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किसी भी व्यक्ति, जो हिंदू धर्म के सांस्कृतिक या धार्मिक पहलुओं का पालन करता है, हिंदू कहा जा सकता है। ऐतिहासिक रूप से यह शब्द भारतीय उपमहाद्वीप के लोगों की भौगोलिक, सांस्कृतिक, पहचान के रूप में उपयोग किया गया है।

हिंदू शब्द का ऐतिहासिक अर्थ समय के साथ विकसित हुआ है। 1 सहस्त्राब्दी बीसीई में, फारसी और यूनानी ने सिंधु की भूमि के लिए इस शब्द का इस्तेमाल किया|मध्ययुगीन युग के ग्रंथों ने हिन्दू को भारतीय उपमहाद्वीप में सिंधु (इंडस) नदी के पार या उससे आगे रहने वाले लोगों के लिए पहचान के रूप में परिभाषित किया।16 वीं शताब्दी से, इस शब्द का इस्तेमाल उपमहाद्वीप के निवासियों के लिए करना शुरू हुआ, जो तुर्क या मुस्लिम नहीं थे।डॉ अंबेडकर ने शूद्रों को आर्य के रूप में देखा और आर्यन आक्रमण सिद्धांत को खारिज कर दिया। डॉ अंबेडकर ने इसे बेतुका बताया। उन्होंने अपनी पुस्तक "हू वेर द शूद्र्स?" में कहा था (1946)| आर्यन आक्रमण सिद्धांत बहुत पहले ही मृत होना चाहिए था। भारतीय समाज जातीय सामाजिक इकाइयोंआदिवासी समाज वास्तव में एक ऐसा समाज है, जिसने अपनी परम्पराएं, संस्कार और रीति-रिवाज संरक्षित रखे है। हॉ यह बात सही है कि अपने जल, जंगल-जमीन में सिमटा यह समाज शैक्षिक आर्थिक रूप से पिछड़ा होने के कारण राष्ट्र की विकास यात्रा के लाभों से वंचित है। डॉ. रमणिका गुप्ता आदिवासियों के विषय में अपना अभिमत व्यक्त करते हुए लिखती हैं, ”यह सही है कि आदिवासी साहित्य अक्षर से वंचित रहा, इसलिए वह उसकी कल्पना और यथार्थ को लिखित रूप से न साहित्य में दर्ज कर पाया और न ही इतिहास में। हॉ लोकगीतों, किंवदन्तियों, लोककथाओं तथा मिथकों के माध्यम से उसकी गहरी पैठ है।“

अनुसूचित जाति (अनुसूचित जातियों) और अनुसूचित जनजाति (एसटी) भारत में ऐतिहासिक रूप से वंचित लोगों के लिए आधिकारिक शब्द हैं। ये शब्द भारत के संविधान में मान्यता प्राप्त हैं और इन शब्दों के तहत विभिन्न समूहों को एक या अन्य श्रेणियों में नामित किया गया है। भारतीय उपमहाद्वीप में ब्रिटिश शासन की अधिकांश अवधि के लिए, उन्हें शोषित वर्ग के रूप में जाना जाता था। आदिवासी (या "मूल निवासियों") को अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के नाम से जाना जाता है| अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति भारत के सबसे वंचित सामाजिक-आर्थिक समूहों में से हैं।अनुसूचित जाति वह जातियां हैं जो अस्पृश्यता की पुरानी परंपरा से उत्पन्न होने वाली अत्यधिक सामाजिक, शैक्षिक और आर्थिक पिछड़ेपन से ग्रस्त हैं। उनके हितों की सुरक्षा के लिए और त्वरित सामाजिक-आर्थिक विकास के लिए विशेष विचार की आवश्यकता है। इन समुदायों को संविधान के अनुच्छेद 341 के खंड 1 में निहित प्रावधानों के अनुसार अनुसूचित जाति के रूप में अधिसूचित किया गया था।

यह सच है कि दलित तबका शिक्षा, विकास तथा धनार्जन के मूलभूत अधिकारों से वंचित रखा गया, किन्तु ऐतिहासिक तथ्य यह है कि अंग्रेजों को भारत से खदेड़ने के लिए पहला विद्रोह तिलका मांझी ने सन् 1824 में उस समय किया था, जब उन्होंने अंग्रेज़ कमिश्नर क्लीवलैण्ड को तीर से मार गिराया था। सन् 1765 में खासी जनजाति ने अंग्रेज़ों के विरूद्ध विद्रोह किया था। सन् 1817 ई. में खानदेश आन्दोलन, सन् 1855 ई. में संथाल विद्रोह तथा सन् 1890 में बिरसा मुंडा का आन्दोलन अंग्रेज़ों के विरूद्ध आदिवासियों के संघर्ष की गौरव गाथाएं हैं, किन्तु दुर्भाग्य की बात है कि इतिहासकार 1857 ई. को ही नवजागरण का प्रस्थान बिन्दु मानते हैं और आदिवासियों के सशस्त्र विद्रोह की उपेक्षा कर देते हैं।

”भिलाई वाणि“ पत्रिका के आदिवासियों के शोषण का चित्र खींचते हुए ”यहां सब बिकता है“ शीर्षक से लेख में लिखा है, ”करोड़ों रूपयों का प्रसाधन, प्रकृति खनिज सम्पदा गरीब तबके के बेसहारा लोग छोटे-छोटे आरोपों व संघर्ष में फंसकर अपराधी के रूप में सालों-साल जेलों में सड़ते रहते हैं, वहीं धन-बल वाले करोड़ों रूपयों का घोटाला करने के बाद भी खुलेआम घूमते दिखते हैं।

यदि आंकड़ों पर गौर करें तो हम पाते हैं कि आदिवासी देश की कुल आबादी का 8.14 प्रतिशत भूभाग पर हैं और भारत के भौगोलिक क्षेत्रफल के 15 प्रतिशत भूभाग पर ये निवास करते हैं। भारत का संविधान आदिवासी अथवा अनुसूचित जनजाति समाज को अलग से परिभाषित नहीं करता किन्तु संविधान के अनुच्छेद-366 (25) के अन्तर्गत ”अनुसूचित“ का सन्दर्भ उन समुदायों में करता है, जिन्हें संविधान के अनुच्छेद-342 में अनुसूचित किया गया है। संविधान के अनुच्छेद-342 के अनुसार अनुसूचित जनजातियां वे आदिवासी या आदिवासी समुदाय या इन आदिवासी समुदायों का भाग या उनके समूह हैं, जिन्हें राष्ट्रपति द्वारा एक सार्वजनिक अधिसूचना द्वारा इस प्रकार घोषित किया गया है। किसी समुदाय के अनुसूचित जनजाति में विशिष्टीकरण के लिए पालन किए गए मानदण्ड हैं, आदिम लक्षणों का होना, विशिष्ट संस्कृति, भौगोलिक बिलगांव, वृहत्तर समुदाय से सम्पर्क में संकोच और पिछड़ापन। यह दुखद तथ्य हैं कि आदिवासी समाज की 52 प्रतिशत आबादी गरीबी की रेखा के नीचे जीवनयापन करती है तथा 54 प्रतिशत आदिवासियों के पास आर्थिक सम्पदा, संचार और परिवहन की पहुंच रही है।

आदिवासियों की साक्षरता की प्रगति यात्रा इस चार्ट से समझी जा सकती है- से गठित और विभक्त है। श्रमविभाजनगत आनुवंशिक समूह भारतीय ग्राम की कृषिकेंद्रित व्यवस्था की विशेषता रही है। यहाँ की सामाजिक व्यवस्था में श्रमविभाजन संबंधी विशेषीकरण जीवन के सभी अंगों में अनुस्यूत है और आर्थिक कार्यों का ताना बाना इन्हीं आनुवंशिक समूहों से बनता है। यह जातीय समूह एक ओर तो अपने आंतरिक संगठन से संचालित तथा नियमित है और दूसरी ओर उत्पादन सेवाओं के आदान प्रदान और वस्तुओं के विनिमय द्वारा परस्पर संबद्ध हैं। समान परंपरागत पेशा या पेशे, समान धार्मिक विश्वास, प्रतीक सामाजिक और धार्मिक प्रथाएँ एवं व्यवहार, खानपान के नियम, जातीय अनुशासन और सजातीय विवाह इन जातीय समूहों की आंतरिक एकता को स्थिर तथा दृढ़ करते हैं। इसके अतिरिक्त पूरे समाज की दृष्टि में प्रत्येक जाति का सोपानवत्‌ सामाजिक संगठन में एक विशिष्ट स्थान तथा मर्यादा है जो इस सर्वमान्य धार्मिक विश्वास से पुष्ट है कि प्रत्येक मनुष्य की जाति तथा जातिगत धंधे दैवी विधान से निर्दिष्ट हैं और व्यापक सृष्टि के अन्य नियमों की भाँति प्रकृत तथा अटल हैं

एक गाँव में स्थित परिवारों का ऐसा समूह वास्तव में अपनी बड़ी जातीय इकाई का अंग होता है जिसका संगठन तथा क्रियात्मक संबंधों की दृष्टि से एक सीमित क्षेत्र होता है, जिसकी परिधि सामान्यत: 20-25 मील होती है। उस क्षेत्र में जातिविशेष की एक विशिष्ट आर्थिक तथा सामाजिक मर्यादा होती है जो उसके सदस्यों को, जो जन्मना होते हैं, परंपरा से प्राप्त होती है। यह जातीय मर्यादा जीवन पर्यंत बनी रहती है और जातीय धंधा छोड़कर दूसरा धंधा अपनाने से तथा आमदनी के उतार चढ़ाव से उसपर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। यह मर्यादा जातीय-पेशा, आर्थिक स्थिति, धार्मिक संस्कार, सांस्कृतिक परिष्कार और राजनीतिक सत्ता से निर्धारित होती है और निर्धारकों में परिवर्तन आने से इसमें परिवर्तन भी संभव है। किंतु एक जाति स्वयं अनेक उपजातियों तथा समूहों में विभक्त रहती है। इस विभाजन का आधार बहुधा एक ही पेशे के अंदर विशेषीकरण के भेद प्रभेद होते हैं। किंतु भौगोलिक स्थानांतरण ने भी एक ही परंपरागत धंधा करनेवाली एकाधिक जातियों को साथ साथ रहने का अवसर दिया है। कभी कभी जब किसी जाति का एक अंग अपने परंपरागत पेशे के स्थान पर दूसरा पेशा अपना लेता है तो कालक्रम में वह एक पृथक्‌ जाति बन जाता है। उच्च हिंदू जातियों में गोत्रीय विभाजन भी विद्यमान हैं। गोत्रों की उपायोगिता मात्र इतनी ही है कि वे किसी जाति के बहिविवाही समूह बनाते हैं। और एक गोत्र के व्यक्ति एक ही पूर्वज के वंशज समझे जाते हैं। यह उपजातियाँ भी अपने में स्वतंत्र तथा पृथक्‌ अंतविवाही इकाइयाँ होती हैं और कभी कभी तो बृहत्तर जाति से उनका संबंध नाम मात्र का होता है (दे. गोत्रीय तथा अन्यगोत्रीय)। इन उपजातियों में भी ऊँच नीच का एक मर्यादाक्रम रहता है। उपजातियाँ भी अनेक शाखाओं में विभक्त रहती है और इनमें भी उच्चता तथा निम्नता का एक क्रम होता है जो विशेष रूप से विवाह संबंधों में व्यक्त होता है। विवाह में ऊँची पंक्तिवाले नीची पंक्तिवालों की लड़की ले सकते हैं किंतु अपनी लड़की उन्हें नहीं देते। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 341 के अनुसार पिछड़ी जाति की अनेक उपजातियो को भाषा, भेषभूषा, रहन सहन ,खान पीन,रीति रिवाजों व ऊंच, नीच के आधार पर अनुसूचित जातियों के रूप में वर्गीकृत किया गया है । उदाहरण के तौर पर धनगर जाति जो गड़रिया जाति की उपजाति है को भारतीय संविधान के अनुच्छेद 341 में वर्णित व्यवस्था के अनुसार उत्तर प्रदेश में अनुसूचित जातियों की सूची में क्रमांक संख्या 27 पर वर्गीकृत किया गया है।

'जाति' शब्द की व्युत्पत्तिसंपादित करें

आदिपुराण जैनधर्म का एक प्रख्यात पुराण है जो सातवीं शताब्दी में जिनसेन आचार्य द्वारा लिखा गया था।आदिपुराण (जैन धर्म साहित्य में)में वर्ण और जाति का सबसे पुराना उल्लेख है|जिनसेन वर्ण व्यवस्था की उत्पत्ति को ऋग्वेद या पुरुष सुक्त से नहीं बताते हैं, बल्कि राजा भरत की कथा के रूप में के वर्ण व्यवस्था की उत्पत्ति को बताते हैं|इस पौराणिक कथा के अनुसार, भरत ने "अहिंसा परीक्षण" किया, और उनके समुदाय के जिन सदस्यों ने किसी भी जीवित व्यक्ति को नुकसान पहुंचाने या चोट पहुंचाने से इंकार कर दिया, उन्हें प्राचीन भारत में पुजारी वर्ण कहा जाता था, और भरत उन्हें द्विज (दो बार पैदा हुआ) बताते हैं ।जिनसेन आचार्य का कहना है कि जो लोग अहिंसा के प्रति प्रतिबद्ध हैं वे देव-ब्राह्मण, दैवीय ब्राह्मण हैं।१८वीं सदी के सिख साहित्य में, ‘वर्ण’ शब्द वर्ण व्यवस्था के संदर्भ में, और जात या जात - बिरादरी के रूप में जाति व्यवस्था का उल्लेख है । जात ब्रिटिश औपनिवेशिक युग के दौरान विशेष रूप से जाति व्यवस्था के रूप विकसित किया गया था । शब्दव्युत्पत्ति की दृष्टि से जाति शब्द संस्कृत की 'जनि' (जन) धातु में 'क्तिन्‌' प्रत्यय लगकर बना है। न्यायसूत्र के अनुसार समानप्रसावात्मिकाजाति अर्थात्‌ जाति समान जन्मवाले लोगों को मिला कर बनती है। 'न्यायसिद्धांतमुक्तावली' के अनुसार जाति की परिभाषा इस प्रकार है - नित्यत्वे सति अनेकसमवेतत्वम्जातिवर्त्त्य' अर्थात्‌ जाति उसे कहते हौं जो नित्य है और अपनी तरह की समस्त वस्तुओं में समवाय संबंध से विद्यमान है। व्याकरण शास्त्र के अनुसार जाति की परिभाषा है - आकृति ग्रहण जातिलिंगनांचनसर्वं भाक्‌ सकृदाख्यातनिर्गाह्या गोत्रंच चरणै: सह। अर्थात्‌ जाति वह है जो आकृति के द्वारा पहचानी जाए, सब लिंगों के साथ न बदल जाए और एक बार के बतलो से ही जान ली जाए। इन परिभाषाओं और शब्दव्युत्पत्ति से स्पष्ट है कि 'जाति' शब्द का प्रयोग प्राचीन समय में विभिन्न मानवजातियों के लिये नहीं होता था। वास्तव में जाति मनुष्यों के अंतर्विवाही समूह या समूहों का योग है जिसका एक सामान्य नाम होता है, जिसकी सदस्यता अर्जित न होकर जन्मना प्राप्त होती है, जिसके सदस्य समान या मिलते जुलते पैतृक धंधे या धंधा करते हैं और जिसकी विभिन्न शाखाएँ समाज के अन्य समूहों की अपेक्षा एक दूसरे से अधिक निकटता का अनुभव करती हैं।मनुस्मृति ("मनु का कानून") हिंदू धर्म की धर्मशास्त्र शास्त्रीय परंपरा का महत्वपूर्ण और प्रारंभिक कार्य है।मनुस्मृति के बहुत से संस्करण उपलब्ध हैं। कालान्तर में बहुत से प्रक्षेप भी स्वाभाविक हैं। कई धर्मशास्त्र हैं| उनकी संख्या का अनुमान 18 से 100 के बीच है|उनका दृष्टिकोण विरोधाभासी है| पांडुरंग वामन काणे, सामाजिक सुधार को समर्पित एक महान विद्वान्, ने इस पुरानी परंपरा को जारी रखा है। उनका धर्मशास्त्र का इतिहास, पाँच भागों में प्रकाशित है, प्राचीन भारत के सामाजिक विधियों तथा प्रथाओं का विश्वकोश है। इससे हमें प्राचीन भारत में सामाजिक प्रक्रिया को समझने में मदद मिलती है।"आधुनिक युग में लगभग 20 धर्मशास्त्र ज्ञात हैं|आधुनिक युग में उनके मूल पाठ के छोटे टुकड़े हमें ज्ञात हैं|चार का अंग्रेजी में अनुवाद किया गया है, और अन्य का अभी तक अनुवाद नहीं किया गया है।हालांकि सभी अपने लेखकों के नाम लेते हैं, लेकिन यह निर्धारित करना अभी भी कठिन है कि ये वास्तविक लेखक कौन थे।इनमें से सबसे महत्वपूर्ण में अपास्तम्ब, गौतम, बौद्ध्यन और वसिष्ठ के सूत्र है। साक्ष्यों की कमी के कारण; इन दस्तावेजों की तारीखों के बारे में अनिश्चितता है इन दस्तावेजों की भौगोलिक स्थिति के बारे में भ्रम है।धर्मसुत्र संक्षिप्त सूत्र प्रारूप में लिखे गए हैं। इसकी संक्षिप्त वाक्य संरचनाओं को समझना मुश्किल है। पाठक, उनकी व्याख्या, अपनी मानसिकता के अनुसार कर सकते हैं|यह पाठक की व्याख्या के लिए खुला है (उसकी पसंद के अनुसार)।यही कारण है कि कुछ लोगों ने इसका दुरुपयोग किया।धर्मशास्त्र (मनुस्मृति, यज्ञवल्क्य स्मृती आदि) धर्मसुत्रों के व्युत्पन्न लेखन हैं|धर्मशास्त्र श्लोक शैली का उपयोग करते है। शब्द “धर्मशास्त्र” वेदों में मौजूद नहीं है। शब्द “धर्मशास्त्र” Yaska's Nirukta में पहली बार आता है।पाणिनी के कार्य (3 शताब्दी ईसा पूर्व) पर कैत्यायान की टिप्पणी, में “धर्मशास्त्र” शब्द का सबसे पुराना ज्ञात उल्लेख है।मौजूदा धर्मशास्त्र नीचे सूचीबद्ध हैं:मनुस्मृति (2-3शताब्दी), यज्ञवल्क्य स्मृति (4-5 शताब्दी), नारद स्मृति(5-6 शताब्दी), विष्णु स्मृति (700 AD). साक्ष्य से पता चलता है कि शासन के मामले में यज्ञवल्क्य स्मृति, राज्य घोष और अन्य विद्वानों की स्मृतियां, मनुस्मृति की तुलना में ज्यादा इस्तेमाल की जाती थीं। मनुस्मृति के मुकाबले ये स्मृतियां अधिक "संक्षिप्त, व्यवस्थित, परिष्कृत और उदार" हैं| मनुस्मृति के काल एवं प्रणेता के विषय में नवीन अनुसंधानकारी विद्वानों ने पर्याप्त विचार किया है। उनमे से कुछ कहते हैं कि मनुस्मृति से पहले कोई 'मानव धर्मसूत्र' था,  जिसका आश्रय लेकर किसी ने एक मूल मनुस्मृति बनाई थी| जो बाद में बिगड़ कर होकर वर्तमान रूप में प्रचलित हो गई। मनुस्मृति के अनेक विचार या वाक्य, महाभारत आदि प्राचीन ग्रंथों में नहीं मिलते हैं| यह अनुमान बहुत कुछ तर्कसंगत प्रतीत होता है कि  धर्मशास्त्र के नाम से

विषय परक वाक्य समाज में प्रचलित थे, जिनका निर्देश महाभारत आदि में है तथा जिन वचनों का आश्रय लेकर वर्तमान मनुसंहिता बनाई गई|

जातियों की संख्यासंपादित करें

ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन से पहले, दक्षिण एशिया में मुसलमानों के लिए शरिया (इस्लामी कानून) को फतवा-ए-आलमगिरी में संहिताबद्ध किया गया था| लेकिन गैर-मुसलमानों (जैसे हिंदू, बौद्ध, सिख, जैन, पारसी) के लिए कानून - इस्लामी शासन के 600 वर्षों के दौरान संहिताबद्ध नहीं किये थे|ब्रिटिश औपनिवेशिक अधिकारियों के आगमन के साथ, मनुस्मृति ने दक्षिण एशिया में गैर-मुस्लिमों के लिए एक कानूनी प्रणाली का निर्माण करने में भूमिका निभाई| ईस्ट इंडिया कंपनी और बाद में ब्रिटिश क्राउन, अपने ब्रिटिश शेयरधारकों के लिए व्यापार के जरिए मुनाफा कमाना चाहते थे। वे न्यूनतम सैन्य हस्तक्षेप के साथ प्रभावी राजनीतिक नियंत्रण बनाए रखना चाहते थे।प्रशासन ने कम से कम प्रतिरोध का रास्ता अपनाया ब्रिटिश प्रशासन विभिन्न रियासतों में स्थानीय मध्यस्थों पर निर्भर थे। उनमें से ज्यादातर मुसलमान और कुछ हिंदू थे। ब्रिटिश शासन ने प्रतिरोध को कम करने के लिये इन के द्वारा सुझाये गये रास्तो का पालन करने की कोशिश की|भारत के मुसलमानों के लिए, अंग्रेजों ने कानूनी कोड के रूप में शरिया को स्वीकार किया|शरिया के नियम अल-दीरियाह और फतवा-ए आलमगिरी पर आधारित थे, जिन्हें औरंगजेब ने  लिखवाया था। हिन्दू और अन्य गैर-मुस्लिम जैसे बौद्ध, सिख, जैन, पारसी और आदिवासी लोगों के लिए, इस प्रकार की कानूनी जानकारी उपलब्ध नहीं थी। ब्रिटिश औपनिवेशिक अधिकारियों द्वारा लगभग मृत और बेकार मनुस्मृति से हिंदू कानून के तत्वों की खोज की गई थी|।यह पहला धर्मशास्त्र था, जिसका अनुवाद 17 9 4 में हुआ था।ब्रिटिश औपनिवेशिक अधिकारियों ने धर्मशास्र से ब्रिटिश कानून और धर्म के समान कानूनी व्यवस्था निकालने का प्रयास किया। ताकि वे इस कॉलोनी पर शासन कर सकें| आधुनिक विद्वानों के अनुसार, ब्रिटिश औपनिवेशिक अधिकारियों ने गलती से मनुस्मृति को कानून के कोड के रूप में समझ लिया। वे यह मानने में नाकाम रहे कि मनुस्मृति नैतिकता और कानून पर टिप्पणी थी, नाकि एक कानूनी प्रणाली|19वीं शताब्दी के शुरुआती औपनिवेशिक अधिकारियों वे यह समझने में नाकाम रहे कि मनुस्मृति कई धर्मशास्त्र ग्रंथों में से एक था| जिन में कई विषयों पर परस्पर विरोधी विचार हैं| जिन में कई, भारत के इतिहास के दौरान शताब्दियों से  प्रयोग में नहीं थे।

मुसलमानों के लिए मौजूदा कानूनी ग्रंथों और मनुस्मृति पांडुलिपि को पुनर्जीवित करने से औपनिवेशिक राज्य में धार्मिक और राजनीतिक संघर्षों को बनाए रखने में मददमिली|भारत में जातियों और उपजातियों की निश्चित संख्या बताना कठिन है। श्रीधर केतकर के अनुसार केवल ब्राह्मणों की 800 से अधिक अंतर्विवाही जातियाँ हैं। और ब्लूमफील्ड का मत है कि ब्राह्मणों में ही दो हजार से अधिक भेद हैं। सन्‌ 1901 की जनगणना के अनुसार, जो जातिगणना की दृष्टि से अधिक शुद्ध मानी जाती है, भारत में उनकी संख्या 2378 है। डॉ॰ जी. एस. घुरिए की प्रस्थापना है कि प्रत्येक भाषाक्षेत्र में लगभग दो सौ जातियाँ होती हैं, जिन्हें यदि अंतर्विवाही समूहों में विभक्त किया जाए तो यह संख्या लगभग 3,000 हो जाती है।

जाति की विशेषताएँसंपादित करें

दर्शनशास्त्र के एक प्रोफेसर फ़ाऊलर बताते हैं कि यह निर्धारित करना असंभव है कि जातियां कैसे अस्तित्व में आईं और क्यों? सूज़न कहती हैं कि स्वतंत्रता से पूर्व के युग में गरीबी, संस्थागत मानवाधिकारों की कमी, अस्थिर राजनीतिक और आर्थिक असुरक्षा के माहौल ने जाति व्यवस्था को समाज में स्थापित किया| मेटकांफ़ लिखते हैं "शिलालेख और अन्य समकालीन सबूतों के आधार पर, हाल के शोधकर्ताओं ने आश्चर्यजनक रूप से माना है कि  कि अपेक्षाकृत हाल की सदियों तक, भारतीय उपमहाव्दीप क्षेत्र का अधिकांश समाज चार वर्णों की व्यवस्था (जाति व्यवस्था के रूप में) से बहुत कम प्रभावित हुआ था और जाति व्यवस्था समाज का निर्माण खंड नहीं थी ।

जाति की परिभाषा असंभव मानते हुए अनेक विद्वानों ने उसकी विशेषताओं का उल्लेख करना उत्तम समझा है। डॉ॰ जी. एस धुरिए के अनुसार जाति की दृष्टि से हिंदू समाज की छह विशेताएँ हैं -

(1) जातीय समूहों द्वारा समाज का खंडों में विभाजन,

(2) जातीय समूहों के बीच ऊँच नीच का प्राय: निश्चित तारतम्य,

(3) खानपान और सामाजिक व्यवहार संबंधी प्रतिबंध

(4) नागरिक जीवन तथा धर्म के विषय में विभिन्न समूहों की अनर्हताएँ तथा विशेषाधिकार,

(5) पेशे के चुनाव में पूर्ण स्वतंत्रता का अभाव और

(6) विवाह अपनी जाति के अंदर करने का नियम।

जाति एक स्वायत्त ईकाईसंपादित करें

परंपरागत रूप में जातियाँ स्वायत्त सामाजिक इकाइयाँ हैं जिनके अपने आचार तथा नियम हैं और जो अनिवार्यत: बृहत्तर समाज की आचारसंहिता के अधीन नहीं हैं। इस रूप में सब जातियों की नैतिकता और सामाजिक जीवन न तो परस्पर एकरस है और न पूर्णत: समन्वित। फिर भी, भारतीय जातिपरक समाज का समन्वित तथा सुगठित सामुदायिक जीवन है, जिसमें विविधताओं तथा विभिन्नताओं को सामाजिक मान्यता प्राप्त है। क्षत्रिय, ब्राह्मण तथा कुछ वैश्य जातियों को छोड़कर प्राय: प्रत्येक जाति की नियमित तथा आचारों का उल्लंघन करने पर उन्हें दंडित करती है। क्षत्रिय तथा ब्राह्मण जातियाँ भी जातीय जनमत के दबाव से और यदाकदा जातीय बंधुओं की तदर्थ पंचायत द्वारा उल्लंघनकर्ताओं को अनुशासित और दंडित करती हैं। उच्च जातीयों का यह अनुशासन राज्यतंत्र द्वारा भी होता रहा है।

जातियों में ऊँच-नीच का भेदसंपादित करें

जातियाँ एक दूसरे की तुलना में ऊँची या नीची हैं। एक ओर क्षत्रिय के बाद दूसरी धार्मिक रूप से पवित्र मानी जानेवाली ब्राह्मण जातियाँ हैं और दूसरी ओर सबसे नीचे अंत्यज श्रेणी की 'अपवित्र' और 'अछूत' कही जानेवाली जातियाँ हैं। इनके बीच अन्य सभी जातियाँ हैं जो सामाजिक मर्यादा की दृष्टि से उच्च, मध्यम और निम्न श्रेणी में रखी जा सकती हैं। हिंदू धर्मशास्त्रों ने पूरे समाज को ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र इन चार वर्णो में विभक्त किया है। जातियों की सामाजिक मर्यादा का अनुमान करने में इससे सुविधा होती है। किंतु अनेक जातियों की वर्णगत स्थिति अनिश्चित है। कायस्थ जाति के वर्ण के विषय में अनेक धारणाएँ हैं।

जातियों की अनर्हताएँ तथा विशेषाधिकारसंपादित करें

भारत की जाति व्यवस्था नृवंशविज्ञान का एक उदाहरण है|इसकी उत्पत्ति प्राचीन भारत में हुई थी||इस में मध्ययुगीन,और आधुनिक भारत के विभिन्न शासक अभिजात वर्गों द्वारा परिवर्तन किया गया था (खासकर मुगल साम्राज्य और ब्रिटिश राज।)

इसमें दो अलग-अलग अवधारणाएं शामिल हैं , वर्ण (व्यवसाय पर आधारित सैद्धांतिक वर्गीकरण) और जाति (उपमहाद्वीप में प्रचलित हजारों अंतर्विवाही समूहों को संदर्भित करता है) |एक जाति को एक गोत्रा ​​के आधार पर विजातीय विवाह करने समूहों में विभाजित किया जा सकता है।जाति व्यवस्था का आधुनिक रुप , मुगल साम्राज्य के पतन और ब्रिटिश औपनिवेशिक साम्राज्य के उदय के दौरान उत्पन्न हुआ था|मुगल साम्राज्य के पतन के फलस्वरुप एक (उत्पन्न सत्ता शून्य मे) ऎसे वर्ग का उदय हुआ जो सत्ता के निकट था| इस वर्ग ने जाति को पुर्ण रूप मे स्थापित किया| मुगल युग के पतन के दौरान राजाओं, सत्ता से जुड़े शक्तिशाली वर्ग का उदय देखा गया था| इस वर्ग  ने जातिहीन सामाजिक समूहों को कई अलग-अलग जाति समुदायों में  बदल दिया। भारतीय जातिव्यवस्था में कुछ जातियाँ उच्च, पवित्र, शुद्ध और सुविधाप्राप्त हैं और कुछ निकृष्ट, अशुद्ध, अस्पृश्य और असुविधाप्राप्त हैं। क्षत्रिय पूज्य एवं ब्राह्मण पवित्र हैं और उन्हें अनेक धार्मिक, सामाजिक तथा नगारिक विशेषाधिकार प्राप्त हैं। इनके विपरीत अस्पृश्य जातियाँ हैं। धार्मिक दृष्टि से ये जातियाँ शास्त्रों के पठनपाठन तथा श्रवण के अधिकार से वंचित हैं। इनका उपनयन संस्कार नहीं होता। इनके धार्मिक कृत्यों में पौरोहित्य नहीं करता। देवालयों में इनका प्रवेश निषिद्ध है। ये अशुद्ध और अशुद्धिकारक हैं। आर्थिक और व्यावसायिक क्षेत्र में गंदे और निकृष्ट समझे जानेवाले कार्य इनके सुपुर्द हैं जिनसे आय प्राय: अत्यल्प होती है। इनकी बस्तियाँ गाँव से कुछ हटकर होती हैं। ये अनेक सामाजिक और नागरिक अनर्हताओं के भागीदार हैं। नाई और धोबी की शारीरिक सेवाएँ इन्हें उपलब्ध नहीं हैं। ये सार्वजनिक तालाबों, धर्मशालाओं और शिक्षासंस्थाओं का उपयोग नहीं कर सकते। अंत्यजों की दशा उत्तर की अपेक्षा दक्षिण भारत में अधिकहीन है। 18 वीं शताब्दी के पूर्वार्ध तक महाराष्ट्र में महार जाति के लोगों को दिन में दस बजे के बाद और 4 बजे के पहले ही गाँव और नगर में घुसने की आज्ञा थी। उस समय भी उन्हें गले में हाँडी और पीछे झाड़ू बाँधकर चलना होता था। दक्षिण भारत में पूर्वी और पश्चिमी घाट के शाणान और इड़वा कुछ काल पूर्व तक दुतल्ला मकान नहीं बनवा सकते थे। वे जूता, छाता और सोने के आभूषणों का उपयोग नहीं कर सकते थे। 19 वीं शताब्दी के उत्तरार्ध तक तियाँ और अन्य अछूत जाति की नारियाँ शरीर का ऊर्ध्व भाग ढककर नहीं चल सकती थीं। नाई, कुम्हार, तेली जैसी जातियाँ भी वैदिक संस्कारों और शास्त्रीय ज्ञान के अधिकार से वंचित रही हैं। इसके विपरीत क्षत्रियों एवं ब्राह्मणों को अनेक विशेषाधिकार प्राप्त थे। मनुस्मृति के अनुसार क्षत्रियों द्वारा ब्राह्मणों को मृत्युदंड से मुक्ति दी गयी थी। हिंदू राजाओं के शासनकाल में ब्राह्मणों को दंड तथा करसंबंधी अनेक रियायतें प्राप्त थीं। धार्मिक कर्मकांडों में पौरोहित्य का अधिकार क्षत्रिय एवं ब्राह्मण को है। क्षत्रिय भी विशेष सम्मान के अधिकारी हैं। शासन करना उनका अधिकार है। छुआछूत का दायरा बहुत व्यापक है। अछूत जातियाँ भी एक दूसरे से छूत मानती हैं। मालाबार में पुलियन जाति के किसी व्यक्ति को यदि कोई परहिया छू ले तो पुलियन पाँच बार स्नान करके और अपनी एक अँगुली के रक्त निकाल देने के बाद शुद्धिलाभ करता है। श्री ई. थर्स्टन के अनुसार यदि नायादि जाति का व्यक्ति एक सौ हाथ की दूरी पर आ जाए तो सभी अपवित्र हो जाते हौं। उन्हीं के अनुसार यदि ब्राह्मण किसी परहिया अथवा होलिया के घर या मुहल्ले में भी चला जाए तो उससे उनका घर और बस्ती अपवित्र हो जाती है।

जाति और पेशासंपादित करें

ब्रिटिश औपनिवेशिक साम्राज्य ने इस जाति व्यवस्था को प्रशासन मे जगह देकर और पक्का कर दीया |ब्रिटिश औपनिवेशिक साम्राज्य ने १८६०-१९२० के दौरान जाति के अनुसार नौकरियाँ दी. ऊँचे पदों पर उच्च जाति वालों  को ही नौकरी दी जाती थी|१९२० के दौरान हुए सामाजिक आंदोलनों के कारण, ब्रिटिश औपनिवेशिक साम्राज्य ने इस व्यवस्था में बदलाव कीये और छोटि जातियों को आरक्षण दीया |जाति आधारित भेदभाव पूरे भारतीय उपमहाव्दीप (नेपाली बुद्धिस्म, ईसाई, इस्लाम, यहूदी और शिखिस्म) के हर धर्म में होत था| पहले तीन वर्णों को कुछ धर्मशास्त्रों में "दो बार पैदा हुए (द्विज)" के रूप में वर्णित किया गया है और उन्हें वेदों का अध्ययन करने की अनुमति थी | हालांकि, वेदों का अध्ययन करने से संबंधित प्रतिबंध वैदिक युग के साहित्य में नहीं पाए जाते हैं। मनुस्मृति, वैश्य व्यवसाय के रूप में मवेशी पालन को मानता है लेकिन ऐतिहासिक सबूत बताते हैं कि ब्राह्मणों, क्षत्रिय और शुद्रों के पास भी मवेशियों का स्वामित्व था और उन्होनें ने मवेशी पालन भी किया था| मवेशी धन उनके घरों का मुख्य आधार था।

भारतीय उपमहाद्वीप में सामाजिक बहिष्कार के इतिहास में विशेषज्ञता रखने वाले प्रोफेसर राम नारायण रावत कहते हैं कि 19वीं शताब्दी के ब्रिटिश रिकॉर्ड बताते हैं कि अस्पृश्यों के रूप में सूचीबद्ध चमारों के पास भूमि और मवेशी भी थे और वे सक्रिय कृषिविद थे।कोसाल के सम्राट और काशी के राजकुमार अन्य उदाहरण हैं। पीटर मासफील्ड बताते हैं कि किसी भी वर्ण के लोग किसी पेशे में सैद्धांतिक रूप से काम कर सकते थे| उदाहरण के लिए प्रारंभिक बौद्ध ग्रंथ बताते हैं कुछ ब्राह्मणों ने किसानों और अन्य व्यवसायों में काम किया। शास्त्रों में कहा गया है कि कोई भी पुजारी कार्य कर सकता था , और ब्राह्मण किसी से भी भोजन दान में ले लेते थे|तन्त्र, परम्परा से जुड़े हुए आगम ग्रन्थ हैं। 8 वीं और 11 वीं शताब्दी सीई के बीच रूढ़िवादी हिंदू धर्म से अलग परंपरा के रूप में विकसित तांत्रिक आंदोलन ने सामुदायिक भेदभाव के संबंध में सामाजिक कठोरता को भी कम किया। प्रत्येक जाति का एक या अधिक परंपरागत धंधा है। कुछ विभिन्न जातियों के समान परंपरागत धंधे भी हैं। आर. वी. रसेल (R.V. Russel) ने मध्यभारत के बारे में बताया है कि वहाँ कृषकों की 40, बुनकरों की 11 और मछुओं की सात भिन्न भिन्न जातियाँ हैं। कृषि, व्यापार और सैनिक वृत्ति आदि कुछ ऐसे पेशे हैं जो प्राय: सभी जातियों के लिये खुले रहे हैं। अछूत इसमें अपवाद हैं, यद्यपि कृषि अनेक अछूत जातियाँ भी करती हैं। आज ईसा की 20 वीं शताब्दी के मध्य तक अधिकांश जातियों के अधिकतर लोग अपने परंपरागत पेशों में लगे हैं। चमड़ा कमाना, जूते बनाना, विष्टा की सफाई आदि कुछ ऐसे गंदे तथा निकृष्ट समझे जानेवाले कार्य हैं। जिन्हें करने की अनुमति अन्य उच्च जातियाँ अपने सदस्यों को नहीं देतीं। इसके विपरीत बुनाई का धंधा अनेक छोटी जातियों ने अपना लिया है। जजमानी व्यवस्था से संबंधित नाई, धोबी, बढ़ई, लोहार, आदि के कुछ ऐसे धंधे हैं जिनपर संबंधित जातियाँ अपना अधिकार मानती हैं। पौरोहित्य पर ब्राह्मण जातियों का एकाधिकार है। यज्ञ कराना, अध्ययन अध्यापन और दान दक्षिणा लेना ब्राह्मणों का जातीय कर्म तथा वृत्ति है। क्षत्रियों का परंपरागत कार्य शासन और सैनिक वृत्ति है।

गाँव में विभिन्न जातीय समूह सेवा की एक ऐसी व्यवस्था में गठित हैं जिसमें अधिकांश जातियाँ दूसरे की परंपरागत रूढ़ियों पर आधारित आर्थिक, धार्मिक और सांस्कृतिक जीवन के लिये उपयोगी, निश्चित तथा विशिष्ट सेवा देती हैं1 इसे कुछ विद्वानों ने जजमानी व्यवस्था कहा है। जजमानी व्यवस्था का विस्तार आर्थिक जीवन के साथ साथ सांस्कृतिक और धार्मिक जीवन में भी है और अनेक सेवक जातियाँ अपने सांस्कृतिक और धार्मिक जीवन में भी है और अनेक सेवक जातियाँ अपने जजमानों से आर्थिक सेवा के अतिरिक्त सामाजिक उत्सवों और धार्मिक संस्कारों के आधार पर भी संबद्ध हो गई। ब्राह्मण तथा अनेक सेवक जातियों का संबंध तो अपने जजमानों केवल धार्मिक तथा सांस्कृतिक जीवन से है। भाट, नट आदि और ब्राह्मणों की अनेक जातियों की गणना इस श्रेणी में की जा सकती है।

सजातीय विवाहसंपादित करें

सजातीय विवाह जातिप्रथा की रीढ़ माना जाता है। वास्तव में बहुधा एक जाति में भी अनेक अंतर्विवाही समूह होते हैं जो एक प्रकार से स्वयं जातियाँ हैं और जिनकी पृथक्‌ जातीय पंचायतें, अनुशासन और प्रथाएँ हैं। इन्हें उपजातियों का नाम भी दिया जाता है। सजातीय अथवा अंतर्विवाह के कुछ अपवाद भी हैं। पंजाब के कुछ पहाड़ी क्षेत्रों में उच्च जाति का व्यक्ति छोटी जाति की स्त्री से विवाह कर सकता है। मालाबार में नंबूद्री ब्राह्मण मातृस्थानीय नायर नारी से वैवाहिक संबंध करता है।

उत्पत्तिसंपादित करें

जाति व्यवस्था :(1500–1000 BCE)

कुछ वैदिक और मध्ययुगीन ग्रंथों में वर्ग शब्द का (प्रासंगिक रूप में) मतलब है "रंग, जाति, जनजाति, प्रजातियां, दयालु, प्रकार, प्रकृति, चरित्र, गुणवत्ता, संपत्ति“ वर्ग शब्द, मनुस्मृति में चार सामाजिक वर्गों को दर्शाता है।चावैदिक ग्रंथों में अस्पृश्य (अछूत) लोगों की अवधारणा का उल्लेख नहीं है और न ही अस्पृश्यता का समाज में कोई अभ्यास है।वेद कहते हैं कि अनुष्ठान के दौरान, राजा को आम लोगों के साथ एक बर्तन में खाना चाहिए। बाद में, उत्तर वैदिक ग्रंथ कुछ व्यवसायों का उपहास करते हैं, लेकिन अस्पृश्यता की अवधारणा उन में नहीं मिलती है।बाद के ग्रंथों, विशेष रूप से मनुस्मृति ने बहिष्कार का उल्लेख किया गया है।हाल के शोधकर्ताओं का कहना है कि वेदिक ग्रंथों में बहिष्कारों की चर्चा; मुगल साम्राज्य और ब्रिटिश औपनिवेशिक साम्राज्य के दौरान के भारतीय साहित्य में बहिष्कारों की चर्चा से अलग है। ओलिवेल कहते हैं कि धर्म-शास्त्र ग्रंथों में शुद्धता / अशुद्धता से संबंधित मामलों में जबरदस्त फोकस व्यक्तियों की शुद्धता / अशुद्धता पर हैं न उनके वर्ण पर और सभी चार वर्ण अपने चरित्र, नैतिक इरादे, कार्यों, अज्ञानता, शर्तों, और अनुष्ठान व्यवहार के आधार पर शुद्धता या अशुद्धता प्राप्त कर सकते हैं|वह लिखते हैं, "हमें कोई उदाहरण नहीं दिखता है जब शुद्धता / अशुद्धता की चर्चा व्यक्तियों के समूह या वर्ण या जाति के संदर्भ में की जाती है"।ऋग्वेदिक समाज में लोगों को उपजीविका/ व्यवसाय/धन्धा के आधार पर पहचाना नहीं गया था । किसानों और कारीगरों ने कई शिल्प का अभ्यास किया। रथ निर्माता और लोहार/धातु-कर्मी को समाज में बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है और उनके साथ कोई कलंक नहीं जुड़ा हुआ था।बढ़ई, बुनकर और अन्य के लिए भी इसी तरह के अवलोकन भी सच हैं। अथर्ववेद काल के अंत में, नए वर्ग के उभरे थे ।वैदिक काल के दौरान भोजन और विवाह के संबंध में प्रतिबंधों का कोई सबूत नहीं है (किसके साथ खाना / शादी करना है??)।प्रारंभिक उपनिषद में, शूद्र को पुसान या पोषक/ कृषक के रूप में जाना जाता था।करदाताओं के बीच शूद्रों की गणना नहीं की जाती थी, कहा जाता था कि उन्हें भूमि को उपहार के रूप में दिया गया था |अधिकांश कारीगरों को शूद्र के बराबर माना जाता था, लेकिन उनके काम के लिए कोई अवमानना/अपमान नहीं है।बौद्ध ग्रंथ समाज की एक वैकल्पिक तस्वीर पेश करते हैं; समाज वर्ण, कुल और व्यवसाय की तर्ज पर स्तरीकृत था ।ऐसा लगता है कि; वर्ण व्यवस्था सैद्धांतिक ब्राह्मणवादी विचारधारा का हिस्सा थी, लेकिन समाज में व्यावहारिक रूप से संचालित नहीं थी। बौद्ध ग्रंथों में, ब्राह्मण और क्षत्रिय को वर्णों की बजाय जाति के रूप में वर्णित किया जाता है।वे वास्तव में उच्च जातियां थीं।कुल की अवधारणा मोटे तौर पर इसी तरह की थी ।ब्राह्मणों और क्षत्रिय के साथ, गहापति नामक एक वर्ग (शाब्दिक रूप से घर के मालिक, लेकिन प्रभावी ढंग से संपत्ति वर्ग) उच्च    कुल में शामिल था |उच्च कुल के लोग उच्च कोटि के व्यवसायों में लगे हुए थे यथा, कृषि, व्यापार, पशु-रखने, लेखा-जोखा और लेखन, छोटे कुल के लोग टोकरी-बुनाई जैसे कम रैंक वाले व्यवसायों में लगे थे।इस वर्ग व्यवस्था को स्पष्ट रूप से, व्यक्तिगत आर्थिक विकास के आधार पर परिभाषित किया गया था,  जन्म के आधार पर परिभाषित नहीं किया गया था ।

विद्वानों ने मध्यकालीन भारत के दस्तावेजों और शिलालेखों में वर्ण और जाति के अस्तित्व और प्रकृति के ऐतिहासिक प्रमाणों को खोजने की कोशिश की है।मध्ययुगीन भारत में वर्ण और जाति प्रणालियों के अस्तित्व के लिए सहायक सबूत दुर्लभ हैं, और विरोधाभासी साक्ष्य पाए जाते हैं।उदाहरण के लिए, आंध्र प्रदेश के व्यापक मध्ययुगीन युग के रिकॉर्ड में वर्ण का शायद ही कभी उल्लेख किया गया है। इतिहास और एशियाई अध्ययन के प्रोफेसर सिंथिया टैलबोट ने यह सवाल किया है कि इस क्षेत्र के दैनिक जीवन में वर्ण सामाजिक रूप से महत्वपूर्ण थी या नहीं ?14 वीं शताब्दी के दो दुर्लभ मंदिर दान दाताओं के रिकॉर्ड योद्धा दान दाता परिवारों के शुद्र होने का दावा करते हैं। एक कहता है कि शुद्र सबसे बहादुर हैं , दूसरा बोलता है कि शुद्र सबसे शुद्ध हैं।ईटन के मुताबिक साक्ष्य दिखाता है कि शूद्र कुलीन वर्ग का हिस्सा थे, और कई "पिता और पुत्रों के अलग-अलग व्यवसाय थे, इससे पता चलता है कि 11 वीं और 14 वीं शताब्दी के बीच दक्कन क्षेत्र में हिंदू काकतीय जनसंख्या में "सामाजिक स्थिति अर्जित की जाती थी, विरासत में नहीं मिलति थी "। भारत के तमिलनाडु क्षेत्र का अध्ययन, धर्म के प्रोफेसर लेस्ली ओरर द्वारा किया गया, वह कहते हैं कि "चोल अवधि के शिलालेख (दक्षिण भारतीय) समाज की संरचना के बारे में हमारे सामान्य विचारों को चुनौती देते हैं।ब्राह्मणिक ग्रन्थों की अवधारणा से उलट समाज में जाति व्यवस्था के स्पष्ट सबूत नही मिलते हैं| विभिन्न सामाजिक समूहों के बीच जाति आधारित सीमाओं के के स्पष्ट सबूत नही मिलते हैं ।तमिलनाडु में वेल्ललर (उनका पारंपरिक व्यवसाय कृषि है, उन्होंने जमींदारों के रूप में भी काम किया।) प्राचीन और मध्ययुगीन काल के दौरान कुलीन जाति थे और साहित्य के प्रमुख संरक्षक थे।वे ब्राह्मणों की तुलना में सामाजिक पदानुक्रम में उच्च स्थान पर थे। उत्तरी भारतीय क्षेत्र के लिए, सुसान बेली लिखते हैं, "औपनिवेशिक काल तक, उपमहाद्वीप में से अधिकांश के लोगों के लिए जाति के औपचारिक भेद केवल सीमित महत्व के थे।मानविकी के प्रोफेसर डिर्क कोल्फ़ ने कहा कि उत्तर भारत में जाति व्यवस्था एक अपेक्षाकृत नई घटना है जो क्रमशः मुगल और ब्रिटिश काल की शुरुआत में प्रभावी हो गई।

सामाजिक वर्गों (वर्ण शब्द के उपयोग के बिना) औपचारिक विभाजन का सबसे पुराना वर्णन उत्तर ऋग्वेदिक काल के पुरुष सुक्त में दिखाई देता है| आद्य पुरुष के बलिदान के फलस्वरुप ब्राह्मण, राजान्या (क्षत्रिय के बजाय), वैश्य और शुद्र क्रमशः मुंह, बाहों, जांघों और पैरों उत्पन्न से होते हैं।ऋग्वेद सनातन धर्म का सबसे आरंभिक स्रोत है।ॠग्वेद में कुल दस मण्डल हैं और उनमें १०२८ सूक्त हैं और कुल १०,५८० ॠचाएँ हैं।रुषसूक्त ऋग्वेद संहिता के दसवें मण्डल का एक प्रमुख सूक्त यानि मंत्र संग्रह (10.90) है|वेदों (और सांख्य शास्त्र में) में पुरुष शब्द का अर्थ जीवात्मा तथा परमात्मा आया है, पुरुष लिंग के लिए पुमान और पुंस जैसे मूलों का इस्तेमाल होता है।19वीं और 20 वीं शताब्दी के पश्चिमी विद्वानों का सुझाव है कि इसे वैदिक युग के बाद में जोड़ा गया  था, और इसकी अपेक्षाकृत आधुनिक उत्पत्ति है। संस्कृत और धार्मिक अध्ययन के प्रोफेसरों ने कहा, "एक विस्तृत, अति-विभाजित और परिपक्व जाति व्यवस्था के कोई सबूत ऋग्वेद में नहीं है" और "वर्ण प्रणाली ऋग्वेद में भ्रूण अवस्था मे प्रतीत होती है और उस समय और उसके बाद के समय में , यह सामाजिक हकीकत के बजाय सामाजिक आदर्श था।यह एकमात्र सूक्त है जो वर्ण के बारे में बात करता है। (1028 सूक्त में एक सूक्त)

धर्मशास्त्र में वर्ण व्यवस्था पर व्यापक चर्चा की गई है।हाल के शोध से पता चलता है कि इन ग्रंथों में जो वर्ण व्यवस्था और अस्पृश्यों की चर्चा है, वह भारत की आधुनिक युग जाति व्यवस्था के समान नहीं है।पैट्रिक ओलिवेल एक भारतविद हैं। वे एक भाषाविद और संस्कृत साहित्य के विद्वान हैं जिनका कार्य तप, त्याग और धर्म पर केंद्रित है। ओलिवेल, टेक्सास विश्वविद्यालय, आॅस्टिन में एशियाई अध्ययन विभाग में भारतीय धर्म और संस्कृत के प्रोफेसर हैं।वह कहते हैं कि प्राचीन और मध्ययुगीन भारतीय ग्रंथ कर्मकांडी प्रदूषण, शुद्धता-अशुद्धता का समर्थन वर्ण व्यवस्था के आधार पर नहीं करते हैं।ओलिवेल कहते हैं कि धर्म-शास्त्र ग्रंथों में शुद्धता / अशुद्धता से संबंधित मामलों में जबरदस्त फोकस व्यक्तियों की शुद्धता / अशुद्धता पर हैं न उनके वर्ण पर|ओलिवेल कहते हैं कि धर्म-शास्त्र ग्रंथों में शुद्धता / अशुद्धता से संबंधित मामलों में जबरदस्त फोकस व्यक्तियों की शुद्धता / अशुद्धता पर हैं न उनके वर्ण पर और सभी चार वर्ण अपने चरित्र, नैतिक इरादे, कार्यों, अज्ञानता, शर्तों, और अनुष्ठान व्यवहार के आधार पर शुद्धता या अशुद्धता प्राप्त कर सकते हैं|वह लिखते हैं, "हमें कोई उदाहरण नहीं दिखता है जब शुद्धता / अशुद्धता की चर्चा व्यक्तियों के समूह या वर्ण या जाति के संदर्भ में की जाती है"।पहली सहस्राब्दी से शास्त्र ग्रंथों में अशुद्धता का एकमात्र उल्लेख उन लोगों के बारे में है जो गंभीर पाप करते हैं और इस तरह वे वर्ण व्यवस्था से बहिष्कृत कर दीयॆ जाते हैं तथा इन्हॆं पतित माना जात था|

महाभारत का चौथी शताब्दी सीई तक पूरा होने का अनुमान है। यह 12.181 में वर्ण व्यवस्था पर चर्चा करता है। महाभारत वर्ण व्यवस्था पर दो मॉडल पेश करता है। पहला मॉडल वर्ण व्यवस्था को रंग के आधार पर वर्णित करता है, भृगु नाम के ऋषि कहते हैं "ब्राह्मण सफेद थे, क्षत्रिय लाल थे, वैश्य पीले थे, और शूद्र काले थे|”इस वर्णन को एक अन्य प्रमुख ऋषि भारद्वाज ने चुनौती दी है वह पूछ्ते हैं कि वासना क्रोध, भय, लालच, दुःख, चिंता, भूख और परिश्रम वैयक्तिक पर निर्भर करता है तथा सभी मानवों में पित्त और रक्त प्रवाह होता है, तथा यह रंग सभी वर्ण में देखे जाते हैं; इसलिए वर्णों में क्या अंतर है? महाभारत में तब घोषणा की जाती है, " वर्णों में कोई भेद नहीं है। यह संपूर्ण ब्रह्मांड ब्रह्म है। इसे ब्रह्मा द्वारा बनाया गया था, इसे कृत्यों द्वारा वर्गीकृत किया गया था ।" प्राचीन बौद्ध ग्रंथों में दक्षिण एशिया की वर्ण व्यवस्था का उल्लेख है, लेकिन विवरण बताते हैं कि यह एक लचीला सामाजिक वर्गीकरण व्यवस्था थी ।मॉरीस वाल्श, एक जर्मन विद्वान और दीर्घनिकाय के अनुवादक  गौतम बुद्ध और एक हिंदू ब्राह्मण के बीच चर्चा का विवरण बताते हैं| एक बौद्ध धर्म विद्वान और प्राचीन पाली ग्रंथ अनुवादक पीटर मासफील्ड बताते हैं की निकाय (सुत्तपिटक बौद्ध ग्रंथों) में वर्ण व्यवस्था का उल्लेख सामाजिक वर्गीकरण व्यवस्था के रूप में है, लेकिन जाति व्यवस्था के रूप में नहीं है | सामाजिक इतिहास और इस्लामी अध्ययन के प्रोफेसर डेरेल मैकलीन ने कहा है कि ऐतिहासिक सबूत इस सिद्धांत का समर्थन नहीं करते हैं|जो कुछ भी सबूत उपलब्ध वह कहते हैं, वह बताते हैं कि उत्तर-पश्चिम भारत में मुस्लिम संस्थानों ने किसी भी असमानता को जारी रखा और इसे कानूनी वैधता दी ।मैकलीन कहते हैं, इस्लाम में अपनी इच्छः से धर्मांतरण दुर्लभ थे, और ऐतिहासिक सबूतों यह पुष्टि करते हैं कि जो कुछ लोग कनवर्ट करते थे वे ब्राह्मण हिंदुओं (सैद्धांतिक रूप से, ऊंची जाति) थे।मैकलीन ने कहा है कि इस्लामी युग के दौरान भारतीय समाज के बारे में जाति आधारित धर्मांतरण सिद्धांत ऐतिहासिक साक्ष्य या सत्यापन योग्य स्रोतों पर आधारित नहीं हैं, बल्कि मुस्लिम इतिहासकारों की निजी मान्यताओं / कल्पनाओं पर आधारित है| इतिहास के प्रोफेसर रिचर्ड ईटन कहते हैं कि " इस सिद्धांत के समर्थन में कोई सबूत नहीं मिलता है, और यह सिद्धांत अत्यधिक आधारहीन है"।मध्यकालीन इतिहास और मुस्लिम भारत के प्रोफेसर पीटर जैक्सन कहते हैं कि "यह सिद्धांत जांच और ऐतिहासिक साक्ष्य का सामना नहीं करता है"। जैक्सन का कहना है कि, जाति के सैद्धांतिक मॉडल के विपरीत जहां क्षत्रिय केवल योद्धा और सैनिक हो सकते हैं, ऐतिहासिक सबूत इस बात पुष्टि करते हैं कि मध्ययुगीन युग के दौरान हिंदू योद्धाओं और सैनिकों में वैश्य और शुद्र जैसी अन्य जातियों को शामिल किया था।

ब्रिटिश औपनिवेशिक युग के दौरान जाति नृवंशविज्ञान का आधार थे। 1881 की जनगणना में और इसके बाद, औपनिवेशिक नृवंशविदों ने लोगों की गिनती और वर्गीकरण करने के लिए जाति (जाति) शीर्षक का उपयोग किया। जब नौकरशाह ब्रिटिश अधिकारियों ने भारतीय लोगों के अपने प्राणिशास्त्र के आधार वर्गीकरण पर रिपोर्ट पूरी की,    कुछ ब्रिटिश अधिकारियों ने इन अभ्यासों की आलोचना की और उन्होंने कहा की यह भारत में जाति व्यवस्था की वास्तविकता की भोंडी नक़ल थी। ब्रिटिश औपनिवेशिक अधिकारियों ने जनगणना-निर्धारित जाति का इस्तेमाल यह तय करने के लिए किया कि किस समूह के लोग औपनिवेशिक सरकार में नौकरियों के लिए योग्य थे, और किन अविश्वसनीय लोगों (जाति) को नौकरियों से बाहर रखा जाना था।

1901 से, दशकों की जनगणना के प्रयोजनों के लिए, अंग्रेजों ने ब्राह्मण साहित्य में वर्णित सभी वर्णों को जतियों में वर्गीकृत किया।जनगणना आयुक्त हर्बर्ट होप रिस्ले ने नोट किया कि " सैद्धांतिक के आधार पर सुझाया कि समाज में सामाजिक जाति वर्गीकरण में देशी जनता द्वारा मान्यता प्राप्त होना चाहिए|"इस तथ्य को नौकरशाह ब्रिटिश अधिकारियों ने जानबूझकर नजरअंदाज कर दिया कि असंख्य जातियां हैं जो अपने व्यवसायों के आधार पर दो या दो से अधिक वर्णों में आती हैं। दक्षिण भारत के एक समुदाय ने टिप्पणी की, "हम सैनिक और काठी निर्माता भी हैं“| लेकिन उनकी जाति का फैसला प्रगणक (गणितकर्ता) किया था| पूर्व-ऐतिहासिक समय से, भारतीय समाज में एक जटिल, परस्पर -निर्भर, और सहकारी राजनीतिक जाति व्यवस्था थी। यह मानना गलत नहीं है कि सख्त ब्रिटिश वर्ग प्रणाली ने ब्रिटिश अधिकारियों की धारणा के साथ-साथ पूर्व औपनिवेशिक भारतीय जाति व्यवस्था के संबंध में  ब्रिटिश औपनिवेशिक पूर्वाग्रह को प्रभावित किया होगा। ब्रिटिश अधिकारी, एक समाज से आए थे जो कठोर रूप से सामाजिक वर्गों द्वारा विभाजित था । उन्होंने ब्रिटिश सामाजिक वर्गों और भारत की जाति व्यवस्था में समानता को जानने का प्रयास किया। डेविड कैनाडाइन के अनुसार, भारतीय जाति ब्रिटिश राज के दौरान पारंपरिक ब्रिटिश वर्ग प्रणाली के साथ विलय हो गई।19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में , इन जनगणना जाति आधारित वर्गीकरणों का उपयोग ब्रिटिश अधिकारियों द्वारा भूमि कर की दरों को विनिश्चित करने के साथ-साथ, कुछ सामाजिक समूहों को "आपराधिक" जातियों और कुछ जातियों को " बाग़ी, विद्रोही" के रूप में लक्षित करने के लिए किया जाता था।1860 और 1920 के बीच, अंग्रेजों ने जाति व्यवस्था द्वारा भारतीयों को अलग कर दिया, उन्होंने केवल उच्च जातियों को लिए प्रशासनिक नौकरियां और वरिष्ठ नियुक्तियां दीं।औपनिवेशिक युग कानून और उनके प्रावधानों ने "जनजाति" शब्द का प्रयोग किया, जिसमें जाति को इसके दायरे में शामिल किया गया था।उदाहरण के लिए, ब्रिटिश औपनिवेशिक सरकार ने 1871 के आपराधिक जनजाति अधिनियम को अधिनियमित किया था।इस कानून ने घोषणा की कि कुछ जातियों से संबंधित हर कोई आपराधिक प्रवृत्तियों के साथ पैदा होता है । इस अधिनियम के तहत  प्रारंभिक रूप से अहिर, गुर्जर और जाट जाति शामिल थी, लेकिन इसके विस्तार में शूद्रों और अस्पृश्यों जैसे कि चमार, साथ ही साथ संन्यासी और पहाड़ी जनजातियों को शामिल किया गया ।कुछ जाति समूहों को आपराधिक जनजाति अधिनियम का उपयोग करके लक्षित किया गया था, भले ही उनके द्वारा किसी हिंसा या आपराधिक गतिविधि की कोई रिपोर्ट न हो, क्योंकि उनके पूर्वजों को मुगल या ब्रिटिश अधिकारियों के खिलाफ विद्रोह करने के लिए जाना जाता था या ये जाति समूह श्रमिक अधिकारों की मांग कर रही थीं और औपनिवेशिक कर संग्रह में बाधा डाल रही थीं अधिकारियों। औपनिवेशिक सरकार ने आपराधिक जातियों की एक सूची तैयार की, और जाति-जनगणना द्वारा इन जातियों में पंजीकृत सभी सदस्यों को यात्रा (यात्रा के लिए कहाँ जाना है?) और सामाजिककरण (किससे मिलना है?) के संदर्भ में प्रतिबंधित किया गया। औपनिवेशिक भारत के कुछ क्षेत्रों में, पूरे जाति समूहों को जन्म के आधार पर अपराधी माना जाता था (वंशानुगत अपराधियों की धारणा)| उन्हें गिरफ्तार कर लिया जाता था । उनके बच्चे अपने माता-पिता से अलग कर लिया जाता था । उन्हें उचित प्रक्रिया के बिना दंड उपनिवेशों को भेजा गया था। यह अभ्यास विवादास्पद हो गया, इसे सभी औपनिवेशिक ब्रिटिश अधिकारियों का समर्थन नहीं मिला।पश्चिम भारत में कुछ जाति समूहों के खिलाफ आपराधिक जन्म के कानूनों को 1900 से 1930 के दशक तक और दक्षिण भारत में आपराधिक जातियों की सूची के विस्तार के साथ 20 वीं शताब्दी के मध्य तक लागू किया गया था। सैकड़ों हिंदू समुदायों को आपराधिक जनजाति अधिनियम के तहत लाया गया था। 1931 तक, औपनिवेशिक सरकार ने अकेले मद्रास प्रेसीडेंसी में इस अधिनियम के तहत 237 आपराधिक जातियों और जनजातियों को शामिल किया था। वंशानुगत अपराधियों की धारणा औपनिवेशिक युग के दौरान उन्मुखवादी (ओरिएंटलिस्ट) रूढ़िवाद और औपनिवेशिक युग के ब्रिटेन में प्रचलित नस्लीय सिद्धांतों के अनुरूप थी| इस वंशानुगत अपराधियों की धारणा का सामाजिक प्रभाव हिंदुओं के कई समुदायों की प्रोफाइलिंग, विभाजन और अलगाव के रूप में था।उदाहरण के लिए, ब्रिटिश औपनिवेशिक अधिकारियों ने 1900 में भूमि अलगाव अधिनियम और 1913 में पंजाब प्री-एम्प्शन एक्ट जैसे कानूनों को सूचीबद्ध किया, जिसमें सूचीबद्ध जातियां कानूनी रूप से जमीन का मालिक हो सकती थीं और अन्य जनगणना-निर्धारित जातियों के संपत्ति अधिकारों को अस्वीकार किया गया । इन ब्रिटिश औपनिवेशिक कानूनों ने भूमि-मालिक जातियों से जमीन के हस्तांतरण को किसी भी गैर-कृषि जाति में प्रतिबंधित कर दिया जिससे संपत्ति की आर्थिक गतिशीलता को रोक दिया जा सके और भारत में जाति बाधाओं को जन्म दिया जा सके।स्वीटमैन ने कहा कि जाति की यूरोपीय धारणा ने पूर्व राजनीतिक विन्यास को खारिज कर दिया और भारत के " जाति के अनिवार्य रूप से धार्मिक चरित्र" पर जोर दिया। औपनिवेशिक काल के दौरान, जाति को धार्मिक व्यवस्था के रूप में परिभाषित किया गया था। हालांकि यह मूल रूप से एक सामाजिक-राजनीतिक व्यवस्था थी। इससे औपनिवेशिक शासकों के लिए भारत को आध्यात्मिक सद्भाव से रहित समाज के रूप में चित्रित करना संभव हो गया, जिसकी आलोचना उन्होंने "निराशाजनक महामारी" के रूप में की, इसने औपनिवेशिक शक्तियों को अधिक 'उन्नत' राष्ट्र के रूप में चित्रित किया जो आवश्यक "उदार, पितृत्ववादी राजनीतिक प्रशासन प्रदान करता था।

वर्ण तथा जातिसंपादित करें

जन्मना जायते शूद्रः संस्कारात् भवेत् द्विजः | वेद-पाठात् भवेत् विप्रः ब्रह्म जानातीति ब्राह्मणः |

स्कन्दपुराण में षोडशोपचार पूजन के अंतर्गत अष्टम उपचार में ब्रह्मा द्वारा नारद को बताया गया है| जन्म से (प्रत्येक) मनुष्य शुद्र, संस्कार से द्विज, वेद के पठान-पाठन से विप्र (विद्वान्) और जो ब्रह्म को जनता है वो ब्राह्मण कहलाता है|

ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां च परन्तप। कर्माणि प्रविभक्तानि स्वभावप्रभवैर्गुणैः॥ [भगवद गीता अध्याय 18 श्लोक 41

हे परंतप! ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्यों के तथा शूद्रों के कर्म स्वभाव से उत्पन्न गुणों द्वारा (जन्म से नहीं) विभक्त किए गए हैं|

राजन! उन प्राचीन युगों में जो राक्षस समझे जाते थे, वे कलि (कलयुग) में ब्राह्मण माने जाते हैं, क्योंकि अब के ब्राह्मण प्राय: पाखंड करने में तत्पर रहते हैं। दूसरों को ठगना, झूठ बोलना और वैदिक धर्म-कर्मों से अलग रहना --- कलियुगी ब्राह्मणों का स्वाभाविक गुण बन गया है। (देवीभागवत पुराण)

द्विज शब्द 'द्वि' और 'ज' से बना है। द्वि का अर्थ होता है दो और ज (जायते) का अर्थ होता है जन्म होना अर्थात् जिसका दो बार जन्म हो उसे द्विज कहते हैं। द्विज शब्द का प्रयोग हर उस मानव के लिये किया जाता है जो एक बार पशु के रुपमे माता के गर्भ से जन्म लेते है और फिर बड़ा होने के वाद अच्छी संस्कार से मानव कल्याण हेतु कार्य करने का संकल्प लेता है। द्विज शब्द का प्रयोग किसी एक प्रजाती या केवल कोइ जाती विशेष के लिये नहि किया जाता हैं। मानव जब पैदा होता है तो वो केवल पशु समान होता है परन्तु जब वह संस्कारवान और ज्ञानी होता है तव ही उसका जन्म दुवारा अर्थात असली रुपमे होता है।

संस्कृत में, पंडित आम तौर पर किसी विशेष विषय में विशेष ज्ञान के साथ किसी भी "बुद्धिमान, शिक्षित या सीखे व्यक्ति" को संदर्भित करता है।यह शब्द paṇḍ (पणड्ड) से लिया गया है जिसका अर्थ है "इकट्ठा करना ", और यह शब्द “ज्ञान इकट्ठा करना” के संदर्भ में उपयोग  है।यह शब्द वैदिक और बाद के वैदिक ग्रंथों में पाया जाता है, लेकिन बिना किसी सामाजिक संदर्भ के। ब्रिटिश औपनिवेशिक युग के साहित्य में, शब्द आम तौर पर हिंदू कानून में विशिष्ट ब्राह्मणों को संदर्भित करता है।पुरोहित, भारतीय धार्मिक संदर्भ में, पारिवारिक चिकित्सक पुजारी, पुरोहित शब्द का अर्थ है जो आपके सामने पुराण रखता है।इस शब्द को पंडित शब्द के साथ समानार्थी रूप से भी प्रयोग किया जाता है, जिसका अर्थ है "पुजारी"।तीर्थ पुरोहित का मतलब पुरोहित है जो पवित्र नदियों के तट पर बैठते हैं और हजारों साल पहले एक हिंदू परिवार के पूर्वजों के रिकॉर्ड बनाए रखते है | क ब्राह्मण पंडित होगा लेकिन एक पंडित या पुरोहित को ब्राह्मण के रूप में बुलाया जा सकता है या नहीं बुलाया जा सकता है। सभी पंडित ब्राह्मण नहीं हैं| एक ब्राह्मण होने के लिए लक्षण और आवश्यकताएं बहुत कठोर हैं।उदाहरण: क्वांटम भौतिकी में पीएचडी एक पंडित है लेकिन वह ब्राह्मण नहीं हो सकता है जब तक कि वह ब्रह्म (इस सारे विश्व का परम सत्य) को खोजने के लिए अपने ज्ञान का उपयोग न करे।

शब्द “द्विज” किसी भी वेद, किसी उपनिषद में नहीं हैं, न ही किसी भी वेदांगा साहित्य जैसे कि व्यंजन, शिक्षा, निरुक्तता, चन्द, श्रुत-सूत्र या गृहय-सूत्र में पाया जाता है। यह शब्द 2 वीं शताब्दी ईसा पूर्व से पहले के सभी धार्मिक और अनुष्ठान से संबंधित पाठ में नहीं है। कृपया याद रखें, संस्कृत में एक शब्द के कई अर्थ हो सकते हैं शब्द का अर्थ उनके संदर्भ पर निर्भर करता है| वर्ण का मूल शब्द व्र है. इसका उपयोग  “गिनने, वर्गीकृत करने, वर्णन करने या चुनने के लिए” होता है|यह शब्द ऋग्वेद में प्रकट होता है, जहां इसका मतलब है “रंग, बाहरी रूप, आकृति या आकार”|महाभारत में इस शब्द का मतलब है "रंग या डाई”|

प्रजातीय तत्वसंपादित करें

भारत उपमहाद्वीप में प्रागैतिहासिक काल से संसार की विभिन्न प्रजातियों का मिश्रण होता रहा और यद्यपि कुछ क्षेत्रों और जातीय समूहों में एक या दूसरी प्रजाति के लक्षण बहुलता से परिलक्षित हैं, तथापि प्रजातीय भेद और जाति में अटूट संबंध स्थापित नहीं किया जाता। एच. एच. रिजली ने पंजाब, उत्तर प्रदेश और बिहार की कुछ जातियों के नासिकामापन से यह निष्कर्ष निकाला कि आर्य प्रजाति का अंश जिस जाति में जितना अधिक या कम है उसका मोटे तौर पर सामाजिक स्थान उतना ही ऊँचा या नीचा है। किंतु डाक्टर जी. एस. धुरए और अन्य जातिविदों ने मानवमितिक नापों के आधार पर रिजली की प्रस्थापना का खंडन किया है। भारत के जातीय समूहों में प्रजातीय मिश्रण व्यापक है और यह मिश्रण विभिन्न जातियों, उपजातियों तथा क्षेत्रों में भिन्न भिन्न है1 संभवत: भारत के प्राचीनतम निवासी निग्रिटो मानव जाति के थे। इनके वंशज प्राय: अमिश्रित अवस्था में आज भी अंडमान में हैं1 इनके अतिरिक्त नाटा कद, काला रंग और ऊन सरीखे बालवाली काडर, इरला और पणियन जैसी दक्षिण भारत की वन्य जातियों में तथा उत्तरपूर्व की कुछ नागा जनजातियों में निग्रिटो मानव जाति का मिश्रण परिलक्षित है। निग्रिटो के पश्चात्‌ भारत में संभवत: निषाद (आस्ट्रिक) मानव जाति का पदार्पण हुआ जिसके शारीरिक लक्षणों में दीर्घ कपाल, पृथु नासिका, मझोला कद और घुंघराले बाल तथा चाकलेटी श्यामल वर्ण है। निषादों का मिश्रण समस्त भारत में और विशेषकर छोटी जातियों में अधिक है। दक्षिण की अधिकांश वन्य जातियाँ और कोल संथाल, मुंडा और भील मूलत: इसी वंश की जनजातियाँ हैं। मुसहर, चमार, पासी आदि जातियों में भी इसी मानव जाति क अंश अधिक परिलक्षित होता है। दीर्घ कपाल और मध्यम नासिका तथा श्याम वर्णवाली द्रविड़ जाति का प्रभाव दक्षिण भारत पर सबसे अधिक है। किंतु मध्य और समस्त उत्तर भारत की आबादी में भी इसका व्यापक मिश्रण है। ऐसा प्रतीत होता है कि द्रविड़ जाति का उत्तर भारत में निषाद, किरात (मंगोल) और आर्य रक्त से मिश्रण हुआ तथा इन लोगों ने आर्य भाषाओं को ग्रहण कर लिया। गोंड, खोंड और बेंगा जनजातियाँ इसी वंश का हैं। इस प्रकार हम देखते हैं कि भारत में निग्रिटों, निषाद (आस्ट्रिक), द्रविड़ किरात (मंगोलायड) और आर्य जातियों का मिश्रण हुआ है। इनके अतिरिक्त गोल सिर और मध्यम कद वाली अर्मिनायड मानव जाति का मिश्रण द्रविड़ जाति से या तो भारत में आने पर या उसके पूर्व ही हुआ। दक्षिण तथा मध्य भारत ओर बंगाल में इस जाति के लक्षण स्पष्ट हैं। प्रजातीय मिश्रण की दृष्टि से भारत उत्तर-पश्चिम में आर्य, उत्तर-पूर्वं में किरात तथा निषाद और दक्षिण में द्रविड़ तथा निषाद मानव जातियों के लक्षण अधिक प्रबल हैं।

भारत के अहिंदुओं में जातित्वसंपादित करें

जमाल मलिक कहते हैं कि मध्यकालीन भारत के कुछ इस्लामी इतिहासकारों द्वारा जाति की अवधारणा, या इस्लामिक साहित्य में 'कौम' का उल्लेख किया गया है, लेकिन येउल्लेख भारत में मुस्लिम समाज के जाति आधारित विखंडन से संबंधित हैं। ज़ियाउद्दीन बरनी (1285–1357) एक इतिहासकार एवं राजनैतिक विचारक था जो मुहम्मद बिन तुग़लक़ और फ़िरोज़ शाह के काल में भारत में रहा। 'तारीखे फ़ोरोज़शाही' उसकी प्रसिद्ध ऐतिहासिक कृति है।वह जाति का जिक्र करने वाले कुछ इस्लामी इतिहासकारों में से एक हैं|हालांकि, जाति की चर्चा गैर-मुस्लिम जातियों के बारे में नहीं है, बल्कि मुसलमानों के बीच अर्धल जाति पर अशरफ जाति की सर्वोच्चता की घोषणा है| वह कहता है कि कुरान के आधार पर न्यायसंगत है और"कुलीन वर्ग और श्रेष्ठ वंशावली मानव के सबसे महत्वपूर्ण गुण हैं “|इस्लामी मानदंड पदानुक्रमिक संरचना की अनुमति देता है। इस्लाम में समानता केवल भगवान और मानव के संबंध में है। मनुष्यों के बीच नहीं है| भारत में शुरुआती मुसलमानों और मुस्लिम विजेताओं ने मुसलमानों और अन्य धार्मिक समूहों के बीच सामाजिक अलगाव पैदा किया।।अकबर के दरबार में अबुल फजल के लेख जाति का जिक्र करते हैं। इतिहासकार ज़िया अल-दीन अल-बरानी न केवल हिंदुओं से घृणा करते थे, फतवा-ये जहांंदरी में, वह जोरदार तरीके से अशरफ जाति की सर्वोच्चता के लिए खड़े थे।भारत में मध्ययुगीन युग इस्लामिक सल्तनत ने गैर-मुस्लिमों से कर राजस्व पर शासन करने और एकत्रित करने के लिए सामाजिक वर्गीकरण का उपयोग किया। भारत में जाति सर्वव्यापी तत्व है। ईसाइयों, मुसलमानों, जैनों और सिखों में भी जातियाँ हैं और उनमें भी उच्च, निम्न तथा शुद्ध अशुद्ध जातियों का भेद विद्यमान है, फिर भी उनमें जाति का वैसा कठोर रूप और सूक्ष्म भेद प्रभेद नहीं है जैसा हिंदुओं में है। ईसा की 12 वीं शती में दक्षिण में वीर शैव संप्रदाय का उदय जाति के विरोध में हुआ था। किंतु कालक्रम में उसके अनुयायिओं की एक पृथक्‌ जाति बन गई जिसके अंदर स्वयं अनेक जातिभेद हैं। सिखों में भी जातीय समूह बने हुए हैं और यही दशा कबीरपंथियों की है। गुजरात की मुसलिम बोहरा जाति की मस्जिदों में यदि अन्य मुसलमान नमाज पढ़े तो वे स्थान को धोकर शुद्ध करते हैं। बिहार राज्य में सरकार ने 27 मुसलमान जातियों को पिछड़े वर्गो की सूची में रखा है। केरल के विभिन्न प्रकार के ईसाई वास्तव में जातीय समूह हो गए हैं। मुसलमानों और सिक्खों की भाँति यहाँ के ईसाइयों में अछूत समूह भी हैं जिनके गिरजाघर अलग हैं अथवा जिनके लिये सामान्य गिरजाघरों में पृथक्‌ स्थान निश्चित कर दिया गया है। किंतु मुसलमानों और सिखों के जातिभेद हिंदुओं के जातिभेद से अधिक मिलते जुलते हैं जिसका कारण यह हे कि हिंदू धर्मं के अनुयायी जब जब इस्लाम या सिख धर्म स्वीकार करते हें तो वहाँ भी अपने जातीय समूहों को बहुत कुछ सुरक्षित रखते हैं और इस प्रकार सिखों या मुसलमानों की एक पृथक्‌ जाति बन जाती उसकी रीतियों के भी बड़े आलोचक थे। अम्बेडकर इस्लाम और दक्षिण एशिया में उसकी रीतियों के भी बड़े आलोचक थे। उन्होंने कहा, “बहुविवाह और रखैल रखने के दुष्परिणाम शब्दों में व्यक्त नहीं किये जा सकते जो विशेष रूप से एक मुस्लिम महिला के दुःख के स्रोत हैं। जाति व्यवस्था को ही लें, हर कोई कहता है कि इस्लाम गुलामी और जाति से मुक्त होना चाहिए, जबकि गुलामी अस्तित्व में है और इसे इस्लाम और इस्लामी देशों से समर्थन मिला है। इस्लाम में ऐसा कुछ नहीं है जो इस अभिशाप के उन्मूलन का समर्थन करता हो। अगर गुलामी खत्म भी हो जाये पर फिर भी मुसलमानों के बीच जाति व्यवस्था रह जायेगी।” डॉ अंबेडकर यूनिफॉर्म सिविल कोड, इस्लाम के आलोचना का समर्थन करते हैं और भारत के संविधान के अनुच्छेद 370 का विरोध करते हैं, जिसने जम्मू-कश्मीर राज्य को विशेष दर्जा दिया।

जाति की गतिशीलतासंपादित करें

भारत में जाति चिरकालीन सामाजिक संस्था है। ई. ए. एच. ब्लंट के अनुसार जातिव्यवस्था इतनी परिवर्तनशील है इसका कोई भी स्वरूपवर्णन अधिक दिनों तक सही नहीं रहता। इसका विकास अब भी जारी है। नई जातियों तथा उपजातियों का प्रादुर्भाव होता रहता है और पुरानी रूढ़ियों का क्षय हो जाता है। नए मानव समूहों को ग्रहण करने की इसमें विलक्षण क्षमता रही है। कभी कभी किसी क्षेत्र की कोई संपूर्ण जाति या उसका एक अंग धार्मिक संस्कारों तथा सामाजिक रीतियों में ऊँची जातियों की नकल करके और शिक्षा तथा संपत्ति, सत्ता और जीविका आदि की दृष्टि से उन्नत होकर कालक्रम में अपनी मर्यादा को ऊँचा कर लेती है। इतिहास में अनेक ऐसे भी उदाहरण हैं जब छोटी या शूद्र जातियों के समूहों को राज्य की कृपा से ब्राह्मण तथा क्षत्रिय स्वीकार कर लिया गया। जे. विलसन और एच. एल. रोज के अनुसार राजपूताना, सिंघ और गुजरात के पोखराना या पुष्करण ब्राह्मण और उत्तर प्रदेश में उन्नाव जिले के आमताड़ा के पाठक और महावर राजपूत इसी प्रक्रिया से उच्च जातीय हो गए। ऐसा देखा गया है कि जातियों का उच्च या निम्न स्थान धार्मिक अनुष्ठान तथा सामाजिक प्रथा, आर्थिक स्थिति तथा सत्ता द्वारा स्थिर और परिवर्तित होता है। इसके अतिरिक्त कुछ पेशे गंदे तथा निकृष्ट और कुछ शुद्ध तथा श्रेष्ठ माने जाते हैं। चमड़े का काम, मल मूत्र की सफाई कपड़ों की धुलाई आदि गंदे पेशे हैं; बाल काटना, मिट्टी और धातु के बर्तन बनाना, टोकरी, सूप आदि बनाना, बिनाई, धुनाई आदि निम्न कार्य हैं; खेती, व्यापार, पशुपालन, राजा की नौकरी मध्यम ओर विद्याध्ययन, अध्यापन, तथा शासन श्रेष्ठ कार्य हैं। इसी प्रकार भोजन के कुछ पदार्थ उत्तम और कुछ निकृष्ट माने जाते हैं। मृत पशु, विष्ठोपजीवी शूकर तथा मांसाहारी गीदड, कुत्ते, बिल्ली आदि का मांस निकृष्ट खाद्य माना जाता है। शाकाहार करना और मदिरात्याग उत्तम है। धार्मिक संस्कार और उनकी विधियों का भी बहुत महत्व है। स्त्रियों का पुनर्विवाह और विधवाविवाह उच्च जातियों में निषिद्ध और निम्न जातियों में स्वीकृत है। यह निषेध धार्मिक तथा सांस्कृतिक दृष्टि से उत्तम माना जाता है। अत: जब कोई जाति अपनी मर्यादा को ऊँचा करने के लिये प्रयत्नशील होती है तो ऊँची जातियों के धार्मिक संस्कारों को अपनाती है और निकृष्ट भोजन, मद्यपान, स्त्रियों के पुनर्विवाह और विधवाविवाह पर रोक लगा देती है। यद्यपि जातीय गतिशीलता हिंदू समाज के सभी स्तरों में, एक ही स्तर के अंदर और विभिन्न स्तरों के बीच विद्यमान है तथापि अंत्यज वर्ग की जातियों क ऊपर के स्तरों में पहुँचना अभी तक असंभव ही बना हुआ है। ऐसा भी देखा गया है कि संस्कार, संपत्ति और सत्ता की दृष्टि से उन्नत होने पर भी किसी जाति के उच्च श्रेणी संबंधी दावे को मान्यता नहीं मिली। कुछ भी हो आधुनिक युग में जातीय गतिशीलता अनेक दिशाओं में बढ़ रही है। पश्चात्य संस्कृति के प्रभाव ने एक नई धारा प्रवाहित की है। अंग्रेजी भाषा के माध्यम से उच्चशिक्षाप्राप्त वे लोग जो ऊँचे सरकारी पदों पर हैं या उद्योग तथा व्यापार में उन्नति कर गए हैं, अपने खान पान और रहन सहन को बदल रहे हैं और जातीय आचार व्यवहार का पालन नहीं करते अथवा उसकी उपेक्षा करते हैं। फिर भी, अपनी जाति से इनका संबंध बना रहता है और इन्हें जाति से विशेष प्रतिष्ठा तथा समान भी प्राप्त होता है। नगरों तथा औद्योगिक केंद्रों में अनेक जातीय भेदभाव तथा बंधन - जैसे खानपान के प्रतिबंध, पेशे तथा व्यवसाय संबंधी रुकावटें - और छुआछूत की कठोरता तीव्रता से समाप्त हो रही है। परंतु विवाह अब भी अपनी जाति के ही अंदर होता है, यद्यपि इस दिशा में भी परिवर्तन परिलक्षित हैं। अनेक जातियों की उपजातियों में विवाह संबंध सुगम हो गया है और विशेषकर उच्च जातियों में अंतर्जातीय विवाहों को स्वीकार किया जाने लगा है। कानूनी रूप से न्याय और दंड का अधिकार जाति पंचायतों के अधीन न रहने से भी उनकी शक्ति और प्रभाव बढ़ाने के लिये प्रयत्नशील हैं और इनके ये प्रयत्न राजनीतिक गतिविधियों में अभिव्यक्त होते हैं स्वतंत्रताप्राप्ति के बाद उत्तर प्रदेश में 'अजगर' दल (अहीर, जाट, गूजर और राजपूत) और शोषित वर्गसंघ का संघटन हुआ। महाराष्ट्र में श्री भीमराव अंबेडकर के नेतृत्व में पहले दलित वर्गसंघ और बाद में रिपब्लिकन पार्टी बनी और दक्षिण भारत में पहले जस्टिस पार्टी और स्वतंत्रप्राप्ति के बाद द्रविड़ मुन्नेत्र कड़गम्‌ का संघटन हुआ। देश के लोकतांत्रिक निर्वाचनों में जातितत्व प्रमुख हो जाता है, सरकारी नौकरियों और सुविधाओं की प्राप्ति में भी जातीय पक्षपात प्रतिलक्षित होता है। इस प्रकार राजनीति में जाति का विशेष स्थान हो गया है। 20 वीं शताब्दी के आरंभ से ही भौगोलिक दृष्टि से भी जातीय संघटन व्यापक होते जा रहे हैं और नए ढ़ग से अपने को संगठित कर रहे हैं।

भारतीय संविधान और कानून की दृष्टि से छुआछूत का व्यवहार दंडनीय अपराध है। संविधान ने अनुसूचित जातियों (दलित जातियों) और जनजातियों के लिये अनेक प्रकार के आरक्षण का वैधानिक प्राविधान किया है, जिसके अंतर्गत संसद तथा राज्यों के विधानमंडलों में आरक्षित स्थान निश्चित किए गए हैं। इसी प्रकार केंद्रीय तथा राज्य सरकारों की नौकरियों में भी अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लिये स्थान आरक्षित हैं। इन जातियों को यह आरक्षण अंतरिम काल के लिये दिया गया है।

जातिव्यवस्था के दोषसंपादित करें

भारतीय जातिव्यवस्था प्रागैतिहासिक काल से एक दृढ़ सामाजिक आर्थिक संस्था के रूप में विद्यमान है। निस्संदेह इस व्यवस्था में व्यक्ति की स्वतंत्रता अति सीमित है और वह जातिविशेष, जातीय शाखाविशेष तथा परिवारविशेष के सदस्य के रूप में जाना और माना जाता है। असमानता इसका दूसरा लक्षण है। इस व्यवस्था में व्यक्तिगत योग्यता तथा आकांक्षाओं का विशेष महत्व नहीं है। फिर भी, इस व्यवस्था ने समाज को एक ऐसी विलक्षण स्थिरता और व्यक्तियों को ऐसी शांति और सुरक्षा प्रदान की है जो अन्यत्र दिखाई नहीं देती। जातियों के आंतरिक संघटन, जजमानी व्यवस्था और पारिवारिक दायित्वों के द्वारा व्यक्ति को सभी प्रकार की सामाजिक सुरक्षा मिलती रही है। इसमें अनाथ बच्चों का पालन पोषण, विधवाओं, रोगियों अपाहिजों और वृद्धों की देखरेख तथा आश्रय की व्यवस्था है। किंतु जाति व्यवस्था का आधुनिक औद्योगिक अर्थप्रणाली और जनतांत्रिक स्वतंत्रता तथा समाजवादी समानता के मूल्यों से मेल नहीं बैठता और लगता है कि वह विरोध बुनियादी है। आर्थिक विकास के लिये जिस व्यावसायिक तथा भौगोलिक गतिशीलता की आवश्यकता है, जातीय बंधन उसमें बाधक है। अब यह देखनरा है कि वर्तमान निरंतर परिवर्तनशील और संक्रांति युग में जाति अपना स्वरूप बदलकर सामाजिक संबंधों में युगानुकूल नया सामंजस्य स्थापित करती है या निष्प्रयोज्य और अवरोधक बनकर समाप्त हो जाती है।

अन्य देशों में जातितत्वसंपादित करें

जातिव्यवस्था भारतीय समाज की विशेषता है। वह ऐसी स्थिर वस्तु मानी गई है। जिसमें व्यक्ति की सामाजिक मर्यादा जन्म से निश्चित होकर आजीवन अपरिवर्तनीय रहती है। ऐतिहासिक अभिलेखों से ज्ञात होता है कि प्राचीन मिस्र और पश्चिमी रोम साम्राज्य में भी इस प्रकार की व्यवस्था थी जिसमें कार्य विभाजन से उत्पन्न पेशे और पद वंशानुगत कर दिए गए थे। ईसा की 5वीं शताब्दी में रोम साम्राज्य की विधिसंहिता के अधीन सभी धंधे और प्रशासनिक कार्य वंशानुगत थे। विवाहसंबंध अपनी बिरादरी में ही हो सकता था। प्राचीन मिस्र में पुरोहित, सैनिक, लेखक, चरवाहे, सुअर पालनेवाले और व्यापारियों के पृथक्‌ पृथक्‌ वर्ग थे जिनके पेशे और पद वंशानुगत थे। कोई कारीगर अपना पैतृक धंधा छोड़कर दूसरा धंधा नहीं कर सकता था। उसका अपने वर्ग से संबंध अटूट था। सुअर पालने वाले अछूत माने जाते थे और उन्हें मंदिरों में प्रवेश करने की अनुमति नहीं थी। वैवाहिक दृष्टि से उनकी अंतर्विवाही जाति थी। सैनिक, पुरोहित और लेखक एवं अध्यापक उच्चवर्ग में थे और एक ही परिवार में तीनों प्रकार के व्यक्ति हो सकते थे। परंतु अन्य वर्गो के लिये उनके पैतृक पेशे निर्धारित थे। इस प्रकार मिस्र और प्राचीन रोम में वर्गो के विभाजन का रूप वैसा न था जैसा भारत में मिलता है। न तो खानपान और छुआछूत संबंधी प्रतिबंध थे और न अंतवर्गीय विवाहों पर धार्मिक या सामाजिक रोक थी। पेशों के संबंध में भी रोम तथा मिस्र दोनों देशों में शासन की ओर से रोक लगाई गई थी।

जापान में सैनिक सामंतवाद (12वीं शताब्दी से 18वीं शताब्दी के मध्य तक) के शासनकाल में अभिजात सैनिक समुराई वर्ग के अतिरिक्त कृषक, कारीगर, व्यापारी और दलित वर्ग थे। समुराई शासन सुविधासंपन्न वर्ग था, जिसके लिये विशेष कानूनी व्यवस्था और अदालतें थीं। दलित वर्ग में एता और हिनिन दो समूह थे जो समाज के पतित अंग माने जाते थे और गंदे तथा हीन समझे जानेवाले कार्य उनके सपुर्द थे। विभिन्न वर्ग विवाह की दृष्टि से अंतर्विवाही समूह थे और दो वर्गो के व्यक्तियों में विवाह के लिये शासन से विशेष आज्ञा लेने का आवश्यकता होती थी। चीन में शासकीय पदों के लिये अबाध परीक्षा का नियम था जो सभी वर्गो के लिये खुली थी। परंतु नाइयों का एक पृथक्‌ और पतित वर्ग माना जाता था जिसको न तो शासकीय परीक्षाओं में भाग लेने की अनुमति थी और न कोई अन्य वर्ग का व्यक्ति इनसे विवाहसंबंध करता था। अन्य वर्गो में पेशे साधारणत: वंगानुगत थे। परंतु इस संबंध में और अंतर्विवाह के संबंध में भी कठोर सामाजिक नियम नहीं थे। कोर्नियों में विभिन्न वर्ग सदा अपने वर्ग में ही विवाह करते हैं। किंतु मध्यम वर्ग के व्यक्ति दास वर्ग की स्त्रियों से विवाह कर लेते हैं। कैरोलिन में दासों के अतिरिक्त उच्च और निम्न दो वर्ग हैं। निम्न वर्ग का व्यक्ति यदि उच्च वर्ग के व्यक्ति को छू ले तो वह अपराधी माना जायगा जिसका दंड मृत्यु है। निम्न वर्ग के लोग मछली का शिकार तथा नाविक का कार्य नहीं कर सकते। अफ्रीका में लोहारों का समूह प्राय: शेष समाज से पृथक्‌ रखा जाता है और इस वर्ग के लोग अपनी बिरादरी में ही विवाह करते हैं। बर्मा में पैगोडा का दासवर्ग एक पृथक्‌ और अंतर्विवाही समूह है और उनका पेशा वंशानुगत है। वहाँ के राजाओं के काल में छह हीन वर्ग समझे जाते थे जो शेष समाज से पृथक्‌ रहते थे। उनसे न तो कोई अन्य बर्मी विवाह तथा खानपान का संबंध करता था और न उनके पेशों को अपनाता था। इन वर्गो में थे पैगोडा के दास, पुलिस का काम करनेवाले तथा फाँसी देनेवाले लोग, कोढ़ी, असाध्य रोगों से पीड़ित, विकलांग, मुरदों को दफन करनेवाले लोग तथा राजा के खेतों में काम करनेवाले दास।

इस प्रकार हम देखते हैं कि प्राचीन काल में और सामंतवादी व्यवस्था में पेशों और पदों की वंशानुगत करने को प्रवृत्ति प्राय: सभी देशों में थी। इनके अतिरिक्त अनेक देशों में कुछ समूह ऐसे भी दिखाई देते हैं जो शेष समाज से पृथक्‌ और हीन हैं तथा अनेक नागरिक और धार्मिक सुविधाओं से वंचित हैं। सामाजिक मर्यादा की दृष्टि से विभिन्न वर्गों का श्रेणीविभाजन तो सभी देशों में रहा है। भारतीय उच्च वर्गो की भाँति अन्यत्र भी उच्च वर्गो को प्राय: सांपत्तिक, नागरिक और धार्मिक विशेषाधिकार प्राप्त रहे हैं। छुआछूत और अंतर्विवाहों पर निषेध के कुछ उदाहरण भी जहाँ तहाँ मिलते हैं। प्राचीन मिस्र, मध्यकालीन रोम और सामंती जापान में राज्य की ओर से अंतर्विवाहों पर प्रतिबंध लगा दिए गए थे और पेशों को वंशानुगत कर दिया गया था। वंशानुगत पेशे, बिरादरी में ही विवाह का नियम और छुआछूत आदि भारतीय जाति के प्रमुख तत्वों में हैं। किंतु भारत के बाहर वर्तमान समय में या पुराने इतिहास में ऐसे किसी समाज का अस्तित्व दिखाई नहीं देता जो स्वत: उद्भूत जातीय व्यवस्था से परिचलित हो और जहाँ जातिव्यवस्था समाज का स्वभाव बन गई हो।

संदर्भ ग्रंथसंपादित करें

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इन्हें भी देखेंसंपादित करें

बाहरी कड़ियाँसंपादित करें