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आधुनिक और सामानय अर्थ में, लोकविधान के अनुसार, सनातन धर्म के चार वर्णों में से चौथा वर्ण शूद्र कहलाता है। इनका कार्य उद्योग करना और निम्न कोटी के शिल्प के काम करना माना गया कुछ वैश्य वर्ण उच्च कोटी के धातु के भी शिल्प कार्य करते है बस वो कर्म शूद्र लेकिन उनका वर्ण वैश्य माना जाता है यजुर्वेद में शूद्रों की उपमा समाजरूपी शरीर के पग से दी गई है;अर्थात अर्थव्यवस्था इन्ही की उपमा है । समाजरूपी शरीर इन्ही के अर्थव्यवस्था के पैर से समाज गतिशील है । इसीलिये कुछ लोग इनकी उत्पत्ति ब्रह्मा के पैरों से मानते हैं।

विविध युगों और परंपराओं में शूद्रों की स्थिति विभिन्न थी। वैसे शूद्र (और वर्ण-व्यवास्था पर भी) शास्त्रों में अलग-अलग बातें कहीं गयीं हैं। उदाहरण के लिए डॉ भीमराव आम्बेडकर का मत है कि शूद्र मूलतः आर्य थे।

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