शालिवाहन प्रमर–पश्चिमी इतिहासकारों की मूर्खता से रचे गये झूठे इतिहास से प्रमरवंशीय राजपूत सम्राट् शालिवाहन को इतिहास में जानबूझकर ‘शक’ के रूप में घोषित किया । प्रमरवंशी राजा विक्रमादित्य प्रमर ने (82–19 ई.पू) तक शासन किया एवं उन के प्रपौत्र शालिवाहन ईसा पश्चात् (78–138 ई.) शासन किया, जिसको शक से जोड़ कर प्रमरवंश का नाम उड़ा दिया । शालिवाहन ने शकों की हत्या कर अपने परदादा विक्रमादित्य की तरह शकारि (शकों के शत्रु) कहलाये थे और ये बात उन पश्चिमी इतिहासकारों ने भी मानी हैं, किन्तु फिर भी इतिहास में शालिवाहन को शकवंशीय कहा हैं । ईसवी सन् (78 ई.) में प्रपौत्र सम्राट् शालिवाहन ने शकों को हराया एवं शालिवाहन शक का प्रारम्भ किया । कई पश्चिमी इतिहासकार शातकर्णी एवं सातवाहन को सम्मिलित कर खिचड़ी इतिहास बनाते हुए सम्राट् शालिवाहन प्रमर को शातकर्णी राजा बना देते हैं।[1][2]

शालिवाहन
शकारि
दसवें प्रमर सम्राट
शासनावधि78–130 ई.
पूर्ववर्तीदेवदत
उत्तरवर्तीसलीहोत्र
संतानसलीहोत्र
घरानाप्रमर

परिचयसंपादित करें

प्रमर सम्राट् विक्रमादित्य के 49 वर्षों के पश्चात् सम्राट् शालिवाहन प्रमर का राज्याभिषेक (78 ई.) अम्बावती (वर्त्तमान् उज्जैन/अवन्तिका) में हुआ था एवं वें सम्राट् विक्रमादित्य प्रमर के प्रपौत्र थे । युगप्रतिष्ठापक शालिवाहन – ने अपनी राजधानी को धार सेलरा मोलेरा पहाडीयों पर स्थापित किया एवं भारतवर्ष के सम्पूर्ण भूमंडल पर अपना आधिपत्य स्थापित किया हिमालय से लेकर कन्याकुमारी तक व अपने परदादा सम्राट् विक्रमादित्य जैसे शूरवीर द्वितीय विश्वविजेता । इन्होंने अश्वमेधयज्ञ भी किया और फारस तक सभी देशों को जीत लिया ।[3][4]

युद्ध अभियानसंपादित करें

सम्राट् शालिवाहन परमार ने राजगद्दी पर आसीन होते ही (78 ई.) में विशाल सेना के साथ शक अश्शूरों पर आक्रमण कर आर्यावर्त के टुकड़े कर बनाये गये अवैदिक  मलेच्छस्थानों को ध्वस्त कर आर्यावर्त को मलेच्छ-मुक्त करके शुद्ध करने के लिए '''तार्तर''' (तार्तर — अश्शूरों का बृहत्तम भूभाग राज्य था जहाँ शक अश्शूरों का आधिपत्य था ।) इस भूभाग के टुकड़े होकर वर्त्तमान् में कई देश बने जैसे कि रूस, उज़्बेकिस्तान, युक्रेन, क़ज़ाख़स्तान, यूरेशिया, तुर्क, तुर्कमेनिस्तान ,किर्ग़िज़स्तान, बुल्गारिया व रोमानिया इत्यादि अन्य 28 देशों को मिला कर तार्तर/तैत्तिररि राज्य बना था।[5][4]

खोरासन (ईरान में), बाह्लीक (उत्तरी अफ़गानिस्तान) — इन सब म्लेच्छदेशों राज्यों पर आक्रमण कर दिया और शक एवं अश्शूरों का संहार किया एवं अश्शूरों/शकों को न केवल दण्डित कर सम्पूर्ण आर्यावर्त से खदेड़ा, अपितु अश्शूरों द्वारा लुटे गये प्रजाधन को भी वापस लाये एवं खण्डित किये गये आर्यावर्त को फिर से अखंड किया । राज्य की सीमाओं पर सैन्यबल से घेड़ा किया गया जिससे मलेच्छ आर्यावर्त की सीमा लांघ कर आक्रमण ना कर पायें एवं आर्यावर्त्त की सीमा को सिन्धुनदी के पूर्व में स्थापित करते हुए म्लेच्छदेशों की सीमा को सिन्धु नदी के पश्चिम में स्थापित किया ।[6][5]

शक संवत् या शालिवाहन संवत्संपादित करें

विक्रमसंवत् के पश्चात् शालिवाहन संवत् का आरंभ हुआ । ईसवी सन् (78 ई.) में प्रपौत्र सम्राट् शालिवाहन ने शकों को हराया एवं शालिवाहन शक का प्रारम्भ किया ।[7][7]

इन्हें भी देखेंसंपादित करें

सन्दर्भसंपादित करें

  1. Moriz Winternitz 1985, पृ॰ 377.
  2. Viśvanātha Devaśarmā (1999). Shudraka. Sahitya Akademi. पृ॰ 4. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 9788126006977.
  3. Kota Venkatachelam (1956). Indian eras. पपृ॰ 63–70.
  4. Alf Hiltebeitel (2009). Rethinking India's Oral and Classical Epics: Draupadi among Rajputs, Muslims, and Dalits. University of Chicago Press. पपृ॰ 254–275. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 9780226340555.
  5. William Cooke Taylor (1838). Examination and Analysis of the Mackenzie Manuscripts Deposited in the Madras College Library. Asiatic Society. पपृ॰ 49–55.
  6. सन्दर्भ त्रुटि: <ref> का गलत प्रयोग; JASB_1875 नाम के संदर्भ में जानकारी नहीं है।
  7. Government of India (1955), "The Saka Era", Report of the Calendar Reform Committee, पपृ॰ 255–256

बाहरी कड़ियाँसंपादित करें