मीरा बाई

श्री कृष्ण भक्ति रस की महान कवयित्री।श्री कृष्ण की महा भक्त। इनके लिए विष का प्याला दूध समान।
राजा रवि वर्मा द्वारा बनाया गया मीराबाई का चित्र

'मीराबाई (1498-1546)कृष्ण भक्त हैं उनकी कविता कृष्ण भक्ति के रंग में रंग कर और गहर हो जाती है।[1] मीरा बाई ने कृष्ण भक्ति के स्फुट पदों की रचना की है।मीरा कृष्णणा कि भक्ति हे

जीवन परिचयसंपादित करें

 
मीराबाई का मंदिर, चित्तौड़गढ़ (१९९०)

मीराबाई का जन्म सन 1498 ई. में मेड़ता(कुड़की) में दूदा जी के चौथे पुत्र रतन सिंह के घर हुआ। ये बचपन से ही कृष्णभक्ति में रुचि लेने लगी थीं।मीरा का विवाह मेवाड़ के सिसोदिया राज परिवार में हुआ। उदयपुर के महाराजा भोजराज इनके पति थे  जो मेवाड़ के महाराणा सांगा के पुत्र थे। विवाह के कुछ समय बाद ही उनके पति का देहान्त हो गया। पति की मृत्यु के बाद उन्हें पति के साथ सती करने का प्रयास किया गया, (किन्तु मीरा इसके लिए तैयार नहीं हुईं।(मीरा के पति का अंतिम संस्कार चित्ततोड़ में मीरा की अनुपस्थिति में हुुुआ ) विरक्त हो गयीं और साधु-संतों की संगति में हरिकीर्तन करते हुए अपना समय व्यतीत करने लगीं। पति के परलोकवास के बाद इनकी भक्ति दिन-प्रतिदिन बढ़ती गई। ये मंदिरों में जाकर वहाँ मौजूद कृष्णभक्तों के सामने कृष्णजी की मूर्ति के आगे नाचती रहती थीं। मीराबाई का कृष्णभक्ति में नाचना और गाना राज परिवार को अच्छा नहीं लगा। उन्होंने कई बार मीराबाई को विष देकर मारने की कोशिश की। घर वालों के इस प्रकार के व्यवहार से परेशान होकर वह द्वारका और वृंदावन गईं। वह जहाँ जाती थीं, वहाँ लोगों का सम्मान मिलता था। लोग उन्हे देवी के जैसा प्यार और सम्मान देते थे।मीरा का समय बहुत बड़ी राजनैतिक उथल पुथल का समय रहा है। बाबर का हिंदुस्तान पर हमला और प्रसिद्ध खानवा की लड़ाई जो की बाबर और राणा संग्राम सिंह के बीच हुई, जिसमें राणा सांगा की पराजय हुई और भारत में मुग़लों का अधिपत्य शुरू हुआ। इस सभी परिस्तिथियों के बीच मीरा का रहस्यवाद और भक्ति की निर्गुण मिश्रित सगुण पद्धत्ति सवर्मान्य  बनी।

द्वारका में संवत 1603(1547ई.)वो भगवान कृष्ण की मूर्ति में समा गईं।

मीराबाई को राजस्थान की राधा का जाता है (बचपन का नाम पेमल या प्रेमल )

जन्म 1498 कुड़की ,पाली( इसके अलावा बाजोली मेड़ता में भी माना जाता ह)

पिता- रतन सिंह राठौड़ (बाजोली के जागीरदार)

दादा - राव दूदा ने लालन-पालन किया मेड़ता नागौर में

गुरु - मीरा बाई ने पति भोजराज की मृत्यु के पश्यात  रविदासजी को गुरु बनाया ।

*मीराबाई का विवाह 1516 में राणा सांगा के बड़े पुत्र भोजराज के साथ , शादी के 7 वर्ष बाद भोजराज की मृत्यु हो गई.

इन्हें भी देखेंसंपादित करें

सन्दर्भसंपादित करें

  1. राजीवरंजन मीराबाई: समनन सन्दर्भ में वागर्थ (सम्पादक) एकांत श्रीवास्तव जुलाई २०१२ कोलकाता

बाहरी कड़ियाँसंपादित करें