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हिंदी जाति की अवधारणा डॉ रामविलास शर्मा की महत्वपूर्ण स्थापनाओं में से एक है। डॉ॰ रामविलास शर्मा की ‘हिन्दी जाति' की अवधारणा में जाति शब्द का प्रयोग नस्ल (race) या बिरादरी (caste) के लिए न होकर राष्ट्रीयता (nationality) के अर्थ में हुआ है। उन्होंने सर्वाधिक बल अपनी इसी मान्यता पर दिया। अपनी इसी स्थापना के कारण वे सर्वाधिक विवादित और चर्चित भी हुए।

अवधी, ब्रजभाषा, भोजपुरी, मगही, बुंदेलखंडी, राजस्थानी आदि बोलियों के बीच अंतरजनपदीय स्तर पर हिंदी की प्रमुख भूमिका को देखते हुए रामविलासजी ने ‘हिंदी जाति’ की अवधारणा सामने रखी, ताकि इन बोलियों को बोलने वाले जनपदीय या क्षेत्रीय पृथकता की भावना से उबर कर हिंदी को अपनी जातीय भाषा के रूप में स्वीकार कर सकें।

'निराला की साहित्य साधना' द्वितीय खण्ड में इसे स्पष्ट करते हुए रामविलास जी ने लिखा है-

भारत में अनेक भाषाएँ बोली जाती हैं। इन भाषाओं के अपने-अपने प्रदेश हैं। इन प्रदेशों में रहने वाले लोगों को ‘जाति’ की संज्ञा दी जाती है। वर्ण-व्यवस्था वाली जाति-पाँत से इस ‘जाति’ का अर्थ बिल्कुल भिन्न है। किसी भाषा को बोलने वाली, उस भाषा क्षेत्र में बसने वाली इकाई का नाम जाति है। (पृष्ठ 68) अर्थात जाति का सीधा संबंध भाषा से है।

हिन्दी जाति की अवधारणा नयी नहीं है। 1902 की ‘सरस्वती’ में श्री कार्तिक प्रसाद ने ‘महाराष्ट्रीय जाति का अभ्युदय’ नामक लेख लिखा। भारत में जैसे महाराष्ट्रीय जाति है, उसी तरह हिन्दीभाषी प्रदेश में हिन्दी जाति भी है। 1930 में डॉ॰ धीरेन्द्र वर्मा ने ‘हिन्दी राष्ट्र या सूबा हिन्दुस्तान’ नामक पुस्तक लिखी। इस पुस्तक में उन्होंने हिन्दी भाषी प्रदेश का सूबा निर्धारण किया। 1940 में प्रकाशित ‘आर्यभाषा और हिन्दी’ नामक पुस्तक में डॉ॰ सुनीति कुमार चटर्जी ने हिन्दीभाषी जाति का उल्लेख किया है। कामिल बुल्के ने ‘रामकथा उत्पत्ति और विकास’ नामक महत्त्वपूर्ण पुस्तक में रामकथा के प्रसंग में हिन्दी प्रदेश का उल्लेख किया है। इसी तरह हिन्दी साहित्य सम्मेलन के अध्यक्षीय भाषण में राहुल जी ने हिन्दी प्रदेश की सांस्कृतिक उपलब्धियों की विस्तार से चर्चा की थी।

रामविलास शर्मा ने बड़े विस्तार से मध्यकाल से लेकर आधुनिक काल तक राजनीतिक, आर्थिक, व्यापारिक परिवर्तनों के परिप्रेक्ष्य में पूरे देश में हिंदी के सहज, स्वाभाविक विकास का इतिहास प्रस्तुत किया। इस क्रम में उन्होंने राष्ट्रीय संपर्क-भाषा, राष्ट्रभाषा के रूप में हिंदी के विकास को रेखांकित किया, तो दूसरी तरफ अवधी, ब्रज, भोजपुरी आदि बोलियों के बीच हिंदी के जातीय भाषा के रूप में प्रतिष्ठित होने का तथ्य सामने रखा। जिस तरह भाषा के आधार पर बांग्ला, गुजराती, मराठी आदि जातियों की पहचान होती है, उसी तर्ज पर हिंदी प्रदेश के लोग भी जनपदीय बोलियों के आधार पर पहचाने जाने के बजाय एक हिंदी भाषी जाति के रूप में पहचाने जाएं- उनकी यही मंशा थी।

डॉ॰ रामविलास शर्मा हिंदी जाति के साथ-साथ तमिल, तेलगू, उड़िया, बंगाली आदि जातियों की चर्चा भी करते हैं और उनके विकास पर बल देते हैं। लेकिन इस बात पर वे खेद प्रकट करते हैं कि अन्य भाषा-भाषी क्षेत्रों में जातीयता की धारणा जितनी प्रबल है उतनी हिंदी के अंदर नहीं है, इसी कारण साम्प्रदायिकता और जातिवाद (casteism) सर्वाधिक इसी क्षेत्र में देखने को मिलता है। यह क्षेत्र आज भी राजनितिक रूप से विभक्त है, इसका क्षेत्र उत्तर प्रदेश, उत्तरांचल, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, बिहार, झारखंड, दिल्ली, राजस्थान, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश तक विस्तृत है। रामविलास शर्मा भाषावार राज्यों के गठन वाले फार्मूले को हिंदी क्षेत्र में न अपनाए जाने का लगातार विरोध करते रहे। इस संबंध में पी.एन. सिंह ठीक ही लिखते हैं- “रामविलास जी को यह बात आजीवन सालती रही कि भारत में बंगाली, पंजाबी, तमिल, मराठी, गुजराती, तेलगू इत्यादि जातियों का निर्माण तो हो सका और ये राजनीतिक इकाई के रूप में विकसित हो सकीं लेकिन हिंदी प्रदेश में जातीय बोध का अभाव रहा जिसके चलते यह राजनीतिक रूप से विभक्त रहा।” (रामविलास शर्मा और हिंदी जाति, आलोचना, 2001, सहस्राब्दी अंक पाँच) जबकि ऐतिहासिक आर्थिक विकास के साथ बदलते पूँजीवादी संबंधों में जातीय निर्माण व गठन की लंबी प्रक्रिया के बाद हिंदी यहाँ रहने वालों की जातीय भाषा बनी है।

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