"आनन्‍द केंटिश कुमारस्‍वामी" के अवतरणों में अंतर

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1908 में उनकी प्रसिद्ध कृति ‘द एम्स ऑव इंडियन आर्ट’ प्रकाशित हुई और दो वर्ष बाद 'आर्ट ऐंड स्वदेशी'। 1913 में 'आर्ट्स ऐंड क्रैफ्ट्स ऑव इंडिया ऐंड सीलोन' और अगले ही साल [[भगिनि निवेदिता]] के साथ ‘मिथ्स ऑव हिंदूज़ ऐंड बुद्धिस्ट’ प्रकाशित हुआ। तदनंतर ‘बुद्ध ऐंड दि गास्पेल ऑव बुद्धिज्म', 'द डांस ऑव शिव’ और बोस्टन संग्रहालय के विविध कैटलग प्रकाशित हुए। 1923 में ‘इंट्रोडक्शन टु इंडियन ऐंड इंडोनेशियन आर्ट’ छपी। इसी बीच डॉ. कुमारस्वामी ने [[फ्रेंच]] में भी कलासंबंधी तीन पुस्तकें प्रकाशित की जिनके नाम हैं : ‘लेज़ार ए मातिए द लींद ए द सिलान’, ‘पूर कोंप्रांद लार ईन्दू’ और ‘ले मिनियातूर ओरियांताल द ला कलेक्सी ओ गुलूबे’।
 
1930 से कुमारस्वामी का रुझान दर्शन की ओर विशेष हो गई और सन् 33 में उन्होंने [[veda|वेदों]] के अध्ययन स्वरूप ‘ए न्यू ऐप्रोच वेदाज़ ऐसे इन ट्रांसलेशन ऐंड एक्सिजेसिस’ प्रकाशित करते रहे। पर कुमारस्वामी का संबंध जीवन के अंत तक कला से बना रहा और वे ललितकलाओं पर अपने विचार दार्शनिक स्तर से प्रकाशित करते रहे। ‘एलिमेंट्स ऑव बुद्धिस्ट आइकानोग्राफी’ (1937) तथा ‘ह्वाई एग्ज़िविट वर्क्स ऑव आर्ट आर्ट? ‘ (1934) इसी प्रकार के चिंतन के परिणाम थे। 1944 में 70 वर्ष की अवस्था में उनकी मृत्यु हुई। मृत्यु के बाद उनकी कृति ‘लिविंग थाट्स ऑव गोतम दि बुद्धा’ प्रकाशित हुई।
 
[[श्रेणी:श्रीलंका के निवासी]]
[[श्रेणी:कला]]
[[श्रेणी:उत्तम लेख]]
 
[[de:Ananda Kentish Coomaraswamy]]
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