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{{बौद्ध तीर्थ}}
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नालन्‍दा विश्‍वविद्यालय के अवशेषों की खोज अलेक्‍जेंडर कनिंघम ने की थी। माना जाता है कि इस विश्‍वविद्यालय की स्‍थापना 450 ई. में गप्‍तगुप्त शासक कुमारगुप्‍त ने की थी। <ref name="Altekar1965">Altekar, Anant Sadashiv (1965). ''Education in Ancient India'', Sixth, Varanasi: Nand Kishore & Bros.</ref><ref name="New York Times">"Really Old School," Garten, Jeffrey E. New York Times, December 9, 2006.</ref> इस विश्‍वविद्यालय को इसके बाद आने वाले सभी शासक वंशों का समर्थन मिला। महान शासक हर्षवर्द्धन ने भी इस विश्‍वविद्यालय को दान दिया था। हर्षवर्द्धन के बाद पाल शासकों का भी इसे संरक्षण मिला। केवल यहां के स्‍थानीय शासक वंशों ने ही नहीं वरन विदेशी शासकों से भी इसे दान मिला था। इस विश्‍वविद्यालय का अस्तित्‍व 12वीं शताब्‍दी तक बना रहा। 12‍वीं शताब्‍दी में तुर्क आक्रमणकारी बख्तियार खलजी ने इस विश्‍वविद्यालय को जल‍ा डाला।
 
<!-- इस विश्‍वविद्यालय के बारे में माना जाता है कि यह विश्‍व का प्रथम आवासीय विश्‍वविद्यालय था। इसमें करीब 10000 छात्र एक साथ विद्या ग्रहण करते थे। यहां 2000 शिक्षक छात्रों को पढ़ाते थे। यह विश्‍वविद्यालय स्‍थापत्‍य कला का अदभूत नमूना था। यह पूरा परिसर एक विशाल दीवार से घिरा हुआ था तथा इसमें प्रवेश के लिए केवल एक ही मुख्‍य द्वार था। इस परिसर में आठ विशाल भवन, दस मंदिर, कई प्रार्थनाकक्ष तथा अध्‍ययन कक्ष थे। इसके अलावा यहां सुंदर बगीचे तथा झीलें भी थी। इसका पुस्‍तकालय नौ मंजिला था। जिसमें पुस्‍तकों का अनुपम संग्रह था। इस पुस्‍तकालय में सभी विषयों से संबंधित पुस्‍तकें थी। इस विश्‍वविद्यालय में केवल भारत से ही नहीं बल्कि कोरिया, जापान, चीन, तिब्‍बत, इंडोन‍ेशिया, पर्शिया तथा तुर्की से भी विद्यार्थी शिक्षा ग्रहण करने आते थे। प्रसिद्ध चीनी विद्वान ह्वेनसांग ने भी यहीं से शिक्षा ग्रहण की थी। -->
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