"शून्यता": अवतरणों में अंतर

1,246 बाइट्स जोड़े गए ,  12 वर्ष पहले
सम्पादन सारांश नहीं है
(नया पृष्ठ: '''शून्यवाद''' या '''शून्यता'' बौद्धों की महायान शाखा मा...)
 
No edit summary
'''शून्यवाद''' या '''शून्यता''' [[बौद्ध धर्म| बौद्धों]] की [[महायान]] शाखा माध्यमिक नामक विभाग का मत या सिद्धान्त है जिसमें संसार को शून्य और उसके सब पदार्थों को सत्ताहीन माना जाता है (विज्ञानवाद से भिन्न)।
 
"माध्यमिक न्याय" ने "शून्यवाद" को दार्शनिक सिद्धांत के रूप में अंगीकृत किया है। इसके अनुसार ज्ञेय और ज्ञान दोनों ही कल्पित हैं। पारमार्थिक तत्व एकमात्र "शून्य" ही है। "शून्य" सार, असत्, सदसत् और सदसद्विलक्षण, इन चार कोटियों से अलग है। जगत् इस "शून्य" का ही विवर्त है। विवर्त का मूल है संवृति, जो अविद्या और वासना के नाम से भी अभिहित होती है। इस मत के अनुसार कर्मक्लेशों की निवृत्ति होने पर मनुष्य निर्वाण प्राप्त कर उसी प्रकार शांत हो जाता है जैसे तेल और बत्ती समाप्त होने पर प्रदीप।
 
==इन्हें भी देखें==