आयुर्वेद में भैषज्य कल्पना का अर्थ है औषधि के निर्माण की डिजाइन (योजना)। [1]आयुर्वेद में रसशास्त्र का अर्थ 'औषध (भेषज) निर्माण' है और यह मुख्यतः खनिज मूल के औषधियों से सम्बन्धित है।रसशास्त्र और भैषज्य कल्पना मिलकर आयुर्वेद का महत्वपूर्ण अंग बनाते हैं।

भैषज्यकल्पना कितनी महत्वपूर्ण है, यह निम्नलिखित श्लोक से स्पष्ट है-

यस्य कस्य तरोर्मूलं येन केनापि मिश्रितम् ।
यस्मै कस्मै प्रदातव्यं यद्वा तद्वा भविष्यति ॥
(जिस-तिस वृक्ष का मूल ले लिया, जिस-किस द्वारा उसका मिश्रण बना दिया गया , जिस-तिस को उसे दे दिया गया (सेवन करा दिया गया), (तो परिणाम भी) ऐसा-वैसा ही होगा।)

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सन्दर्भसंपादित करें

  1. "संग्रहीत प्रति". मूल से 22 दिसंबर 2015 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 13 दिसंबर 2015.