"वेणीसंहार" के अवतरणों में अंतर

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छः अंक के कथावस्तु वाले इस 'वेणीसंहार' नाटक की मुख्य और सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें [[महाभारत]] की सम्पूर्ण युद्धकथा को समाविष्ट किया गया है। 'वेणीसंहार' नाटक की दूसरी विशेषता तृतीय अंक का प्रसंग [[कर्ण]] और [[अश्वत्थामा]] का कलह है।
 
नाटक का नायक [[[दुर्योधन]] है, क्योंकि उसको लक्ष्य में रखकर समस्त घटनाएं चित्रित हैं। इसीलिए उसके दुःख, पराभव और मृत्यु का वर्णन होने से यह एक [[दुःखान्तदुखान्त नाटक]] माना जाता है। कुछ विद्वान [[भीम]] को नाटक का नायक मानने के पक्ष में हैं, क्योंकि इसमें [[वीर रस]] की प्रधानता है तथा नाटक की कथा भीम की प्रतिज्ञाओं पर आधारित है। भीमसेन का चरित्र प्रभावशाली और आकर्षक है। उनके भाषणों से उनकी वीरता और पराक्रम का पता लगता है। उसमें आत्मविश्वास का अतिरेक है। [[अश्वत्थामा]] अपने गुणों को प्रकट किये बिना अपूर्ण व्यक्तित्व सा है।
 
नाटककार निस्सन्देह घटना-संयोजन में अत्यन्त दक्ष हैं। उनके वर्णन सार्थक और स्वाभाविक हैं। नाटक का प्रधान रस, वीर है। गौड़ी रीति, ओज गुण और प्रभावी भाषा-उसकी अन्य विशेषताएं हैं। [[कर्ण]] का वक्तव्य देखिये-