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सुबन्धु संस्कृत भाषा के एक कवि थे। ये वासवदत्ता नामक गद्यकाव्य के रचयिता हैं।

जीवनकालसंपादित करें

सुबन्धु छठी शताब्दी ईस्वी में हुए ऐसा कहा जाता है। सुबन्धु ने अपने ग्रन्थ में 'श्रीपर्वतः इव सन्निहितः मल्लिकार्जुनः' ऐसा श्रीशैल के विषय में कहा है, इससे वे दाक्षिणात्य थे ऐसा विद्वानों का मत है। उनके काव्य में वर्णनात्मक भाग अधिक है। यद्यपि सुबन्धु ने अपने काव्य में उपमा, रूपक, विरोधाभास, उत्प्रेक्षा, परिसंख्या आदि अलंकारों का भी उपयोग किया है, तथापि श्लेष अलंकार इनका प्रिय रहा है। सुबन्धु की भाषा सुलभ और सरल है। केवल वासवदत्ता ही इनकी एक कृति है।

सन्दर्भसंपादित करें

बाहरी कड़ियाँसंपादित करें