हिन्दू वर्ण व्यवस्था

वर्ण की संरचना

वर्ण-व्‍यवस्‍था हिन्दू धर्म में सामाजिक कार्योन्नति (ऊन्नति) का एक आधार है। हिंदू धर्म-ग्रंथों के अनुसार समाज को चार वर्णों के कार्यो से समाज का स्थायित्व दिया गया हैै - ब्राह्मण (शिक्षा सम्बन्धी कार्य), क्षत्रिय (शत्रु से रक्षा), वैश्य (वाणिज्य) और शूद्र (उद्योग व कला) । इसमे सभी वर्णों को उनके कर्म में श्रेष्ठ माना गया है। शिक्षा के लिए ब्राह्मण श्रेष्ठ, सुरक्षा करने मे क्षत्रिय श्रेेष्ठ, वैश्य व शूद्र उद्योग करने मे श्रेेष्ठ । वैश्य व शूद्र वर्ण को बाकी सब वर्ण को पालन करने के लिए राष्ट्र का आधारभूत संरचना उद्योग व कला (कारीगर) करने का प्रावधान इन धर्म ग्रंथो मे किया गया है।

वे सभी जो सुरत हैं, विनम्र हैं, सत्कर्मों में लगे हैं, सुदन्त है, आत्मसंयम का जीवन जीते हैं, वे सभी परिनिवृत हैं, चाहे वे क्षत्रिय हों , ब्राह्मण हों, वैश्य हों, शूद्र हों। (सुत्तनिपात )

वर्ण एक अवस्था है। शास्त्रों के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति शूद्र पैदा होता है और प्रयत्न और विकास से अन्य वर्ण अवस्थाओं में पहुंचता है। वास्तव में प्रत्येक में चारों वर्ण स्थापित हैं। इस व्यवस्था को वर्णाश्रम धर्म कहते हैं।[1]

इन्हें भी देखेंसंपादित करें

सन्दर्भसंपादित करें

  1. गविन फ्लूड (२४ अगस्त २००८). "Hindu concepts" [हिन्दू विचारधारा] (अंग्रेज़ी में). बीबीसी. मूल से 11 अप्रैल 2014 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि २३ जून २०१४.