शाकम्भरी देवी माँ पार्वती का एक सौम्य अवतार हैं। इन्हें चार भुजाओं और कही पर अष्टभुजाओं वाली के रुप में भी दर्शाया गया है। ये माँ ही वैष्णो, चामुंडा, कांगड़ा वाली, ज्वाला, चिंतापुरणी, कामाख्या, चंडी, बाला सुंदरी, मनसा, नैना और शताक्षी देवी कहलाती है। माँ शाकम्भरी ही रक्तदंतिका, छिन्नमस्तिका, भीमा,भ्रामरी और श्री दुर्गा है। माँ श्री शाकंभरी के देश मे अनेक सिद्धपीठ है। जिनमे शाकम्भरी माता राजस्थान सकरायपीठ और सांभर पीठ राजस्थान मे और सहारनपुर पीठ उत्तर प्रदेश मे है। तीनों पीठों का सम्बन्ध शिवालिक पर्वतमाला पर विराजमान शाकम्भरी देवी से है इनके प्रसाद में कोई भी हरी वनस्पति दी जाती है।

शाकम्भरी
"हरित वस्त्र वालों की"
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देवनागरी शाकम्भरी
जीवनसाथी शिव
त्यौहार शाकम्भरी पूर्णिमा, दुर्गा पूजा, दुर्गा अष्टमी, नवरात्रि, दशहरा, विजयवाड़ा का शाकम्भरी उत्सव, कनक दुर्गा मंदिर

शाकम्भरी देवी और दुर्गमासुर की कथासंपादित करें

पुराणों और धार्मिक ग्रन्थों के अनुसार हिरण्याक्ष के वंश मे एक महादैत्य रूरु था। रूरु का एक पुत्र हुआ दुर्गम। दुर्गमासुर ने ब्रह्मा जी की तपस्या करके चारों वेदों को अपने अधीन कर लिया। वेदों के ना रहने से समस्त क्रियाएँ लुप्त हो गयी। ब्राह्मणों ने अपना धर्म त्याग कर दिया। चौतरफा हाहाकार मच गया। ब्राह्मणों के धर्म विहीन होने से यज्ञादि अनुष्ठान बंद हो गये और देवताओं की शक्ति भी क्षीण होने लगी। जिसके कारण एक भयंकर अकाल पड़ा। किसी भी प्राणी को जल नही मिला जल के अभाव मे वनस्पति भी सूख गयी। अतः भूख और प्यास से समस्त जीव मरने लगे। दुर्गमासुर के अत्याचारों से पीडि़त देवतागण शिवालिक पर्वतमालाओं में छिप गये तथा उनके द्वारा जगदम्बा की स्तुति करने पर महामाया माँ भुवनेश्वरी आयोनिजा रूप मे इसी स्थल पर प्रकट हुई। समस्त सृष्टि की दुर्दशा देख जगदम्बा का ह्रदय पसीज गया और उनकी आंखों से आंसुओं की धारा प्रवाहित होने लगी। माँ के शरीर पर सौं नैत्र प्रकट हुए। शत नैना देवी की कृपा से संसार मे महान वृष्टि हुई और नदी- तालाब जल से भर गये। देवताओं ने उस समय माँ की शताक्षी देवी नाम से आराधना की। शताक्षी देवी ने एक दिव्य सौम्य स्वरूप धारण किया। चतुर्भुजी माँ कमलासन पर विराजमान थी। अपने हाथों मे कमल, बाण, शाक- फल और एक तेजस्वी धनुष धारण किये हुए थी। माता ने अपने शरीर से अनेकों शाक प्रकट किये। जिनको खाकर संसार की क्षुधा शांत हुई। इसी दिव्य रूप में माँ शाकम्भरी देवी के नाम से पूजित हुई। तत्पश्चात् वह दुर्गमासुर को रिझाने के लिये सुंदर रूप धारण कर शिवालिक पहाड़ी पर आसन लगाकर बैठ गयीं। इसी स्थल पर मां जगदम्बा ने दुर्गमासुर तथा अन्य दैत्यों का संहार किया व भक्त भूरेदेव को अमरत्व का आशीर्वाद दिया।मां की असीम अनुकम्पा से वर्तमान में भी सर्वप्रथम उपासक भूरेदेव के दर्शन करते हैं तत्पश्चात पथरीले रास्ते से गुजरते हुये मां शाकम्भरी देवी के दर्शन हेतु जाते हैं। जिस स्थल पर माता ने दुर्गमासुर नामक राक्षस का वध किया था वहाँ अब वीरखेत का मैदान है। जहाँ पर माता सुंदर रूप बनाकर पहाड़ी की शिखा पर बैठ गयी थी वहाँ पर माँ शाकम्भरी देवी का भवन है। जिस स्थान पर माँ ने भूरा देव को अमरत्व का वरदान दिया था वहाँ पर बाबा भुरादेव का मंदिर है। प्राकृतिक सौंदर्य व हरी- भरी घाटी से परिपूर्ण यह क्षेत्र उपासक का मन मोह लेता है। देवीपुराण के अनुसार शताक्षी, शाकम्भरी व दुर्गा एक ही देवी के नाम हैं।

इतिहास मे शाकम्भरी पीठ का महत्वसंपादित करें

माँ शाकम्भरी पीठ का महत्व इतिहास मे भी कम नही है। आचार्य विष्णुगुप्त चाणक्य और चंद्रगुप्त ने काफी समय यहाँ बिताया था। आचार्य सत्यकेतु विद्यालंकार की पुस्तक आचार्य विष्णुगुप्त चाणक्य मे भी इसका उल्लेख है। चंद्रगुप्त के समय मे माँ शाकम्भरी पीठ स्रुघ्न देश का सबसे बड़ा तीर्थ स्थल था। माँ शाकम्भरी के दर्शन के लिए प्रतिवर्ष लाखों श्रद्धालुओं की भीड़ सिद्धपीठ मे पहुँचती थी। उस समय शाकम्भरी देवी जाने का एकमात्र रास्ता वृहदहट्ट (वर्तमान बेहट) ही था। यहाँ से आगे का रास्ता घने जंगलों से होकर गुजरता था। वृहदहट्ट से श्रद्धालु टोली बनाकर शक्तिपीठ मे जाते थे।पूरे भारत मे माँ शाकम्भरी देवी का प्राकाट्य स्थल और प्राचीन शक्तिपीठ यही है साम्भर की शाकम्भरी देवी का मंदिर चौहानों ने बनवाया था जोकि माँ शाकम्भरी को अपनी कुलदेवी मानते थे और सकराय मे भी लगभग 10 वीं और ग्यारहवीं सदी मे ब्रह्माणी और रूद्राणी को शाकम्भरी कहा जाने लगा

शक्तिपीठ शाकुम्भरी देवी सहारनपुरसंपादित करें

माँ श्री शाकंभरी भगवती का अति पावन प्राचीन सिद्ध शक्तिपीठ शिवालिक पर्वतमाला के जंगलों में एक बरसाती नदी के किनारे है। जिसका वर्णन स्कंद पुराण,मार्कंडेय पुराण,भागवत आदि पुराणों मे मिलता है। माँ का यही शक्तिपीठ देवी का नित्य स्थान है। कहा जाता है कि माता यहाँ स्वयंभू स्वरूप मे प्रकट हुई थी। जनश्रुतियों के अनुसार जगदंबा के इस धाम के प्रथम दर्शन एक चरवाहे ने किये थे। जिसकी समाधि आज भी मंदिर परिसर मे बनी हुई है। माँ के दर्शन से पुर्व यहाँ देवी के अनन्य भक्त बाबा भूरादेव के दर्शन करने का विधान है।

शाकम्भरी देवी माँ के वैसे तो अनेक धाम है। लेकिन सहारनपुर की जंगली पहाडियों मे विराजमान सिद्ध भवन की छटा ही कुछ निराली है। पहाड़ी की तलहटी मे माँ का मंदिर है। पंद्रह-सौलह सीढियाँ चढने के पश्चात माँ के अद्भुत स्वरूप के दर्शन होते हैं। संगमरमर के चबुतरे पर जिस पर चांदी मढी हुई है माता अपने चारों स्वरूपों और बाल गणेश के साथ विराजमान है। माता के चारों रूप सुंदर पोशाकों सोने व चांदी के आभुषणो से अलंकृत है। माँ के दायीं और भीमा एवं भ्रामरी देवी तथा बायीं और शताक्षी देवी प्रतिष्ठित है। देश मे ये एकमात्र ऐसा मंदिर है जहाँ दुर्गा के चार रूपो के दर्शन एक साथ होते है। माँ के दर्शन से पुर्व भुरा देव बाबा के दर्शन करने होते है। जिन्होंने देवासुर संग्राम में शामिल होकर अपने प्राणों का बलिदान दे दिया था। माता जगदंबा ने प्रसन्न होकर भुरादेव को यह वरदान दिया था कि जो भी प्राणी मेरे दर्शनार्थ आएगा वह प्रथम भुरादेव के ही दर्शन करेगा।अर्थात बगैर भुरादेव के दर्शन माता को अपनी पुजा स्वीकार नहीं होती। माँ श्री शाकम्भरी देवी जी साक्षात लक्ष्मी स्वरूपा है। शाकम्भरी देवी जी भगवान विष्णु के ही आग्रह करने पर शिवालिक की दिव्य पहाडियों पर स्वयंभू स्वरूप मे प्रकट हुई थी। माता शाकम्भरी के स्वरूप का विस्तृत वर्णन दुर्गा सप्तशती के मुर्ति रहस्य अध्याय मे मिलता है। कहा जाता है कि महाशक्ति ने आयोनिजा स्वरूप मे प्रकट हो शताक्षी अवतार धारण किया। देवी शताक्षी रचना का प्रतीक है। शताक्षी माँ ने ही शाकों द्वारा सबकी बुभुक्षा को शांत किया और श्री शाकम्भरी देवी कहलाई जोकि पालन का प्रतीक है। शाकम्भरी देवी ने ही दुर्गमासुर दानव का संहार करके जगत को शांति प्रदान की और दुर्गा कहलाई जोकि संहार का प्रतीक है। अतः जगदंबा शाकम्भरी देवी जी ही अप्रत्यक्ष रूप से परमशक्ति परमेश्वरी महामाया है। माँ का शक्तिपीठ अति प्राचीन है। माता के बुलाने पर भक्तजन चुंबकीय शक्ति की तरह दरबार की और खींचें चले आते है। माता के भवन की परिक्रमा मे काल भैरव,ज्वाला देवी,काली माता,शिवजी,गणेश भगवान, हनुमान जी नैना चरवाहा आदि के लघु मंदिर बने हुए है। जगत को तारने वाली और शरणागत का परित्राण करने वाली महाशक्ति जगत माता चंडिका साक्षात माँ शाकम्भरी ही है। माँ अंबा भगवती भवानी भुवनेश्वरी भंडारे भरने वाली है।माँ सर्वव्यापी और सर्वविदित है पुरातन काल मे माँ शाकम्भरी देवी ही हिमालय की पर्वत शृंखलाओं मे प्रकट हुई थी अतः माँ का सर्वाधिक प्राचीनतम तीर्थ यही है और सतयुग मे देवी सती का शीश भी यहाँ गिरा जो इसकी प्राचीनता की पुष्टि करता है।

माँ शाकम्भरी चौहान सहित अनेक राजपूतो और अन्य जातियों की कुलदेवी है 8वीं शताब्दी के काल मे अनेकों राजपूत अपने राज्य का विस्तार करते हुए राजस्थान पहुंच गए वहाँ जाकर भी उन्होंने अपनी कुलदेवी माँ शाकम्भरी के भव्य मंदिर बनवाये और आशाएं पूरी करने वाली माँ शाकम्भरी आशापुरा नाम से भी विख्यात हुई। माँ आदिशक्ति जगतजननी जगदंबिका योगमाया शाकम्भरी जंगल मे मंगल करने वाली भगवती है। माँ के सिद्ध शक्तिपीठ का उल्लेख महाभारत के वन पर्व मे इस प्रकार है " राजन उस पवित्र देवी स्थान की यात्रा करे जो तीनों लोको मे शाकम्भरी के नाम से विख्यात है "। यहाँ पर यह वर्णन शिवालिक पर्वत पर विराजमान शाकम्भरी देवी का ही है क्योंकि इस वर्णन मे शाकेश्वर महादेव का भी उल्लेख है जो शाकम्भरी देवी मंदिर के पीछे पहाड़ी की गोद मे है। लेकिन वर्तमान मे उन लोगों की कमी नही है जो इस मंदिर की प्राचीनता को लेकर संदेह करते है। अगर मंदिर की प्राचीनता के बारे मे पता करना है तो महाभारत के वनपर्व और स्कंद पुराण के केदारखंड का अध्ययन नितांत आवश्यक है क्योंकि केवल अनुमान लगाने से कुछ हासिल नही हो सकता। पांडवों द्वारा स्थापित पांच शिवमंदिर भी यहाँ है यथा बडकेश्वर महादेव, शाकेश्वर महादेव, इन्दरेश्वर महादेव, कमलेश्वर महादेव और वटुकेश्वर महादेव।

मंदिर की भौगोलिक स्थितिसंपादित करें

माता का मंदिर चारों और से पहाडियों से घिरा हुआ है जिनकी ऊंचाई 2000 से 3000 फीट तक है। इस क्षेत्र मे बेर, बेलपत्र, सराल, तुरड, महव्वा,आंवला,तेंदू, कढाई, शीशम, खैर, सराल, आम, जामुन, डैक,अमलतास, पलाश,नीम, सांगवान, साल आदि के पेड़ अत्यधिक पाये जाते है। इसके अतिरिक्त शिवालिक की ये पहाडियां आयुर्वेद औषधियों से परिपूर्ण है। इस क्षेत्र मे बंदर, काले मुंह वाले लंगूर, हाथी, हिरन, चित्तल, जंगली बकरे, मुर्गे, तोते, सेह, बलाई, लोमडे, गुलदार, माहें, तेंदुए आदि वन्य जीव निवास करते हैं। शाकम्भरी देवी सिद्धपीठ के उत्तर की और सात किमी दूर सहंस्रा ठाकुर धाम है जोकि प्राकृतिक आभा से परिपूर्ण है। सहंस्रा ठाकुर के पास ही प्राचीन गौतम ऋषि की गुफा, सुर्यकुंड आदि पवित्र स्थान है। शाकम्भरी देवी मंदिर के पास ही माता छिन्नमस्ता देवी और मनसा देवी का संयुक्त मंदिर है। माता छिन्नमस्ता का मंदिर चार शिव मंदिरों के बीच मे है पूर्व मे कमलेश्वर महादेव,पश्चिम मे शाकेश्वर महादेव, उत्तर मे वटुकेश्वर महादेव और दक्षिण मे इन्दरेश्वर महादेव के मंदिर है। माता शाकम्भरी देवी के मंदिर से एक फर्लांग आगे पहाडियों के बीच प्राचीन रक्तदंतिका देवी का मंदिर है जिसका जीर्णोद्धार 1968 के लगभग मे हुआ था। रक्तदंतिका मंदिर से कुछ आगे महाकाली की प्राचीन गुफा भी है। माता शाकंभरी देवी मंदिर के बारे में मान्यता है कि नवरात्र की चतुर्दशी पर यहां शेर भी शीश नवाने के लिए आता था। जब माता का शेर यहां शीश नवाने के लिए आता था तब सभी भक्त रास्ता छोड़ देते थे और शेर शीश नवाकर चुपचाप चला जाता था। आज आसपास आबादी होने की वजह से शेर तो नही आता लेकिन शेर के आने के आने के प्रमाण जरूर मिलते हैं। इस मंदिर के बारे में ऐसी भी धारणा है कि इस मंदिर परिक्षेत्र में तेल से कोई भी खाद्य पदार्थ नहीं बनाया जाता था अगर कोई भूलवश भी तेल से खाद्य पदार्थ बनाने की कोशिश भी करता था तो उसकी दुकान में आग लग जाती थी इसलिए यहां पर सभी भोजन सामग्री घी से बनाई जाती थी।

आस - पास के प्राचीन तीर्थसंपादित करें

इस पावन सिद्धपीठ के लगभग 100 किलोमीटर दायरे के अंदर काफी और प्राचीन तीर्थ भी हैं जिनका वर्णन वेदों और पुराणों में किया गया है। माता शाकंभरी देवी मंदिर से 90 किलोमीटर दूर पूर्व की ओर हरिद्वार तीर्थ है जो कि उत्तराखंड राज्य मे है। सिद्धपीठ से 78 किलोमीटर दूर दक्षिण की ओर देवबंद नामक स्थान पर प्राचीन माता त्रिपुरा बाला सुंदरी का मंदिर है। इस पंचकोसी सिद्धपीठ से लगभग 81 किलोमीटर दूर पश्चिम की ओर श्री आदिबद्री तीर्थ और माता मंत्रा देवी और सरस्वती नदी का उद्गम स्थल है जो कि हरियाणा के यमुनानगर जिले में आता है। सिद्धपीठ से लगभग 35 किलोमीटर दूर पश्चिम की ओर यमुनानगर जिले में ही कालेश्वर महादेव का प्राचीन मठ है। शाकंभरी देवी से लगभग 99 किलोमीटर दूर त्रिलोकपुर धाम है जहां माता बाला सुंदरी का भव्य मंदिर है जोकि हिमाचल राज्य के जिला सिरमौर में पड़ता है। वर्तमान में माता शाकुंभरी देवी की गणना उत्तर भारत की प्रसिद्ध नौ देवी स्थलों मे की जाती है अगर उत्तर भारत की नौ देवियों के नाम आए तो बिना माता शाकंभरी की यात्रा के नौ देवियों की यात्रा संपूर्ण नहीं मानी जाती। नौ देवियों के नाम इस प्रकार हैं माता वैष्णो देवी कटरा,मां चामुंडा देवी, मां वज्रेश्वरी देवी कांगड़ा,मां ज्वाला देवी,मां चिंतपूर्णी देवी,मां नैना देवी,मां मनसा देवी पंचकूला ,मां कालिका देवी,मां शाकम्भरी देवी लेखक अनिल सागडी

मंदिर और देवी दर्शनसंपादित करें

माँ शाकम्भरी देवी के भवन से लगभग एक किमी पहले बाबा भूरादेव का मंदिर है। भूरादेव के प्रथम दर्शन कर यात्री आगे प्रस्थान करते हैं। आगे का मार्ग पथरीला है जो एक खोल से होकर जाता है। वर्षा ऋतु मे खोल मे पानी भी आ जाता है। तब यात्रा स्थगित कर देनी चाहिए क्योंकि पानी का बहाव अधिक होता है। थोड़ा आगे चलने पर माँ शाकम्भरी देवी प्रवेश द्वार आता है। कुछ और आगे चलने पर माता का भवन दिखाई देने लगता है। माता के मंदिर मे प्रवेश करने से पहले श्रध्दालु पंक्ति मे लग जाते हैं और सीढिया चढकर माता के भवन मे पहुंच जाते हैं। माता के गर्भगृह मे माता शाकम्भरी देवी दाहिने भीमा, भ्रामरी और बाल गणेश तथा बायें और शताक्षी देवी की प्रतिमा विराजमान है। ये प्रतिमाएँ काफी प्राचीन है। लेकिन माता शाकम्भरी देवी की प्रतिमा अधिक प्राचीन है बाकी प्रतिमाओं को आदिगुरु शंकराचार्य जी ने स्थापित किया था। मंदिर की परिक्रमा मे कई देवी-देवताओ के लघु मंदिर बने हुए हैं।

शाकम्भरी देवी के अन्य मंदिरसंपादित करें

सकराय धाम माता शाकम्भरी देवी के मुख्य तीन मंदिर है। माता का दुसरा प्रमुख मंदिर राजस्थान के सकराय गाँव मे अरावली की पर्वतमालाओं की शांत मालकेतु घाटी मे है। यहाँ पर माता के दर्शन ब्रह्माणी और रुद्राणी के रूप मे होते है। माता का यह मंदिर सीकर जिले मे स्थित है। उदयपुरवाटी से यह लगभग १६ किमी की दूरी पर स्थित है। कस्बे के शाकम्भरी गेट से १५ किलोमीटर दूर अरावली की पहाडिय़ों के बीच सकरायपीठ माता शाकंभरी का प्राचीन मंदिर स्थित है। मां शाकंभरी के मंदिर की स्थापना सैकड़ों वर्ष पूर्व में हुई थी। माता के मंदिर में ब्रह्माणी व रूद्राणी के रूप में दो प्रतिमाएं विराजमान हैं।सिद्धपीठ होने से माता की ख्याति आज पूरे भारत में फैली हुई है। मंदिर के पुजारियों के अनुसार माता शाकंभरी के प्राचीन तीन मंदिर है। पहला प्राचीन मंदिर यहां सकराय में तो दूसरा उत्तर प्रदेश के सहारनपुर मे है और तीसरा राजस्थान के ही साम्भर मे है।

माँ का यह पावन धाम अरावली की सुंदर पहाडियों की शांत मालकेतू घाटी मे है। प्रतिदिन सुबह साढ़े पांच बजे और शाम को पौने सात बजे माता की आरती होती है। नवरात्र में माता के दरबार में जगह जगह शतचंडी अनुष्ठानों का आयोजन होता है। जगदंबा के दरबार मे अब तक पूर्व राष्ट्रपति प्रतिभा सिंह पाटिल, पूर्व उप राष्ट्रपति भैरूसिंह शेखावत, मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे, हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह, सपा के अमरसिंह पहुंच चुके है। इनके अलावा फिल्म स्टार मनोज कुमार, अजय देवगन, काजोल, तनिशा सहित सैंकड़ों अति विशिष्टजन नवरात्र में मां शाकम्भरी के दरबार में दर्शन कर चुके है क्योंकि माँ की लीला अति विचित्र है। मैय्या के चमत्कारो को सुन हर कोई सकराय दौड़ा जाता है। मां शाकंभरी के जाने के लिए एकमात्र मार्ग उदयपुरवाटी से होकर गुजरता है। इसके अलावा जयपुर रोड से गौरिया के रास्ते से होते हुए भी मां शाकंभरी के दरबार में श्रद्धालु पहुंचते हैं लेकिन पहाडिय़ों के मध्य निकले इस रास्ते मे काफी खतरनाक मोड़ है।

कहा जाता है कि यहाँ माँ शाकम्भरी अर्थात ब्रह्माणी को सात्विक और रूद्राणी को तामसिक भोजन परोसा जाता था। भोग के समय देवी की मूर्तियों के बीच पर्दा लगाया जाता था। एक दिन भूलवश माँ ब्रह्माणी अर्थात शाकम्भरी के भोग के थाल से रूद्राणी अर्थात काली का भोग थाल छू गया। तब माँ की मूर्ति का मुख तिरछी और हो गया। अतः इस मंदिर से तामसिक भोग की प्रथा बंद हुई और दोनों माताओं को सात्विक भोग दिया जाने लगा।

माँ शाकम्भरी के भक्त सकराय धाम की यात्रा कर अपनी जीवन यात्रा धन्य बनाये

साम्भर धाम

माता का यह स्थान जयपुर जिले मे साम्भर कस्बे के पास साम्भर झील मे एक छोटी सी पहाड़ी पर है। चिलचिलाती धूप और रेगिस्तान की तपती रेत के बीच यह आध्यात्मिक स्थान है। माता का यह मंदिर पृथ्वीराज चौहान के समय बनाया गया था। उससे पहले यहाँ जंगल होता था और घाटी देवी की बनी कहलाती थी। राजस्थान की राजधानी जयपुर से करीब 100 किलोमीटर दूर सांभर कस्बे में स्थित मां शाकंभरी मंदिर करीब 2500 साल पुराना बताया जाता है। शाकंभरी को दुर्गा का अवतार माना जाता है। मंदिर में भादवा सुदी अष्टमी को मेला आयोजित होता है। दोनों ही नवरात्रों में माता के दर्शन करने के लिए दूर-दूर से भक्त आते हैं। दंत कथाओं और स्थानीय लोगों के मुताबिक मां शाकंभरी की कृपा से यहां चांदी की भूमि उत्पन्न हुई। चांदी के साथ ही यहां इस बात को लेकर झगड़े शुरू हो गए। जब समस्या ने विकट रूप ले लिा तो मां ने यहां बहुमूल्य सम्पदा और बेशकीमती चांदी को नमक में बदल दिया। इस तरह से सांभर झील की उत्पत्ति हुई। वर्तमान में करीब 90 वर्गमील में यहां नमक की झील है।

इसके अलावा देवी के अन्य धाम शाकम्भरी धाम कटक

शाकम्भरी धाम केदारहिल्स

शाकम्भरी देवी हरिद्वार

बनशंकरी देवीसंपादित करें

माँ बनशंकरी देवी का मंदिर भारत के कर्नाटक राज्य के बागलकोट जिले में बादामी के पास स्थित एक हिंदू मंदिर है। मंदिर को बनशंकरी या वनशंकरी कहा जाता है क्योंकि यह तिलकारण्य वन में स्थित है। मंदिर की देवी को शाकुम्भरी भी कहा जाता है, जो देवी आदिशक्ति का स्वरूप है।

शाकम्भरी देवी का स्वरूपसंपादित करें

माता शाकम्भरी देवी के स्वरूप का विस्तृत वर्णन श्री दुर्गा सप्तशती के अंत में मूर्ति रहस्य में मिलता है। इसके अनुसार शाकंभरी देवी नीलवर्णा है । नील कमल के समान उनके नेत्र हैं। गंभीर नाभि है। त्रिवल्ली से विभूषित सूक्ष्म उदर वाली है । यह माता कमल पर विराजमान हैं। उनके एक हाथ में कमल है जिन पर भंवरे गूंज रहे हैं ये परमेश्वरी अत्यंत तेजस्वी धनुष को धारण करती हैं। ये ही देवी शाकम्भरी है शताक्षी तथा दुर्गा नाम से भी यही कही जाती है। ये ही विशोका, दुष्टदमनी ,सती,चंडी,मां गौरी ,कालिका तथा विपत्तियों का विनाश करने वाली पार्वती है। जो मनुष्य शाकम्भरी का ध्यान जब पूजा स्तुति और नमस्कार करता है ।वह शीघ्र ही अन्न पान,फल और अमृत रूपी अक्षय फल पाता है।

पंचकोसी सिद्धपीठसंपादित करें

माँ शाकुम्भरी देवी के मंदिर को पंचकोसी सिद्धपीठ कहते हैं। देवताओं के आग्रह पर माँ ने पंचकोसी सिद्धपीठ मे आसन लगाया था। माँ की महिमा का वर्णन शाकम्भरी चालीसा मे इस प्रकार है-

पांचकोस की खोल तुम्हारी

तेरी लीला अति विस्तारी

पंचकोसी सिद्धपीठ की महिमा श्रीदेवी भागवत् मे शाकम्भरी,शताक्षी महात्म्य मे मिलती है उसके अनुसार देवता माँ शाकम्भरी को पंचकोसी मे विराजित रहने वाली कह रहे हैं।

शाकम्भरी देवी की महिमासंपादित करें

जय जय शाकंभरी माता ब्रह्मा विष्णु शिव दाता हम सब उतारे तेरी आरती री मैया हम सब उतारे तेरी आरती

संकट मोचनी जय शाकंभरी तेरा नाम सुना है री मैया राजा ऋषियों पर जाता मेधा ऋषि भजे सुमाता हम सब उतारे तेरी आरती

मांग सिंदूर विराजत मैया टीका शुभ सजे है सुंदर रूप भवन में लागे घंटा खूब बजे है री मैया जहां भूमंडल जाता जय जय शाकंभरी माता हम सब उतारे तेरी आरती

क्रोधित होकर चली मात जब शुंभ निशुंभ को मारा को मारा महिषासुर की बांह पकड़ कर धरती पर दे मारा मैया मारकंडे विजय बताता पुष्पा ब्रह्मा बरसाता हम सब उतारे तेरी आरती

चौसठ योगिनी मंगल गाने भैरव नाच दिखावे। भीमा भ्रामरी और शताक्षी तांडव नाच सिखावें री मैया रत्नों का हार मंगाता दुर्गे तेरी भेंट चढ़ाता हम सब उतारे तेरी आरती

कोई भक्त कहीं ब्रह्माणी कोई कहे रुद्राणी तीन लोक से सुना री मैया कहते कमला रानी री मैया मां से बच्चे का नाता ना ही कपूत निभाता हम सब उतारे तेरी आरती

सुंदर चोले भक्त पहनावे गले मे सोरण माला शाकंभरी कोई दुर्गे कहता कोई कहता ज्वाला री मैया दुर्गे में आज मानता तेरा ही पुत्र कहाता हम सब उतारे तेरी आरती

शाकंभरी मैया की आरती जो भी प्रेम से गावें सुख संतति मिलती उसको नाना फल भी पावे री मैया जो जो तेरी सेवा करता लक्ष्मी से पूरा भरता हम सब उतारे तेरी आरती

कैसे पहुंचेसंपादित करें

शाकुंभरी देवी का प्रसिद्ध मंदिर उत्तर प्रदेश राज्य के जिला सहारनपुर में पड़ता है। इसके लिए सबसे पहले सहारनपुर पहुंचना होता है। दिल्ली से सहारनपुर लगभग 182 किलोमीटर दूर पड़ता है और पंजाब की ओर से आने वाले श्रद्धालुओं के लिए अंबाला वाया यमुना नगर मार्ग अत्याधिक सुगम है । चंडीगढ़ से पंचकूला होते हुए नेशनल हाईवे 73 द्वारा सीधे सहारनपुर पहुंचा जा सकता है । सहारनपुर के निकटतम हवाई अड्डा देहरादून चंडीगढ़ और दिल्ली है जो लगभग 50 से 150 किलोमीटर तक के दायरे में हैं। हिमाचल प्रदेश से आने वाले श्रद्धालुओं के लिए सहारनपुर आना जरूरी नहीं है। पौंटा साहिब से हथिनी कुंड बैराज होते हुए बेहट पहुंचा जा सकता है। बेहट से शाकंभरी देवी का मंदिर 16 किमी दूर है।

मंदिरसंपादित करें

माता शाकम्भरी देवी सिद्धपीठ के मंदिरों की सूची इस प्रकार है- (1)शाकम्भरी देवी द्वार जो सिद्धपीठ से दो किमी पहले है।

(2)माता बगलामुखी मंदिर

(3)शनिदेव मंदिर

(4)पंचमुखी हनुमान मंदिर

(5)बडकेश्वर महादेव मंदिर

(6)भूरादेव मंदिर

(7)इन्दरेश्वर महादेव मंदिर

(8)मनसा/ छिन्नमस्ता मंदिर

(9)कमलेश्वर हादेव मंदिर

(10)शाकेश्वर महादेव मंदिर

(11)शंकराचार्य आश्रम

(12)शाकम्भरी संस्कृत माध्यमिक विद्यालय

(13)श्री शाकम्भरी देवी भवन मंदिर

(14)बीरखेत का मैदान

(15)वटुकेश्वर महादेव मंदिर

(16)रक्तदंतिका मंदिर

(17)महाकाली की गुफा

(18)प्रेत शिला

(19)सहंस्रा ठाकुर धाम

(20)सूर्यकुण्ड

(21)गौतम ऋषि की गुफा

(22)बाणगंगा

माता शाकुंभरी देवी का मंदिर शिवालिक की पर्वत मालाओं में बना हुआ है। यह स्थान प्राचीन सिद्ध शक्तिपीठ है। प्राचीन सिद्ध शक्तिपीठ होने के कारण भी यह उपेक्षित रहा । सरकार यहां कोई भी विकास कार्य नहीं करवा सकती। जनमानस को वर्षा ऋतु के दौरान बरसाती नदी से निकलकर मंदिर जाना होता है। मंदिर तक पहुंचने के लिए 1 किलोमीटर तक कोई सड़क नहीं है बल्कि नदी के बीच से गुजर कर जाना होता है। बरसात के दिनों में जब नदी में भयंकर बाढ़ आती है तो काफी श्रद्धालु बह जाते हैं। जिससे जानमाल का काफी नुकसान होता है। शारदीय नवरात्र के दौरान यहां एक बहुत बड़ा मेला लगता है। वैसे यहां पर साल में तीन बड़े मेले लगते हैं। जिनमें शारदीय नवरात्र मेला मुख्य माना जाता है। इस मेले में देश के विभिन्न भागों से करोड़ों श्रद्धालु श्रद्धा की जोत मन में जगा कर माता के दरबार में हाजिरी देने आते हैं। प्रमुख प्रधान शक्तिपीठ होने के बाद भी यहां पर जिला प्रशासन द्वारा बनाई गई तो तमाम व्यवस्थाएं धरी की धरी रह जाती है। शारदीय नवरात्र के दौरान नदी में बाढ़ आ जाती है और पूरा मेला तहस-नहस हो जाता है। इस शक्तिपीठ में मूलभूत सुविधाएं श्रद्धालुओं को मिलनी चाहिए ताकि शक्तिपीठ की गरिमा बनी रहे और अचानक आई बाढ़ से निपटा जा सके। यहां चढ़ावे के रूप में इतनी राशि चढ़ती है कि सरकार को अपनी ओर से एक रुपया भी खर्च करने की जरूरत नहीं पड़ेगी।

पुराणों मे शाकम्भरी पीठ का उल्लेखसंपादित करें

माँ शाकम्भरी पीठ का वर्णन स्कंद पुराण, भागवत् पुराण, शिव पुराण, मारकंडेय पुराण, कनक धारा स्तोत्र, देवी पुराण, महाभारत आदि ग्रंथों मे मिलता है। महाभारत के वनपर्व के अनुसार, ततो गच्छेत राजेन्द्र देव्या स्थानं सुदुर्लभं। शाकम्भरीति विख्याता त्रिषुलोकेशु विश्रुता।। दिव्यवर्ष सहस्त्र शाकेन किल सुव्रता आहार सा कृतवती मासि मासि नराधिप ऋषियों अभ्यागतास्तत्र देव्या भक्त्यातपोधना: आतिथ्य च कृतम तेषाम् शाकेन किल भारत

संदर्भसंपादित करें

https://books.google.com/books?id=qzUqk7TWF4wC