भारत गणराज्य का विदेश मंत्रालय (MEA) विदेशों के साथ भारत के सम्बन्धों के व्यवस्थित संचालन के लिये उत्तरदायी मंत्रालय है। यह मंत्रालय संयुक्त राष्ट्र में भारत के प्रतिनिधित्व के लिये जिम्मेदार है। इसके अतिरिक्त यह अन्य मंत्रालयों, राज्य सरकारों एवं अन्य एजेन्सियों को विदेशी सरकारों या संस्थानों के साथ कार्य करते समय बरती जाने वाली सावधानियों के बारे में सलाह देता है।

विदेश मंत्रालय
Ministry of External Affairs
भारत का प्रतीक चिन्ह
भारत का प्रतीक चिन्ह
संस्था अवलोकन
स्थापना 2 सितम्बर 1946
अधिकार क्षेत्र भारत गणराज्य
मुख्यालय कैबिनेट सचिवालय
रायसीना पहाड़ी , नई दिल्ली
उत्तरदायी मंत्री सुब्रह्मण्यम जयशंकर, विदेश मामलों के संघीय कैबिनेट मंत्री
 
वी0 मुरलीधरन, राज्य मंत्री
संस्था कार्यपालक विजय केशव गोखले
वेबसाइट
www.mea.gov.in

सुब्रह्मण्यम जयशंकर 30 मई 2019 से भारत के विदेश मंत्री हैं।

नीति का अर्थ है तर्क पर आधारित कार्य, जो वर्तमान और भविष्य को प्रभावित करे। इसका उद्देश्य अपनी स्थिति को उत्तरोत्तर उन्नत बनाना होता है। इस कार्य की सफलतापूर्वक पूर्ति विदेश नीति पर ही निर्भर है। किसी देश की विदेश नीति को क्रियान्वित करने का उत्तरदायित्व उस देश के विदेश विभाग पर होता है। यह सरकार के महत्वपूर्ण विभागों में से एक विभाग होता है। इसी की योग्यता पर यह निर्भर करता है कि यह किस प्रकार देश के राष्ट्रीय हितों, सम्मान और प्रतिष्ठा को बनाये रखेगा। इसी के कार्य एक देश को शान्ति अथवा युद्ध के कार्य के मार्ग पर ले जाते हैं। इन्हीं के प्रयासों से देश की आवाज अन्तर्राष्ट्रीय जगत में सुनी जा सकती है। इसका एक गलत कदम देश को अन्धकार के गर्त में ले जा सकता है। विदेश नीति का प्रभाव विश्वव्यापी होता है।

भारतीय विदेश मन्त्रालय का संगठन

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स्वतन्त्रता पूर्व ब्रिटिश भारतीय सरकार का एक विदेश विभाग था। इसका सर्वप्रथम निर्माण वारेन हेस्टिंग्स के काल में 1784 में किया गया था। 1842 तक यह गुप्त और राजनीतिक विभाग (Secret and Political Department) के नाम से जाना जाता था, बाद में इसे विदेश विभाग (Foreign Department) कहा जाने लगा। इसके तीन उप विभाग थे- विदेश, राजनीतिक और गृह। 1914 के पश्चात् यह विदेश और राजनीतिक विभाग (Foreign and Political Department) कहलाने लगा। 1935 के अधिनियम के परिणामस्वरूप बढ़े हुये कार्यों के कारण विदेश और राजनीतिक विभागों को अलग स्वतन्त्र विभागों में कर दिया गया। 1945 में इस विभाग को नवीन नाम दिया गया “विदेश विभाग और राष्ट्रमण्डलीय सम्बन्ध विभाग“। 1946 को अन्तरिम सरकार का कार्यभार संभालने पर नेहरू ने इस विभाग का निर्देशन अपने हाथों में लिया। मार्च 1949 में मन्त्रालय के इन दो विभागों को एक कर दिया गया तथा इसे विदेश मंत्रालय का नाम दिया गया, जिस नाम से यह आज भी जाना जाता है।

विदेश विभाग के मूल रूप से पांच कार्य माने गये हैं-

  • (१) अपने देश के विदेशों के साथ सम्बन्ध,
  • (२) अन्तर्राष्ट्रीय संधियों का क्रियान्वयन,
  • (३) अपने देश के नागरिकों की सुरक्षा तथा विदेशों में राष्ट्रीय हितों की रक्षा,
  • (४) अपने देश व पर देश के नागरिकों के आने जाने पर नियन्त्रण और,
  • (५) व्यापार व वाणिज्य हितों की रक्षा।

इन कार्यों की पूर्ति के लिये विदेश विभाग सूचनायें एकत्रित करता है, उनका अध्ययन कर विदेश मन्त्री तथा मन्त्रिमण्डल को परामर्श देता है। विदेश विभाग आर्थिक क्षेत्र में विभिन्न देशों के साथ सम्बन्ध, देश की सुरक्षा के लिये खतरों से बचाव का परामर्श तथा सांस्कृतिक और प्रचार कार्य में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करता है।

विदेश मन्त्री

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किसी भी देश की नीति का निर्माण कौन करता है, यह निश्चित रूप से कहना अति कठिन है। तानाशाही देशों से भले ही यह सम्भव हो, परन्तु संसदात्मक शासन में यह कहना सहज रूप से सम्भव नहीं है। संसदीय शासन व्यवस्था में सिद्धान्तः मन्त्रिमण्डल यह कार्य करता है। इस व्यवस्था में यदि प्रधानमन्त्री प्रभावशाली व्यक्तित्व का हो, तो सभी नीति निर्माण कार्य वही करता है। यदि साथ ही विदेश नीति के निर्माण का कार्य विदेश मन्त्रालय करता है, जिसका अध्यक्ष विदेश मन्त्री होता है। संसदीय प्रजातांत्रिक व्यवस्था के आधार पर इसकी नियुक्ति प्रधानमन्त्री द्वारा बहुसंख्यक सत्तारूढ़ के किसी एक सदस्य में से होती है, जो मन्त्रिमण्डल तथा प्रधानमन्त्री के प्रति उत्तरदायी होता है। प्रधानमन्त्री के पश्चात् यह सबसे महत्वपूर्ण व्यक्ति होता है। इस पद की महत्ता के कारण ही प्रायः भारत में प्रधानमन्त्री विदेश विभाग के कार्य को औपचारिक अथवा अनौपचारिक रूप से अपने पास ही रखने का प्रयास करता है।

संसदीय व्यवस्था के अनुरूप विदेश नीति निर्माण का कार्य मूलतः मन्त्रिमण्डल का उत्तरदायित्व है। विदेश मन्त्री, मन्त्रिमण्डल के विचारार्थ समस्या रखता है और जब मन्त्रिमण्डल उन पर निर्णय लेता है तो ये निर्णय संसद के विचारार्थ रखे जाते हैं। यहाँ इन पर खुला विचार-विमर्श होता है। संसद की स्वीकृति के पश्चात् ही विदेश विभाग इन्हें क्रियान्वित करता है, निर्देशन विदेश मन्त्री का ही रहता है। विदेशें के समक्ष वही अपने देश का कार्यकारी प्रतिनिधि होता है। उसी की योग्यता, कुशलता, व्यक्तिगत गुणों तथा विचारों के आधार पर देश का गौरव, सम्मान व प्रतिष्ठा बढ़ती है। इसी कारण उसकी नियुक्ति अथवा पद मुक्ति एक महत्वपूर्ण अन्तर्राष्ट्रीय राजनीतिक घटना मानी जाती है। विदेश नीति के निर्माण, निर्णय प्रक्रिया तथा इसके क्रियान्वयन में उसका प्रमुख हाथ होता है। वास्तव में नीति क्रियान्यन का यह केन्द्र-बिन्दु होता है। किस देश के साथ कैसे सम्बन्ध हों, किसके साथ कौनसी सन्धि करनी है- व्यापारिक अथवा सांस्कृतिक, सैनिक अथवा राजनीतिक-आदि निर्णय वही लेता है। उसे निर्णय लेने से पूर्व कई बातों का ध्यान करना पड़ता है। उसके नीति सम्बन्धी निर्णय आर्थिक, सैनिक, भौगोलिक, राजनीतिक, गृह व अन्तर्राष्ट्रीय नीतियों से आबद्ध रहते हैं। वह न तो पूर्णरूपेण आदर्शवादी और न ही अवसरवादी होता है। वह समय व परिस्थिति के अनुसार निर्णय लेकर अधिकाधिक राष्ट्रीय हितों की पूर्ति करता है। समय-समय पर आयोजित शिखर सम्मेलनों, संयुक्त राष्ट्र व राष्ट्रसंघ मण्डल के अधिवेशनों आदि में वही भाग लेता रहता है और अपने देश के प्रतिनिधि मण्डल को नेतृष्त्व प्रदान करता है। अपने विभाग का मार्गदर्शन तथा प्रशासनिक नियन्त्रण उसी के हाथों में होता है। विदेशों से आये प्रतिनिधि एवं शिष्ट मण्डलों अथवा अन्य अधिकारियों के साथ वार्तायें आदि भी वही करता है।

उपमंत्री अथवा संयुक्त मन्त्री

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विदेश मन्त्री के कार्यभार को हल्का करने के लिये तथा उसकी सहायतार्थ एक राज्य मन्त्री उपमंत्री अथवा संयुक्त विदेश मन्त्री भी होता है। ये विदेश मन्त्रालय के कुछ भाग का कार्यभार संभालते हैं तथा विदेश मन्त्री को निणर्य लेने में परामर्श अथवा किसी विशेष विषय पर नोट तैयार कर नीति-निर्णय लेने में सहायता देते हैं।

विदेश सचिव

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विदेश विभाग के राजनीतिक अध्यक्ष विदेश मन्त्री के अतिरिक्त इस विभाग का एक और विभागीय अध्यक्ष होता है, यह विभाग का सचिव होता है। रोजमर्रा के प्रशासकीय कार्य की हस्ताक्षर, मन्त्रालय के खर्चे का सही उपयोग इसी का उत्तरदायित्व होता है। सामान्यतः विदेश मन्त्री मोटे तौर पर नीति निर्णय आदेश देकर विसृत पूर्ति का कार्य विदेश सचिव पर ही छोड़ देते हैं। विदेश सचिव के सहायतार्थ अनेक संयुक्त सचिव व उप-सचिव होते हैं जो विभिन्न उप-विभागों के अध्यक्ष होते हैं।

प्रोटोकॉल विभाग

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नयाचार (न्य + आचार = प्रोटोकॉल) का कार्य उतना ही प्राचीन है जितना कि स्वयं राजनय। विदेश राष्ट्राध्यक्षों, प्रधानमन्त्रियों, राजदूतों आदि के साथ व्यवहार के नियमों को प्रोटोकॉल के नियम कहते हैं। ये निश्चित नियम होते है। इस विभाग का अध्यक्ष (Chief of Protocol) आवाभगत, स्वागत आदि के शिष्टाचार के नियमों का विधिवत पालन को सुनिश्चित करता है। स्वागत पार्टी हो अथवा भोज, रेलवे स्टेशन पर आगमन हो अथवा हवाई अड्डे पर, भोज में बैठने की व्यवस्था हो अथवा स्वेदशी अधिकारियों का परिचय, इन सभी परिस्थितियों में प्रोटोकॉल के नियमों का पालन विभागाध्यक्ष की सूझबूझ, कुशलता और योग्यता पर निर्भर करता है।

चूँकि नेहरू प्रधानमन्त्री होने के साथ-साथ विदेश मन्त्री भी थे, अतः कार्य की अधिकता होने के कारण यह सोचा गया कि विदेश विभाग के कार्य को देखने के लिये एक योग्य व्यक्ति को नियुक्त किया जाये जो उन्हें सही परामर्श दे सके। 1947 से 1964 तक (एक वर्ष 1952 को छोड़) विदेश विभाग का कार्य भार एक महासचिव (Secretary General) सर गिरिजा शंकर वाजपेयी पर था। नेहरू का इन पर अटूट विश्वास था और वे इनसे निरन्तर परामर्श लेते रहते थे। 1964 में प्रधानमन्त्री लाल बहादुर शास्त्री द्वारा सरदार स्वर्णसिंह के विदेशमन्त्री नियुक्त कर देने पर यह सोचा गया कि अब महासचिव की आवश्यकता नहीं है, अतः यह पद समाप्त कर दिया गया। विदेश सचिव ही विभाग का सर्वोच्च अधिकारी माना जाता है।

विदेश मंत्रालय के विभाग

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विदेश सचिव की सहायतार्थ दो सचिव विदेशी मामले १ (Secretary External Affairs I) तथा सचिव विदेश मामले २ (Secratary External Affairs II) हुआ करते थे, बाद में इन्हें सचिव (पूर्व) (Secretary East तथा सचिव (पश्चिम) (Secretary West) कहा जाने लगा।

विदेश विभाग 20 उप विभागों (Division) मेंं बँटा है, जिनके अध्यक्ष अतिरिक्त सचिव, संयुक्त सचिव अथवा डायरेक्टर होते हैं। ये विभाग प्रशासनिक (Administrative), प्रादेशिक (Territorial) और कार्य सम्बन्धी (Functional) होते हैं। इनकी सहायता तथा परामर्श के लिये एक प्रशसन तंत्र (Bureaucracy) परसोपानिक (hierarchical) आधार पर संगठित होता है जिसमें कार्य करने की आज्ञा ऊपर से दी जाती है, प्रशासनिक विभाग केवल प्रशासन से ही सम्बन्धित है, अतः यह नीति निर्माण प्रक्रिया में कोई योगदान नहीं देता। अन्य दो विभागों-प्रादेशिक व कार्य सम्बन्ध- द्वारा सूचनाओं को एकत्रित कर विदेश मन्त्री को परामर्श दिया जाता है। सूचनाएँ, विश्वभर में फैले भारतीय दूतावासों तथा वाणिज्य दूतावासों से प्राप्त होती हैं।

भारतीय विदेश मन्त्रालय के निम्नलिखित विभाग हैंः-

प्रादेशिक अथवा भौगोलिक आधार पर 9 विभाग हैं - अमेरिका, यूरोप, पश्चिमी और उत्तरी अफ्रीका, पाकिस्तान (2 उपविभाग) उत्तरी पूर्वी एशिया और दक्षिणी एशिया। हर डिविजन भौगोलिक आधार पर कई देशों को मिलाकर बनाया जाता है।

कानूनी और संधि विभाग (Legal and Treaties Division) - अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर पैदा हुई कानूनी समस्याओं, अधिकरणों (Tribunals), संधि, अनुसमर्थन आदि प्रश्न जिनसे भारत प्रत्यक्षः सम्बन्धित हो, इसी विभाग की देखरेख में सुलझाये जाते हैं।

वैदेशिक प्रचार विभाग (External Publicity Division) - विदेशों में भारतीय दष्ष्टिकोण को रखने तथा उसका प्रचार करने का मूल कार्य इस विभाग का है। हालांकि इस विभाग का कार्य सांस्कृतिक आदान-प्रदान में भी सहायक है। यह अन्तर्राष्ट्रीय समारोहों (fairs and festivals) सद्भावना शिष्ट मण्डलों नाच-गान, खिलाड़ियों आदि के विनिमय में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह विभाग एक संयुक्त सचिव (विदेश प्रचार) के नेतृत्व में कार्य करता है, उसकी सहायतार्थ दो निदेशक (Director) एक उप-निर्देशक, कई सूचना अधिकारी तथा उप-सूचना अधिकारी होते हैं।

स्वतन्त्रता पूर्व ब्रिटिश भारत का एक विदेश प्रचार संगठन (External Publicity Organisation) था जिसे 1943 में प्रचार व प्रसारण विभाग (Department of Information and Broadcasting) ने अपने अन्तर्गत ले लिया था। स्वतन्त्रता प्राप्ति के तुरन्त पश्चात मार्च 1948 में नेहरू ने विदेश नीति के क्षेत्र में प्रचार के महत्व पर बल दिया। विदेश प्रचार विभाग को विदेश विभाग के नियन्त्रण में रखा गया। 1958 में यह निर्णय लिया गया कि विदेश प्रचार विभाग ही विदेश प्रचार के लिये मूलतः उत्तरदायी रहेगा। यह विभाग तीन प्रकार के प्रचार कार्य करता है- प्रेस को सूचना देना, विदेशों में प्रचार संस्थानों पर नियन्त्रण और विदेशों में प्रचार करना। 1963 में स्थापित विदेश प्रचार विभाग की एक नई शाखा- प्रोडक्शन यूनिट (Production Unit) प्रचार साहित्य का निर्माण करती है।

ऐतिहासिक विभाग (Historical Division) - यह विभाग विदेश मन्त्रालय की सहायतार्थ विशेष विषयों पर शोधपत्र तैयार कराता है। इसका अपना एक अलग पुस्तकालय है।

प्रशासनिक विभाग (Administrative Division) - यह विभाग कार्यकर्त्ता वर्ग (Personnel) सेवा वर्ग आदि के प्रशासन का कार्य करता है। यह विदेशों में भारतीय दूतावासों व वाणिज्य दूतावासों की प्रशासनिक व्यवस्था की भी देखभाल करता है।

आर्थिक विभाग (Economic Division) -आर्थिक व तकनीकि आधार पर विदेशों के साथ भारतीय हितों के आधार पर सहयोग का कार्य इस विभाग के अधीन है।

नीति नियोजन व समीक्षा विभाग (Policy Planning and Review Division) - विदेश नीतियों का समीक्षात्मक अध्ययन कर बदलती हुई परिस्थितियों अनुसार भारत की भविष्य में क्या नीति होनी चाहिये, इस सम्बन्धा में यह विभाग को परामर्श देता है।

सुरक्षा, संचार, नागरिक सुरक्षा आदि विभाग (Security, Communications and Civil Defence Division) - यह विभाग संचार सुरक्षा आदि समस्याओं पर विचार करके विदेश विभाग तथा विदेशों में भारतीय दूतावासों को परामर्श देता रहता है।

गुप्त वार्ता विभाग (Intelligence Division) - विदेशों में स्थित दूतावासों का कर्त्तव्य है वे सभी साधनों का उपयोग करके सूचनायें एकत्रित करें तथा अपनी सरकार को ये सूचनायें निरन्तर भेजते रहें सभी देशों में गुपत विभाग यह कार्य करते हैं।

भारत में गुप्त विभाग (Intelligence Bureau) गृह मन्त्रालय के नियन्त्रण में कार्य करता था। प्रतिरक्षा मन्त्रालय की सहायतार्थ 1956 में एक संयुक्त गुप्त संगठन (Joint Intelligence Organisation) की स्थापना की गई थी। इसके दो भाग चीन व पाकिस्तान सम्बन्धी सूचनायें एकत्रित करते हैं। विदेश नीति की आदर्शवादिता के कारण गुप्त विभाग अधिक योग्यता और निपुणता से कार्य नहीं कर पाया था। 1967 में विदेश गुप्त संगठन (External Intelligence Organisation) की स्थापना की गई। इसका उद्देश्य पड़ौसी राज्यों से सैनिक सूचनाओें की प्राप्ति था। विदेशी दूतावासों में सैनिक अताशे भी गुप्त सैनिक सूचनायें एकत्रित करके मन्त्रालय को भेजते हैं। गृह तथा प्रतिरक्षा मन्त्रालय भी विदेश मन्त्रालय की भाँति गुप्त सूचनाएँ एकत्रित करते हैं। इन विभागों के मध्य समन्वय बैठाने वाली संस्था गुप्तचर समिति (Joint Intelligence Committee) है। 1965 में इस समिति का पुनर्गठन किया गया। अब इसकी सदस्यता विदेश, गृह तथा प्रतिरक्षा मन्त्रालयों के तीन संयुक्त सचिवों, तीन सैनिक गुंप्त विभागों के अधयक्षों तथा गृह-विभाग के एक सदस्य से पूरी होती है। इसके अलावा एक निरीक्षक विभाग (Inspectorate) भी है जो एक विशेष अतिरिक्त सचिव (Additional Secretary) के नेतृत्व में कार्य करता है। इसका मूल कार्य विदेशों में स्थित भारतीय दूतावासों के कार्य करने की रीति और क्षमता का अनुमान लगाना तथा समय-समय पर उनका दौरा करके राजनयिक अभिकर्त्ताओं के वेतन और भत्ते आदि पर विचार करते हुए उनके बढ़ाने का परामर्श देना होता है साथ ही ये दूतावास अधिकारियों के प्रशासन, व्यय, तथा उनके कार्यों का निरीक्षण कर अपनी सरकार को प्रतिवेदन देते हैं जिनमें भारतीय विदेश दूतावासों व राजनयिक अभिकर्त्ताओं के कार्यों की उन्नति, नियमों का उचित पालन, व्यय पर नियन्त्रण आदि ये सिफारिशें करते हैं।

गुप्त वाहक व्यवस्था (Carries of Diplomatic Bag) के अधिकारी भी विदेश मंन्त्रालय के संगठन के ही एक भाग है। इनका मूल कार्य अपने देश अथवा दूतावास द्वारा भेजे गये दूतावास प्रेष को सुरक्षापूर्ण लाना व ले जाना है।

कल्याण विभाग विभाग (Welfare Unit) मन्त्रालय का कल्याण एक मुख्यालय तथा विदेश स्थित मिशनों में काम करने वाले सभी अधिकारियों के कल्याण की देखभाल करता है। एक विशेष कोष (Self Benefit Fund) में से कर्मचारियों को आवश्यकता पड़ने पर धान से सहायता की जाती है।

हिन्दी में कार्य

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इन्हें भी देखें - विश्व हिन्दी सम्मेलन

मन्त्रालय अपना कार्य अधिकाधिक रूप से हिन्दी में करता है। विदेशों से की गई संधियां, समझौते, संयुक्त वक्तव्यों को हिन्दी में ही लिखा व हस्ताक्षरित किया जाता है। विदेश सेवा के अधिकारियों के लिये हिन्दी में एक अल्पावधि प्रशिक्षण, मन्त्रालय के कार्यक्रम के विचाराधीन है। विदेशों में हिन्दी प्रचार का कार्य विदेशों में हिन्दी प्रचार की योजना के अन्तर्गत किया जाता है। विदेश विभाग की उप-समिति 'केन्द्रीय हिन्दी समिति’-विदेश विभाग की उप-समिति केन्द्रीय हिन्दी समिति’ विदेशी हिन्दी लेखकों को प्रोत्साहित करने के लिये उन्हें विशेष सम्मानित करती है। इसके लिये एक विशेष समिति (Award Committee) का निर्माण किया गया है। विदेशों में भारतीय मिशनों के माध्यम से हिन्दी को लोकप्रिय बनाने के उद्देश्य से हिन्दी अधिकारी, प्राध्यापक और आशुलिपिक भेजे गये हैं तथा मिशनों के लिये और अधिक हिन्दी में टाईपराईटर, पुस्तकें, समाचार-पत्र और पत्रिकायें भेजी जाती हैं। विदेश मन्त्री अटल बिहारी वाजपेयी ने यह भी बताया कि भारतीय मिशनों को विदेशों में भारतीय बच्चों को हिन्दी में शिक्षा देने की भी व्यवस्था है। इन्दिरा सरकार ने अक्टूबर 1980 में एक संसदीय दल को विदेशों मेंं स्थित भारतीय दूतावासों का दौरा कर वहाँ हिन्दी के प्रयोग पर प्रगति आँकने और अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करने हेतु भेजा था।

इन्हें भी देखें

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बाहरी कड़ियाँ

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