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कालचक्र ( तिब्बती भाषा: དུས་ཀྱི་འཁོར་ལོ།, Wylie: dus kyi 'khor lo; Mongolian: Цогт Цагийн Хүрдэн Tsogt Tsagiin Hurden; Chinese: 時輪) बौद्ध धर्म के बज्रयान सम्प्रदाय के दर्शन से सम्बन्धित एक शब्द है।

कालचक्र अथवा 'समय का चक्र', प्रकृति से सुसंगत रहते हुए ज्योतिषशास्त्र, सूक्ष्म ऊर्जा और आध्यात्मिक चर्या के मेल से बना तांत्रिक ज्ञान है। बौद्ध खगोलविज्ञान के अनुसार ब्राह्माण्ड का एक पूरा चक्र चार स्थितियों- शून्य, स्वरूप, अवधि और विध्वंस - से मिलकर बनता है। बौद्ध ग्रंथों के अनुसार कालचक्र के तीन प्रकार हैं- बाह्र, आंतरिक और वैकल्पिक कालचक्र।[1]

बौद्ध धर्म में कालचक्र पूजा विश्व शांति के लिए अद्भुत प्रार्थना मानी जाती है। इसे 'कालचक्रयान' नाम से भी जाना जाता है। कालचक्र अभिषेक द्वारा शांति, करुणा, प्रेम और अहिंसा की भावना को जन-जन तक पहुंचाने का प्रयास किया जाता है। प्रसिद्ध तिब्बती विद्वान तारानाथ के अनुसार भगवान बुद्ध ने चैत्र मास की पूर्णिमा को श्रीधान्यकटक के महान स्तूप के पास कालचक्र का ज्ञान प्रसारित किया था। उन्होंने इसी स्थान पर कालचक्र मंडलों का सूत्रपात भी किया था।

कालचक्र पूजा का सामाजिक पक्ष भी है। इस पूजा के मूल में मानवता की भावना निहित है। कालचक्र पूजा में शामिल होने के लिए जाति-धर्म का कोई बंधन नहीं है। विश्व कल्याण के लिए, सत्य, शांति, अहिंसा, दया, करुणा, क्षमा जैसे मानवीय मूल्यों की स्थापना के लिए कालचक्र पूजा विशेष महत्त्व रखती है। कालचक्र अनुष्ठान पर देश-दुनिया के लोग जाति और धर्म का भेदभाव मिटाकर एकजुट होते हैं।

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