहार" वन्य जीव अभयारण्यसंपादित करें

यह अभयारण्य शहर से 18 किलोमीटरकी दूरी पर स्थित है। यह अभयारण्य धौलपुर शासकका सबसे पुराना वन्यजीव-अभयारण्य है। इसका क्षेत्रफल करीबन 59.86 वर्ग किलोमीटर है। वनविहार विंध्य-पठार पर स्थित है। तालाब ए शाही का निर्माण सालेखान ने करवाया, जो साहजहांका जागीरदार था।

तालाब-ए-शाहीसंपादित करें

यह जगह धौलपुर - बाड़ी मार्ग पर धौलपुर से 40 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। तालाब-ए-शाही काफी खूबसूरत एवं ऐतिहासिक झील है। इस झील का निर्माण शाहजहां ने 1617 ईसवी में करवाया था। इस झील को देखने के लिए काफी संख्या में पर्यटक यहां आते हैं। यहाँ राजा व् रानी के दो महल है। रानी के महल को पर्यटकों हेतु होटल में परवर्तित कर दिया गया है जो आज भी आकर्षण का केंद्र है। ऐसा माना जाता है कि इसका निर्माण शाहजहां के मनसबदार साले खान ने उनके लिये बनवाया था।

रामसागर-अभयारण्यसंपादित करें

यह अभयारण्य धौलपुर से 34 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यह अभयारण्य रामसागर झील का एक हिस्सा है। इस झील में मगरमच्छ के साथ मछलियों एवं सांपों की प्रजातियां देखी जा सकती है। इसके अतिरिक्त पानी में रहने वाली पक्षी जैसे जलकौवा, बत्तख आदि भी देख सकते हैं। यह बाड़ी के निकट है।

श्री महंकाल (महाकालेश्वर) मन्दिर, सरमथुरासंपादित करें

लसवारी-संपादित करें

लसवारी एक ऐतिहासिक स्थल है। इसी स्थान पर लार्ड लेक ने दौलत राव सिंधिया की हत्या की थी। इसके अलावा यहां पुराना मुगल गार्डन, दमोह जल प्रपात और कानपुर महल भी हैं। यह सभी जगह लसवारी की खूबसूरत जगहों में से हैं। दमोह- सरमथुरा से २ कि०मि० की दूरी पर है। यह एक सुन्दर जल-प्रपात है। इसकी ऊंचाई ३०० फुट है। सरमथुरा का महंकाल (महाकालेश्वर) मन्दिर प्रसिद्ध है।

== उद्योग और व्यापार- यहां पर सबसे बड़ा रोजगार कृषि और पत्थर का है धौलपुर से 60 किलोमीटर दूर सर मथुरा है जहां पर लाल पत्थर अधिक मिलता है यहां लाल पत्थर रोजगार का साधन है

जनसंख्यासंपादित करें

2011 के जनगणना के अनुसार जिला के कुल जनसंख्या 1206516 है। 2001 में हुए जनगणना के अनुसार धौलपुर नगर की कुल जनसंख्या 92,137 है; और धौलपुर ज़िले की कुल जनसंख्या 9,82,815 रही। जिसमें 22.71% की बढ़ोत्तरी हुई है। जिले का कुल क्षेत्रफल 3033 वर्ग किमी है। जिले का औसत जनसंख्या घनत्व लगभग 398 व्यक्ति प्रति वर्ग किमी तथा लिंगानुपात 846 और साक्षरता दर 69.08% हैं.

by Kishan Gupta

krishgpt108@gmail.com

Mahatma Gandhi Kashi Vidyapith, Varanasi

हवाई मार्ग

सबसे नजदीकी एयरपोर्ट आगरा में है। आगरा से धौलपुर की दूरी 60 किलोमीटर है।

रेल मार्ग

रेल मार्ग द्वारा धौलपुर से दिल्ली 230 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।

सड़क मार्ग

सड़क मार्ग द्वारा भरतपुर से धौलपुर 113 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। धौलपुर मुम्बई आगरा राष्ट्रीय मार्ग NH3 पर स्थित है

सन्दर्भसंपादित करें

बाहरी कड़ियाँसंपादित करें