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गुड़ एक मीठा ठोस खाद्य पदार्थ है जो ईख, ताड़ आदि के रस को उबालकर कर सुखाने के बाद प्राप्त होता है। इसका रंग हल्के पीले से लेकर गाढ़े भूरे तक हो सकता है। भूरा रंग कभी-कभी काले रंग का भी आभास देता है। यह खाने में मीठा होता है। प्राकृतिक पदार्थों में सबसे अधिक मीठा कहा जा सकता है। अन्य वस्तुओं की मिठास की तुलना गुड़ से की जाती हैं। साधारणत: यह सूखा, ठोस पदार्थ होता है, पर वर्षा ऋतु जब हवा में नमी अधिक रहती है तब पानी को अवशोषित कर अर्धतरल सा हो जाता है। यह पानी में अत्यधिक विलेय होता है और इसमें उपस्थित अपद्रव्य, जैसे कोयले, पत्ते, ईख के छोटे टुकड़े आदि, सरलता से अलग किए जा सकते हैं। अपद्रव्यों में कभी कभी मिट्टी का भी अंश रहता है, जिसके सूक्ष्म कणों को पूर्णत: अलग करना तो कठिन होता हैं किंतु बड़े बड़े कण विलयन में नीचे बैठ जाते हैं तथा अलग किए जा सकते हैं। गरम करने पर यह पहले पिघलने सा लगता है और अंत में जलने के पूर्व अत्यधिक भूरा काला सा हो जाता है।

गुड़ का उपयोग मूलतः दक्षिण एशिया में किया जाता है। भारत के ग्रामीण इलाकों में गुड़ का उपयोग चीनी के स्थान पर किया जाता है। गुड़ लोहतत्व का एक प्रमुख स्रोत है और रक्ताल्पता (एनीमिया) के शिकार व्यक्ति को चीनी के स्थान पर इसके सेवन की सलाह दी जाती है। गुड़ के एक अन्य हिन्दी शब्द जागरी का प्रयोग अंग्रेजी में इसके लिए किया जाता है।

प्रकारसंपादित करें

गुड़ कई प्रकार और आकार का होते हुए भी वस्तुत: एक ही पदार्थ है। ईख से प्राप्त ईख का गुड़ एवं ताड़ से प्राप्त ताड़ का गुड़ कहा जाता है, पर ईख से प्राप्त गुड़ इतना प्रचलित है कि इसे लोग केवल गुड़ ही कहते हैं। इसके विपरीत भी गुड़ का कई तरह से वर्गीकरण किया जा सकता है, जैसे साफ किया हुआ गुड़ एवं बिना साफ किया हुआ गुड़, छोटी पिंडियों एवं बड़ी पिंडियोंवाला आदि। रख दिए जाने पर, अर्थात् पुराना होने पर, इसके गुणों में परिवर्तन होता जाता है। इसलिये नया गुड़, एवं पुराना गुड़ इस भाँति भी उपयोग में इसका विवरण आता है।

गुड़ में चीनी का बाहुल्य होता है और इसकी मात्रा कभी कभी 90 प्रतिशत से भी अधिक तक पहुँच जाती है। इसके अतिरिक्त इसमें ग्लूकोज़, फ्रुक्टोज़, खनिज (चूना, पोटाश, फासफ़ोरस आदि) भी अल्प मात्रा में रहते हैं। इसमें जल का भी थोड़ा अंश रहता है जो ऋतु के अनुसार घटता बढ़ता रहता है।

गुड़ उद्योगसंपादित करें

गुड़ उद्योग भारत का बहुत पुराना उद्योग है तथा जहाँ जहाँ ईख पैदा होती है, यह उद्योग काफी प्रचलित है। उत्तर प्रदेश में घी उद्योग के बाद इसी का स्थान है। कृषक स्वयं ही पुराने ढंग से गुड़ बनाते हैं। दक्षिण भारत में भी यह उद्योग बहुत प्रचलित है। यहाँ पर गुड़ ईख के रस के अतिरिक्त ताड़ के रस, या मीठी ताड़ी से भी बनाया जाता है। यह रस इन पेड़ों से, विशेष कर ग्रीष्म ऋतु में निकलता है। अब तो भारत के सभी प्रदेशों में, जहाँ ये वृक्ष पाए जाते है, ताड-गुड़-उद्योग को काफी प्रोत्साहन दिया जा रहा है।

गुड़ बनाने की विधियाँसंपादित करें

इसको बनाने के लिए लोहे के उथले कढ़ाहों में गन्ने के रस को भर कर उबाला जाता है। उबालते समय इसे लगातार हिलाया जाता है और इसमें अशुद्धियां निकालने और इसके गुणों में वृद्धि के लिए विभिन्न वस्तुएं मिलायी जाती हैं। समय के साथ रस का पानी उड़ जाता है और बचे हुए अर्ध ठोस गुड़ को साँचों में डाल कर विभिन्न आकारों में जमा दिया जाता है।

ईख के रस सेसंपादित करें

(क) ईख से रस निकालना: देशी कोल्हू के द्वारा लगभग 60-65 प्रतिशत रस निकलता है। यह रस बड़े-बड़े कड़ाहों में डाला जाता है। डालते समय कपड़े से रस छान लिया जाता है, तब यह रस उबाला जाता है।

(ख) रस की सफाई : रस को साफ करने के लिये प्राय: चूने का उपयोग किया जाता है। चूना रस में उपस्थित कार्बनिक अम्लों तथा अन्य अपद्रव्यों से मिल कर रासायनिक परिवर्तन करता है। प्रोटीन के अणु भी रस के गरम होने पर एक दूसरे से परस्पर मिलकर अवक्षिप्त हो जाते हैं। ये सब रस के ऊपर आकर लगभग आधा इंच से लेकर एक इंच तक मोटी तह बनाते हैं। इनमें रस के अधिकांश अपद्रव्य रहते हैं। इन्हें लोहे के बड़े चम्मचों से अलग कर लेते है। चूने के अतिरिक्त विशेष प्रकार के बने कोयले, घास आदि का भी उपयोग अपद्रव्यों को दूर करने के लिए किया जाता है। अपद्रव्यों को अलग करने के पश्चात् रस को उबालते हैं। इससे रस का जल भाप बनकर उड़ता जाता है। जब रस का चौथाई भाग रह जाता है तब चाशनी (syrup) काफी गाढ़ी हो जाती है और इसमें मणिभ बनने के लक्षण दिखाई देने लगते हैं। तब चाशनी को खुले बर्तनों में एक डेढ़ इंच मोटे स्तर में डाल देते हैं। जब यह थोड़ा गर्म ही रहता है तब, जब तक अर्ध ठोस न हो जाए, लकड़ी के बड़े चम्मचों से चलाते हैं। फिर या तो बड़े बड़े साँचों में डाल देते हैं या हाथ में लेकर छोटी-छोटी भेलियाँ (पिंडिया) बनाते हैं।

ताड़ के रस या मीठी ताड़ी से गुड़ बनानासंपादित करें

 
पश्चिम बंगाल में खजूर से मीठे रस से गुड़ बनाया जाता है।

ताड़ी से गुड़ बनाने की विधि लगभग ईख के रस से गुड़ बनाने की भाँति ही है। इसमें अपद्रव्य कम होते हैं। अत: उन्हें छाँटने के लिए चूना इत्यादि देने की आवश्यकता नहीं पड़ती। ईख के गुड़ की अपेक्षा इसमें ग्लूकोज़ की मात्रा अधिक होती हैं एवं चीनी की कम। विटामिन भी इसमें अधिक रहता हैं। अत: स्वास्थ्य की दृष्टि से यह ईख के गुड़ से अधिक लाभकारी है।

गुड़ के गुण पर मिट्टी, खाद आदि का प्रभाव-यदि मिट्टी में विलेय लवणों की मात्रा अधिक रहे तो उसमें पैदा होने वाली ईख का गुड़ प्राय: अच्छा नहीं होता। यह अधिक भूरा एवं जल सोखने वाला होता है तथा वर्षा ऋतु में पसीजता है और हलका काला भूरा सा होता है। उसकी मिठास में भी एक प्रकार का खारापन रहता है। जिस ईख की सिंचाई होती है उसका गुड़ इतना स्वादिष्ट एवं देखने में अच्छा नहीं होता जितना बरानी (बिना सिंचाई के) ईख का होता हैं। किंतु किसी किसी मिट्टी पर सिंचाई का प्रभाव गुड़ के गुणों पर अच्छा भी होता है।

उपयोगसंपादित करें

गुड़ उपयोगी खाद्य पदार्थ माना जाता है। इसका उपयोग भारत में अति प्राचीन काल से होता आ रहा है। भारत की साधारण जनता इसका व्यापक रूप में उपयोग करती है तथा यह भोजन का एक आवश्यक व्यंजन है। इसमें कुछ ऐसे पौष्टिक तत्व विद्यमान रहते हैं जो चीनी में नहीं रहते। स्वच्छ चीनी में केवल चीनी ही रहती हैं, पर गुड़ में 90 प्रतिशत के लगभग ही चीनी रहती है। शेष में ग्लूकोज, खनिज पदार्थ, विटामिन आदि स्वास्थ्य की दृष्टि से उपयोगी पदार्थ भी रहते हैं। आयुर्वेदिक दवाओं तथा भोज्य पदार्थों में विभिन्न रूपों में इसका उपयोग होता है।

गुड़ के अन्य प्रकारसंपादित करें

गुड़ का चूर्ण रूप शक्कर कहलाता है और पंजाब, हरियाणा, दिल्ली और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में इसका सेवन लगभग प्रत्येक ग्रामीण घर में किया जाता है। गुड़ गन्ने के अतिरिक्त खजूर से भी बनाया जाता है। खजूर का गुड़ भारत में मुख्यतः पश्चिम बंगाल और इसके आस पास के क्षेत्रों में प्रचलित है। इसे ताल गुड़ भी कहते हैं।

मसाले वाला गुड़संपादित करें

गुड़ को बनाते समय इसमें विभिन्न मसाले डाल कर मसाले वाला गुड़ तैयार किया जाता है। मसालों में प्रमुख रूप से इलायची, सौंफ, काली मिर्च, मूँगफली और कसा हुआ नारियल मिलाया जाता है। इसे आम तौर पर भोजन के पश्चात हाजमा दुरुस्त करने के लिए खाया जाता है।

गुड़ के औषधीय गुणसंपादित करें

कुछ लोगों द्वारा गुड़ को विशेष रूप से परिशुद्ध चीनी से अधिक पौष्टिक माना जाता है, परिशुद्ध चीनी के विपरीत, इसमें अधिक खनिज लवण होते है। इसके अतिरिक्त, इसकी निर्माण प्रक्रिया में रासायनिक वस्तुएं इस्तेमाल नहीं की जाती है। भारतीय आयुर्वेदिक चिकित्सा के अनुसार गुड़ का उपभोग गले और फेफड़ों के संक्रमण के उपचार में लाभदायक होता है; साहू और सक्सेना[1] ने पाया कि चूहों में गुड़ के प्रयोग से कोयले और सिलिका धूल से होने वाली फेफड़ों की क्षति को रोका जा सकता है। गांधी जी के अनुसार चूँकि गुड़ तेजी से रक्त में नही मिलता है इसलिए यह चीनी की तुलना में, अधिक स्वास्थ्यवर्धक है।[2] वैसे, वह अपने स्वयं के व्यक्तिगत आहार में भी इसका प्रयोग करते थे साथ ही वह दूसरो को भी इसके प्रयोग की सलाह देते थे।

बाजारसंपादित करें

गुड़ का विश्व का सबसे बडा़ बाजार उत्तर प्रदेश का सीतापुर]] जिला है। इसके अतिरिक्त विश्व का गुड़ का दूसरा बडा़ बाजार भी भारत के आंध्र प्रदेश का विशाखापत्तनम जिले में है।

गुड़ खाने के फायदेसंपादित करें

विभिन्न भाषाओं में गुड़ के नामसंपादित करें

  • दक्षिण एशिया में
संस्कृत : गुड (शाब्दिक अर्थ : 'गेंद')
बंगाली, असमिया, ओडिया, भोजपुरी, मैथिली, उर्दू, पंजाबी : गुड़
सिन्धी : गुढ़ (ڳُڙ)
कोंकनी : गोड
मलयालम : शर्क्करा या चक्कर
गुजराती : गोल (ગોળ)
राजस्थानी : गोल गूल
मराठी : गुळ
कन्नड : बेल्ल (ಬೆಲ್ಲ)
तेलुगु : बेल्लम् (బెల్లం)
तमिल : वेल्लम् (வெல்லம்)
सिंहल : हकुरु (හකුරු)
नेपाली : भेली

चित्रावलीसंपादित करें

सन्दर्भसंपादित करें

  1. Sahu, Anand P.; Saxena, Ashok K. (1994). "Enhanced Translocation of Particles from Lungs by Jaggery" (pdf). Environmental Health Perspectives. 102 (S5): 211–214. PMID 7882934. डीओआइ:10.2307/3432088. नामालूम प्राचल |month= की उपेक्षा की गयी (मदद)
  2. Gandhi diet make-up and info

इन्हें भी देखेंसंपादित करें

बाहरी कड़ियाँसंपादित करें