"कोथ": अवतरणों में अंतर

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<!-- [[चित्र:ULCERCELLULITIS1.JPG|right|thumb|300px|मधुमेहग्रस्त व्यक्ति के पैर में कोथ - इसका कुछ भाग शुष्क है और कुछ भाग आर्द्र है।]] -->
जब किसी भी कारण से शरीर के किसी भाग अथवा बड़े [[ऊतक]]-समूह की मृत्यु हो जाती है तब उस व्याधि को '''कोथ''' (ग्रैंग्रीनगेंग्रीन अथवा मॉर्टिफिकेशन, Gangrene or Mortification) कहते हैं। कोथ जानलेवा स्थिति का संकेत है। कोथ शब्द प्राय:प्रायः उन बाहरी अंगों के ऊतकों की मृत्यु के लिये उपयोग किया जाता है जो हमको दिखाई देते है। इस रोग में ऊतक का नाश अधिक मात्रा में हो जाता है। धमनी के रोग, धमनी पर दबाव या उसकी क्षति, विषैली ओषधियों, जैसे अरगट अथवा कारबोलिक अम्ल का प्रभाव, बिछौने के व्रण, जलना, धूल से दूषित व्रण, प्रदाह, संक्रमण, कीटाणु, तंत्रिकाओं का नाश तथा मधुमेह आदि कोथ के कारण हो सकते हैं।
 
== प्रकार ==
कोथ मुख्यत:मुख्यतः दो प्रकार का होता है: शुष्क और आर्द्र। शुष्क कोथ जिस भाग में होता है, वहाँ रक्तप्रवाह शनै: शनै: कम होकर पहले ऊतक का रंग मोम की तरह श्वेत तथा ठंढा हो जाता है, तदुपरांत राख के रंग का अथवा काला हो जाता है। यदि ऊर्ध्व या अध: शाखा में कोथ होता है तो वह भाग पतला पड़कर सूख जाता है और कड़ा होकर निर्जीव हो जाता है। इसको अंग्रेजी मे '''मॉर्टिफ़िकेशन''' कहते हैं। आर्द्र कोथ जिस भाग में होता है वहाँ [[रूधिर]] का संचार एकाएक कट जाता है, परंतु उस स्थान में रक्त भरा होता है और द्रव भरे छाले दिखाई देते हैं। वहाँ के सब ऊतक मृत हो जाते हैं। मृत भाग सड़े हुए खुरंड (स्लफ, Slough) के रूप में पृथक्‌ हो जाता है और उसके नीचे लाल रंग का व्रण निकल आता है। आरंभआरम्भ में ये असंक्रामक होता है। परंतुपरन्तु बाद में इसमें [[दंडाणु]] का संक्रमण हो जाता है।
 
दोनों प्रकार के कोथ में शल्य आवश्यक है। पेनिसिलिन की सुई और सल्फोनामाइड तथा निकोटिनिक अम्ल हितकर सिद्ध हुए हैं।